The First Metro में आपका स्वागत है. मैं मानसी फडके हूं. मैं पक्की मुंबईकर हूं. हर पंद्रह दिन में मैं मुंबई के नज़रिए से आपको भारत की एक झलक दिखाने की कोशिश करती हूं. यकीन मानिए, यहां से सब कुछ थोड़ा अलग नजर आता है.
मुझे वह समय याद है जब मैं करीब 23 साल की थी. मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई थी. पहली बार अपनी कमाई और अपनी जिंदगी खुद संभालने की आजादी मिली थी. उस वक्त मेरी दुनिया बस काम और दोस्तों के बीच घूमती थी. हफ्ते में कम से कम एक दिन हम रात 9 या 9.30 बजे तक काम खत्म करते और फिर डिनर, ड्रिंक्स, थोड़ा कराओके या बेफिक्र होकर डांस करने निकल जाते.
आखिरकार मैं जिंदगी के उस दौर में पहुंच गई थी जहां कोई कर्फ्यू नहीं था. लेकिन फिर अचानक एक कर्फ्यू आ गया. फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वह मेरे माता-पिता ने नहीं लगाया था.
यह कर्फ्यू मुंबई पुलिस की सोशल सर्विस ब्रांच के असिस्टेंट कमिश्नर वसंत ढोबले ने लगाया था. जैसे ही पार्टी का माहौल बनने लगता, ढोबले अपनी टीम के साथ, अक्सर कैमरों के साथ, वहां पहुंच जाते और सबको घर लौटना पड़ता. वह बड़े-बड़े रेस्टोरेंट और पब पर छापे मारते थे. वजह कई होती थीं. जैसे तय समय से ज्यादा देर तक खुले रहना, जरूरी लाइसेंस के बिना डीजे म्यूजिक चलाना, जरूरत से ज्यादा भीड़ होना और ऐसी ही दूसरी बातें.
कुछ लोगों ने उन्हें कानून का सख्ती से पालन कराने वाला हीरो माना. उनका कहना था कि उन्होंने उन शराबी लोगों की परेशानी खत्म की, जिनसे इन जगहों के आसपास रहने वाले लोग परेशान रहते थे. वहीं कई लोगों ने उन्हें विलेन बताया. उनके मुताबिक यह ‘मोरल पुलिसिंग’ थी. लोगों ने उनके काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए, खासकर कैमरे लेकर छापा मारने पर.

लेकिन इस बहस में कोई भी किसी भी पक्ष में हो, एक बात तय थी. उस समय मुंबई में लगभग हर कोई वसंत ढोबले का नाम जानता था. यहां तक कि वे लोग भी जो कभी अखबार नहीं पढ़ते थे.
अब बात आज की.
आज मुंबई में लगभग हर कोई, यहां तक कि वे लोग भी जो अमेरिका-ईरान युद्ध की हर खबर रखते हैं लेकिन अपने ही शहर में क्या हो रहा है यह नहीं जानते, महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर तुकाराम मुंढे का नाम जानते हैं. उन्होंने हाल ही में नियमों के उल्लंघन के आरोप में कई मशहूर और बड़े रेस्टोरेंट बंद कर दिए हैं और हर चीज पर बहुत बारीकी से नजर रख रहे हैं.
मैं इन दोनों अधिकारियों की तुलना नहीं कर रही हूं. मैं यह भी नहीं कहूंगी कि दोनों एक जैसे हैं. दोनों का करियर भी बिल्कुल अलग रहा है. लेकिन दोनों हालात में एक जैसी बात जरूर है. जैसे पहले ढोबले का नाम हर किसी की जुबान पर था, वैसे ही आज मुंढे का नाम है. कुछ लोग उनके काम की तारीफ कर रहे हैं, जबकि कुछ लोगों को उनका तरीका जरूरत से ज्यादा सख्त लग रहा है.
मिलिंद देवड़ा जैसे कई नेताओं ने खाने जैसी बुनियादी और जरूरी चीज में सुरक्षा और साफ-सफाई के नियम लागू करने के लिए मुंढे की तारीफ की है. वहीं देवड़ा की शिवसेना के साथी संजय निरुपम समेत कई लोगों ने उनके तरीके को “ड्रेकोनियन” यानी जरूरत से ज्यादा सख्त बताया है.
एक दिन इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते समय मुझे मेरी कॉलेज की पुरानी दोस्त सोनल वेद की एक मजेदार पोस्ट दिखी. सोनल कई कुकबुक लिख चुकी हैं और अपने मजाकिया अंदाज की वजह से सोशल मीडिया पर काफी मशहूर हैं. उन्होंने लिखा, “मुंबई के रेस्टोरेंट ऐसे सफाई कर रहे हैं जैसे उनके ससुराल वाले घर आने वाले हों.” उन्होंने आगे लिखा, “मुंढे गाइड ही अब नया मिशेलिन गाइड है.”
उनका एक और मजेदार कमेंट था.
“देश के सबसे बड़े रेस्टोरेंट में तुकाराम मुंढे. ‘तुम्हारी रसोई में फंगस और बैक्टीरिया क्यों हैं?’
…शेफ. ‘सर, वो कोजी है. वो लैक्टो-फर्मेंटेड पत्ता गोभी है. और वो हमारे जूस पेयरिंग कोर्स के लिए सी बकथॉर्न कोम्बुचा है.'”
उनकी यह बात पढ़कर मैं खूब हंसी. फिर मुझे वह पहली बातचीत याद आई जो मेरी मुंढे से हुई थी, जब उन्हें FDA कमिश्नर बनाया गया था. मैंने उन्हें नई पोस्टिंग की बधाई दी थी, हालांकि इसमें बधाई देने जैसी कोई खास बात नहीं थी. 21 साल के करियर में यह उनका 25वां तबादला था और सिर्फ दो महीने के अंदर दूसरा ट्रांसफर था.

एफडीए में पोस्टिंग मिलने से पहले तुकाराम मुंढे को प्रधान सचिव (आपदा प्रबंधन, राहत और पुनर्वास) बनाया गया था. लेकिन विभाग के मंत्री और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी माने जाने वाले बीजेपी नेता गिरीश महाजन ने उनके साथ काम करने पर आपत्ति जताई. इसके बाद उनकी पोस्टिंग अचानक रोक दी गई.
2005 बैच के आईएएस अधिकारी मुंढे की राजनीतिक गलियारों में अलग पहचान बन चुकी है. ज्यादातर मंत्री उनके साथ काम करने से हिचकते हैं.
ईमानदार और साफ-साफ काम करने वाले मुंढे के लिए सबसे ऊपर सिर्फ नियमों की किताब है. जो भी या जो कोई भी नियमों के बीच आता है, उसे वह नजरअंदाज कर देते हैं. इसी वजह से उनका कई नेताओं से टकराव हुआ.
जब उनकी पोस्टिंग रोक दी गई, तब वह एक महीने तक बिना किसी पद के रहे. इसलिए जब मैंने उन्हें एफडीए कमिश्नर बनने पर बधाई दी, तो शायद वह थोड़ा अटपटा लगा हो. लेकिन मैंने दिल से बधाई दी थी.
हमारे देश में खाने की गुणवत्ता और सुरक्षा के मानक बहुत खराब हैं. नियमों का पालन भी ढंग से नहीं होता. हमने कई बार पढ़ा कि बदेमियां जैसे मशहूर रेस्टोरेंट की रसोई में चूहे मिले. इसके बावजूद लोग वहां के रोल खाना नहीं छोड़ते.
एफडीए कमिश्नर की पोस्ट मुंढे के लिए एक तरह से डिमोशन भी मानी गई. तकनीकी रूप से नहीं, लेकिन प्रधान सचिव से एफडीए कमिश्नर बनना अफसरशाही में आगे बढ़ने के बजाय पीछे जाने जैसा माना जाता है. उनसे पहले श्रीधर दुबे पाटिल 2014 बैच के अधिकारी थे. उनसे पहले 2024 में जिम्मेदारी संभालने वाले राजेश नार्वेकर 2009 बैच के अधिकारी थे.
मैंने मुंढे को मैसेज में लिखा था कि देश के फूड सेफ्टी सिस्टम को साफ करने की बहुत जरूरत है. उनका जवाब मैं साझा नहीं कर सकती क्योंकि वह निजी बातचीत थी. लेकिन वह एक और ट्रांसफर और इस पोस्ट की वरिष्ठता से ज्यादा खुश नहीं दिखे.
चार्ज संभालते ही उन्होंने वही किया जो हर पोस्टिंग पर करते आए हैं. छापे मारे, कार्रवाई की और नियम तोड़ने वालों को लाइन पर लाने की कोशिश की. उन्होंने सबसे पहले पतंजलि पर कुछ बीमारियों के चमत्कारी इलाज के भ्रामक दावे करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई शुरू की. तंबाकू और निकोटिन के अवैध कारोबार पर सख्त मकोका लगाने का फैसला किया. इसके बाद राज्यभर के कई होटल और दुकानों पर छापे मारे. पारसी डेयरी फार्म और के. रुस्तम एंड कंपनी जैसी मशहूर जगहों को अस्थायी रूप से बंद किया. विलिंगडन और सीसीआई जैसे बड़े क्लबों के फूड लाइसेंस निलंबित किए. स्कूलों के आसपास जंक और तली हुई चीजें बेचने पर भी रोक लगा दी.
यह सुनते ही मुझे अपने स्कूल के बाहर मिलने वाला मक्खियों से घिरा कमरख और नमक-मिर्च वाला इमली याद आ गया. कभी-कभी मैं उसकी जगह काला खट्टा बर्फ का गोला खा लेती थी. उसे याद कर थोड़ी पुरानी यादें ताजा हो गईं. लेकिन साथ ही खुशी भी हुई कि मेरी बेटी के स्कूल में न तो जंक फूड मिलता है और न ही ऐसे ठेले लगने दिए जाते हैं. अच्छा है कि मुंढे इसे सभी स्कूलों में लागू कर रहे हैं.
पारसी डेयरी और के. रुस्तम दशकों से मुंबई की पहचान रहे हैं. जुलाई में दोनों पर एफडीए ने कार्रवाई की.

मैंने पहली बार 2016 में तुकाराम मुंढे का नाम सुना था. तब वह नवी मुंबई नगर निगम के आयुक्त थे. अवैध निर्माण, गैरकानूनी फेरीवालों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई कर उन्होंने नवी मुंबई के लोगों के बीच बड़ी लोकप्रियता हासिल कर ली थी.
उस समय राज्य में बीजेपी और अविभाजित शिवसेना की सरकार थी और दोनों दलों के बीच अक्सर टकराव रहता था. नवी मुंबई के नगर आयुक्त मुंढे भी सरकार के भीतर विवाद का बड़ा मुद्दा बन गए थे. कांग्रेस, अविभाजित एनसीपी और अविभाजित शिवसेना ने मिलकर उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया. सिर्फ बीजेपी के छह पार्षदों ने उनके खिलाफ वोट नहीं दिया.
तब मैं हिंदुस्तान टाइम्स में थी और इस खबर को कवर कर रही थी. उसी दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हमारे न्यूजरूम आए थे. मैंने उनसे मुंढे के बारे में पूछा. यह देखकर अच्छा लगा कि उन्होंने खुलकर मुंढे का समर्थन किया.
फडणवीस ने कहा था, “तुकाराम मुंढे बहुत कुशल अधिकारी हैं. नवी मुंबई नगर निगम में कई सालों से कुछ ऐसी व्यवस्थाएं थीं जो कानूनी नहीं थीं और बिल्कुल पारदर्शी भी नहीं थीं. उन्होंने उन्हें बदलने की कोशिश की. इससे कई लोग नाराज हो गए.” उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने मुंढे को सिर्फ जनप्रतिनिधियों से संवाद बेहतर करने की सलाह दी थी.
शिवसेना ने उस समय सामना में उनके खिलाफ संपादकीय लिखा था. उसमें कहा गया था कि पार्टी जी.आर. खैरनार जैसे ईमानदार और साहसी अधिकारियों का समर्थन करती है, जिन्होंने अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी. लेकिन संपादकीय में यह भी कहा गया कि मुंढे गुस्से में काम करते हैं और उनमें संयम की कमी है. अगर बीजेपी पार्षदों को अपनी मर्जी से वोट देने की आजादी होती, तो वे भी अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट देते.
चार साल बाद हालात बदल गए. जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे और नागपुर में मुंढे का कुछ बीजेपी नेताओं से विवाद चल रहा था, तब उद्धव ठाकरे ने उनका खुलकर समर्थन किया. सामना को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “अगर किसी अधिकारी का सख्त रवैया जनता के भले के लिए है, तो उसमें गलत क्या है?”
चार साल बाद बीजेपी को ही मुंढे से दिक्कत होने लगी.
2016 में वापस लौटें तो फडणवीस ने मुख्यमंत्री रहते हुए अविश्वास प्रस्ताव को रद्द कर दिया था. लेकिन आखिरकार पार्षदों के दबाव में आकर पांच महीने बाद ही मुंढे का तबादला कर दिया. जबकि आमतौर पर आईएएस अधिकारी किसी एक पोस्ट पर तीन साल रहते हैं.
मुंढे जहां भी गए, कहानी लगभग वही रही. ज्यादातर आम लोगों ने उनका समर्थन किया. कई जगह तो उनके तबादले के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए.
लेकिन लगभग हर राजनीतिक दल के नेताओं ने उन्हें पसंद नहीं किया. हालांकि ज्यादातर नेताओं की एक बात पर सहमति रही कि मुंढे पूरी तरह ईमानदार अधिकारी हैं. लेकिन उनका कहना था कि वह घमंडी हैं, सख्त रवैया अपनाते हैं और राजनीतिक नेतृत्व को नजरअंदाज कर अकेले फैसले लेते हैं.
मंत्रियों और नेताओं के लिए परेशानी बनने वाली उनकी छवि को देखते हुए कई बार उनकी पोस्टिंग भी राजनीतिक सोच के तहत हुई. जैसे जब उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने के एक महीने बाद बीजेपी के गढ़ नागपुर में उन्हें नगर आयुक्त बना दिया. एक बार बातचीत में मुंढे ने भी कहा था कि उन्हें डर था कि लोग इसे राजनीतिक पोस्टिंग समझेंगे.
ठीक वही हुआ जिसका उन्हें डर था. नागपुर में बीजेपी नेताओं ने उन पर भ्रष्टाचार और गड़बड़ी के कई आरोप लगाए. सरकार ने जांच भी शुरू कर दी. उस समय सरकार के सूत्रों ने मुझे बताया था कि वहां उनका कार्यकाल इतना विवादों से भरा रहा कि उन्होंने खुद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से दखल देने और तबादला करने की मांग की थी. आखिरकार अगस्त 2020 में उनका तबादला हुआ.
एफडीए की पोस्टिंग को भी कुछ लोग राजनीतिक नजरिए से देख रहे हैं. यहां उन्हें एनसीपी के मंत्री नरहरी झिरवाल के साथ काम करना है, जिनसे फडणवीस कथित तौर पर खुश नहीं हैं. हाल के समय में झिरवाल कई विवादों में रहे हैं. उनके विभाग का एक कर्मचारी रिश्वत लेते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो के हत्थे चढ़ा था. बाद में उनका एक कथित वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें वह एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में नजर आए. फडणवीस के नजरिए से देखें तो झिरवाल के साथ ऐसा सख्त अधिकारी होना, जो नेताओं से भी टकरा जाए, शायद बुरा नहीं है.
झिरवाल पर दबाव भी शुरू हो गया है. एफडीए के कई कर्मचारियों ने उनसे शिकायत की है कि काम के घंटे और शिफ्ट में किए गए हालिया बदलावों से उन्हें परेशानी हो रही है.
2022 में जब मुंढे कई महीनों तक बिना पोस्टिंग के थे, तब मैं उनसे दक्षिण मुंबई के एक कैफे में मिली थी. उनके पास न पोस्टिंग थी और न ही कोई दफ्तर. बातचीत के दौरान मैं सोचने लगी कि बार-बार तबादले झेलने वाले अधिकारी के परिवार के लिए यह कितना मुश्किल होता होगा. उनके जीवनसाथी के लिए नौकरी बनाए रखना कितना कठिन होता होगा. बच्चों को बार-बार नवी मुंबई, पुणे, नासिक, नागपुर, मुंबई और पता नहीं किन-किन शहरों के स्कूल बदलने पड़ते होंगे.
मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कभी एक जगह बसकर निजी क्षेत्र में नौकरी करने के बारे में नहीं सोचा. वहां उन्हें ज्यादा वेतन मिलता. अलग-अलग सरकारी क्षेत्रों का उनका अनुभव, साफ-साफ काम करने का तरीका और नियमों के प्रति सख्ती वहां भी बहुत पसंद की जाती.
उन्होंने तुरंत जवाब दिया, “मैं क्यों छोड़ूं? मैं तो सब कुछ सही कर रहा हूं.”
उसी समय एक युवा लड़का, जो शायद कॉलेज का छात्र था, हमारी बातचीत के बीच आ गया. उसने पूछा, “सर, क्या आप तुकाराम मुंढे हैं?”
चश्मा लगाए और छोटी मूंछ वाले मुंढे ने सिर हिलाकर हां कहा.
लड़के ने कहा, “सर, मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं. ऐसे ही अच्छा काम करते रहिए.”
तुकाराम मुंढे जानते हैं कि सरकार के भीतर उनके कई विरोधी हैं. लेकिन वह यह भी जानते हैं कि उनके बहुत से समर्थक भी हैं. यही बात उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है.
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