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Sunday, 20 September, 2026
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लखनऊ के RJ ने शुरू की गोमती की सफाई, 177 रविवारों में 8 वालंटियर से जुड़ गए 8,000 लोग

RJ प्रतीक भारद्वाज ने कूड़े से भरी गोमती नदी को देखने के बाद Go For Gomti शुरू किया. शुरुआत में उन्हें ‘सफाई कर्मचारी’ कहकर मज़ाक उड़ाया गया, फिर धीरे-धीरे करीब 8,000 वालंटियरों का नेटवर्क बन गया, जिसमें बुजुर्गों से लेकर युवा तक शामिल हैं.

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लखनऊ: जैसे ही सूरज की किरणें कुड़िया घाट के गुलाबी पत्थरों से बने गुंबदों पर पड़ना शुरू होती हैं, रेडियो जॉकी प्रतीक भारद्वाज दिन की शुरुआत वैसे ही करते हैं. हेडफोन और माइक्रोफोन की जगह वह नारंगी रंग के रबर के दस्ताने पहनते हैं और एक बड़ी रेक लेकर सफाई में जुट जाते हैं. जल्द ही 10-15 लोग उनके साथ जुड़ जाते हैं. कभी लोग ज्यादा होते हैं, कभी कम, लेकिन यह उनकी नदी सफाई की पहल Go For Gomti की ओर से आयोजित 177वीं सफाई है.

भारद्वाज के लिए यह सब उनकी ज़िंदगी के एक मुश्किल दौर से शुरू हुआ. वे लखनऊ के नंबर एक RJ थे और Radio Mirchi पर आध्यात्म से जुड़ा मॉर्निंग शो करते थे, लेकिन एक हादसे के कारण उन्हें एक महीने तक घर पर रहना पड़ा और अपने श्रोताओं से दूर रहना पड़ा. एक दिन वह गोमती नदी के किनारे सुकून पाने के लिए गए, लेकिन वहां शराब की बोतलें और कूड़ा फैला हुआ था.

उन्होंने कहा, “मैं यहां अपने नाना जी के साथ आया करता था. तब नदी साफ थी, मछलियां साफ दिखाई देती थीं. पहले लोग सच में गोमती को मां मानकर उसकी पूजा करते थे. आज के लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह गोमती है, सीवर की नाली है या कुछ और.” इसके बाद उन्होंने इसके लिए कुछ करने का फैसला किया.

जब भारद्वाज ने 2023 में पहली सफाई मुहिम की घोषणा की, तो 10 लोग भी नहीं आए. अब Go For Gomti एक NGO है, जिसमें करीब 8,000 लोगों का नेटवर्क और करीब 6,000 सदस्यों वाली व्हाट्सएप कम्युनिटी है. पहली सफाई के बाद से हर रविवार लखनऊ के लोग कुड़िया घाट पर गोमती नदी की सफाई के लिए जुटते हैं. अब तक उन्होंने एक भी सफाई अभियान नहीं छोड़ा है.

Go For Gomti की टीम दो घंटे की सफाई मुहिम के लिए दस्ताने पहनती हुई, अब तक की 177वीं सफाई | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
Go For Gomti की टीम दो घंटे की सफाई मुहिम के लिए दस्ताने पहनती हुई, अब तक की 177वीं सफाई | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

शहरों में पानी के स्रोत लंबे समय से कूड़ा फेंकने की जगह की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं और उन्हें बचाने की तुरंत ज़रूरत है, लेकिन नगर निकायों से मदद नहीं मिलने के कारण नागरिकों ने खुद ही इसकी जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी है. इसके पीछे पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और अपने शहर पर गर्व की भावना है. भारत के ‘बीच मैन’ अफरोज शाह हैं, जो वर्सोवा बीच और मुंबई की मीठी नदी से कूड़ा निकालते हैं; जोधपुर के ‘एक्वामैन’ कैरन रॉन्सली हैं, जो पुराने समय की बावड़ियों से गाद निकालते हैं; भारत के ‘लेक मैन’ आनंद मल्लिगावद हैं, जो बेंगलुरु की सूखती झीलों को फिर से जीवित कर रहे हैं; और 20 साल के सुरेंद्र सिंह चौधरी उर्फ बिट्टू तबाही हैं, जो मध्य प्रदेश की अजनार नदी को अपने हाथों से साफ करने के कारण वायरल हुए थे.

ऑफिस में भी ऐसी बातें होती थीं, जैसे, ‘तुम वहां सफाई कर्मचारी की तरह घूम-घूमकर क्या कर रहे हो?’ जब मुझे नगर निगम का एंबेसडर बनाया गया, तो दूसरे चैनलों के RJ कहते थे, ‘सफाई कर्मचारियों का एंबेसडर’

–प्रतीक भारद्वाज, Go For Gomti के संस्थापक

इनमें से ज्यादातर लोगों ने बिल्कुल अकेले शुरुआत की थी. आसपास के लोग रॉन्सली और बिट्टू को ‘पागल’ कहते थे. भारद्वाज ने बताया कि लोग उनका मज़ाक उड़ाते थे और पूछते थे: “आप किस तरह का सफाई कर्मचारियों वाला काम कर रहे हैं?” लेकिन नगर निकायों की लापरवाही से पैदा हुई इस कमी के बीच इन लोगों की व्यक्तिगत मुहिम धीरे-धीरे बड़े नागरिक आंदोलनों में बदल गई. बाद में नगर निकायों ने भी इसमें हिस्सा लेना शुरू किया और नेताओं ने भी उनकी तारीफ की.

जब भारद्वाज ने Go For Gomti शुरू किया, तब तत्कालीन कमिश्नर इंद्रजीत सिंह के नेतृत्व में लखनऊ नगर निगम ने भी इसमें हिस्सा लिया था. नगर निगम ने सफाई कर्मचारियों को भेजा और रविवार की सफाई मुहिम में मदद की, लेकिन हर हफ्ते होने वाली इस सफाई की जिम्मेदारी भारद्वाज और उनके वालंटियरों पर ही बनी रही.

पिछले रविवार को कुड़िया घाट पर नगर निगम के दो या तीन कर्मचारी मौजूद थे, लेकिन रविवार को Go For Gomti के साथ नदी की सफाई में नगर निकाय खुद हिस्सा नहीं लेता. उसके कर्मचारी केवल सफाई अभियान के दौरान वालंटियरों द्वारा इकट्ठा किए गए कूड़े को उठाते हैं.

गोमती में रविवार की शिफ्ट

सुबह 6 बजे के ठीक बाद लोग सफाई के लिए कुड़िया घाट पर धीरे-धीरे पहुंचने लगे. इनमें हर उम्र और अलग-अलग काम करने वाले लोग थे—एक सरकारी कॉलेज की प्रिंसिपल, एक सेल्स एग्जीक्यूटिव, एक MBA स्टूडेंट.

जब पूरा ग्रुप इकट्ठा हो गया, तो उन्होंने “Go For Gomti” का बैनर लगाया और सफाई की तैयारी शुरू कर दी. पहले दो या तीन अभियानों में वे सर्जिकल ग्लव्स इस्तेमाल करते थे, लेकिन जल्द ही उन्हें पता चला कि इससे और कचरा पैदा हो रहा है. अब वे नारंगी रंग के दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले ग्लव्स पहनते हैं. सफाई का बाकी सामान उस वालंटियर के घर पर रखा जाता है, जो जगह के सबसे करीब रहता है और अभियान के लिए उसे साथ लेकर आता है.

गोमती के किनारे पानी पर जलकुंभी और दूसरी वनस्पतियों की मोटी परत जमी हुई है. वालंटियर इन्हें अपने हाथों और लंबी डंडियों से खींचकर निकालते हैं और घाट की ओर खींचकर फुटपाथ पर जमा करते जाते हैं. जो शुरुआत में हरे पौधों का ढेर दिखाई देता है, उसके नीचे जल्द ही फंसा हुआ कचरा दिखने लगता है, जिसमें प्लास्टिक के पैकेट, बोतलें और दूसरी फेंकी गई चीजें शामिल हैं.

प्रतीक भारद्वाज Go For Gomti के वालंटियरों के साथ उस दिन की सफाई के एजेंडे पर चर्चा करते हुए | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
प्रतीक भारद्वाज Go For Gomti के वालंटियरों के साथ उस दिन की सफाई के एजेंडे पर चर्चा करते हुए | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

गंदे पानी में सबसे पहले उतरने वाले व्यक्ति आकाश हैं. वह करीब 20 साल के सेल्स एग्जीक्यूटिव हैं और इस साल अप्रैल में ग्रुप से जुड़े थे. उनके हाथ में रेक जैसी शक्ल वाला सिर लगा एक लंबा डंडा है. उन्हें भारद्वाज की इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए सफाई अभियान के बारे में पता चला था.

उन्होंने कहा, “मैंने मैसेज भेजा और मुझे ग्रुप में जोड़ लिया गया. तब से मैं लगातार आ रहा हूं.”

ग्रुप में शामिल होने से पहले उसे शक था कि कहीं यह ऐसा NGO तो नहीं है, जो “सिर्फ कमीशन और पैसों पर चलता है”.

उन्होंने कहा, “जितना मैंने देखा है, उनमें से ज्यादातर इसी आधार पर चलते हैं, लेकिन जब मैंने देखा कि यहां असल में काम कैसे होता है, तो मैंने सोचा, ‘ठीक है, अब मैं जुड़ सकता हूं; मैं यह कर सकता हूं.’”

Go For Gomti एक NGO के रूप में रजिस्टर्ड है, लेकिन भारद्वाज इसे कम्युनिटी कहना पसंद करते हैं.

उन्होंने कहा, “NGO अक्सर ऐसे लगते हैं जैसे काले पैसे को सफेद और सफेद पैसे को काला करने के लिए बनाए गए हों.”

मोहनलालगंज के एक सरकारी कॉलेज की 50 साल की प्रिंसिपल नीतू मिश्रा के लिए Go For Gomti “परिवार” जैसा है.

तब गोमती सच में एक नदी थी—साफ, जीवंत और हरियाली से भरी हुई. आसपास के बहुत से बच्चों ने यहां तैरना सीखा. आज पानी गंदा हो गया है और नई पीढ़ी उस तरह तैरने या किनारे पर साफ-सुथरे तरीके से बैठने का अनुभव नहीं कर सकती, जैसा हमने किया था

–नीतू मिश्रा, Go For Gomti वालंटियर

उन्होंने कहा, “यहां आने वाला हर व्यक्ति हमारे लिए परिवार है. गोमती की सफाई करना निश्चित रूप से हमारा उद्देश्य है. लेकिन इसके साथ-साथ हमसे जुड़े सभी लोगों की परवरिश और विकास अच्छी तरह हो और वे अच्छे इंसान बन सकें, यह भी हमारे लिए ज़रूरी है.”

मिश्रा Go For Gomti के तीसरे अभियान में शामिल हुई थीं. तब से वह हर रविवार आने की कोशिश करती हैं या जब स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें उन्हें रोकती हैं, तो दूसरे तरीकों से जुड़ी रहती हैं. पिछली सर्दियों में उन्हें हार्ट अटैक आया था, लेकिन टीम उनके संपर्क में रही और वह सोशल मीडिया और लोगों तक पहुंच बनाने के काम में मदद करती रहीं.

उन्होंने कहा, “हर रविवार सदस्य घाट से मुझे वीडियो कॉल करते थे. इससे मेरा जुड़ाव बना रहा. अभी भी मेरे घुटने में दिक्कत है, जिसकी वजह से मैं झुककर सफाई नहीं कर सकती, लेकिन फिर भी मैं हर रविवार अपनी मौजूदगी और नैतिक समर्थन देने के लिए आने की कोशिश करती हूं.”

पुरानी यादें, नए हाथ

40 साल से ज्यादा उम्र के ज्यादातर लोगों की तरह, नीतू मिश्रा की बचपन की यादों में भी साफ गोमती शामिल है. लखनऊ में जन्मीं और पली-बढ़ीं मिश्रा ने बताया कि उनका परिवार पुराने शहर के यहियागंज में रहता था. हर रविवार वह अपने दादा के साथ नखास मार्केट जाती थीं और फिर इमामबाड़ा और रूमी दरवाजा घूमती थीं. उनकी लंबी सैर गोमती के घाटों पर जाकर खत्म होती थी.

उन्होंने कहा, “तब गोमती सच में एक नदी थी—साफ, जीवंत और हरियाली से भरी हुई. आसपास के बहुत से बच्चों ने यहां तैरना सीखा. आज पानी गंदा हो गया है और नई पीढ़ी उस तरह तैरने या किनारे पर साफ-सुथरे तरीके से बैठने का अनुभव नहीं कर सकती, जैसा हमने किया था.”

MBA छात्र आसुतोष मिश्रा गोमती के किनारे से प्लास्टिक और कचरा निकालते हुए | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
MBA छात्र आसुतोष मिश्रा गोमती के किनारे से प्लास्टिक और कचरा निकालते हुए | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

आज इस टीम में ज्यादातर युवा हैं, जो कचरा इकट्ठा करने के लिए नदी और उसके किनारों में उतरते हैं. इनमें से कई को भारद्वाज ने ‘भर्ती’ किया है. उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है और उन्हें अक्सर छात्रों के साथ सेशन करने के लिए वापस बुलाया जाता है. वह पहल के बारे में बात करने का कोई मौका नहीं छोड़ते और इसके बाद कई छात्र सफाई अभियानों से जुड़ चुके हैं.

मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि जाना नहीं है—कभी ऐसा नहीं लगा कि इस जगह को छोड़ दूं. मुझे कभी आलस महसूस नहीं हुआ. और अगर मैं नहीं जाता, तो मेरी टीम का कोई और व्यक्ति आगे आ जाता

–प्रतीक भारद्वाज, Go For Gomti के संस्थापक

इनमें से एक आसुतोष मिश्रा हैं. वह MBA फर्स्ट इयर के स्टूडेंट हैं और नदी में काफी अंदर तक जाकर उन जगहों पर जमा कचरा निकालते हैं, जहां किनारे से पहुंचना मुश्किल है. दूसरों से अलग, उनके पास साफ गोमती की बचपन की यादें नहीं हैं. उनके लिए गोमती शहर के नजारे का ही एक हिस्सा है, लेकिन वह भविष्य में एक साफ नदी और साफ लखनऊ देखना चाहते हैं.

उनके परिवार की किराने की दुकान है, जहां आमतौर पर प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल होता है, लेकिन आसुतोष ग्राहकों को समझाने की कोशिश करते हैं कि वे सामान खरीदने के लिए अपनी थैलियां लेकर आएं.

उन्होंने कहा, “हमारी दुकान पर लोग एक पैकेट दूध खरीदते हैं और प्लास्टिक की कैरी बैग मांगते हैं. इसकी कोई असली जरूरत नहीं है. आप इसे बिना बैग के भी ले जा सकते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “अगर आप रोज सिर्फ एक प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करने से बचें, तो महीने में 30 बैग, साल में 365 बैग—यानी कम से कम 5 से 6 किलो प्लास्टिक बचाया जा सकता है.”

‘सफाई कर्मचारियों के राजदूत’

हाल की स्वच्छ सर्वेक्षण रिपोर्ट में लखनऊ को भारत का तीसरा सबसे साफ शहर बताया गया है और वायु प्रदूषण से निपटने के लिए स्वच्छ वायु इंडेक्स में शहर पहले स्थान पर रहा, लेकिन जब साफ-सफाई की बात आती है तो शहर की तस्वीर दो अलग-अलग तरह की दिखती है. एक तरफ चौक की कचरे से भरी गलियां हैं, तो दूसरी तरफ साफ-सुथरे और अच्छी तरह बनाए गए पक्के रास्तों के बगल में गोमती का कचरे से भरा पानी है.

तीन साल पहले, जब भरद्वाज गोमती के किनारे थोड़ा सुकून पाने पहुंचे थे, जहां उन्होंने तैरना सीखा था—तो उन्होंने देखा कि लोग बोतलें, बीयर के डिब्बे और जो कुछ भी उनके पास था, नदी में फेंक रहे थे. उन्होंने एक बुजुर्ग महिला को भी पूजा की चीजें सीधे पानी में डालते देखा.

उन्हें याद है कि जब उन्होंने उस महिला से इस बारे में सवाल किया, तो उसने उनसे कहा: “मुझे ज्ञान मत दो. अगर हम इसे यहां नहीं डालेंगे, तो और कहां डालेंगे?”

प्रतीक भारद्वाज और गो फॉर गोमती के स्वयंसेवक कुड़िया घाट पर गोमती से जलकुंभी और कचरा निकालते हुए | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
प्रतीक भारद्वाज और गो फॉर गोमती के स्वयंसेवक कुड़िया घाट पर गोमती से जलकुंभी और कचरा निकालते हुए | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

7 मई 2023 को भारद्वाज ने इंसाग्राम पर एक स्टोरी डाली और लखनऊ के लोगों से गोमती की सफाई में उनके साथ जुड़ने को कहा. उस समय उनके करीब 80,000 फॉलोअर्स थे और उन्हें लगा कि अगर 800 लोग नहीं तो कम से कम 80 लोग जरूर आएंगे, लेकिन सिर्फ आठ लोग आए.

उन्होंने कहा, “उस समय लोगों की संख्या एक चुनौती थी, लेकिन मैं आसानी से निराश नहीं होता. मैं बहुत सकारात्मक इंसान हूं, अपनी ज़िंदगी को लेकर आशावादी हूं.”

भारद्वाज ने कोशिश और तेज कर दी. उन्होंने रील्स पोस्ट कीं और पोस्टर लगाए, जिनमें लोगों को दिखाया गया कि गोमती के साथ क्या हो रहा है और इसकी सफाई करना क्यों जरूरी है. इसका असर हुआ. दूसरी सफाई मुहिम में 73 लोग पहुंचे और इसके बाद संख्या लगातार बढ़ती गई. रेडियो मिर्ची और लखनऊ नगर निगम भी इस कोशिश के साथ जुड़ गए.

गोमती से निकाली गई जलकुंभी का ढेर, जिसमें प्लास्टिक और दूसरे तरह का कचरा फंसा हुआ है | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
गोमती से निकाली गई जलकुंभी का ढेर, जिसमें प्लास्टिक और दूसरे तरह का कचरा फंसा हुआ है | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

हर कोई इस काम के लिए उतना मददगार नहीं था. भारद्वाज ने बताया कि उन्हें रेडियो इंडस्ट्री के कुछ साथियों से ताने भी सुनने पड़े.

उन्होंने बताया, “ऑफिस में ही ऐसी बातें होती थीं, जैसे, ‘तुम वहां सफाई कर्मचारी बनकर क्यों घूम रहे हो?’ जब मुझे नगर निगम का एंबेसडर बनाया गया, तो दूसरे चैनलों के RJs कहते थे, ‘सफाई कर्मचारियों का एंबेसडर’.”

शुरुआत में इस सफाई अभियान को 150 दिनों तक चलाने की योजना थी, क्योंकि भरद्वाज को लगता था कि मीडिया इंडस्ट्री और ब्रांड्स के साथ उनका काम उन्हें हमेशा इसे जारी रखने की इजाजत नहीं देगा, लेकिन यह अभियान अपने आप आगे बढ़ता गया. हजारों लोगों ने इसकी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली है.

भारद्वाज ने कहा, “जरूरी यह है कि उस टीम में जोश बनाए रखा जाए, उन्हें प्रेरित रखा जाए, उन्हें समाधान दिए जाएं और उन्हें यह बताया जाए कि वे हमारे लिए कितने मायने रखते हैं. यहां आकर आप अलग-अलग सोच रखने वाले लोगों से मिलते हैं और मुझे लगता है कि गो फॉर गोमती के जरिए जिन लोगों से मैं मिला हूं, वे अब तक मेरी जिंदगी में मिले सबसे अच्छे लोग रहे हैं.”

खस्ता और वंदे मातरम्

जब तक स्वयंसेवक अपना काम पूरा करते हैं, तब तक घाट पर बदलाव साफ दिखाई देने लगता है. जिस हिस्से में वे पिछले दो घंटे से काम कर रहे थे, वहां अब पेड़-पौधों और कचरे का जाल नहीं दिखता. गुलाबी पत्थरों की सीढ़ियों से टकराता पानी भी काफी साफ दिखाई देता है.

रविवार की सफाई मुहिम के बाद कुड़िया घाट के पास गोमती का साफ किया गया हिस्सा | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
रविवार की सफाई मुहिम के बाद कुड़िया घाट के पास गोमती का साफ किया गया हिस्सा | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

जल में तेजी से फैलने वाले पौधों, प्लास्टिक के रैपर, बीयर की बोतलें और डिब्बे, चिप्स के पैकेट, टॉफी के रैपर और डिस्पोजेबल चाय के कपों का एक बड़ा ढेर जमा हो गया है. आखिरकार सफाई का काम खत्म हो जाता है. सभी अपने हाथ धोते हैं, कुछ लोग कपड़े बदलते हैं, जबकि दूसरे लोग उन लोगों की तारीफ करते हैं जिन्होंने सबसे ज्यादा काम किया. इसके बाद वे छोटी-सी बैठक करते हैं, जिसमें बात होती है कि क्या अच्छा हुआ और आगे वे क्या बेहतर कर सकते हैं.

इसके बाद आराम करने और एक लाइव ‘परफॉर्मेंस’ का आनंद लेने का समय आता है. पिछले कुछ महीनों से एक और समूह हर रविवार पास की घास वाली जगह पर आ रहा है और कराओके पर 90 के दशक के हिंदी गाने गाता है. पूरी टीम संगीत का आनंद लेती है और चौक से आने वाले खस्तों का बेसब्री से इंतजार करती है. कुरकुरे खस्ते उनके इस कार्यक्रम का हिस्सा हैं और इसके अलावा उन्हें कुछ और नहीं चाहिए.

सफाई अभियान के बाद खस्ते खाते गो फॉर गोमती के सदस्य | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट
सफाई अभियान के बाद खस्ते खाते गो फॉर गोमती के सदस्य | फोटो: हर्ष तिवारी/दिप्रिंट

बक्से वाले खस्ते लाने की जिम्मेदारी फूलों की सजावट का कारोबार चलाने वाले प्रमोद तिवारी की है. वह 2024 में भरद्वाज का सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखने के बाद इस अभियान से जुड़े थे. उन्होंने कभी साफ गोमती नहीं देखी है. तिवारी ने बताया कि शुरुआत में समूह ने केले को नाश्ते के लिए रखने के बारे में सोचा था, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि वे इससे कुछ ज्यादा अच्छा खाने के हकदार हैं.

उन्होंने कहा, “खस्ता पुराने लखनऊ की पहचान है, है ना? पहले बख्शी का खस्ता था, आजकल चौपटिया का खस्ता ज्यादा मशहूर और स्वादिष्ट है. इसलिए हमने खस्ता खाने की यह परंपरा शुरू की.”

जल्द ही खस्ते आ जाते हैं और सभी लोग उन्हें खाने लगते हैं. अगर खस्ते बच जाते हैं, तो वे वहां से गुजर रहे लोगों को भी अपने साथ खाने के लिए बुलाते हैं. यह घाट पर आने वाले लोगों को इस अभियान के बारे में बताने और उन्हें इसमें शामिल होने का मौका देने का एक और तरीका है.

आखिर में वे ‘वंदे मातरम्’ गाते हैं. सभी एक-दूसरे से हाथ मिलाते हैं और करीब 8:30 बजे रविवार की सफाई मुहिम अगले रविवार तक के लिए खत्म हो जाती है.

व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद यह ऐसी चीज है, जिसका भारद्वाज को इंतजार रहता है.

उन्होंने कहा, “मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं यहां नहीं जाऊंगा—कभी ऐसा नहीं लगा कि इस जगह को छोड़ दूंगा. मुझे कभी आलस महसूस नहीं हुआ. और अगर मैं नहीं जाता, तो मेरी टीम में से कोई और आगे आ जाता.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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