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Tuesday, 18 August, 2026
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सीवर में होने वाली मौतें सालों तक परिवारों को कैसे परेशान करती हैं

सफाई कर्मचारी आंदोलन का अनुमान है कि 2013 में एंटी-मैनुअल स्कैवेंजिंग कानून लागू होने के बाद से सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते हुए 1,726 से ज़्यादा मज़दूरों की मौत हो चुकी है.

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नई दिल्ली: जब भी उनके समुदाय का कोई व्यक्ति उन्हें बताता है कि उसे सीवर साफ करने का काम मिला है, परवीन उन्हें एक ही जवाब देते हैं.

“मत जाओ”, “कुछ और काम ढूंढो. कोई भी दूसरा काम.”

वे जानते हैं कि उनमें से ज्यादातर उनकी बात नहीं मानेंगे. जब काम कम हो और कोई ठेकेदार एक दिन की मजदूरी के लिए कुछ सौ रुपये देने को तैयार हो, तो काम से मना करना हमेशा आसान नहीं होता.

आठ साल पहले, परवीन ने अपने भाई को नहीं रोका था.

32 साल के जोगिंदर 2017 में काम के लिए सीवर में उतरे थे. वे फिर कभी वापस नहीं आए. आज, परवीन किसी खुले मैनहोल के पास से गुज़रते हैं तो उन्हें अपने भाई की याद आती है.

परवीन के भाई जोगिंदर की सीवर साफ करते समय मौत हो गई. इस नुकसान ने न सिर्फ उनके परिवार को बदल दिया, बल्कि परवीन के काम, राजनीति और अपने आस-पास की दुनिया को देखने का नज़रिया भी बदल दिया | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
परवीन के भाई जोगिंदर की सीवर साफ करते समय मौत हो गई. इस नुकसान ने न सिर्फ उनके परिवार को बदल दिया, बल्कि परवीन के काम, राजनीति और अपने आस-पास की दुनिया को देखने का नज़रिया भी बदल दिया | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

उन्होंने बताया कि जोगिंदर की मौत के बाद उनके परिवार ने एक फैसला किया: अब कोई भी दोबारा सीवर में नहीं उतरेगा. न उनके भाई, न उनके बच्चे, न उनके भतीजे, न ही कोई और जिसे वे ऐसा करने से रोक सकते हैं.

सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतें अक्सर एक दिन की खबर बनती हैं और फिर लोगों की याद से गायब हो जाती हैं, लेकिन पीछे छूट गए परिवारों के लिए यह एक बहुत लंबे संघर्ष की शुरुआत होती है. कुछ बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. विधवाएं परिवार की अकेली कमाने वाली बन जाती हैं.

मुआवजा मिलने में कई साल लग सकते हैं. अक्सर इसके लिए सरकारी दफ्तरों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं. अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य को खोने के बाद कई परिवारों को शहर छोड़कर अपने गांव वापस जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है. सीवर में होने वाली मौतों का असर तुरंत होने वाले नुकसान से कहीं आगे तक जाता है. ये मौतें समाज, संस्थागत अन्याय और सरकार की बेरुखी को देखने का उनका नज़रिया बदल देती हैं. कुछ लोगों के पास सफाई के काम को जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, लेकिन परवीन जैसे कुछ लोगों ने इसे अपना मिशन बना लिया है कि अगली पीढ़ी फिर कभी सीवर में न उतरे.

उन्होंने कहा, “जब आप हमारी जाति और समुदाय में पैदा होते हैं, तो बचपन से ही लोग इस काम के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं.”
परवीन वाल्मीकि समुदाय से हैं, “जब तक लड़के 17 या 18 साल के होते हैं, तब तक उनमें से कई यह काम शुरू कर चुके होते हैं.”

जोगिंदर ने भी ऐसा ही किया था. उन्होंने तीसरी या चौथी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया था और किशोर उम्र में ही सफाई का काम शुरू कर दिया था, क्योंकि दूसरे काम के बहुत कम मौके थे.

परवीन के लिए अपने भाई को खोने से सिर्फ उनका परिवार नहीं बदला—इससे इस काम को देखने का उनका नज़रिया भी बदल गया. जो काम पहले आम माना जाता था, अब वे अपना समय लोगों को उससे दूर रहने की चेतावनी देने में लगाते हैं. पीढ़ियों से सफाई का काम एक ऐसी चीज़ माना जाता रहा जिसे करना ही है. जोगिंदर की मौत के बाद परवीन ने तय किया कि यह सिलसिला उनके परिवार के साथ खत्म होगा.

उनकी कहानियां ऐसे संकट के बीच सामने आती हैं जो कानूनी रोक के बावजूद जारी है. सफाई कर्मचारी आंदोलन का अनुमान है कि 2013 में मैनुअल स्कैवेंजिंग के खिलाफ कानून लागू होने के बाद से सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते हुए 1,726 से ज्यादा कर्मचारी मारे गए हैं. इस साल अकेले अब तक 100 से ज्यादा कर्मचारी अपनी जान गंवा चुके हैं.

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा, “अखबार एक-दो दिन इसकी खबर छापते हैं और फिर सब इसे भूल जाते हैं, लेकिन परिवार इसे नहीं भूलते.”

परिवार का बिखरना

सीवर में होने वाली मौत अपने पीछे सिर्फ दुख नहीं छोड़ती. यह परिवार के भीतर के रिश्तों को भी बदल सकती है.

कई परिवारों के लिए मुआवजा, जिसे मिलने में अक्सर कई साल लग जाते हैं—अनिश्चितता का कारण बन जाता है. परिवार महीनों, कभी-कभी सालों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं, दस्तावेज़ जुटाते हैं और मुआवजे के लिए दावा करते हैं. कुछ मामलों में विधवाओं या बुजुर्ग माता-पिता को इस प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती या वे इसे समझ नहीं पाते. उन्हें यह भी पता नहीं होता कि उन्हें कितना मुआवजा मिलना चाहिए या कहीं किसी दूसरे रिश्तेदार ने पहले ही उसके लिए दावा तो नहीं कर दिया है.

पैसा मिलने के बाद भी हमेशा सब ठीक नहीं होता.

परवीन के परिवार में जोगिंदर की मौत के बाद मिला मुआवजा परिवार के बीच दरार की एक और वजह बन गया. परिवार को सरकार से मुआवजा मिला और दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (DICCI) की ओर से एक गाड़ी भी मिली. परवीन का कहना है कि उनके बड़े भाई ने इन फायदों को अपने पास रख लिया. बाकी भाई-बहनों को कुछ नहीं मिला.

वे इस बारे में गुस्से से ज्यादा मजबूरी के भाव में बात करते हैं.

उन्होंने बताया कि जोगिंदर की मौत से पहले सभी भाई एक परिवार की तरह साथ रहते थे. इसके बाद पैसों की परेशानी, नुकसान और मुआवजे को लेकर मतभेदों ने धीरे-धीरे उन्हें एक-दूसरे से दूर कर दिया. आज हर परिवार अलग रहता है और अपनी-अपनी परेशानियां झेल रहा है.

उन्होंने कहा, “अगर मैं सबसे बड़ा भाई होता, तो मैं इस परिवार को कभी टूटने नहीं देता.”

उम्मीदें और हकीकत

दिल्ली के बाहरी इलाके में बसे बगडोला गांव में घर बड़े हैं और गलियां शांत. इस इलाके में जाट और यादव परिवारों के छोटे-छोटे बंगले जैसे घर हैं. इन्हीं के बीच एक ऐसी गली है, जिसे देख पाना भी आसान नहीं है. गली इतनी संकरी है कि उसमें पैदल चलना भी मुश्किल है. ऊपर से चल रहे निर्माण कार्य ने गली के बिल्कुल आखिरी छोर पर बने नीले घर का रास्ता भी रोक रखा है—एक ऐसा घर, जहां पहुंचने के लिए ठीक से सड़क तक नहीं है, लेकिन इस घर का एक अलग पता है. कई साल बाद भी, आसपास के लोग इसे आज भी उस घर के नाम से जानते हैं, जहां एक आदमी की सीवर में मौत हुई थी.

इस टेढ़े-मेढ़े, जर्जर और मुश्किल से खड़े इस नीले घर में सत्यवती, उनके पति और उनके तीन बच्चे रहते हैं. ‘रहते हैं’ कहना शायद सही नहीं होगा—वे मुश्किल से गुज़ारा करते हैं. उनके पति को माली के काम से हर महीने 10,000 रुपये मिलते हैं. परिवार की एक और कमाई तब खत्म हो गई, जब उनके देवर अशोक की सीवर साफ करते हुए मौत हो गई. इसके कुछ समय बाद, उनकी नई-नवेली पत्नी अपनी लगभग दो महीने की बेटी को लेकर घर छोड़कर चली गई. उस बच्ची का नाम भी अभी नहीं रखा गया था. परिवार को नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ, लेकिन वे उसे दोष नहीं देते.

सत्यवती और उनके बच्चों को जब से याद है, तब से उनकी कोई फैमिली फोटो नहीं खिंचवाई गई है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
सत्यवती और उनके बच्चों को जब से याद है, तब से उनकी कोई फैमिली फोटो नहीं खिंचवाई गई है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

सत्यवती ने कहा, “वह जवान थी. उसकी पूरी ज़िंदगी उसके आगे थी.”

एक पूरे परिवार का सपना—दो भाई अपने-अपने परिवारों के लिए कमाते, उनकी पत्नियां एक-दूसरे का साथ देतीं और बच्चे बड़े होकर वह सब बनते जिसकी उन्होंने कल्पना की थी—अधूरा रह गया. परिवार के ये सपने, उनकी उम्मीदें, सीवर में ही बह गईं.

सत्यवती के देवर अशोक की तस्वीरें, जिनकी 2009 में सीवर की सफाई करते समय मौत हो गई थी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
सत्यवती के देवर अशोक की तस्वीरें, जिनकी 2009 में सीवर की सफाई करते समय मौत हो गई थी | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

अशोक की भतीजी कोमल को याद है कि उनके चाचू उन्हें गोद में लेकर घूमते थे और बहुत प्यार करते थे. उनके लिए खिलौने खरीदना, उन्हें आसपास घुमाने ले जाना—सब कुछ उन्हें अच्छे से याद है, लेकिन धुंधला-सा. अब 20 साल की कोमल ने मेरठ में बैचलर ऑफ आर्ट्स की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन परिवार फीस नहीं भर सका, इसलिए उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी.

उस हादसे की एक अखबार की कटिंग जो 17 साल बाद भी सत्यवती की ज़िंदगी को बदल देती है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
उस हादसे की एक अखबार की कटिंग जो 17 साल बाद भी सत्यवती की ज़िंदगी को बदल देती है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

उनके छोटे भाई नवीन, 18, ने स्कूल छोड़ दिया है और अब साइकिल रिपेयर की दुकान पर काम सीख रहे हैं. वह काम सीख रहे हैं, लेकिन अभी कमाई नहीं करते.

सत्यवती के टूटे-फूटे घर के अंदर, उनके देवर की तस्वीर के साथ परिवार की पुरानी तस्वीरें टंगी हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
सत्यवती के टूटे-फूटे घर के अंदर, उनके देवर की तस्वीर के साथ परिवार की पुरानी तस्वीरें टंगी हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

सबसे छोटे, गौरव, इंजीनियर बनना चाहते हैं, लेकिन परिवार उनकी ट्यूशन फीस नहीं भर सका, जिसके बाद वह 9वीं कक्षा में फेल हो गए और दोबारा स्कूल नहीं जा सके. उन्होंने कहा कि वह अपने लिए किसी दूसरी ज़िंदगी की कल्पना नहीं कर सकते.

परिवार को न तो कोई मुआवजा मिला है और न ही सरकार की ओर से कोई मदद. उन्हें यह तक पता नहीं था कि वे किसी मुआवजे के हकदार हैं.

दुनिया को देखने का एक अलग नज़रिया

परवीन की ज़िंदगी सिर्फ उस काम से तय नहीं होती, जिसे वे चाहते हैं कि लोग करना बंद कर दें. सीवर के अंदर उनके भाई की मौत ने उनके आसपास की हर चीज़ को देखने का उनका नज़रिया बदल दिया है. अब उनकी ज़िंदगी और उनके सपने उस जगह से बाहर निकलने की इच्छा से तय होते हैं.

वे एक सरकारी स्कूल में सफाईकर्मी के तौर पर काम करते हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी का ज्यादातर हिस्सा जिस जगह पर उन्हें सबसे ज्यादा अपना लगा, वह एक सॉफ्टबॉल का मैदान रहा है. आसपास के लोग उन्हें “खिलाड़ी” या “मास्टर” के नाम से जानते हैं. उन्होंने बचपन में खेलना शुरू किया था और दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में दूसरे बच्चों के साथ प्रैक्टिस करते थे. उनके पास सामान खरीदने के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे. उन्हें जिन ग्लव्स की ज़रूरत होती थी, उनकी कीमत 2,000-2,500 रुपये थी, इसलिए वे जो मिल सकता था, उसी से काम चलाते थे.

परवीन एक सॉफ्टबॉल खिलाड़ी और कोच के तौर पर अपने काम के लिए देश भर में गए हैं. अपने भाई के साथ जो हुआ, उसे देखने के बाद, उन्होंने कहा कि वह अपने परिवार के किसी और सदस्य को कभी सीवर में नहीं जाने देंगे | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
परवीन एक सॉफ्टबॉल खिलाड़ी और कोच के तौर पर अपने काम के लिए देश भर में गए हैं. अपने भाई के साथ जो हुआ, उसे देखने के बाद, उन्होंने कहा कि वह अपने परिवार के किसी और सदस्य को कभी सीवर में नहीं जाने देंगे | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

कॉलेज के खिलाड़ी प्रैक्टिस करके चले जाते थे. परवीन और दूसरे बच्चे उनके छोड़े हुए सामान का इस्तेमाल करने के मौके का इंतज़ार करते थे. इस खेल ने उन्हें उन जगहों तक पहुंचाया, जहां उनका काम कभी नहीं ले गया. 2004 में वे जूनियर नेशनल्स के लिए धर्मशाला गए और दूसरे स्थान पर रहे.

वे आज भी उन यात्राओं के बारे में ऐसे उत्साह से बात करते हैं, जैसे उन्हें सिर्फ टूर्नामेंट ही नहीं, बल्कि कहीं और जाने की आज़ादी भी याद हो. वे इंदौर, उज्जैन और काशी विश्वनाथ गए. उन्होंने ऐसी वर्कशॉप में भी हिस्सा लिया, जहां खेल की पढ़ाई कर रहे छात्रों को मैदान तैयार करने और खेल खेलने का तरीका सिखाया.

परवीन के लिए, यात्रा सीखने का हिस्सा बन गई, “जब तक आप बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक आप दुनिया को नहीं समझेंगे.”

उन्होंने यही सोच कोचिंग और पिता बनने के अपने तरीके में भी अपनाई है. वे चाहते हैं कि उनके दो बच्चों—पांचवीं कक्षा में पढ़ रही बेटी और पहली कक्षा में पढ़ रहे बेटे—को वे मौके मिलें, जो उन्हें नहीं मिले.

19 साल की उम्र में परवीन का चयन सीमा सुरक्षा बल (BSF) में हुआ था. उन्होंने 12वीं कक्षा पास की थी और राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) का हिस्सा भी रहे थे, लेकिन वे नहीं गए. उन्होंने बताया कि उनकी मां ने उन्हें रुकने के लिए कहा था. वे सबसे छोटे बच्चे थे.

अब वर्दी उनके लिए अपने बच्चों के सपने का हिस्सा बन गई है. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी सेना में जाना चाहती है और वे चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसी ज़िंदगी जीएं, जो उन्हें उस काम से आगे ले जाए जिसे उनके समुदाय से पारंपरिक रूप से करने की उम्मीद की जाती रही है.

उन्होंने कहा, “मैं उन्हें वर्दी में देखना चाहता हूं क्योंकि मैं इसे नहीं पहन सका.”

एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जो अपना दिन सफाई करते हुए बिताता है और जिसके भाई की मौत सीवर के अंदर हुई, यह फर्क मायने रखता है. परवीन अपने सपनों को अमीर बनने के तौर पर नहीं देखते. वे बाहर निकलने की बात करते हैं—मोहल्ले से बाहर, पीढ़ियों से चले आ रहे कामों से बाहर और ऐसी दुनिया में, जहां बच्चे यह चुन सकें कि वे क्या बनना चाहते हैं. बाहर निकलना उस ज़िंदगी की शुरुआत है, जिसकी कल्पना वे अपने परिवार के लिए करते हैं.

एक फैसला जो चुपचाप हुआ

सत्यवती के लिए अशोक की मौत के बाद हुए बदलाव सिर्फ पैसों, काम या बच्चों के भविष्य तक सीमित नहीं थे. इसका असर उनकी धार्मिक पहचान पर भी पड़ा. धीरे-धीरे उनके लिए सुकून पाने का तरीका भी बदल गया.

ऐसा कोई एक पल नहीं था जब उन्होंने ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया हो. उन्होंने इसे अतीत से किसी बड़े या अचानक हुए बदलाव के तौर पर भी नहीं बताया. उन्होंने बस अपने मोहल्ले के छोटे से चर्च में बैठना शुरू किया और वहां भजन सुने. वे बार-बार वहां जाने लगीं, जब तक कि उन्हें वे गाने याद नहीं हो गए.

इस वाल्मीकि परिवार के लिए अशोक की मौत के बाद की ज़िंदगी धर्म और समाज में अपनी जगह को लेकर भी एक बड़े सवाल का सामना करने जैसी हो गई है. उनका घर अलग दिखाई देता है—सिर्फ इसलिए नहीं कि उसकी दीवारें चमकीले नीले रंग की हैं, बल्कि इसलिए भी कि उसकी हालत बहुत खराब है.

मुख्य कमरे में छत पर एक चादर टंगी है, जो उन्हें गर्मियों की तेज़ धूप से बचाती है और ऊपर से लगातार गुज़रने वाले हवाई जहाजों की आवाज़ को कुछ कम करती है. दीवारों पर पुराने कैलेंडर और धूल से भरी परिवार की तस्वीरें लगी हैं. इसके अलावा वहां बहुत कुछ नहीं है.

दीवार पर काफी ऊपर ईसा मसीह की एक तस्वीर लगी है.

सत्यवती ने कहा, “जब भी मैं मंदिर जाती थी, मुझे लगता था कि मुझे अपने साथ कुछ लेकर जाना है—फूल, प्रसाद, यहां तक कि कुछ खुले पैसे भी, लेकिन कई बार मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं होता था. इससे मुझे शर्मिंदगी और बेचैनी महसूस होती थी.”

सत्यवती के घर की दीवार पर जीसस क्राइस्ट की एक अकेली तस्वीर टंगी है, जो अशोक की मौत के बाद उनके विश्वास की एक शांत निशानी है, जब चर्च उनके और उनके परिवार के लिए आराम का ज़रिया बन गया | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
सत्यवती के घर की दीवार पर जीसस क्राइस्ट की एक अकेली तस्वीर टंगी है, जो अशोक की मौत के बाद उनके विश्वास की एक शांत निशानी है, जब चर्च उनके और उनके परिवार के लिए आराम का ज़रिया बन गया | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

उन्होंने पास ही के एक चर्च में जाना शुरू किया. वहां भजन गाना, प्रार्थना करना या बस चुपचाप बैठना उनके लिए सुकून का जरिया बन गया. जल्द ही पूरा परिवार वहां जाने लगा. अब, भविष्य को लेकर डर और अपने बच्चों को बेहतर ज़िंदगी न दे पाने के दुख के बीच, यह सुकून उनके लिए जरूरी हो गया है.

यह एक दिन में लिया गया फैसला कम और अशोक की मौत के बाद धीरे-धीरे बनी एक आदत ज्यादा थी. वे बताती हैं कि उन्हें वहां कोई बड़ा समुदाय नहीं मिला. उनके लिए यह अब भी एक निजी फैसला है, एक ऐसी जगह जहां वे बैठ सकती हैं, गा सकती हैं और थोड़ी देर के लिए उन सारी चीज़ों के बारे में सोचना बंद कर सकती हैं, जो गलत हो गईं.

500 रुपये की राजनीति

परवीन विरोध प्रदर्शनों और सरकार की घोषणाओं पर नज़र रखते हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि अब उन्हें इस बात में कम दिलचस्पी है कि सत्ता में कौन है और इस बात में ज्यादा कि लोग सत्ता के सामने अपनी बात कैसे रखते हैं.

उन्होंने कहा कि जब कोई बड़ा आंदोलन भी खड़ा होता है, तब भी लोग उसमें शामिल होने से हिचकते हैं. वे आपस में बहुत बंटे हुए हैं और अपनी ज़िंदगी चलाने में ही इतने व्यस्त हैं. वे विरोध प्रदर्शनों और अपने आसपास के गुस्से को देखते हैं और सोचते हैं कि एक जैसी समस्याओं का सामना करने वाले लोग एक साथ क्यों नहीं आते. हाल में जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों के बारे में सोचते हुए, उनका मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार जितनी भी ताकतवर हो, उसे भी चुनौती दी जा सकती है, लेकिन तभी, जब लोग आपस में लड़ना बंद करें.

“लेकिन लोग एक नहीं होते.”

इसीलिए परवीन को इस बात पर संदेह है कि बड़े से बड़ा विरोध प्रदर्शन भी लंबे समय तक बदलाव ला सकता है. उनके लिए एकता की यह कमी इस बात में दिखाई देती है कि मशीनों और उन्हें रोकने के लिए बनाए गए कानूनों के बावजूद सफाई कर्मचारी अब भी सीवर में उतरते हैं.

उन्होंने कहा कि समस्या सिर्फ यह नहीं है कि मशीनें उपलब्ध नहीं हैं. वे महंगी हैं, जबकि एक मजदूर की जिंदगी को उतनी अहमियत नहीं दी जाती, “हम जैसा गरीब मजदूर कहेगा, ‘भाई, मुझे 500 रुपये दे दो. शाम को मेरा घर चल जाएगा’, तो उसे नीचे उतरना ही पड़ेगा.”

उन्होंने कहा, “लोग यह नहीं समझते कि सीवर में उतरना आसान नहीं है, लेकिन उसके सामने यह फैसला होता है कि उस दिन उसके परिवार का पेट भरेगा या नहीं.”

सरकारें मशीनों और योजनाओं की घोषणा करती हैं, लेकिन सीवर के बाहर खड़ा मजदूर अब भी यही सोच रहा होता है कि अगर उसने ठेकेदार को मना कर दिया तो क्या होगा.

“उसके पास मुश्किल से कोई विकल्प होता है. उसे नीचे उतरना ही पड़ेगा.”

उनके लिए, आखिरकार राजनीति इसी सवाल पर लौट आती है—क्या कोई मजदूर उस काम को मना करने का खर्च उठा सकता है, जो उसकी जान ले सकता है.

एक बेटा जो अपने पिता को याद नहीं कर सकता

शहर के दूसरे छोर पर राजकुमारी एक और सीवर मौत की लंबी छाया में अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी जी रही हैं. 17 साल पहले उनके पति अजीत की एक पुलिस थाने के परिसर में दिल्ली जल बोर्ड के सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मौत हो गई थी. इसके बाद उन्होंने अपने तीन बच्चों को अकेले पाला.

आज पानी का टैंकर आया है, जिसका मतलब है कि कपड़े और बर्तन धोने का मुश्किल काम भी करना होगा—खासकर उनके सूजे हुए हाथों के साथ. उनके सबसे छोटे बेटे अरुण ने अभी-अभी 18 साल की उम्र पूरी की है. वह दोपहर की धूप के बावजूद घर के बाहर एक पड़ोसी के साथ बैठा है. गर्म हवा ही उसे थोड़ी राहत दे रही है. अंदर रखा कूलर बंद है क्योंकि बिजली का बिल बहुत महंगा है.

राजकुमारी अपने 18 साल के बेटे अरुण के साथ, जिसे अपने पिता की कोई याद नहीं है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
राजकुमारी अपने 18 साल के बेटे अरुण के साथ, जिसे अपने पिता की कोई याद नहीं है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
राजकुमारी के पास अपने पति अजीत की एकमात्र तस्वीर है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
राजकुमारी के पास अपने पति अजीत की एकमात्र तस्वीर है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

जब उनके पिता की एक पुलिस थाने के परिसर में दिल्ली जल बोर्ड के सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मौत हुई, तब अरुण मां का दूध पी रहा था. पीछे राजकुमारी और उनके दो बेटे और एक बेटी रह गए. वे पुलिस कॉलोनी में रहते थे, लेकिन मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने कथित तौर पर मामले को दबा दिया और परिवार को वहां से निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा.

उनका बड़ा बेटा, जो अब 24 साल का है, किशोर उम्र से ही छोटे-मोटे काम करता आ रहा है और फिलहाल एक ज्वेलरी की दुकान पर काम करता है. अरुण ने भी जल्द ही काम करना शुरू कर दिया. राजकुमारी आसपास के घरों में घरेलू सफाई का काम करती थीं, लेकिन हाथों में लगातार दर्द और सूजन के कारण उन्हें काम छोड़ना पड़ा.

उन्होंने कहा, “मेरे बेटों ने मुझसे कहा, ‘हम संभाल लेंगे.’ मैं डॉक्टर के पास जाने का खर्च नहीं उठा सकती, इसलिए वे सिर्फ इतना कहते हैं कि मैं खुद पर ज्यादा जोर न डालूं.”

पति की मौत के सत्रह साल बाद भी राजकुमारी अकेले ही अपने बच्चों को पालने का बोझ उठा रही हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
पति की मौत के सत्रह साल बाद भी राजकुमारी अकेले ही अपने बच्चों को पालने का बोझ उठा रही हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

अब रोहिणी के सेक्टर 3 में अंबेडकर नगर स्थित उनके एक कमरे के किराए के घर में उनका दिन घरेलू कामों के इर्द-गिर्द ही गुज़रता है.पति की मौत के बाद उन्होंने गांव लौटने के बारे में सोचा था, लेकिन उन्होंने कहा कि गांव में बिना ज़मीन की विधवा होना शहर में ऐसी ज़िंदगी जीने से भी ज्यादा मुश्किल है.

राजकुमारी ने कहा, “मेरे बेटों ने मुझसे कहा कि हम या तो पढ़ सकते हैं या काम कर सकते हैं, लेकिन अगर हम पढ़ाई चुनते, तो हमारे सिर पर छत भी नहीं होती. इसलिए यह कभी सच में कोई विकल्प था ही नहीं.”

कमरे के एक कोने में एक छोटा-सा मंदिर है. दीवारों पर गणेश जी, उनके एक बेटे और एक बैडमिंटन रैकेट की तस्वीरें लगी हैं. उनके पति की कोई तस्वीर नहीं है.

उन्होंने कहा, “मैं उनकी तस्वीर भी दीवार पर नहीं लगा पाई. दिन चिंता में बीत जाता है, लेकिन रात में उनकी याद आती है.” उनके पास उनकी सिर्फ एक तस्वीर है, जिसे वे अपने बिस्तर के नीचे सुरक्षित रखती हैं. “मैं सिर्फ अंदर ही अंदर रो सकती हूं. मैं ये बातें किससे साझा करूं? शहर में मेरे किसी रिश्तेदार ने हमारा साथ नहीं दिया.”

अरुण को अपने पिता याद नहीं हैं. उनका अपना अस्तित्व ही उनके पिता के होने का एकमात्र सबूत है. उन्होंने कहा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को याद नहीं कर सकते जिसे उन्होंने कभी जाना ही नहीं. बचपन में, उनकी मां ने बताया, वह पूछते थे कि उनके पिता के साथ क्या हुआ और वे कहां हैं. उनके पास कभी कोई जवाब नहीं था. जैसे-जैसे वह बड़े हुए, उन्होंने खुद ही पूरी कहानी को समझना शुरू किया और आखिरकार सवाल करना बंद कर दिया. चुप रहना कुछ आसान था.

अब अरुण ने कहा कि काम ढूंढने के अलावा सोचने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है. उन्होंने 15 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था और तब से घर के खर्च में मदद के लिए अलग-अलग काम करते रहे हैं. उन्होंने हाल ही में बर्गर की एक दुकान की नौकरी छोड़ दी है, जहां वे रात की शिफ्ट में काम करते थे, लेकिन उन्होंने कहा कि वे फिर से काम करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि कोई बड़ी योजना नहीं है, क्योंकि ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं.

रात में काम करने के दौरान भी वे अपनी मां को फोन करते थे.

उन्होंने कहा, “मैं अपनी मां से कहता हूं कि वह मेरी चिंता न करें. मैं काम कर रहा हूं, लेकिन मुझे उनकी चिंता होती है.”

त्रासदी के पीछे की व्यवस्था

परवीन, राजकुमारी और सैकड़ों दूसरे परिवारों की कहानियां कोई अपवाद नहीं हैं. ये उस सिलसिले का हिस्सा हैं जो मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक तरीके से सीवर साफ करने पर रोक लगाने वाले कानूनों के बावजूद जारी है.

इस नाकामी का आंकड़ा भी अब अलग-अलग है. 21 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित जवाब में सरकार ने कहा कि जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में खतरनाक तरीके से सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते हुए 332 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई.

हालांकि, सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है. संगठन का कहना है कि इसी अवधि में सीवर और सेप्टिक टैंक में 593 लोगों की मौत हुई, जो सरकार के आंकड़े से 261 ज्यादा है. SKA के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने सरकार पर मौतों को छिपाने का आरोप लगाया है और प्रधानमंत्री से इस नाकामी को स्वीकार करने की मांग की है.

SKA के मुताबिक, 2013 में मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास का कानून लागू होने के बाद से 1,700 से ज्यादा कर्मचारी सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते हुए मारे गए हैं. संगठन ने 2022 में 93, 2023 में 102, 2024 में 116 और पिछले साल 121 मौतें दर्ज कीं. इस साल जुलाई के अंत तक ही उसने 113 मौतें दर्ज कर ली थीं.

विल्सन ने कहा, “सीवर में उतरने वाला व्यक्ति लगभग हमेशा परिवार का कमाने वाला सदस्य होता है. कोई भी अपनी इच्छा से अंदर नहीं जाता. वे इसलिए जाते हैं क्योंकि गरीबी है, बेरोजगारी है और सम्मान के साथ जीने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है.”

कोविड-19 महामारी के दौरान मौतों में कमी आने के बाद, ये आंकड़े फिर लगातार बढ़े हैं.

सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने कहा, “मौतों की संख्या बढ़ी है. इससे पता चलता है कि सरकार जो भी कदम उठा रही है, वे पर्याप्त नहीं हैं. मैं कह सकता हूं कि वे कोई बड़ा कदम उठा ही नहीं रहे हैं.”

विल्सन ने कहा कि मार्च से सितंबर के बीच मौतें आमतौर पर बढ़ जाती हैं. इस दौरान और मानसून से पहले व उसके दौरान, कर्मचारियों को बंद सीवर साफ करने और नालों से गाद निकालने के लिए भेजा जाता है.

उन्होंने कहा कि जब उस व्यक्ति की मौत होती है, तो इसका असर सिर्फ तत्काल होने वाले नुकसान तक सीमित नहीं रहता.

“बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. अगर वे एक-दो साल तक पढ़ाई जारी भी रखते हैं, तो कई को आखिरकार पढ़ाई रोकनी पड़ती है. पत्नी विधवा हो जाती है और अक्सर अपने मायके लौट जाती है. परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ता है, कुछ अपने गांव वापस चले जाते हैं और सब कुछ बिखर जाता है. ऐसी अफरा-तफरी पैदा हो जाती है कि वे अपनी जिंदगी दोबारा खड़ी नहीं कर पाते.”

इसके बावजूद, विल्सन ने कहा कि कई मौतों को वह लंबे समय तक मिलने वाला ध्यान नहीं मिलता जिसकी उन्हें जरूरत है. कुछ मौतें दर्ज ही नहीं होतीं, जबकि कुछ को इस तरह दर्ज किया जाता है कि कर्मचारियों की मौत किन परिस्थितियों में हुई, यह साफ नहीं हो पाता.

विल्सन के लिए इन मौतों को रोकने के लिए बाद में मुआवजा देना काफी नहीं है. इसके लिए उन परिस्थितियों को खत्म करना जरूरी है जो लोगों को सीवर में उतरने के लिए मजबूर करती हैं.

उन्होंने कहा, “उन्हें पूरी व्यवस्था को मशीनीकृत करना होगा. इससे भी ज़रूरी है कि जाति और काम के बीच का संबंध खत्म किया जाए. जिन परिवारों ने पीढ़ियों से यह काम किया है, उन्हें सम्मानजनक वैकल्पिक रोजगार दिया जाना चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होता, लोग सीवर में उतरते रहेंगे क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है.”

दरवाजे पर टिकी नज़र

राम कली अपने बेटे के लौटने का इंतज़ार कर रही हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
राम कली अपने बेटे के लौटने का इंतज़ार कर रही हैं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

2012 से राम कली की दुनिया एक लकड़ी की चारपाई तक सिमट गई है.

जब रोहिणी के सेक्टर 3 की झुग्गी बस्ती में उनके एक कमरे के घर के अंदर रोशनी जलती है, तो उसकी रोशनी सबसे पहले उस चारपाई पर पड़ती है, जहां वह अपना ज्यादातर दिन बिताती हैं. दीवारों पर हाल ही में गुलाबी रंग किया गया है. उनके सामने उनका एक साल का पोता अमन फर्श पर खेलते हुए इधर-उधर चलता रहता है.

राम कली उसे चुपचाप देखती हैं और उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है. उन्होंने कहा कि यही उन कुछ चीज़ों में से एक है, जो अब भी उन्हें खुशी देती है.

राम कली के लिए, उनके बेटे की मौत के बाद के साल दुख में बदल गए हैं. आज, उनका पोता उनके जीवन में खुशी के कुछ स्रोतों में से एक है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
राम कली के लिए, उनके बेटे की मौत के बाद के साल दुख में बदल गए हैं. आज, उनका पोता उनके जीवन में खुशी के कुछ स्रोतों में से एक है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

14 साल पहले, उनके 18 साल के बेटे मनोज कुमार एक और दिन काम करने के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण के सीवर में उतरे थे. उन्हें घर वापस आना था, लेकिन वे कभी नहीं लौटे.

इसके बाद के साल दुख में बीतते गए. उनकी सेहत खराब होती गई और धीरे-धीरे उन्होंने चारपाई से बाहर निकलना भी बंद कर दिया. इसी साल जनवरी में—मनोज की मौत के एक दशक से भी ज्यादा समय बाद, परिवार को आखिरकार सरकार से मुआवजा मिला. इसी पैसे से वह छोटा-सा घर बनाया गया, जहां अब वह अपने छोटे बेटे, बहू और अमन के साथ रहती हैं.

राम कली ने याद करते हुए कहा, “दिहाड़ी कमाने का कोई और रास्ता नहीं था. उसके दोस्त उसे सीवर और नालियां साफ करने के लिए अपने साथ ले गए थे. वह रोज जाता था. किसे पता था कि एक दिन वह बाहर नहीं आएगा?”

वह कुछ पल के लिए दरवाजे की तरफ देखती हैं और फिर अपने पोते की ओर मुड़ जाती हैं.

उन्होंने धीमे से कहा, “मैं अब भी इस खाट पर उसका इंतज़ार करती हूं. मुझे लगता है, वह घर आ रहा है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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