भारत की फूड इंडस्ट्री पहले भी ऐसी स्थिति से गुजर चुकी है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने जुलाई 2018 में ‘ईट राइट इंडिया’ आंदोलन शुरू किया था. तब बड़ी फूड कंपनियों ने अपने खाद्य उत्पादों में नमक, चीनी और ‘सैचुरेटेड फैट’ की मात्रा खुद कम करने का वादा किया था. इसके बाद कई कंपनियों ने नए अनुपात वाले फूड आइटम देने की गंभीर कोशिश की.
लेकिन इस प्रयोग ने एक कारोबारी सच्चाई सामने ला दी. मोंडेलेज़ इंडिया ने कैडबरी डेयरी मिल्क को नए रूप में पेश किया, जिसमें चीनी की मात्रा 30 फीसदी कम कर दी गई थी, लेकिन इस प्रोडक्ट की मांग घट गई और आखिर में इसे बंद करना पड़ा. इसके अलावा, पारंपरिक नमकीन बनाने वाली कंपनी हल्दीराम ने कम सोडियम या कम फैट वाले जो प्रोडक्ट लॉन्च किए और बड़ी कोला कंपनियों ने जीरो शुगर वाले जो प्रोडक्ट लॉन्च किए, उन्हें भी ऐसी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
इसका मतलब यह नहीं था कि उपभोक्ता अपनी सेहत को लेकर लापरवाह हैं. स्वास्थ्यप्रद भोजन को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन जब लोग बड़ी संख्या में खरीदारी करते हैं, तो उनके खरीदारी के फैसले स्वाद, आदत, सुविधा और कीमत के आधार पर होते हैं.
यह उस कंपनी के लिए समस्या पैदा करता है जो बदलाव की शुरुआत करती है. अगर एक कंपनी अपने प्रोडक्ट्स में चीनी, नमक या फैट की मात्रा कम करती है और दूसरी कंपनियों के प्रोडक्ट वैसे ही बने रहते हैं, तो एक खास स्वाद के आदी हो चुके उपभोक्ता दूसरे ब्रांड की ओर चले जाते हैं. अपने प्रोडक्ट में बदलाव करने वाली कंपनी कारोबारी जोखिम उठाती है, जबकि दूसरी कंपनियां यह जोखिम नहीं उठातीं.
बदलाव के लिए बराबर की टक्कर
इस वजह से इंडस्ट्री को पैकेट के ऊपर चेतावनी वाले लेबल को किसी झटके के तौर पर नहीं लेना चाहिए. बल्कि यह उनकी समस्या का समाधान कर सकता है.
जिन प्रोडक्ट्स के बीच तुलना की जाती है, उनमें अगर पोषक तत्वों के लिए एक जैसे नियम लागू किए जाते हैं, तो प्रोडक्ट को नया रूप देना अपने आप में कारोबारी जुआ नहीं रह जाता. हर कंपनी को बेहतर करने का प्रोत्साहन मिलता है. तब होड़ स्वादिष्ट, सस्ते और सुविधाजनक प्रोडक्ट को ज्यादा स्वास्थ्यप्रद बनाने की हो जाती है.
लेकिन प्रोडक्ट को नया रूप रातों-रात नहीं दिया जा सकता. स्वाद, रंग और कीमत को प्रभावित किए बिना प्रोडक्ट में चीनी, नमक और फैट की मात्रा घटाकर उसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए नए प्रयोग करने की ज़रूरत होती है. उपभोक्ता की जीभ को नए स्वाद की आदत पड़ने में समय लगता है. इसलिए चिली, पेरू या अर्जेन्टीना जैसे देशों ने कई वर्षों तक चरणबद्ध तरीके से चलने वाली कठिन शुरुआती प्रक्रिया लागू की.
लक्ष्य फूड कंपनियों पर जुर्माना लगाना नहीं, बल्कि स्वास्थ्यप्रद प्रोडक्ट्स के बाजार को बढ़ावा देना होना चाहिए. फूड इंडस्ट्री इस बदलाव को चार तरीकों से एक अवसर में बदल सकती है.

उद्योग के लिए चार अवसर
पहला: इस उद्योग को फूड और पोषण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सामूहिक रूप से निवेश करना चाहिए.
उपभोक्ताओं की पसंद को समझने और प्रभावित करने के लिए कंपनियां बहुत सारे संसाधन खर्च करती हैं. इसमें से एक हिस्सा उपभोक्ताओं, खासकर बच्चों पर खर्च किया जाए जिनकी खानपान की आदत अभी विकसित हो रही है, ताकि उन्हें ज्यादा जागरूक बनाया जा सके.
ज़ाहिर है, शुरुआत स्कूल से की जा सकती है. फूड, पोषण, लेबल, खुराक, चीनी, नमक और फैट के बारे में समझ को जीवन की बुनियादी शिक्षा का हिस्सा माना जाए. दिल्ली के स्कूलों में हाल में फूड, पोषण और लाइफस्टाइल के बारे में जो ‘लिटरेसी प्रोग्राम’ शुरू किया गया है, उसे पूरे देश के लिए ऐसे कार्यक्रम के उपयोगी खाके के रूप में देखा जा सकता है. दूसरे ऐसे प्रयासों के साथ जुड़कर कंपनियां क्लासरूम को बाजार में बदले बिना पोषण के बारे में सार्थक जागरूकता फैलाने का काम कर सकती हैं.
दूसरा: पूरी व्यवस्था स्वास्थ्यप्रद फूड को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने की कोशिश करे.
स्पष्ट है कि शुरुआत पोषक चीज़ों और स्वास्थ्यप्रद चीज़ों में अंतर बताने से करनी है. इसलिए सरकार और उद्योग जगत को यह जांचना चाहिए कि मौजूदा टैक्स व्यवस्था और उद्योगों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लक्ष्यों के अनुरूप हैं या नहीं.
GST की दरों और फूड प्रोसेसिंग के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन की ‘PLI स्कीम’ की गहराई से जांच करने की जरूरत है. फूड प्रोसेसिंग, स्वास्थ्य और वित्त मंत्रालयों के साथ मिलकर FSSAI को यह विचार करना चाहिए कि प्रोडक्ट में बदलाव और स्वास्थ्य के लिहाज से नई खोज करने के लिए दिए जा रहे प्रोत्साहन कितने प्रभावी हैं. इसके साथ खाद्य सामग्री से जुड़े नियमों, उनसे संबंधित टैक्स व्यवस्था और औद्योगिक नीति को भी इसी दिशा में मोड़ना होगा.
तीसरा: पोषण को पर्यावरण, सामाजिक और शासन व्यवस्था से जुड़े ESG फ्रेमवर्क का मूल आधार बनाएं.
कॉर्पोरेट जिम्मेदारियां फूड कंपनियों को ‘रीसाइकिल’ की जा सकने वाली पैकेजिंग, अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल या कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने से नहीं रोक सकती हैं. इसलिए वे जो बेचती हैं, उसका पोषण के मामले में क्या प्रभाव पड़ रहा है, यह भी महत्वपूर्ण है.
खाद्य सामग्री और पेय बनाने वाली कंपनियों को धीरे-धीरे यह बताना चाहिए कि उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स में नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट में कमी लाने के साथ-साथ स्वास्थ्यप्रद पोषण के मानकों को पूरा करने वाले अपने प्रोडक्ट्स का अनुपात कितना बढ़ाया है. खाद्य सामग्री न बनाने वाली कंपनियां भी कार्यस्थलों पर कैफेटेरिया, वेंडिंग मशीन लगाकर, कॉर्पोरेट मीटिंग करके और कामगारों के कल्याण के कार्यक्रम चलाकर स्वास्थ्यप्रद विकल्पों को बढ़ावा दे सकती हैं.
चौथा: स्वास्थ्यप्रद भोजन की कोशिश आखिरकार फूड सर्विस और खुदरा बिक्री के स्तर पर भी होनी चाहिए.
पैकेट पर लेबल की जो व्यवस्था है, उससे रेस्तरां बाहर हैं. फास्ट फूड देने वाली बड़ी चेन मानक रेसिपी, खुराक और मेनू के साथ कारोबार करती हैं. पोषक तत्वों और मेनू की लेबलिंग उन पर भी लागू की जा सकती है.
इसी तरह, पारंपरिक रिटेलर और ई-कॉमर्स कारोबारी अपने संपर्क स्थलों और किराना स्टोरों को इस तरह डिजाइन कर सकते हैं, ताकि रोज के ग्राहक स्वास्थ्यप्रद चीजों को आसानी से देख और चुन सकें.
प्रतिरोध से अगुआई तक
जब बात चेतावनी देने वाले लेबलों की आती है, तब कंपनियां ब्रांड, बिक्री, उन्हें लागू करने के खर्च और उपभोक्ता की धारणा को लेकर चिंता करने लगती हैं. ये चिंताएं स्वाभाविक हैं और उन पर गंभीरता से काम करने की ज़रूरत है. जो बदलाव आना ही है, उसका विरोध करना एक गलती ही होगी.
भारत की प्रमुख फूड कंपनियों ने 2018 में ही समझ लिया था कि नमक, चीनी और फैट की मात्रा घटाना बहुत ज़रूरी है. स्वैच्छिक बदलाव से सभी कंपनियों के लिए बराबर की प्रतिस्पर्धा की स्थिति नहीं बन पाई थी.
पैकेट पर चेतावनी वाले लेबल अब एक समान व्यवस्था उपलब्ध करा सकते हैं, जिसके कारण कोई एक कंपनी अकेले ही कारोबारी जुआ नहीं खेलेगी.
बदलाव से पहले के समय का इस्तेमाल न केवल पैकेजिंग के लेबल का नया डिजाइन तैयार करने में किया जा सकता है, बल्कि प्रोडक्ट्स को ही पूरी तरह नया बनाने में किया जा सकता है.
सरकार को ज़रूरी नियम बनाने और उचित वित्तीय प्रोत्साहन देने चाहिए. इस उद्योग को नई खोज करनी चाहिए. स्कूलों में फूड को लेकर जानकारी दी जानी चाहिए और उपभोक्ता धीरे-धीरे अपनी पसंद विकसित कर सकते हैं. ये सारे उपाय मिलकर ऐसी व्यवस्था तैयार कर सकते हैं, जिसमें स्वास्थ्यप्रद फूड को नियमों का बोझ न माना जाए, बल्कि एक कारोबारी अवसर के रूप में अपनाया जाए.
भारत को सार्वजनिक स्वास्थ्य के पैरोकारों और फूड इंडस्ट्री के बीच लंबी रस्साकशी नहीं चाहिए. जरूरत यह है कि फूड इंडस्ट्री एक स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में एक प्रमुख साझीदार के रूप में आगे आए.
खाद्य सामग्री के पैकेट पर छपा चेतावनी का ‘रेड हेक्सागन’ कोई मामूली चिह्न नहीं है. यह एक बड़ी मुहिम का संदेश बन सकता है, भारत में खानपान में आ रहे बदलाव की मुहिम का.
पवन अग्रवाल फूड फ्यूचर फाउंडेशन के CEO और FSSAI के पूर्व CEO हैं. उनका एक्स हैंडल @Pawan_Connect है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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