तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जोसफ विजय के नेतृत्व वाली ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (टीवीके) पार्टी की सरकार को राज्य की कमान संभाले चार महीने हो चुके हैं. एक मशहूर तमिल कहावत है— ‘ओरू पाणी सोत्रुक्कू ओरु सुरू पदम’, जिसका अर्थ है: चावल का एक दाना बता देता है कि पूरा भात पक गया है या नहीं.
इसलिए, चार महीने यह अंदाजा लगाने के लिए काफी हैं कि तमिलनाडु का शासन किस दिशा में आगे बढ़ रहा है. यही बात टीवीके सरकार के ‘शासकीय’ फ़ैसलों और कदमों के लिए भी कही जा सकती है.
राज्य विधानसभा में इस सरकार के दो बड़े फ़ैसलों और एक एक्शन को हम चावल के उस एक दाने के रूप में ले सकते हैं. कार्यपालिका ने एक फैसला तो चेन्नै के पास परांदुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण की परियोजना को रद्द करने का किया है, और हड़बड़ी में किया गया दूसरा फैसला ठीक चेन्नै बीच (समुद्रतट) पर विशाल सचिवालय भवन का निर्माण करवाने का है. तीसरा मामला 7 सितंबर को राज्य विधानसभा में मुख्यमंत्री के एक बदनुमा प्रदर्शन का है.
इन सब पर विस्तार से विचार करने की जरूरत है, ताकि इन फ़ैसलों और कदमों के ‘नवाबी’ तेवर को समझा जा सके.
‘प्रकृति’ और विकास के मुद्दों पर यू-टर्न
परांदुर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना को ही लें. विजय ने इसे इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि उन्होंने पहके ही उस इलाके के गांववालों से इसका वादा किया था, जिनकी बेहद कमाऊ कृषि भूमि छिन जाने वाली थी. विजय ने कहा था: “मैं विकास के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मैं इस हवाई अड्डे का इसलिए विरोध करता हूं कि यह प्रकृति से भारी कीमत वसूलता.“ उन्होंने कहा था कि चेन्नै को साल-दर-साल विनाशकारी बाढ़ का मुख्यतः इसलिए सामना करना पड़ता है क्योंकि पानी के बहाव के प्राकृतिक चैनलों को नष्ट किया जा रहा है. सत्ता में आने के बाद उन्होंने इस वादे को मुख्य रूप से उस क्षेत्र की कमजोर पारिस्थितिकी और किसानों के कल्याण के मद्देनजर सरकारी नीति के रूप में अपना लिया है.
यह तो अच्छी बात है, लेकिन इस फैसले के चंद दिनों के बाद ही उनके उद्योग मंत्री ने विधानसभा में घोषणा कर दी कि सरकार ने उद्योग तथा दूसरे मकसद के लिए जितनी जमीन का अधिग्रहण किया है उनका इस्तेमाल करने पर विचार कर रही है. लेकिन 5,000 एकड़ से ज्यादा जमीन प्रकृति को और किसानों को लौटाने की कोई बात नहीं की जा रही है ताकि किसान अपनी खेती फिर शुरू कर सकें, जो कि उद्योग लगाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है. गुप्त एजेंडा बहुत सरल-सा लगता है: इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास से संबंधित परियोजना को किसी बहाने रद्द कर दो और कृषि भूमि को ‘मुनाफे वाले’ रियल एस्टेट के विकास की भेंट चढ़ा दो. इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास से संबंधित इस काफी महत्वपूर्ण परियोजना के लिए किसी वैकल्पिक स्थान की अभी तक पहचान नहीं की गई है.

इसके बाद, चेन्नै के पट्टणिपक्कम में 20 लाख वर्गफुट जमीन पर 15 मंज़िला सचिवालय भवन बनवाने का फैसला किया जाता है. यह निहायत बेकार कदम है, और समुद्रतटीय नियमन क्षेत्र के नियमों के मद्देनजर गंभीर सवाल खड़े करता है. 25.55 एकड़ का यह क्षेत्र तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड के अधीन है, और बिलकुल समुद्रतट पर है, जहां से मात्र कुछ मीटर की दूरी पर बंगाल की खाड़ी से ऊंची लहरें आती हैं. पट्टणिपक्कम मशहूर मरीना बीच के विस्तार-क्षेत्र में आता है. यह पुरानी मद्रास सिटी के भीड़भाड़ वाले मायलापुर इलाके का हिस्सा है, जहां ट्रैफिक का आज ही यह हाल है कि वह रेंगती रहती है.
समुद्र के सतह में वृद्धि के खतरों के कारण यह परियोजना चेन्नै तट के लिए एक पारिस्थितिकीय विनाश साबित हो सकती है. वहां बड़ी संख्या में मछुआरों की रोजी-रोटी छिन सकती है और वे भारी आर्थिक संकट में फंस सकते हैं. मछुआरों और पर्यावरण की रक्षा में जुटे एक्टिविस्ट्स ने इस परियोजना का भरी विरोध करते हुए चिंता जाहिर की है कि इससे तटवर्ती आबादी की आजीविका, बीच तक जाने का रास्ता और जलवायु परिवर्तन के कारण यह क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है.
विडंबना यह है कि विजय ने यह फैसला कथित रूप से एक ज्योतिष की इस सलाह पर किया है कि मुख्यमंत्री के कार्यालय का मुख समुद्र की ओर होना चाहिए. यह उन्हें इतना भाग्यशाली बना सकता है कि वे प्रधानमंत्री तक बन सकते हैं. संयोग से, विजय का सुपर लक्जरी अपार्टमेंट इस प्रस्तावित स्थल के सामने सड़क के दूसरी तरफ ही है.
सीएम की कुर्सी पर सिनेमा
इस बीच, विधानसभा में पुलिस विभाग के लिए अनुदान की मांग पर बहस का विजय ने मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरह जवाब दिया वह अपमानजनक ही था. विपक्ष के नेता के जायज सवालों का जवाब देते हुए विजय ने लीक से हटकर डीएमके पार्टी की आलोचना शुरू कर दी कि वह इमरजेंसी वाले दौर के कुख्यात ‘मीसा’ कानून का बार-बार जिक्र कर रही थी. उन्होंने अपनी दाहिनी हथेली को अपमानजनक ढंग से जबड़े के पास लाया, जिसका मतलब यह लगाया गया कि वे ‘मीसा’ कानून के तहत गिरफ्तारी के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के जबड़े को पहुंची चोट की नकल कर रहे थे. उन्होंने सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के प्रासंगिक ब्योरों और डीएमके में भ्रष्टाचार के खिलाफ ईडी के नोटिस का भी जिक्र किया.
अपने भाषण के लहजे और हावभाव से विजय ने यही प्रदर्शित किया कि वे महज एक फिल्म अभिनेता ही हैं, अभी मुख्यमंत्री नहीं बने हैं. बाद में उन्होंने दावा किया कि यह “अनजाने” में हो गया।. इस बात ने मामले को और बिगाड़ दिया.

केवल जनकल्याण ही शासन नहीं है
जहां तक विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार के ‘शासन’ के एजेंडा का सवाल है, उसमें ‘जनता के लिए रेवड़ियों’ की लंबी फेहरिस्त ही दिखती है. यह सूची उनकी व्यक्तिगत वेबसाइट पर उपलब्ध है. ‘टीवीके शासन का जनादेश-2026’ नामक इस सूची में ‘गारंटियों’ का लंबा खाका दिया गया है, जिनमें से इन गारंटियों को लागू कर दिया गया है— 200 यूनिट बिजली मुफ्त देना, ‘सिंगापेन सिरप्पु अतिरडि पडै’ (लायन महिला सुरक्षा सेना) का गठन, ड्रग्स विरोधी टास्क फोर्स का गठन, 17 TASMAC दुकानों को बंद करना, महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा (वेत्री पायनम) की सुविधा, सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में वृद्धि. दूसरी और कई योजनाएं तैयार की जा रही हैं.
इन्हें ज्यादा से ज्यादा सरकारी फैसले और कार्यक्रम ही कहा जा सकता है, शासन नहीं. भूल और भ्रम हो रहे हैं क्योंकि ‘शासन’ को अक्सर ‘सरकार’ मान लिया जाता है.
राष्ट्रीय या प्रादेशिक स्तर पर शासन को तमाम तरह के मसलों के प्रबंधन में राजनीतिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक सत्ता का उपयोग माना जाता है. शासन में जटिल क्रियाविधियां और प्रक्रियाएं शामिल होती हैं, और वे संस्थाएं शामिल होती हैं जिनके जरिए नागरिक और नागरिक समूह अपने हितों को तय करते हैं, अपने मतभेदों को सुलझाते हैं और अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल और अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं. अच्छा शासन सहभागी, पारदर्शी, और जवाबदेह होता है. इसमें सरकार भी शामिल है और वह उसका प्रमुख हिस्सा होती है लेकिन शासन निजी क्षेत्र और सिविल सोसाइटी को शामिल करके उससे आगे निकल जाता है.
शासन को संयुक्त उपक्रम होना चाहिए
सवाल यह है कि शासन ‘व्यक्तिपूजा-केंद्रित’ हो, ‘सरकार-केंद्रित’ हो, या ‘समाज-केंद्रित’ हो? एक सच्चे लोकतंत्र में न तो व्यक्तिपूजा-केंद्रित शासन को आगे किया जा सकता है, न सरकार-केंद्रित शासन को, जो सरकार को सर्वशक्तिमान बना देता है. तानाशाही के विपरीत, लोकतंत्र में शासन को समाज-केंद्रित होना चाहिए जिसमें भागीदारी और भूमिका-निर्वाह निम्न प्रकार से हो सकता है :
- सत्ताधारी तंत्र की सरकारें अनुकूल राजनीतिक, प्रशासनिक, कानूनी, और जीवंत माहौल बनाती हैं. ऐसे सरकारों का गठन जमीनी लोकतंत्र की प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए.
- व्यापार, वाणिज्य, कृषि, और उद्योग के जरिए जिस निजी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व होता है वह उद्यमशीलता को बढ़ावा देता है और रोजगार तथा आमदनी पैदा करता है.
- स्वयंसेवी क्षेत्र के जरिए जिस सिविल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व होता है वह विभिन्न समूहों को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए सक्रिय करता है. यह संघर्षों का भी निबटारा करती है.
ऐसा शासन एक संयुक्त उपक्रम होता है. इस लिहाज से शासन को कामकाज के कुछ मानदंडों और सिद्धांतों का पालन करना चाहिए. इनमें ये सब शामिल होते हैं— सभी दावेदारों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना; शासन तथा समाज के सभी स्तरों पर पारदर्शिता और जवाबदेही; सामाजिक तथा सार्वजनिक कल्याण, आर्थिक वृद्धि और विकास; सरकार तथा सिविल सोसाइटी की सभी संस्थाओं के बीच संतुलित संबंध; सरकारी कार्यक्रमों तथा नीतियों की सामाजिक समीक्षा; ‘ओम्बड्समैन’ जैसे पद का आवश्यक गठन और उन्हें निर्भय होकर काम करने की सुविधा; और कार्यकुशल तथा निष्पक्ष न्यायिक व्यवस्था.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयंसेवी क्षेत्र जिस सिविल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व करता है उसके लिए पर्याप्त गुंजाइश हो कि वह सरकारों के ‘विकास’ एजेंडा पर अपने विचार बिना किसी भय या लगाव के खुल कर जाहिर कर सके.
तमिलनाडु में व्यक्तिपूजा
तमिलनाडु में शासन न तो सरकार-केंद्रित है और न समाज-केंद्रित बल्कि वह जोसफ विजय की व्यक्तिपूजा-केंद्रित है, जिन्हें सुपर हीरो, कमजोर तबकों, और निहित स्वार्थों द्वारा पीड़ित लोगों के रक्षक, गरीबों के मसीहा, और नैतिक विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है.
उन्हें ‘अण्णा’ (बड़े भाई) के रूप में प्रचारित करना इस रणनीति का आधार बन गया. इसे चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया पर रीलों और मीमों के जरिए खूब फैलाया गया. इसमें जनता के बीच विजय की असाधारण, साहसी और ऊर्जावान युवा की फिल्मी छवि का पूरा लाभ उठाया गया. यह छवि फिल्मों में एक साथ दर्जनों विलेन को मार गिराने वाले, और रीलों में शासन की जटिल समस्याओं को चुटकी में हल कर डालने के उनके दृश्यों ने बनाई.
अब वे जिस सरकार के मुखिया हैं, उसे भी इसी तरीके से चलाया जा रहा है. इसे उन्होंने सिनेमा और मनोरंजन उद्योग से तमाम तरह के सलाहकारों से खुद को घेरकर और मजबूती ही दी है. नौकरशाही गौण भूमिका में है और चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त चीफ सेक्रेटरी ने या तो अपनी भूमिका त्याग दी है या इस व्यक्तिपूजा में शरीक हो गए हैं.
सकारात्मक बात यह है कि विजय ने प्रशासन के ऊंचे स्तर पर भ्रष्टाचार पर कथित रूप से लगाम लगाया है. लेकिन नकारात्मक बात यह है कि उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार को बेकाबू छोड़ दिया है. टीवीके और विजय ने चुनाव में विधानसभा की 234 में से 108 सीटें जीतीं. इसके बाद उन्होंने कॉंग्रेस, माकपा, भाकपा, और वीसीके (विदूतलै चिरुतैगल कात्ची) पार्टियों के विधायकों को साथ लेकर कुल 118 सीटों का कामचलाऊ बहुमत जुटा लिया, जबकि इन पार्टियों ने मौजूदा प्रमुख विपक्षी दल डीएमके के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. विजय ने एआइडीएमके जैसे दूसरे विपक्षी दल से भी दलबदल को बढ़ावा दिया, जिसके कुछ विधायक आज अधर में लटके हुए हैं. ये आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि विजय ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की मर्जी के आगे झुककर तमिल पहचान से समझौता किया है.
तमिलनाडु आज एक ऐसे नौसिखुए जमात के हाथों में है जिसे प्रशासन, राजनीति या नेतृत्व का कोई अनुभव नहीं है, जिसने सिनेमाई करतबों, प्रोपगंडा रीलों, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का भारी दुरुपयोग करके सत्ता हासिल किया है. इसके नेता को शासन चलाने का कोई ज्ञान नहीं है, वह केवल फिल्म अभिनेता-केंद्रित माहौल बनाकर शासन चलाना जानता है. जोसफ विजय बस यही कर रहे हैं.
एम.जी. देवसहायम एक रिटायर्ड IAS अधिकारी और ‘पीपल-फर्स्ट’ के चेयरमैन हैं. उन्होंने भारतीय सेना में भी सेवा की है. वे ‘इमरजेंसी एंड नियो-इमरजेंसी: हू विल डिफेंड डेमोक्रेसी?’ किताब के लेखक हैं. विचार निजी हैं.
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