नई दिल्ली: 15 सितंबर को सऊदी अरब ने कहा कि उसकी एयर डिफेंस ने मक्का के ऊपर एक हूती ड्रोन को नष्ट कर दिया. उसने चेतावनी दी कि दो पवित्र मस्जिदों और जायरीनों पर किसी भी हमले को “रेड लाइन” माना जाएगा. दो दिन बाद, किंगडम ने कहा कि इंटरसेप्ट किए गए ड्रोन का मलबा गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गए.
हालांकि, ईरान-समर्थित हूती मिलिशिया ने इन आरोपों से इनकार किया. हूती सैन्य प्रवक्ता अब्दुल मलिक अल हूती ने कहा, “यमन की तरफ से पवित्र स्थलों को कोई खतरा नहीं है. हमारे ऑपरेशन उसकी तेल सुविधाओं और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हैं…”
कई देशों से एकजुटता मिलने के बावजूद, रियाद को अभी तक वह चीज नहीं मिली है जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है—अपने उन साझेदारों से सैन्य मदद, जिनके साथ उसके सुरक्षा समझौते हैं, खासकर पाकिस्तान से.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का पर कथित हमले की निंदा करते हुए इसे “घिनौना और जघन्य” बताया और “अधिकतम संयम” बरतने की अपील की. उन्होंने 18 सितंबर को कहा कि हरमैन शरीफैन यानी मक्का और मदीना की दो पवित्र मस्जिदों की सुरक्षा और पवित्रता “हर पाकिस्तानी के दिल के बेहद करीब रहने वाला कर्तव्य” है.
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने भी शरीफ की बात दोहराई.
इस समय सिर्फ बयान देने की बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब ने हाल ही में, जैसा कि मक्का समझौते पर हस्ताक्षर से दिखा, अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने और अमेरिका की संभावित दूरी से बचने के लिए अपने साझेदारों को बढ़ाने की कोशिश की है. अमेरिका पश्चिम एशिया में लंबे समय से पारंपरिक सुरक्षा गारंटर रहा है.
मक्का समझौता: शुरू होने से पहले ही खत्म?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने 7 अगस्त को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. फिर भी, न तो अंकारा और न ही इस्लामाबाद ने कोई ठोस मदद दी, जबकि जिस शहर मक्का में यह तीनों देशों के बीच समझौता हुआ था, वहीं कथित तौर पर हमला हुआ.
शरीफ की तरह तुर्किये ने भी हमले की निंदा की और इन हमलों को तुरंत रोकने की अपनी अपील दोहराई. उसने तनाव कम करने की बात कही. पाकिस्तान और तुर्किये दोनों ही सऊदी अरब के युद्ध में सीधे शामिल होने से बचते दिख रहे हैं.
कुछ विशेषज्ञ मौजूदा तनाव को मक्का समझौते की पहली परीक्षा मान रहे हैं. वहीं, कुछ का कहना है कि इस समझौते को अभी संस्थागत रूप नहीं दिया गया है और न ही हस्ताक्षर करने वाले देशों ने इसे मंजूरी दी है.
पाकिस्तान और तुर्किये के अधिकारियों ने एसोसिएटेड प्रेस को नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उन्हें हूतियों की बढ़ती गतिविधियों के जवाब में सऊदी अरब की तरफ से मदद का कोई अनुरोध नहीं मिला है.
पाकिस्तान के पूर्व राजदूत और रिटायर्ड मेजर जनरल रजा मुहम्मद ने दिप्रिंट को बताया कि मक्का समझौता पूरी तरह रक्षात्मक है.
उन्होंने कहा, “यह किसी भी साझेदार देश पर हमले के खिलाफ सामूहिक रोकथाम की व्यवस्था पर आधारित है. जब सऊदी अरब, तुर्किये या पाकिस्तान पर सीधे हमला होता है या उसकी क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन होता है, तो दूसरे साझेदार सामूहिक फैसले के बाद प्रतिक्रिया दे सकते हैं.”
उन्होंने आगे कहा कि सऊदी अरब हूतियों का सामना करने के लिए तैयार है और लंबे समय से ऐसा करता आया है. उन्होंने कहा, “नई स्थिति जो इस मामले को मुश्किल बनाती है, वह है अमेरिका और हूतियों के बीच युद्धविराम समझौता और अमेरिकी राष्ट्रपति का उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने से इनकार.”
पिछले गुरुवार को, एक Axios रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दो बार फोन किया और उनसे हूतियों के खिलाफ हमले करने की अपील की. उस समय ईरान समर्थित समूह लाल सागर के एक महत्वपूर्ण रास्ते के करीब पहुंच रहा था. ट्रंप ने इनकार कर दिया.
लगभग एक हफ्ते बाद, रॉयटर्स ने बताया कि अमेरिकी अधिकारियों ने ओमान में हूती प्रतिनिधियों से मुलाकात की. इस बैठक में अमेरिकी जहाजों के लिए लाल सागर से सुरक्षित गुजरने को लेकर हूतियों से आश्वासन लिया गया. कोई सहयोगी मदद के लिए आगे नहीं आया, इसलिए सऊदी अरब खुद को मुश्किल स्थिति में पाता है.
पाकिस्तान-सऊदी सहयोग
मक्का समझौते से ज्यादा, जो अभी एक महीने से थोड़ा ही पुराना है, आज पाकिस्तान का समर्थन या समर्थन की कमी ज्यादा महत्वपूर्ण है. ठीक एक साल पहले, सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ एक द्विपक्षीय समझौता किया था, जिसे स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) कहा गया.
इसके अलावा, यमन के मामले में सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान से मदद मांगने का एक लंबा इतिहास रहा है. सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान पर उसकी निर्भरता कई दशकों पुरानी है.
कई दशकों से पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में मौजूद रहे हैं. 1960 के दशक से ही इस्लामाबाद ने हजारों सऊदी सैन्यकर्मियों को ट्रेनिंग दी है. 1967 में दोनों देशों ने पहला औपचारिक रक्षा सहयोग समझौता किया था.
पश्चिम एशिया के अमेरिकी विशेषज्ञ ब्रूस रिडेल ने 2008 में ब्रुकिंग्स के लिए लिखी एक टिप्पणी में कहा था कि पाकिस्तान ने 1960 के दशक में रॉयल सऊदी एयर फोर्स (RSAF) को उसके पहले लड़ाकू विमान बनाने और उड़ाने में मदद की थी. पाकिस्तानी एयर फोर्स के पायलटों ने RSAF के लाइटनिंग लड़ाकू विमानों को उड़ाया था और 1969 में दक्षिण यमन की तरफ से किंगडम की दक्षिणी सीमा पर हुई घुसपैठ को रोकने में मदद की थी.
लगभग 47 साल पहले ग्रैंड मस्जिद, मक्का पर कब्जे के दौरान पाकिस्तान ने सऊदी अरब की मदद की थी. इसके बाद 1982 में हुए द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग समझौते ने दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूत किया.
1980 के दशक में पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंध लगातार मजबूत हुए. सऊदियों ने न सिर्फ इस्लामाबाद के जरिए सोवियत संघ के खिलाफ लड़ रहे अफगान मुजाहिदीन को गुप्त रूप से पैसा और मदद दी, बल्कि पाकिस्तान की सुन्नी मदरसों और धार्मिक संस्थानों में भी पैसा लगाया. इसके जरिए इस्लाम के रूढ़िवादी वहाबी रूप को बढ़ावा मिला.
1990-91 के गल्फ वॉर के दौरान, रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में मौजूद थे ताकि पड़ोसी देशों से पैदा होने वाले खतरों और अस्थिरता से निपटने में सऊदियों की मदद की जा सके.
मार्विन जी. वाइनबाम और अब्दुल्ला बी. खुर्रम ने ‘Pakistan and Saudi Arabia: Deference, Dependence and Deterrence’ (पाकिस्तान और सऊदी अरब: सम्मान, निर्भरता और प्रतिरोध) नाम के लेख में लिखा कि 2011 में जब बहरीन में सरकार विरोधी आंदोलन शुरू हुआ, तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान से मदद मांगी.
उन्होंने मिडिल ईस्ट जर्नल में प्रकाशित इस लेख में लिखा, “माना जाता है कि पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार बहरीन में सऊदी सेना की घुसपैठ के दौरान मौजूद थे और बहरीन के नेशनल गार्ड में योग्य पाकिस्तानियों की भर्ती के प्रयास भी किए गए थे.”
सऊदी खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख प्रिंस तुर्की बिन फैसल ने एक बार पाकिस्तान-सऊदी संबंधों को “शायद दुनिया के किसी भी दो देशों के बीच सबसे करीबी रिश्तों में से एक” बताया था. तब से यह बयान दोनों देशों के संबंधों को समझाने के लिए अक्सर उद्धृत किया जाता है.
फिर भी, अप्रैल 2015 में पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से यमन में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन में शामिल होने के खिलाफ वोट किया. यह गठबंधन हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ रहा था. सऊदी अरब ने पाकिस्तान से अपने अभियान के लिए जहाज, विमान और सैनिक देने को कहा था, लेकिन इस्लामाबाद ने संघर्ष में “तटस्थता” पर जोर दिया. प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने पाकिस्तान सरकार के इस फैसले की आलोचना की थी.
हालांकि, इससे उस समय कोई रुकावट नहीं आई जब पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने 2017 में सऊदी नेतृत्व वाले इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC) के सैन्य कमांडर का पद संभाला. वह अब भी इस पद पर हैं.
2018 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में ‘ट्रेनिंग और सलाह’ के लिए सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी. इससे यह अटकलें लगने लगीं कि उनका इस्तेमाल यमन में किंगडम के सैन्य अभियान में किया जा सकता है. इस्लामाबाद ने कहा कि उन्हें सऊदी अरब की सीमाओं के “बाहर” तैनात नहीं किया जाएगा.
2019 में भी, जब हूतियों ने सऊदी राज्य के स्वामित्व वाली तेल कंपनी अरामको के पंपिंग स्टेशनों पर हमला किया, तब पाकिस्तान का समर्थन सिर्फ एकजुटता के शब्दों तक सीमित रहा.
आज पाकिस्तान क्या कर रहा है
ख्वाजा आसिफ के यह कहने के बावजूद कि अब मक्का समझौते को लागू करने का समय आ गया है और लेफ्टिनेंट जनरल चौधरी के यह कहने के बावजूद कि हरमैन शरीफैन और सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान किसी भी हद तक जाएगा, पाकिस्तान की तरफ से सीधे सैन्य मदद अभी तक नहीं मिली है. इसके बजाय, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने ईरान से हूतियों के सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए उन्हें काबू में करने को कहा.
सैद्धांतिक रूप से, सऊदी-पाकिस्तान SMDA उस तरह की पारंपरिक आपसी रक्षा संधि नहीं है, जैसी अमेरिका ने शीत युद्ध के दौर में की थीं.
“इसकी गोपनीय प्रकृति, सार्वजनिक रूप से बताए गए आपसी रक्षा वाले हिस्से के बावजूद, एक ऐसे समझौते के रूप में इसकी विश्वसनीयता कम करती है जो हमले को रोक सकता है,” वेस्ट एशिया के विशेषज्ञ और काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस रिसर्च (CSDR) के सीनियर रिसर्च एसोसिएट बशीर अली अब्बास ने दप्रिंट को बताया.
“व्यावहारिक रूप से, यमन संघर्ष में रियाद के लिए पाकिस्तान की ऐतिहासिक मदद सीधे हस्तक्षेप के बजाय क्षमता बढ़ाने वाली मदद रही है. SMDA के लागू होने के एक साल में भी इस ऐतिहासिक स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया है.”
इसके अलावा, सऊदी-हूती सैन्य संघर्ष की शुरुआत 2015 में सऊदी नेतृत्व वाले हस्तक्षेप के साथ हुई थी.
अब्बास ने दप्रिंट को बताया, “SMDA जैसे किसी भी आपसी रक्षा समझौते का इस्तेमाल उस स्थिति के लिए होता है जब किसी साझेदार देश पर हमला किया जाता है, न कि तब जब वह किसी विरोधी पर हमला करता है. अमेरिका-ईरान युद्ध में NATO की निष्क्रियता इसका एक उदाहरण है. हालिया तनाव की शुरुआत भी जुलाई में सऊदी समर्थित यमनी सरकार द्वारा सना पर किए गए हमले से हुई थी.”
सना यमन की राजधानी है और हूतियों के नियंत्रण में है. उन्होंने 2014 में इस शहर पर कब्जा कर लिया था.
मई में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आज अनुमान के अनुसार करीब 8,000 पाकिस्तानी सैनिक किंगडम में तैनात हैं. ये उन हजारों पाकिस्तानी सैनिकों के अलावा हैं जो पहले से वहां मौजूद थे. रॉयटर्स ने यह भी बताया कि पाकिस्तान ने करीब 16 विमानों की एक पूरी स्क्वाड्रन तैनात की है, जिनमें ज्यादातर JF-17 लड़ाकू विमान हैं, और ड्रोन की दो स्क्वाड्रन भी तैनात की हैं.
रिपोर्ट में SMDA की गोपनीय जानकारी रखने वाले एक सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा गया कि इस समझौते में सऊदी बलों के साथ मिलकर किंगडम की सीमाओं की सुरक्षा में मदद करने के लिए 80,000 तक पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती की संभावना है.
दरअसल, अप्रैल 2026 में सऊदी रक्षा मंत्रालय ने बताया कि SMDA के तहत पाकिस्तान से एक सैन्य बल किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पहुंचा है.
सऊदी रक्षा मंत्रालय ने कहा, “इस बल में पाकिस्तानी वायु सेना के लड़ाकू और सहायक विमान शामिल हैं. इसका उद्देश्य सऊदी और पाकिस्तानी सशस्त्र बलों के बीच संयुक्त सैन्य तालमेल को मजबूत करना और ऑपरेशनल तैयारी को बेहतर बनाना है, ताकि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता को आगे बढ़ाया जा सके.”
इस तैनाती के अलावा, पाकिस्तान ने सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष के हालिया दौर में अपनी भूमिका के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बताया है. यह स्थिति ऐसे समय में है जब 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में हुए युद्धविराम के बाद काफी हद तक रुके पूर्ण पैमाने के युद्ध के दोबारा शुरू होने की आशंका बनी हुई है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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