बेंगलुरु/तुमकुरु: साल 2012 में कर्नाटक सरकार ने राज्य के करीब सात सूखाग्रस्त जिलों तक पानी पहुंचाने के लिए एक बड़ी योजना पेश की थी. कागजों पर येत्तिनाहोले जल परियोजना काफी आसान लग रही थी. योजना थी कि मानसून के दौरान कर्नाटक के पश्चिमी घाट के बारिश से भरे पहाड़ी इलाकों से पानी लेकर राज्य के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया जाए. लेकिन 14 साल बाद भी यह परियोजना पूरी तरह लागू होने का इंतजार कर रही है, क्योंकि सरकार के प्रस्ताव और परियोजना को लेकर वैज्ञानिकों के आकलन आपस में मेल नहीं खाते.
इस साल अगस्त में कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरायस्वामी ने राज्य की विधान परिषद को बताया था कि सरकार की महत्वाकांक्षी येत्तिनाहोले परियोजना आखिरकार 2027 के अंत तक पूरी होने वाली है.
पानी का रुख मोड़ने के लिए बांध बनाए गए, पंप हाउस तैयार किए गए और पश्चिमी घाट से पानी को पहुंचाने वाले चैंबरों तक ले जाने के लिए कुछ बड़ी पाइपलाइनें भी बिछाई गईं.
इसके तहत 32.15 टीएमसी (हजार मिलियन घन फीट) पानी चिकलाबल्लापुर, कोलार, हासन, चिक्कमगलुरु, तुमकुरु, रामनगर और बेंगलुरु में रहने वाले करीब 75 लाख लोगों के घरों तक पहुंचाने की योजना है.

लेकिन भारत के प्रमुख शोध संस्थानों में से एक, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के वैज्ञानिकों ने शुरुआत से ही पानी की उपलब्धता को लेकर किए गए इस आकलन पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि येत्तिनाहोले के जलग्रहण क्षेत्र में कभी भी 32.15 टीएमसी पानी उपलब्ध कराने की क्षमता नहीं थी, जैसा कि सरकार ने शुरुआत में दावा किया था. IISc के आकलन के मुताबिक, इसमें से कुल 24 टीएमसी पानी को दूसरी जगह ले जाने की बात कही गई थी, जबकि येत्तिनाहोले के जलग्रहण क्षेत्र में वास्तव में केवल करीब 9.55 टीएमसी पानी ही उपलब्ध होता है.
2025 में आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने भी उस बात की पुष्टि की, जिसे वैज्ञानिक एक दशक से ज्यादा समय से कहते आ रहे हैं.
CAG की रिपोर्ट में कहा गया, “2018 से 2023 तक के पांच सालों में येत्तिनाहोले और उसकी सहायक धाराओं पर बनाए गए आठ बांधों में दर्ज पानी के वास्तविक बहाव की तुलना से पता चला कि इन बांधों में उपलब्ध पानी की मात्रा 7.20 टीएमसी से 24.70 टीएमसी के बीच थी. जबकि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) में अनुमानित मात्रा 32.15 टीएमसी मानी गई थी.”
IISc के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के प्रोफेसर टी. वी. रामचंद्रन कई सालों से इस परियोजना में मौजूद गड़बड़ियों की ओर ध्यान दिलाते आ रहे हैं. वह सरकार की इस बड़ी योजना के खिलाफ अकेले खड़े हैं.
2015 में उनके वैज्ञानिक आकलन ने पहली बार इस अंतर को लोगों के सामने रखा था. इसके बाद से उन्होंने सरकार के मंत्रियों से बातचीत करने, पानी की उपलब्धता को लेकर ज्यादा विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने और पर्यावरणविदों तथा स्थानीय लोगों को इस “पर्यावरणीय आपदा” के खिलाफ एकजुट करने तक, हर संभव कोशिश की है. उनका मकसद किसी भी तरह सरकार को इस परियोजना पर दोबारा विचार करने के लिए राजी करना है.
रामचंद्रन ने कहा, “येत्तिनाहोले परियोजना राज्य, खासकर पश्चिमी घाट के लिए विनाशकारी साबित होगी. मामला सिर्फ जलग्रहण क्षेत्र की क्षमता का गलत अनुमान लगाने तक सीमित नहीं है. जिस इलाके में यह परियोजना प्रस्तावित है, वहां पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की भरपूर विविधता है. इससे हजारों पेड़ों और लुप्तप्राय जानवरों की दर्जनों प्रजातियों पर भी असर पड़ेगा.”
गड़बड़ियों का खुलासा करने वाले वैज्ञानिक
भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं,” प्रोफेसर टीवी रामचंद्रन
2014 में रामचंद्रन नेत्रावती नदी के बेसिन में एक फील्ड प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. इसी दौरान हासन जिले के गांवों के लोगों ने पहली बार उन्हें येत्तिनाहोले पेयजल परियोजना के बारे में सरकार की योजना की जानकारी दी. हासन उन इलाकों में से एक है, जहां से इस परियोजना को गुजारने का प्रस्ताव था.
रामचंद्रन ने उस बातचीत को याद करते हुए कहा, “उन्होंने मुझसे पानी की उपलब्धता का वैज्ञानिक आकलन करने का अनुरोध किया, ताकि वे स्वतंत्र रूप से समझ सकें कि इस परियोजना से उन्हें क्या फायदा होगा.” इसी बातचीत के बाद उन्होंने सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की.

अपनी रिसर्च के दौरान उन्होंने पाया कि इस योजना से पश्चिमी घाट की छोटी नदियां और जलधाराएं सूख सकती हैं, जंगल खत्म हो सकते हैं, किसानों को अपनी जमीन छोड़नी पड़ सकती है और सरकारी खजाने पर भारी खर्च का बोझ पड़ सकता है. इसके बावजूद राज्य के सूखाग्रस्त इलाकों की पानी की जरूरत बहुत कम पूरी हो पाएगी. पिछले एक दशक में उनके काम ने उन्हें गांव वालों के बीच एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचान दिलाई है, जो उनके हक के लिए लड़ रहा है. गांव वालों के बीच उनका सम्मान एक और जाने-माने वैज्ञानिक माधव गाडगिल के बाद आता है, जिन्होंने पश्चिमी घाट पर बड़े पैमाने पर काम किया है.
उस उमस भरी दोपहर की यादें, जब उन्होंने अपनी खोज की थी, अब 60 साल के रामचंद्रन को धुंधली-सी याद हैं. लेकिन उनका इरादा आज भी उतना ही मजबूत है. IISc में उनका कार्यालय येत्तिनाहोले परियोजना से जुड़े दस्तावेजों का भंडार है. इसमें सरकार के बयान, फाइलों पर लिखी टिप्पणियां, रिपोर्ट और सालों से संभालकर रखे गए पत्र शामिल हैं. समय के साथ इन दस्तावेजों पर भी असर पड़ा है. कागज पीले पड़ चुके हैं और कुछ फाइलें धूल की मोटी परतों के नीचे दबी हैं, जिन्हें खोलने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है. लेकिन रामचंद्रन को ठीक-ठीक पता है कि कौन-सा दस्तावेज कहां रखा है.
2015 में रामचंद्रन और उनकी टीम ने इस परियोजना पर अपना पहला रिसर्च पेपर प्रकाशित किया. इसका शीर्षक था, ‘येत्तिनाहोले में पर्यावरणीय बहाव का आकलन: पानी मोड़ने के लिए 24 टीएमसी कहां है?’. इस पेपर में बताया गया कि परियोजना का इलाका करीब 180 वर्ग किलोमीटर में फैला है और यहां हर साल औसतन करीब 3,500 से 4,500 मिलीमीटर बारिश होती है. पेपर में की गई गणना के मुताबिक, जलग्रहण क्षेत्र में उपलब्ध पानी की मात्रा 9.55 टीएमसी थी.
इस आकलन में परियोजना से जुड़ी आठ उप-घाटियों में होने वाली औसत बारिश की अलग-अलग गणना की गई. ये थीं येत्तिनाहोले, येत्तिनाहोले टी1, येत्तिनाहोले टी2, कुदुमानेहोल 1, कुदुमानेहोल 2, केरीहोल, होंगदाहल्ला और येत्तिनाहोले का निचला हिस्सा. इसके बाद कुल बारिश की अलग से गणना की गई. इसमें वाष्पीकरण और पौधों के जरिए पानी के वायुमंडल में जाने, घरेलू इस्तेमाल और सिंचाई के लिए जरूरी न्यूनतम पानी जैसे कारकों को ध्यान में रखा गया. इन जरूरतों को पूरा करने के बाद ही बचे हुए पानी को परियोजना के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
इस अध्ययन को विशेषज्ञों की समीक्षा वाली पत्रिका *हाइड्रोलॉजी करंट रिसर्च* में भी प्रकाशित किया गया था. इसमें बताया गया कि इस इलाके में घरेलू इस्तेमाल के लिए करीब 5.84 टीएमसी पानी की जरूरत है. इसके अलावा, इन जलधाराओं में जलीय जीवों को जिंदा रखने के लिए करीब 2 टीएमसी पानी की जरूरत होती है.
रिपोर्ट में कहा गया, “हमारी गणना बताती है कि जलग्रहण क्षेत्र में पानी की उपलब्धता सिर्फ 9.5 टीएमसी है. कृषि और बागवानी से जुड़ी मौजूदा गतिविधियों के साथ-साथ पर्यावरण और पारिस्थितिकी की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी इतने पानी की जरूरत है. पानी को दूसरी जगह ले जाने से जलग्रहण क्षेत्र और नीचे की ओर स्थित इलाकों में फसलों की पैदावार घटेगी. इसके अलावा, गाद और पोषक तत्व, जो आमतौर पर पानी के साथ नीचे की ओर बहते हैं, धाराओं पर बनाए गए बांधों में ही फंस जाएंगे.”
रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई, “इससे पानी के प्राकृतिक बहाव में बदलाव आएगा. इसका असर नदी किनारे के इलाकों और जलीय जीवों के आवास में मौजूद जैव विविधता पर पड़ेगा. इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि नीचे की ओर रहने वाले उन लोगों की आजीविका प्रभावित होगी, जो मछली पकड़ने जैसे कामों पर निर्भर हैं.”
रामचंद्रन ने कहा कि ये रिपोर्ट, बाद में किए गए कई आकलन और पत्र परियोजना को लागू करने वाली कर्नाटक सरकार की संस्था विश्वेश्वरैया जल निगम लिमिटेड (VJNL) के साथ साझा किए गए हैं. यह संस्था जल संसाधन विभाग के तहत काम करती है. लेकिन उसने इन बातों पर ध्यान देने से इनकार कर दिया है.
IISc के प्रोफेसर ने निराशा और बेबसी जाहिर करते हुए कहा, “इस दौरान कई सरकारें आईं और चली गईं. लेकिन किसी ने भी इस परियोजना के दूरगामी असर को समझने की कोशिश नहीं की. इस परियोजना की शुरुआत BJP ने की थी, लेकिन मैंने कांग्रेस सरकार को भी समझाने की कोशिश की. उसने भी इस पर दोबारा विचार नहीं किया.”
रामचंद्रन का मानना है कि येत्तिनाहोले परियोजना में बहुत ज्यादा पैसा लगा हुआ है. 2012 में इसकी शुरुआती अनुमानित लागत 8,323.50 करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर करीब 30,000 करोड़ रुपये हो गई है.
उन्होंने कहा, “यहां गहरे स्तर पर भ्रष्टाचार है. इन इलाकों में पीने का पानी पहुंचाने के लिए ऐसे वैज्ञानिक समाधान मौजूद हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना काम कर सकते हैं. इन पर इस परियोजना की लागत का सिर्फ एक-चौथाई खर्च आएगा. लेकिन फिर सरकार के सप्लायर और ठेकेदार पैसा कैसे कमाएंगे?”
राजनीतिक खींचतान

2012 में जब कर्नाटक कैबिनेट ने येत्तिनाहोले पेयजल परियोजना को मंजूरी दी थी, तब स्थानीय मीडिया ने इसे राज्य की पानी की समस्या का सबसे बड़ा समाधान बताया था. उसी साल 6 जुलाई को *टाइम्स ऑफ इंडिया* के बेंगलुरु संस्करण में सुर्खी छपी थी, ‘येत्तिनाहोले परियोजना पांच जिलों की प्यास बुझाएगी.’
इसके पांच महीने बाद अखबारों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) के प्रमुख एच. डी. कुमारस्वामी का बयान भी छपा. उन्होंने वादा किया था, “अगर मैं मुख्यमंत्री बना, तो 48 घंटे में नेत्रावती नदी को आपके दरवाजे तक ले आऊंगा.”
इसके बाद लगातार मीडिया कवरेज और राजनीतिक बयान आते रहे. अलग-अलग सरकारों ने पानी की कमी दूर करने के समाधान के रूप में इस परियोजना का समर्थन किया, जबकि आलोचकों ने इसकी व्यवहारिकता, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर और इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठाए. सालों से यह परियोजना बड़े-बड़े वादों और लगातार उठ रहे सवालों के बीच फंसी हुई है.
मुख्यमंत्री डी. वी. सदानंद गौड़ा के नेतृत्व वाली BJP सरकार ने जुलाई 2012 में येत्तिनाहोले परियोजना को प्रशासनिक मंजूरी दी थी. उस समय इसकी लागत 8,323 करोड़ रुपये आंकी गई थी और 24 टीएमसी पानी दूसरी जगह ले जाने का प्रस्ताव था.
मार्च 2014 में कांग्रेस सरकार ने इसकी आधारशिला रखी. उस समय परियोजना की अनुमानित लागत बढ़ाकर 12,912 करोड़ रुपये कर दी गई थी.
कर्नाटक की राजनीति में यह परियोजना इतनी गहराई से जुड़ चुकी है कि 2021 में मंगलुरु में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई थी. इसमें आठ कलाकारों और कार्टूनिस्टों ने पानी का रुख मोड़ने वाली इस परियोजना पर अपने काम दिखाए थे. इन कामों में राज्य के लोगों पर परियोजना के नकारात्मक असर को दिखाया गया था.
प्रदर्शनी में दिखाए गए एक कार्टून में एक महिला घड़े से पानी पीने की कोशिश कर रही थी, तभी सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाला एक आदमी उसका सिर दूसरी ओर मोड़ देता है. दूसरे कार्टून में नेत्रावती नदी को द्रौपदी के रूप में दिखाया गया था, जिसके कपड़े उतारे जा रहे हैं. वहीं, राज्य के राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांडव खड़े होकर यह सब देख रहे थे.
कांग्रेस के पूर्व मंत्री और कर्नाटक विधानसभा की सार्वजनिक उपक्रम समिति के सदस्य एम. सी. सुधाकर ने कहा कि 2025 की CAG रिपोर्ट में उठाई गई चिंताओं के बाद समिति परियोजना की दोबारा विस्तार से जांच कर रही है. उन्होंने येत्तिनाहोले परियोजना का विरोध करने वालों की सभी दलीलों को खारिज कर दिया.
उन्होंने कहा, “परियोजना में ऐसी कोई समस्या नहीं है. CAG रिपोर्ट में कुछ बातें उठाई गई थीं और हम उनकी पूरी तरह जांच करेंगे और अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे. परियोजना तय समयसीमा के मुताबिक आगे बढ़ रही है.” हालांकि, उन्होंने परियोजना से जुड़ी और जानकारी देने से इनकार कर दिया.
परियोजना कैसे काम करेगी?
कर्नाटक सरकार ने येत्तिनाहोले पेयजल परियोजना को राज्य की पानी की समस्या दूर करने का सबसे बड़ा समाधान बताया है.
विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) के मुताबिक, इस परियोजना के तहत हासन जिले के सकलेशपुर के आसपास नेत्रावती नदी के ऊपरी बेसिन की आठ धाराओं से पानी लिया जाएगा. मानसून के दौरान इन धाराओं में बड़ी मात्रा में पानी बहता है. इन आठ धाराओं पर बांध बनाए जाएंगे, जो पानी का रुख मोड़ने का काम करेंगे.
जब पानी का स्तर बढ़ेगा, तो इन धाराओं में बहने वाले पानी का एक हिस्सा इकट्ठा करके परियोजना की पानी लेने वाली व्यवस्था तक पहुंचाया जाएगा. कागजों पर यह काम आसान लग सकता है, लेकिन असल में यह इंजीनियरिंग की एक बड़ी चुनौती है.
परियोजना के इंजीनियरों ने बताया कि इन धाराओं का पानी प्राकृतिक रूप से पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में जाता है. लेकिन जिन जिलों तक यह पानी पहुंचाना है, वे पूर्व दिशा में, पश्चिमी घाट के दूसरी ओर स्थित हैं.
इस चुनौती से निपटने के लिए VJNL पानी के प्राकृतिक बहाव की दिशा बदलने का तरीका अपना रही है.
सबसे पहले बांधों में पानी इकट्ठा किया जाएगा और फिर उसे पंप हाउस तक ले जाया जाएगा. वहां से पानी को ऊंचाई तक पहुंचाने वाली बड़ी पाइपलाइनों के जरिए ऊपर उठाया जाएगा. पानी को मशीनों की मदद से ऊपर उठाकर उसके प्राकृतिक बहाव से बिल्कुल अलग दिशा में भेजने की यही प्रक्रिया येत्तिनाहोले परियोजना को बहुत ज्यादा बिजली की खपत वाली परियोजना बनाती है.
पीने का पानी पहुंचाने के अलावा, इस परियोजना का मकसद आसपास के इलाकों में भूजल स्तर को भी बढ़ाना है. DPR के मुताबिक, हर साल करीब 14.056 टीएमसी पानी को पंप करके पीने के लिए पहुंचाया जाएगा. बाकी 9.953 टीएमसी पानी का इस्तेमाल 527 भूमिगत टैंकों को भरने और भूजल स्तर बढ़ाने के लिए किया जाएगा.
सरकार का पक्ष
बेंगलुरु में आनंद राव सर्कल के पास जल संसाधन विभाग के कार्यालय में येत्तिनाहोले परियोजना अधिकारियों के लिए एक बड़ी परेशानी बन गई है. एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी तक यह परियोजना आगे बढ़ती रही है. सालों के दौरान इस परियोजना से जुड़े एक दर्जन से ज्यादा अधिकारी अपना पद छोड़कर जा चुके हैं. कुछ रिटायर हो गए, जबकि कुछ का तबादला हो गया. लेकिन परियोजना अब भी पूरी होने से काफी दूर है.
मुख्य इंजीनियर के कंप्यूटर में एक पूरा फोल्डर और कार्यालय की अलमारियों में दो रैक सिर्फ इसी परियोजना के दस्तावेजों के लिए रखे गए हैं. अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर इन रैकों में इतने दस्तावेज भर जाते हैं कि पुराने कागजी रिकॉर्ड हटाने से पहले विभाग को अपनी आईटी टीम बुलाकर उन्हें डिजिटल रूप में सुरक्षित करना पड़ता है. यह सब इसलिए किया जाता है, ताकि आने वाले नए दस्तावेजों के लिए जगह बनाई जा सके.
कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, शुरुआत से ही इस परियोजना में कई समस्याएं रही हैं. पहले धन की कमी के कारण काम रुका रहा. फिर नौकरशाही की देरी ने इसे अटकाए रखा. और जब यह इन बाधाओं से आगे बढ़ी, तो वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के विरोध के कारण रुक गई.
विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर द प्रिंट से कहा, “वे यह क्यों नहीं समझते कि इस परियोजना से पानी की कमी से जूझ रहे कई जिलों को फायदा होगा? इसे बिना सोचे-समझे लागू नहीं किया गया है. परियोजना का अध्ययन करने के लिए महीनों तक अलग-अलग जगहों का दौरा किया गया और इसकी व्यवहारिकता की जांच की गई. कई योग्य इंजीनियरों और जल विज्ञान विशेषज्ञों ने इसका आकलन किया है.”
अधिकारी ने कहा कि सरकार ने परियोजना की क्षमता का आकलन करने के लिए केंद्रीय जल आयोग (CWC) के उन पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल किया, जो 1971 से 2008 के बीच बंटवाल में नेत्रावती नदी के पानी के बहाव को लेकर दर्ज किए गए थे. इन आंकड़ों के आधार पर छोटे प्रस्तावित जलग्रहण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता का अनुमान लगाया गया. इसके लिए उनके क्षेत्रफल के अनुपात को ध्यान में रखा गया. इसका मतलब है कि पूरे जलग्रहण क्षेत्र में हर साल औसतन 6,280 मिलीमीटर बारिश होने का अनुमान लगाया गया.
इन्हीं आंकड़ों के आधार पर इंजीनियरों ने अनुमान लगाया कि औसतन 32.15 टीएमसी पानी उपलब्ध होगा और उसमें से 24.01 टीएमसी पानी दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा. अधिकारी ने कहा कि यह एक सतर्क अनुमान है और ज्यादातर सालों में जलग्रहण क्षेत्र में इससे भी ज्यादा पानी उपलब्ध होने की संभावना है.
टकराव
“यह एक ऐसी परियोजना है जो सिर्फ कागजों पर है. इससे जिन लोगों को फायदा पहुंचाने का वादा किया गया है, उन्हें खाली नहरें मिलेंगी, जबकि राज्य की जीवनरेखा मानी जाने वाली नेत्रावती नदी का बेसिन पूरी तरह सूख जाएगा,” मंगलुरु के एक निवासी.
पर्यावरणविदों का कहना है कि सरकार की गणना में यहीं गलती हुई है. दोनों पक्षों के बीच असहमति की सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने पानी की उपलब्धता का हिसाब अलग-अलग तरीकों से लगाया है.
सरकार की DPR में बंटवाल में नेत्रावती नदी के पानी के बहाव के आंकड़ों का इस्तेमाल करके आठों जलग्रहण क्षेत्रों में पानी की कुल उपलब्धता का अनुमान लगाया गया है. इसके लिए छोटे जलग्रहण क्षेत्रों के क्षेत्रफल के अनुपात को ध्यान में रखा गया. इसके उलट, IISc के शोधकर्ताओं ने हर जलग्रहण क्षेत्र में पानी की उपलब्धता का अलग-अलग आकलन किया. उन्होंने बारिश के आंकड़ों का इस्तेमाल किया, जिनमें अलग-अलग जगहों पर काफी अंतर था. बारिश करीब 3,500 मिलीमीटर से 4,700 मिलीमीटर तक दर्ज की गई थी. उन्होंने जमीन के इस्तेमाल, पानी के जमीन में समाने, वाष्पीकरण, भूजल स्तर बढ़ाने और खेती, घरेलू इस्तेमाल तथा पशुओं के लिए पहले से जरूरी पानी की मात्रा को भी ध्यान में रखा.
2025 की CAG रिपोर्ट में भी बताया गया कि इन आठों जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश की मात्रा एक जैसी नहीं है. CAG ने 2018 से 2023 के बीच इन क्षेत्रों में पानी के बहाव के आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से जांच की. इसमें पाया गया कि इनमें से किसी भी साल पानी की उपलब्धता सरकार के अनुमान 32.15 टीएमसी तक नहीं पहुंची.
आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में आठों बांधों में पानी की कुल सालाना उपलब्धता 26.80 टीएमसी थी. 2019 में यह 25.43 टीएमसी रही. 2020 में घटकर 24.22 टीएमसी और 2021 में 21.64 टीएमसी रह गई. 2022 और 2023 तक बांधों में पानी की कुल उपलब्धता और घट गई. यह क्रमशः 19.63 टीएमसी और 8.77 टीएमसी रह गई.
पानी का रुख मोड़ने वाली इस परियोजना से प्रभावित होने वाले इलाकों में से एक मंगलुरु के निवासी मुज्जम्मिल अशरफ ने कहा कि इलाके की पानी की जरूरतों और नदी को जिंदा रखने के लिए जरूरी न्यूनतम पानी की मात्रा को ध्यान में रखा जाए, तो दूसरी जगह ले जाने के लिए अतिरिक्त पानी बचेगा ही नहीं.
उन्होंने कहा, “यह एक ऐसी परियोजना है जो सिर्फ कागजों पर है. इससे जिन लोगों को फायदा पहुंचाने का वादा किया गया है, उन्हें खाली नहरें मिलेंगी, जबकि राज्य की जीवनरेखा मानी जाने वाली नेत्रावती नदी का बेसिन पूरी तरह सूख जाएगा.”
अशरफ ने कहा कि सरकार की यह गलती सिर्फ “गलत गणित” तक सीमित नहीं है. यह उन स्थानीय ग्रामीणों के साथ धोखा भी है, जो 2014 से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “मंगलुरु के स्थानीय विधायक राजनीतिक छवि बचाने के लिए अपने मतदाताओं से कहते हैं कि वे इस परियोजना के खिलाफ हैं. लेकिन बंद कमरों में वे विधानसभा में अपने नेताओं को चुनौती देने से इनकार कर देते हैं. हर राजनीतिक दल ने सत्ता में रहते हुए इस परियोजना को आगे बढ़ाया है. वे पर्यावरण की चिंता करने का दिखावा सिर्फ तब करते हैं, जब वे विपक्ष में बैठते हैं.”
जमीन पर हालात
“न तो हमारे गांव के तालाब भरे हैं और न ही पीने के पानी की समस्या दूर हुई है,” वड्डरहल्ली गांव के एक किसान
सरकारी दफ्तरों और वैज्ञानिक शोध पत्रों में आंकड़ों को लेकर चल रही इस लड़ाई से दूर वड्डरहल्ली, वड्डरहल्ली कोप्पलु और हडेनहल्ली जैसे गांव हैं. इन गांवों के लोगों ने इस उम्मीद में परियोजना के लिए अपनी जमीन दी थी कि भविष्य में उनके कुएं पानी से भरे रहेंगे और नलों से पानी आना कभी बंद नहीं होगा. लेकिन इसके बजाय यहां पानी का संकट और गहरा हो गया है.
सालों बाद भी वे इस परियोजना के अपने वादे पूरे करने का इंतजार कर रहे हैं.
किसान और वड्डरहल्ली गांव के नेता पुट्टस्वामी शेट्टी ने कहा कि यहां के किसानों ने करीब एक दशक तक धैर्य के साथ इंतजार किया. लेकिन अब वे परियोजना में हो रही देरी के खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “येत्तिनाहोले नहर हमारे गांव के बिल्कुल पास से गुजरती है. हमारे इलाके के किसानों ने इस परियोजना के लिए अपनी जमीन दी है. लेकिन न तो हमारे गांव के तालाब भरे हैं और न ही पीने के पानी की समस्या दूर हुई है.”
इसी गांव के रमेश कुमार ने कहा कि इलाके में हर मौसम में बारिश का पैटर्न पहले से ज्यादा अनिश्चित होता जा रहा है. अगर सरकार इस पानी को जमा करके दूसरी जगह ले जाना शुरू कर देती है, तो पूरा समुदाय पानी की कमी से जूझने लगेगा.
उन्होंने कहा, “नदियों में पानी कम होता जा रहा है. अगर आप इनसे पानी दूसरी जगह ले जाने लगेंगे, तो हम धीरे-धीरे खुद को विनाश की ओर ले जाएंगे. यहां पानी की समस्या हल करने का कोई बेहतर तरीका होना चाहिए.”
इन गांवों के लोग भी बंटे हुए हैं. यह स्थिति सरकार और वैज्ञानिकों के बीच चल रहे बड़े विवाद को दिखाती है. कुछ लोग चाहते हैं कि परियोजना को जल्द से जल्द पूरा किया जाए, जबकि दूसरे लोग इसे पूरी तरह बंद करने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे उनके इलाकों में पानी और पर्यावरण का संकट और बढ़ेगा. लेकिन एक बात पर सभी सहमत हैं कि उनके गांवों में पानी की कमी की समस्या का समाधान होना चाहिए.
सरकार का कहना है कि ऐसा करने का एकमात्र तरीका येत्तिनाहोले परियोजना को पूरी तरह चालू करना है.
सितंबर 2024 में कर्नाटक सरकार ने परियोजना के पहले चरण का उद्घाटन किया था. इसमें पानी इकट्ठा करने और उसे ऊपर उठाने से जुड़ा बुनियादी ढांचा शामिल था. लेकिन पानी को गुरुत्वाकर्षण के सहारे नीचे की ओर ले जाने और उसे उन जिलों तक पहुंचाने वाला नेटवर्क, जिन्हें इसका फायदा मिलना है, तब भी निर्माणाधीन था.
सरकार को मनाने की कोशिश
रामचंद्रन जब हर सुबह घर से निकलते हैं, तो अपने परिवार को एक सलाह देकर जाते हैं. उन्हें मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि किसी दिन वे उनके बिना भी रह सकते हैं. यह कोई बेवजह का डर नहीं है, बल्कि पिछले 14 सालों के अनुभव से निकली सावधानी है. इन सालों में रामचंद्रन को धमकी भरे फोन आए हैं, उन्हें शारीरिक रूप से डराया गया है और परियोजना से पीछे हटने की चेतावनी भी दी गई है.
लेकिन उनका कहना है कि जब राजनेता अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, तो वैज्ञानिकों को आगे आना चाहिए. परियोजना पर काम करते हुए उन्होंने छात्रों के कई समूहों को प्रशिक्षित किया है. अब ये छात्र सर्वे कर रहे हैं और सरकारी एजेंसियों को पत्र लिखकर उनसे परियोजना पर दोबारा विचार करने की अपील कर रहे हैं.
रामचंद्रन ने कहा, “मैं काम रोक नहीं सकता. हजारों लोग इस परियोजना पर निर्भर हैं. कई बार मुझे लगा कि शायद मुझे यह सब छोड़ देना चाहिए. लेकिन मैंने सच बताने के लिए वैज्ञानिक बनने का फैसला किया था. विज्ञान झूठ नहीं बोलता और मैं बस यही बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं.” यह कहते हुए उनकी आंखें भर आईं.