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Wednesday, 28 October, 2026
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जातीय बंटवारा, नाराज़ MLA और कमजोर गठबंधन. चुनाव से पहले मणिपुर BJP का चुनावी गणित बिगड़ा

चुनाव आयोग की टीम ने 22 अक्टूबर को 16 जिलों में चुनावी तैयारियों का जायजा लिया. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, संकेत हैं कि चुनाव 13 मार्च से पहले होंगे.

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नई दिल्ली: मणिपुर में उपमुख्यमंत्री का पद संभाले उन्हें आठ महीने हो चुके हैं, लेकिन कुकी-जो समुदाय से आने वाली नेमचा किपगेन अब तक एक बार भी इंफाल स्थित अपने कार्यालय नहीं गई हैं. यहां तक कि उन्होंने दिल्ली से ही वर्चुअल तरीके से उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह खुद सिर्फ पांच सदस्यों वाली छोटी कैबिनेट के साथ सरकार चला रहे हैं. इसमें उपमुख्यमंत्री किपगेन और लोसी डिखो भी शामिल हैं. किपगेन और नागा पीपुल्स फ्रंट के विधायक और बीजेपी के सहयोगी डिखो के बीच मतभेद हैं. दोनों एक-दूसरे पर कुकी और नागाओं के बीच हिंसा भड़काने का आरोप लगाते हैं.

इस बीच, राज्यसभा सांसद ए. शारदा देवी बीजेपी की प्रदेश अध्यक्ष बनी हुई हैं, जबकि जुलाई 2024 में उनका तीन साल का कार्यकाल खत्म हो चुका था. इसके बावजूद केंद्रीय बीजेपी की ओर से उन्हें हटाने या आगे की स्थिति को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है. मणिपुर में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने की तैयारी के बीच राज्य की स्थिति ऐसी है.

इसी बीच, चुनाव आयोग की एक टीम ने 22 अक्टूबर को मणिपुर का दौरा किया और 16 जिलों में चुनावी तैयारियों का जायजा लिया. राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि उन्हें तैयारियां शुरू करने को कहा गया है, क्योंकि सरकार का कार्यकाल 13 मार्च को खत्म हो रहा है. उन्होंने कहा, “सभी संकेत हैं कि इससे पहले चुनाव होंगे.”

बीजेपी सरकार पर नज़र

फरवरी से जातीय हिंसा फिर बढ़ने के बाद, जब खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री का पद संभाला, बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार और मणिपुर में पार्टी दोनों पर ध्यान गया है.

राष्ट्रपति शासन के एक साल के दौरान हिंसा में कुछ समय की शांति रही थी, जो फरवरी में खत्म हुई. इसके बाद 50 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इनमें लगभग सभी आदिवासी कुकी और नागा थे. पिछले सोमवार को हुई हिंसा की सबसे ताज़ा घटना में तीन मैतेई ग्रामीणों की मौत हो गई. आरोप है कि यह हमला कुकी उग्रवादियों ने किया था. जनवरी के बाद यह पहली बार था जब मैतेई आम नागरिकों को निशाना बनाया गया.

बीजेपी के कई नेताओं, जिनमें विधायक भी शामिल हैं, और सरकारी अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि लोगों के बीच यह भावना बढ़ रही है कि खेमचंद सिंह की सरकार हिंसा पर काबू नहीं पा सकी है. बीजेपी के एक वरिष्ठ राज्य नेता ने दिप्रिंट से कहा, “मुख्यमंत्री की नीयत अच्छी है, लेकिन उन्हें पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं…अब भी फैसले राज्यपाल अजय भल्ला ही लेते हैं.”

नेताओं ने कहा कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हिंसा का बढ़ना सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं है. उन्होंने कहा कि एन. बीरेन सिंह की जगह मुख्यमंत्री बने खेमचंद सिंह का सिर्फ चार मंत्रियों के साथ सरकार चलाना भी इस धारणा को बढ़ाता है कि चुनाव तक यह एक “अस्थायी व्यवस्था” है.

बीजेपी के एक विधायक ने दिप्रिंट को बताया कि मैतेई समुदाय से आने वाले खेमचंद सिंह ने अलग-अलग समुदायों से संपर्क करने की कोशिश की है. उन्होंने कुकी और नागा समुदाय के लोगों वाले पहाड़ी इलाकों का दौरा किया है. मई 2023 में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जातीय संघर्ष शुरू होने के बाद से बहुत कम मैतेई नेताओं ने इन इलाकों का दौरा किया है.

सिंह ने कांगपोकपी जिले का भी दौरा किया, जहां कुकी समुदाय बहुसंख्यक है और सेनापति जिले का भी, जहां नागा समुदाय का दबदबा है. इंफाल से सेनापति जाने वाली मुख्य सड़क कांगपोकपी से होकर गुजरती है.

पिछले रविवार को मुख्यमंत्री ने कांगपोकपी में सीनाई कैंप का दौरा किया, जिस पर सुरक्षा बलों ने कब्ज़ा कर लिया था. वहां सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) समझौते के तहत आने वाले दो कुकी सशस्त्र समूहों के 159 कैडर रखे गए थे, लेकिन जब सुरक्षा बल जांच के लिए पहुंचे तो उन्हें पता चला कि इनमें से 158 लोग गायब हैं. इसके बाद सुरक्षा बलों ने कैंप पर नियंत्रण कर लिया.

दरअसल, पिछले दिसंबर में सिंह उखरुल जिले में एक कुकी राहत शिविर का दौरा करने वाले पहले मैतेई विधायक थे. बीजेपी विधायक ने कहा, “लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. अलग-अलग समुदायों के बीच गंभीरता से सुलह कराने की कोई कोशिश नहीं हुई है. ये समुदाय अब भी एक-दूसरे से लड़ रहे हैं. पहले मैतेई और कुकी लड़ रहे थे, अब मुख्य रूप से कुकी और नागा लड़ रहे हैं.”

जातीय अविश्वास का असर इस बात से भी दिखता है कि तीन साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी उपमुख्यमंत्री किपगेन समेत लगभग सभी कुकी विधायक मैतेई बहुल इंफाल घाटी में कदम नहीं रख पाए हैं.

फरवरी के बाद विधानसभा के दो सत्र हो चुके हैं. मणिपुर विधानसभा में इस समय 10 कुकी विधायक हैं. इनमें से एक भी फरवरी में हुए पहले सत्र में शामिल होने के लिए इंफाल नहीं आया था. इनमें से एक, वुंगजागिन वाल्टे, पर इंफाल में भीड़ ने बुरी तरह हमला किया था. इस फरवरी में गुरुग्राम के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गई.

सितंबर में हुए विधानसभा सत्र में केवल दो कुकी विधायक इंफाल पहुंचे. इनमें निर्दलीय विधायक हाओखोलेट किपगेन और बीजेपी की सहयोगी कुकी पीपुल्स अलायंस की किमनियो हाओकिप हैंगशिंग शामिल थीं.

बीजेपी के एक विधायक, जो बीरेन सिंह सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, ने दिप्रिंट से कहा, “भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद मंत्री और विधायक विधानसभा सत्र में शामिल होने के लिए इंफाल आने में सुरक्षित महसूस नहीं करते. यह जमीन पर मौजूद स्थिति को दिखाता है.”

19 अक्टूबर को किपगेन ने घोषणा की कि वह जल्द ही इंफाल जाएंगी और वहीं से अपने कामकाज की जिम्मेदारी संभालेंगी. मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली इंफाल यात्रा होती और मई 2023 में हिंसा शुरू होने के बाद भी यह उनकी पहली यात्रा होती.

“लेकिन नेमचा के आने से पहले ही संदिग्ध कुकी उग्रवादियों ने तीन मैतेई नागरिकों की हत्या कर दी. घाटी में फिर तनाव है. ऐसी स्थिति में कोई कुकी इंफाल आने की हिम्मत नहीं करेगा.”

मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह से उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए कई बार फोन किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

BJP सरकार में अंदरूनी मतभेद

एक तीसरे BJP विधायक ने कहा कि खेमचंद सिंह की सरकार खुद ही बंटी हुई है. NPF ने धमकी दी है कि अगर किपगेन को उपमुख्यमंत्री के पद से नहीं हटाया गया तो वह सरकार से बाहर हो जाएगा.

लोसिई डिखो ने दिप्रिंट से कहा कि NPF अपनी मांग पर कायम है. उन्होंने कहा, “नेमचा के पति थांगबोई किपगेन कुकी नेशनल फ्रंट (प्रेसिडेंट) के प्रमुख हैं. वह नागा गांवों पर हमलों में शामिल हैं, जबकि KNF(P) SoO समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला संगठन है. एक विधायक और कानून तोड़ने वाले व्यक्ति को एक साथ कैसे रखा जा सकता है? इसे होने कैसे दिया जा रहा है? उन्हें इस्तीफा देना होगा.”

60 सदस्यों वाली मणिपुर विधानसभा में BJP के 36 विधायक हैं. पांच NPF विधायकों, नेशनल पीपुल्स पार्टी के छह विधायकों, कुकी नेशनल अलायंस के दो विधायकों और तीन निर्दलीय विधायकों के समर्थन के साथ BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास कुल 52 विधायक हैं.

दूसरे BJP नेता ने कहा, “अगर NPF गठबंधन से बाहर हो भी जाता है तो ऐसा नहीं है कि सरकार गिर जाएगी. लेकिन चुनाव से पहले यह BJP सरकार के लिए अच्छा संदेश नहीं होगा.”

नागा और कुछ मैतेई विधायक मांग कर रहे हैं कि कुकी हथियारबंद समूहों, मणिपुर सरकार और केंद्र के बीच हुआ SoO समझौता खत्म किया जाए. इस समझौते को आखिरी बार 4 सितंबर 2025 को एक साल के लिए बढ़ाया गया था और अब इसकी अवधि खत्म हो चुकी है. केंद्र ने अभी तक यह नहीं कहा है कि वह इस समझौते को आगे बढ़ाएगा या नहीं.

राज्य BJP में अव्यवस्था

बीजेपी नेताओं का यह भी कहना है कि राज्य में पार्टी के अंदर भी अव्यवस्था है. उदाहरण के लिए, BJP की प्रदेश अध्यक्ष शारदा देवी का कार्यकाल बढ़ाया गया है.

एक अन्य राज्य BJP नेता ने कहा, “BJP प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है. लेकिन शारदा देवी का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी वह इस पद पर बनी हुई हैं. केंद्र की BJP की तरफ से उन्हें दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राज्य BJP को कितनी अहमियत दी जा रही है.”

जून में शारदा देवी को मणिपुर की एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए निर्विरोध चुना गया था.

दिप्रिंट ने पिछले हफ्ते से शारदा देवी से कई बार संपर्क किया. बुधवार सुबह उन्होंने फोन किया और कहा कि उनके दांत में दर्द है और वह बाद में जवाब देंगी. उनके जवाब देने पर खबर को अपडेट किया जाएगा.

दिप्रिंट से बात करने वाले कई BJP नेताओं ने कहा कि मौजूदा स्थिति को लेकर पार्टी के अंदर काफी नाराजगी है.

तीसरे BJP नेता ने कहा, “ऐसा लगता है कि किसी को कोई चिंता नहीं है. राज्य इकाई में बदलाव होना था… लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोई भी जिलों और मंडलों के पार्टी कार्यकर्ताओं से संपर्क नहीं कर रहा है. कोई यह चर्चा नहीं कर रहा है कि विधायक जब वोट मांगने अपने विधानसभा क्षेत्र में जाएंगे तो उनका मुद्दा क्या होना चाहिए.”

उन्होंने कहा कि विधायक भी खुश नहीं हैं.

राज्य BJP के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हुआ है. विधायकों को मंत्री बनने की उम्मीद थी…लेकिन ऐसा नहीं हुआ.”

पिछली BJP सरकार में मंत्री रहे एल. सुशिंद्रा जैसे कुछ विधायकों ने सार्वजनिक रूप से अपना गुस्सा जाहिर किया है. सुशिंद्रा ने 14 अगस्त को कहा था कि जिस तरह से सरकार चलाई जा रही है, उसके कारण वह पार्टी छोड़ देंगे.

पहले बताए गए BJP के एक विधायक ने कहा कि चुनाव की तैयारियों को लेकर पार्टी के बड़े नेताओं की तरफ से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिला है.

उन्होंने कहा, “हमें बताया गया था कि संबित पात्रा और बी.एल. संतोष अक्टूबर में तीन-चार दिन के लिए आएंगे और चुनाव की तैयारियों को लेकर विधायकों से बात करेंगे. लेकिन वे अभी तक नहीं आए हैं. पार्टी कार्यकर्ता परेशान हैं.”

दिप्रिंट ने BJP के उत्तर-पूर्व के समन्वयक पात्रा से इस बारे में उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए संपर्क किया, लेकिन उन्होंने फोन का जवाब नहीं दिया.

बीरेन का असर

पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह भले ही सत्ता से बाहर हैं और पार्टी में भी उन्हें किनारे कर दिया गया है, लेकिन वह राज्य BJP के सबसे पहचाने जाने वाले चेहरों में अब भी शामिल हैं.

उक्त BJP के पूर्व मंत्री ने कहा, “वह एक ऐसा चेहरा हैं जो लोगों को बांटता है और कुकी लोग उनसे नफरत करते हैं, जबकि मौजूदा मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह के साथ ऐसा नहीं है. राज्य BJP के नेताओं का एक वर्ग अब भी उनका विरोध करता है. लेकिन यह सच है कि वह राज्य में BJP के प्रमुख दिखने वाले चेहरों में से एक हैं.”

इस महीने की शुरुआत में पूर्व मुख्यमंत्री ने दिप्रिंट से कहा था कि मणिपुर में जो हो रहा है, वह पार्टी के नेताओं के बीच एकता नहीं होने की वजह से हो रहा है और इसका असर चुनाव में BJP पर पड़ेगा.

बीरेन सिंह ने कहा, “…घाटी में शांति लौट आई है, लेकिन अंदर से लोग सरकार से खुश नहीं हैं. इसका असर चुनाव में हम पर पड़ेगा. इसलिए हमें बहुत व्यावहारिक और पारदर्शी होना चाहिए. कम से कम चार-पांच महीने का समय है. अगर हमें सत्ता में वापस आना है तो हमें व्यावहारिक और पारदर्शी होना होगा.”

पहले बताए गए तीसरे BJP विधायक ने कहा कि पार्टी के पास अब समय कम बचा है.

विधायक ने चेतावनी दी, “हमें अपनी स्थिति ठीक करनी होगी, वरना हमारे लिए परेशानी होगी. अब बहुत जरूरी है कि केंद्रीय नेतृत्व इस स्थिति पर ध्यान दे और पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की शिकायतों को दूर करे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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