नई दिल्ली: मणिपुर में जारी अशांति के बीच मैतेई समूहों ने “हाईवे की नाकेबंदी और वसूली” के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. उनका कहना है कि राज्य और केंद्र सरकारें “मणिपुर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर जबरन वसूली और नाकेबंदी के बुरे असर को प्रभावी तरीके से कम करने के लिए अब तक कोई वैकल्पिक रास्ता और आपातकालीन सप्लाई चेन योजना नहीं ला पाई हैं.”
टीम मैतेई पर्सनैलिटीज मणिपुर (टीएमपी मणिपुर) और मैतेई एलायंस ट्रस्ट ने सोमवार को संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की. इसमें मणिपुर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर लोगों, यात्रियों, सामान और ज़रूरी चीज़ों की सुरक्षित, बिना रोक-टोक और बिना भेदभाव आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अदालत के दखल की मांग की गई है.
याचिका में सरकारों से कहा गया है कि वे “रास्तों की मजबूती से जुड़ी एक योजना तैयार करें, जिसमें जरूरी सामान की सप्लाई के लिए वैकल्पिक सड़क, रेल और दूसरे सामान पहुंचाने के विकल्पों की पहचान हो. इसमें सामान रखने की जगह, एक वाहन से दूसरे वाहन में सामान पहुंचाने की व्यवस्था, सुरक्षा की जरूरतें और आपातकाल में वैकल्पिक रास्ते शुरू करने का अधिकार रखने वाली एजेंसी की जानकारी भी हो.”
मणिपुर में चार मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग हैं. ये मुख्य रूप से राज्य को भारत के बाकी हिस्सों और पड़ोसी देश म्यांमार से जोड़ते हैं.
इनमें राष्ट्रीय राजमार्ग 2 शामिल है, जो कांगपोकपी और सेनापति जिलों से होकर मणिपुर को दीमापुर, नागालैंड और गुवाहाटी, असम से जोड़ता है. राष्ट्रीय राजमार्ग 37 जिरीबाम जिले से होकर मणिपुर को सिलचर और गुवाहाटी, असम से जोड़ता है. राष्ट्रीय राजमार्ग 102 मोरेह और टेंगनौपाल जिलों से होकर मणिपुर को म्यांमार से जोड़ता है. वहीं राष्ट्रीय राजमार्ग 202 राजधानी इंफाल को नागालैंड के मोकोकचुंग से जोड़ता है और यह सीधे उखरुल जिले से होकर गुजरता है.
याचिका में मणिपुर राज्य, गृह मंत्रालय के जरिए भारत सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को पक्ष बनाया गया है. इसमें अवैध हाईवे नाकेबंदी रोकने, हाईवे इस्तेमाल करने वालों से जबरन वसूली और बिना अनुमति पैसे लेने की समस्या से निपटने और जरूरी परिवहन मार्गों की सुरक्षा के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है.
‘गंभीर और लगातार उल्लंघन’
पीआईएल में “पिछले तीन दशकों से अधिक समय से मणिपुर के लोगों के संविधान से मिले मौलिक अधिकारों के गंभीर और लगातार उल्लंघन” का मुद्दा उठाया गया है. याचिका में कहा गया है कि ऐसा “कथित तौर पर मणिपुर की दूर की स्थिति, देश की मुख्यधारा की नज़र से दूर होने और सरकार की कथित उदासीनता के कारण” हो रहा है.
इसमें कहा गया है, “याचिकाकर्ताओं के पास भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मणिपुर के लोगों और खास तौर पर मणिपुर की कमजोर अर्थव्यवस्था के व्यापक जनहित में यह जनहित याचिका दायर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. यह याचिका मणिपुर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर बड़े पैमाने पर चल रहे जबरन वसूली के गिरोहों (जिन्हें कथित तौर पर उग्रवादी समूहों के लिए पैसे जुटाने का एक तरीका बताया जाता है) और इन राजमार्गों की लगातार नाकेबंदी के खिलाफ है, जिससे पिछले तीन दशकों से अधिक समय से गंभीर आर्थिक परेशानी हो रही है.”
इसमें कहा गया है कि मणिपुर के लोगों को संविधान से मिले अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार का “मणिपुर में बड़े पैमाने पर जबरन वसूली और राष्ट्रीय राजमार्गों की लगातार नाकेबंदी के कारण लंबे समय से गंभीर रूप से उल्लंघन किया जा रहा है. मणिपुर लगातार ‘नजर से दूर, दिमाग से दूर’ वाली स्थिति का शिकार नहीं हो सकता.”
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि राष्ट्रीय राजमार्गों तक पहुंच जाति, समुदाय, निवास, मूल स्थान या मंजिल के आधार पर सीमित न की जाए. उन्होंने बंद, आर्थिक नाकेबंदी, विरोध या आंदोलन के नाम पर हाईवे पर अवैध तरीके से रास्ता रोकने या उसे नियंत्रित करने के खिलाफ भी निर्देश देने की मांग की है. हालांकि, शांतिपूर्ण विरोध करने के कानूनी अधिकार को बनाए रखने की बात कही गई है, एक टीएमपी सदस्य ने बताया.
राजमार्गों की सुरक्षा के लिए समन्वित योजना
याचिका में कहा गया है, “इस याचिका में उठाए गए मुद्दे मणिपुर में राष्ट्रीय राजमार्गों और दूसरे जरूरी परिवहन मार्गों तक जनता की पहुंच और उनके बिना रुकावट चलने से जुड़े हैं. इनका सीधा असर लोगों, भोजन, दवाइयों, ईंधन, जरूरी सामान, व्यापारिक सामान आदि की आवाजाही पर पड़ता है.”
टीएमपी सदस्य ने कहा कि याचिका में एक प्रमुख मांग यह है कि “केंद्र और राज्य सरकारें, राजमार्ग प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों से सलाह करके, अदालत की ओर से तय समय सीमा के भीतर राजमार्गों की सुरक्षा और लोगों की बिना रोक-टोक आवाजाही के लिए एक साझा योजना तैयार करें और उसे लागू करें.”
याचिकाकर्ताओं ने एक व्यापक और लंबे समय की योजना की मांग की है. इसमें “मणिपुर के सभी राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर संवेदनशील जगहों की पहचान की जाए. इसके लिए राजमार्गों को नक्शे पर अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाए और इनमें महत्वपूर्ण चौराहे, पुल, संकरे रास्ते, बार-बार रास्ता रोके जाने वाली जगहें और ट्रकों को रोकने वाले इलाके शामिल किए जाएं.”
याचिका में आगे कहा गया है, “चिह्नित राजमार्गों पर बिना अनुमति के बैरिकेड, गेट, निजी चेकप्वाइंट, जबरन रास्ता बदलना, पैसे लेने के प्वाइंट, वाहनों की जांच या सड़क पर कब्जा करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए. कानूनी और सरकारी चेकप्वाइंट की पहचान साफ तौर पर संबंधित एजेंसी, यूनिट और जिम्मेदार अधिकारी के नाम से होनी चाहिए.”
“जरूरी सामान की कमी के अलावा, राष्ट्रीय राजमार्गों की नाकेबंदी के दौरान इन सामानों की कीमतें भी बहुत बढ़ जाती हैं, जिससे मणिपुर के लोगों को गंभीर सामाजिक और आर्थिक परेशानी होती है. इसलिए, जब खतरा ज्यादा हो, तो संबंधित पक्षों को इन चीजों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया जाना चाहिए: (a) दवाइयां, ऑक्सीजन, मेडिकल सामान, ईंधन, लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी), पानी और जीवन के लिए बेहद जरूरी सामान; (b) भोजन और दूसरे जरूरी सामान; और (b) सामान्य व्यापारिक सामान. यह वर्गीकरण सिर्फ सुरक्षा में प्राथमिकता तय करने के लिए है और इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे कानूनी यातायात को रोकना सही है.”
जबरन वसूली और बिना अनुमति पैसे लेने पर कार्रवाई
याचिका में हाईवे का इस्तेमाल करने वालों से बिना अनुमति पैसे, कथित टैक्स, टोल, फीस और जबरन चंदा लेने के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है, “मणिपुर में पिछले कुछ दशकों से कई समूह राष्ट्रीय राजमार्गों पर पैसे वसूलते और जबरन पैसे लेते रहे हैं. अगर वाहनों को बार-बार रोका जाए, धमकाया जाए या बिना अनुमति पैसे देने के लिए मजबूर किया जाए, तो हाईवे कागज पर खुला होने के बावजूद असल में इस्तेमाल के लायक नहीं रह सकता.”
याचिका में कहा गया है, “इसलिए जबरन वसूली को हाईवे की सुरक्षा से जुड़ी एक अलग समस्या माना जाना चाहिए. मणिपुर के राजमार्गों पर बड़े पैमाने पर हो रही ऐसी वसूली के कारण सामान की कीमतें भी अपेक्षाकृत ज्यादा हो रही हैं, क्योंकि कारोबारी आखिरकार जबरन वसूली में गई रकम का बोझ ग्राहकों पर डाल देते हैं.”
इसमें मांग की गई है कि मणिपुर सरकार और भारत सरकार को “इस माननीय अदालत के साथ मणिपुर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर जबरन वसूली से जुड़ी दर्ज एफआईआर की संख्या, अदालतों में लंबित मामलों और मणिपुर के राजमार्गों पर दिनदहाड़े हो रही इस लूट को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी साझा करने का निर्देश दिया जाना चाहिए.”
याचिका में यह भी कहा गया है, “यहां यह भी बताया जा सकता है कि 2010 में मणिपुर के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने विधानसभा में यह पुष्टि की थी कि 1995 से 2010 के बीच मणिपुर में 628 बंद और नाकेबंदी हुई थीं, जिससे राज्य के खजाने को करीब 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.”
याचिका में कहा गया है, “यह भी बताया गया है कि 3 मई 2023 से 8 सितंबर 2026 तक यानी तीन साल और चार महीने (1,225 दिन) में मणिपुर में 523 दिन आर्थिक नाकेबंदी और राष्ट्रीय राजमार्ग बंद रहे. यहां तक कि 2011 में भी राज्य में 123 दिन नाकेबंदी और 20 दिन बंद रहा था.”
याचिका में कहा गया है, “क्योंकि मणिपुर राज्य और भारत सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं कि भारत सरकार के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस व्यवस्था के तहत पूर्व उग्रवादियों को रखने वाले कैंपों में रह रहे लोगों को बाहर आकर मणिपुर के राजमार्गों पर पैसे वसूलने की अनुमति न हो.”
इसमें कहा गया है, “अगर विश्वसनीय सामग्री से यह पता चलता है कि सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस या सीजफायर व्यवस्था वाले किसी संगठन से जुड़े व्यक्ति ने जबरन वसूली, धमकी या हाईवे पर आवाजाही में अवैध दखल दिया है, तो उस घटना की कानून और उस व्यवस्था की लागू शर्तों के अनुसार जांच होनी चाहिए. ऐसी व्यवस्था का होना अपने आप में किसी कथित अपराध की जांच या जवाबदेही को रोकने का कारण नहीं होना चाहिए.”
टीएमपी के अधिकारी ने कहा कि याचिका में ऐसी वसूली से जुड़े डराने-धमकाने, दबाव बनाने, हिंसा और जबरन पैसे लेने जैसे अपराधों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है. याचिकाकर्ताओं ने 24 घंटे शिकायत दर्ज कराने के लिए सार्वजनिक रूप से बताए गए एक माध्यम और नोडल अधिकारियों की भी मांग की है. ये अधिकारी नाकेबंदी, धमकी, जबरन वसूली और बिना अनुमति पैसे लेने से जुड़ी शिकायतें ले सकें. प्रस्तावित व्यवस्था से शिकायत जल्दी दर्ज करने, जवाब देने और जांच के लिए उसे संबंधित जगह भेजने में मदद मिलेगी. साथ ही शिकायत करने वालों और गवाहों की पहचान और सुरक्षा के लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए.
याचिका में आगे मांग की गई है कि जहां सबूत और लागू कानून इसकी जरूरत बताते हों, वहां अवैध तरीके से रास्ता रोकने, जबरन पैसे लेने, किसी को गलत तरीके से रोकने, धमकाने, हमला करने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे अपराधों में तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए, जांच हो और मुकदमा चलाया जाए. इसमें ऐसे लोगों की भी जांच करने की मांग की गई है, जिन पर इस तरह की गतिविधियों को आयोजित करने, पैसे देने, निर्देश देने या लागू करवाने का आरोप है. यह सब कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए किया जाना चाहिए.
एक और महत्वपूर्ण मांग मणिपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग की जमीन पर कथित तौर पर बिना अनुमति किए गए कब्जों, होर्डिंग, गेट, बैरियर, चेकप्वाइंट, पैसे लेने के बूथ और इसी तरह के दूसरे ढांचों से जुड़ी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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