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Wednesday, 16 September, 2026
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भारत से सीखा ‘क्या नहीं करना चाहिए’, तबाही के बीच नेपाल के न्यूज़ रूम ने क्या कुछ किया?

जब विदेशी क्रूज़ शानदार विज़ुअल्स की तलाश में पहुंचे, तो नेपाली रिपोर्टर बाढ़ वाली सड़कों, खराब कम्युनिकेशन सिस्टम और खतरनाक इलाकों से गुज़र रहे थे.

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काठमांडू: नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ में अर्जुन पौडेल का गांव सोले पूरी तरह तबाह हो गया और उनके परिवार के आठ लोगों की जान चली गई. उनके एडिटर ने उन्हें सहानुभूति के आधार पर छुट्टी लेने की पेशकश की थी. इसके बजाय, पौडेल द काठमांडू पोस्ट के पांच रिपोर्टरों की उस टीम में शामिल हो गए, जो सीधे बाढ़ प्रभावित नुवाकोट और रसुवा जिलों के लिए रवाना हुई थी. उन्होंने आठ दिन तक आपदा, उसके असर और इंसानी नुकसान पर रिपोर्टिंग की.

“मुझे नहीं लगता कि मैं छुट्टी लेकर घर में बैठ सकता था. भले ही यह निजी नुकसान था, लेकिन मुझे देखना था कि मेरे घर के साथ क्या हुआ,” पौडेल ने कहा. वह द काठमांडू पोस्ट और नेपाल में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबारों में से एक कांतीपुर डेली में स्वास्थ्य रिपोर्टर हैं.

पौडेल नेपाल के उन कई पत्रकारों में से एक थे, जिन्हें रसुवा की बाढ़ के बाद निजी और पेशेवर, दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इस बाढ़ में करीब 1,400 लोगों की मौत हुई, जबकि 5,000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं.

नेपाल प्राकृतिक आपदाओं के लिए नया नहीं है, लेकिन इस बाढ़ ने उसके घरेलू मीडिया को दो मोर्चों पर ला खड़ा किया: एक तरफ तबाही की रिपोर्टिंग करना और दूसरी तरफ कई बार खुद इसका शिकार बनना. फिर भी, जैसे-जैसे त्रासदी सामने आती गई, नेपाली मीडिया की रिपोर्टिंग सनसनीखेज या बनावटी भावनात्मक तमाशे में नहीं बदली. इसके बजाय, न्यूजरूम ने शांत और सख्त रिपोर्टिंग की, जिसमें किसी खबर को सबसे पहले देने की होड़ के बजाय तथ्यों को प्राथमिकता दी गई.

Arjun Paudel, a reporter at The Kathmandu Post, whose village Sole was washed away in the floods | Suraj Singh Bisht | ThePrint
‘द काठमांडू पोस्ट’ के रिपोर्टर अर्जुन पौडेल, जिनका गांव ‘सोले’ बाढ़ में बह गया था | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

जहां विदेशी टीमें नाटकीय तस्वीरों की तलाश में पहुंचीं, वहीं नेपाली रिपोर्टर बाढ़ से डूबी सड़कों, खराब संचार व्यवस्था और खतरनाक इलाकों के बीच काम कर रहे थे. कभी पैदल तो कभी हेलिकॉप्टर से वे उन जगहों की खबर दे रहे थे, जो सबसे ज्यादा दिखाई देने वाली तबाही से आगे थीं. कांतीपुर मीडिया ग्रुप, हिमालय टीवी, रातोपाटी, नेपाली टाइम्स और हिमाल खबर समेत पांच प्रमुख न्यूजरूम ने 100 से ज्यादा रिपोर्टरों को मौके पर भेजा और बाढ़ के बाद के हफ्तों में 1,000 से ज्यादा रिपोर्ट प्रकाशित कीं.

यह उस मीडिया इंडस्ट्री के लिए भी एक अहम मौका था, जो अपने आधुनिक स्वतंत्र रूप में अभी करीब तीन दशक पुरानी है.

“न्यूजरूम में हमारी संपादकीय नीति थी कि हम कुछ मिनट देर से खबर देना या खबर बिल्कुल न देना पसंद करेंगे, लेकिन गलत या भ्रामक खबर प्रकाशित नहीं करेंगे,” काठमांडू पोस्ट और कांतीपुर डेली के एडिटर-इन-चीफ गोकरण अवस्थी ने कहा. “हम सिर्फ खबर जल्दी प्रकाशित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी पत्रकारिता में भरोसा बनाने की कोशिश कर रहे हैं.”

शुरुआती कुछ घंटे

26 अगस्त की सुबह 9:30 बजे तक उत्तरी नेपाल के भोते कोशी नदी में आई बड़ी बाढ़ की खबर काठमांडू के न्यूजरूम तक पहुंच चुकी थी. यह बाढ़ त्रिशूली नदी के बेसिन से होते हुए रसुवा और नुवाकोट जिलों तक पहुंची थी. कुछ न्यूजरूम के लिए इसका स्रोत इंटरनेट पर मौजूद वीडियो थे. वहीं कुछ के लिए बाढ़ वाली जगह के पास रहने वाले माता-पिता और रिश्तेदारों के घबराए हुए फोन इसका स्रोत थे.

हिमाल खबर के पत्रकार रमेश कुमार ने कहा, “मैं ऑफिस जा रहा था, तभी रसुवा के बेत्रावती में रहने वाले मेरे पिता का फोन आया. उन्होंने बताया कि बहुत बड़ी बाढ़ आई है और वह काफी डरे हुए लग रहे थे.”

जब कुमार पाटन ढोका में हिमाल खबर के ऑफिस पहुंचे और अपने एडिटरों को बताया, तब तक बाढ़ के वीडियो फेसबुक और एक्स पर फैल चुके थे. शहर के दूसरे न्यूज़ रूम की तरह उनका न्यूज़ रूम भी तुरंत काम में जुट गया.

Ramesh Kumar at his desk in the Himal Khabar office. He was one of the reporters who went to the ground the day of the floods, reporting from Betrawati, his own village | Suraj Singh Bisht | ThePrint
रमेश कुमार हिमाल खबर के ऑफिस में अपनी डेस्क पर. वह उन रिपोर्टरों में से एक थे, जो बाढ़ वाले दिन ही मौके पर पहुंच गए थे और अपने गांव बेत्रावती से रिपोर्टिंग की | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

“सड़कें टूट चुकी थीं, उन जिलों में मोबाइल नेटवर्क नहीं था. इसलिए सबसे बड़ी समस्या वहां पहुंचना और जानकारी की सही तरीके से पुष्टि करना था,” हिमालय टीवी और ऑनलाइन खबर के ग्रुप एडिटर उमेश चौहान ने कहा.

चौहान के हिमालय टीवी ने, जो कांतीपुर के बाद नेपाल के सबसे बड़े टीवी न्यूज चैनलों में से एक है, हेलिकॉप्टर किराए पर लेकर रिपोर्टरों को नेपाल-तिब्बत सीमा के तिमुरे और रसुवागढ़ी इलाकों में भेजने का फैसला किया. वहीं द काठमांडू पोस्ट और हिमाल खबर ने अपने पत्रकारों को कार से काठमांडू से सड़क के रास्ते पहुंच सकने वाली सबसे नजदीकी बाढ़ प्रभावित जगह बिदुर भेजा.

चौहान ने कहा, “हम हेलिकॉप्टर से नेपाल-तिब्बत सीमा वाले इलाके में पहुंचने वाले पहले पत्रकार थे, लेकिन हमने इसका प्रचार नहीं किया. क्योंकि वहां पहुंचना खबर नहीं थी. वहां पहुंचने के बाद हमारे पत्रकारों ने जो किया, वह खबर थी.”

न्यूजरूम ने अपनी टीमों को जरूरी सामान और एक बेसिक फर्स्ट एड किट दी थी, लेकिन न तो एडिटरों को और न ही रिपोर्टरों को ठीक से पता था कि वे किस स्थिति में जा रहे हैं.

बाढ़ के कुछ घंटे बाद जब चौहान के रिपोर्टर हेलिकॉप्टर से नेपाल-तिब्बत सीमा पर तिमुरे कस्बे पहुंचे, तो वहां का नजारा पहचान में नहीं आ रहा था. नदी बस्ती के बीच से बह गई थी और अपने साथ घर, गाड़ियां, सड़कें और पुल बहा ले गई थी. जो कभी घाटी हुआ करती थी, वहां मोटी भूरी गाद और मलबा फैला हुआ था. सुरक्षा कारणों से हेलिकॉप्टर वहां उतर नहीं सका, लेकिन रिपोर्टर जो तस्वीरें लेकर लौटे, वे किसी न्यूजरूम द्वारा बाढ़ की पहली हवाई तस्वीरें थीं.

चौहान ने कहा, “हम ये तस्वीरें इसलिए चाहते थे ताकि सिर्फ नेपाल को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को यह बताया जा सके कि तबाही कितनी बड़ी थी. इससे दुनिया भर के पत्रकारों को भी बाढ़ का पैमाना समझने और इसे कवर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय टीमें भेजने में मदद मिली.”

कुमार और पौडेल जैसे रिपोर्टर जमीन पर भी इसी तरह के नजारे देख रहे थे. वे नुवाकोट की राजधानी बिदुर पहुंचे थे, जो काठमांडू से सड़क के रास्ते पहुंचने वाला सबसे नजदीकी इलाका था. बिदुर से कुछ सौ मीटर दूर त्रिशूली बाजार मलबे और गाद में डूबा हुआ था और वहां बिजली या इंटरनेट नहीं था. वहां अफरा-तफरी और डर का माहौल था.

कुमार ने बताया, “मैंने जो देखा, उसे बताना मुश्किल है. लोग घबराए हुए थे और इधर-उधर भाग रहे थे.” अगले दिन वह अपने गांव बेत्रावती भी गए. उन्होंने कहा, “बेत्रावती में मैंने नदी में शव देखे… कई दिनों तक मुझे डरावने सपने आते रहे.”

रिपोर्टिंग के दौरान निजी नुकसान

बाढ़ पर पौडेल की पहली स्टोरी निजी अनुभव पर आधारित थी, जिसका शीर्षक था, ‘मैंने अपने गांव को एक पल में गायब होते देखा’. बाढ़ के एक दिन बाद लिखी गई यह स्टोरी उस समय लिखी गई थी, जब वह बिदुर में मौके पर मौजूद थे. स्टोरी की शुरुआत पौडेल के इस अविश्वास से हुई कि उनकी पत्नी ने उन्हें बताया था कि सोले बाजार में बाढ़ आ गई है. पूरे दिन, जब वह ऑफिस पहुंचे और बाढ़ के नुकसान के बारे में लगातार जानकारी हासिल करते रहे – जिसमें ल्हेंडे खोला नदी में ग्लेशियल चट्टान गिरने की घटना भी शामिल थी – उसी दौरान उन्हें अपने परिवार के लापता सदस्यों के बारे में भी खबर मिल रही थी.

उनके माता-पिता काठमांडू में सुरक्षित थे, लेकिन उनके ननिहाल के परिवार के लोग, जिनमें उनकी मौसियां, मामा और चचेरे भाई-बहन शामिल थे, लापता थे. उनके दोस्त निरंजन, जो काठमांडू में रहने वाले एक अन्य पत्रकार थे और जिनका परिवार सोले में था, ने अपने माता-पिता और भाई-बहनों को खो दिया था.

पौडेल की स्टोरी द काठमांडू पोस्ट में बाढ़ पर प्रकाशित सबसे ज्यादा पढ़ी गई खबरों में से एक थी. इसके बाद उन्होंने नुवाकोट और रसुवा से 20 से ज्यादा खबरें लिखीं. फिर भी, एक रिपोर्टर के तौर पर पौडेल ने कहा कि यह पहली बार था जब उनके पास कहने के लिए शब्द नहीं थे.

पौडेल ने कहा, “मुझे लगा कि मैं खुद बाढ़ का शिकार था. और जब मैं मौके पर गया, बाढ़ में डूबे घर और सड़कें देखीं और विस्थापित लोगों से मिला, तो मैं सुन्न हो गया था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या सोचूं. मेरा दिमाग बिल्कुल खाली हो गया था. जब मैं लिखने बैठा, तभी शब्द अपने आप निकलने लगे.”

पौडेल और कुमार जैसे रिपोर्टरों के इन इलाकों से निजी संबंध और वहां की जानकारी ने भी कई तरह से उनकी रिपोर्टिंग में मदद की. जब त्रिशूली नदी के ऊपरी इलाकों तक पहुंचने वाली मुख्य सड़कें बंद हो गईं, तब उन्होंने अपने साथियों को बेत्रावती, सोले, सिमले और दूसरे प्रभावित इलाकों तक जाने वाली गांव की अंदरूनी सड़कों को समझने में मदद की.

कुमार ने कहा, “मुझे गूगल मैप्स की जरूरत नहीं थी. मैं इस इलाके को अच्छी तरह जानता था. हम बस लोगों से पूछते हुए गांव-दर-गांव जाते रहे. जहां सड़क मिली, वहां से गए और कई बार जंगल के रास्ते से भी जाना पड़ा.” उन्होंने कहा, “हम सड़क के रास्ते बेत्रावती पहुंचने वाले पहले पत्रकार थे.”

जब दुनिया भर के न्यूजरूम नेपाल पहुंचने लगे और उनका ध्यान तबाही, लोगों के बचने और सरकार के सुरंग बचाव अभियानों की खबरों पर था, तब द काठमांडू पोस्ट, हिमाल खबर और नेपाली टाइम्स के रिपोर्टरों ने अलग तरह की खबरें सामने रखीं. उनकी रिपोर्टिंग में राहत सामग्री पहुंचाने, सरकार की तरफ से अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील और ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के टूटने के बढ़ते खतरे पर ध्यान दिया गया.

कुमार ने उन लोगों पर रिपोर्ट की, जो 2015 के नेपाल भूकंप में विस्थापित हुए थे और 26 अगस्त की बाढ़ में फिर से अपने घर खो बैठे. यह नेपाली नागरिकों पर प्राकृतिक आपदाओं के दोहरे असर की पहली खबरों में से एक थी.

द काठमांडू पोस्ट नेपाल सरकार की तरफ से बचाव अभियानों के लिए विदेशी मदद की पेशकश ठुकराए जाने की खबर देने वाला पहला अखबार था. इस दैनिक ने रसुवा के सबसे कम पहुंच वाले इलाकों में राहत अभियान पर भी कई खबरें सबसे पहले दीं.

दो हफ्तों के दौरान पौडेल की खबरों में बाढ़ के मानवीय नुकसान, लापता लोगों की तलाश कर रहे परिवारों और राहत केंद्रों में बीमारी और पानी के दूषित होने जैसी समस्याओं को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया. इन राहत केंद्रों में फिलहाल करीब 4,000 लोग रह रहे हैं.

अवस्थी ने कहा, “हमारे पास देश के सबसे अनुभवी न्यूजरूम में से एक है, क्योंकि हम सबसे पुराना न्यूज ग्रुप हैं. हमने हर स्टोरी की बहुत बारीकी से योजना बनाई और भले ही हम कुछ खबरें मिस कर गए हों, हमें गर्व है कि हमारी एक भी खबर में गलती नहीं हुई.” उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हमारे रिपोर्टरों ने शानदार काम किया.”

नेपाली न्यूजरूम के एडिटरों ने मौत और तबाही की निजी और मानवीय कहानियों से आगे जाने और इस त्रासदी की बड़ी तस्वीर देखने का फैसला किया. यह तथ्य कि नेपाल में लगातार तीसरे साल बाढ़ आई थी, भी उनकी रिपोर्टिंग का हिस्सा था.

चौहान ने जोर देकर कहा, “यह सच है कि दर्शक ज्यादा मानवीय कहानियां पढ़ना चाहेंगे. इन्हीं कहानियों से वे जुड़ते हैं. लेकिन कभी-कभी आपको अपने दर्शकों को निराश करना पड़ता है. सिर्फ निजी कहानियां बताने का मतलब है कि आप बड़ी तस्वीर को छोड़ देंगे, और वह भी बताई जाने वाली एक कहानी है.”

The Kantipur Media Group office in Kathmandu which hosts Kantipur Daily, The Kathmandu Post, and Kantipur TV | Suraj Singh Bisht | ThePrint
काठमांडू में कांतिपुर मीडिया समूह कार्यालय जो कांतिपुर डेली, द काठमांडू पोस्ट और कांतिपुर टीवी की मेजबानी करता है | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

भारतीय मीडिया से शिकायत

नेपाल का स्वतंत्र न्यूज़ मीडिया 1990 के जन आंदोलन के बाद ही आकार लेने लगा था. यह आंदोलन निरंकुश राजशाही को खत्म करने के लिए चलाया गया था. कांतीपुर मीडिया ग्रुप (KMG), जिसके पास नेपाली अखबार कांतीपुर डेली, अंग्रेजी अखबार काठमांडू पोस्ट और नेपाली टीवी चैनल कांतीपुर है, की स्थापना 1993 में हुई थी और आज भी देश के न्यूज मीडिया पर उसका दबदबा है.

ज्यादातर नेपाली न्यूजरूम के वरिष्ठ एडिटर इस बात पर गर्व करते हैं कि यह इंडस्ट्री कैसे विकसित हुई, खासकर 2015 के भूकंप, 2025 की जेन जी क्रांति और हाल की बाढ़ जैसी घटनाओं पर उसकी सख्त और बेबाक रिपोर्टिंग के जरिए.

हिमाल साउथएशियन मैगजीन के संस्थापक कनक मणि दीक्षित ने कहा, “यह तथ्य कि नेपाल एक छोटा देश है, लेकिन एक संप्रभु देश है, पत्रकार का काम आसान भी बनाता है और मुश्किल भी. आसान इसलिए क्योंकि आप आम लोगों से ज्यादा तुरंत जुड़ सकते हैं, लेकिन मुश्किल इसलिए क्योंकि आपकी ज्यादा निगरानी होती है और आपको ज्यादा सवालों का सामना करना पड़ता है.”

नेपाली न्यूजरूम के लिए एक अहम तुलना उनके पड़ोसी देश के मीडिया के कुछ हिस्सों से है.

कांतीपुर डेली में एडिटर-इन-चीफ रह चुके और बाद में हिमालय टीवी से जुड़ने वाले चौहान ने कहा, “आपदा की रिपोर्टिंग हमेशा मुश्किल काम होती है, लेकिन हमने (नेपाली मीडिया ने) बहुत कुछ सीखा है क्योंकि हम भारतीय टेलीविजन देखा करते थे और हमने उनसे सीखा कि क्या नहीं करना चाहिए.”

नेपाल की पिछली बड़ी आपदा के बारे में बात करते हुए – जब गोरखा क्षेत्र में 7.9 तीव्रता का भूकंप आया था और पूरे देश में 8,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी – चौहान ने याद किया कि कैसे कुछ भारतीय टीवी रिपोर्टरों की कवरेज से नेपाली नागरिक और सिविल सोसाइटी के सदस्य नाराज हो गए थे.

चौहान ने कहा, “2015 में उनकी आपदा की कवरेज के जवाब में सोशल मीडिया पर #GoHomeIndianMedia हैशटैग भी ट्रेंड हुआ था.”

आपदाओं की तेज और सनसनीखेज तस्वीरों से लेकर पीड़ितों से असंवेदनशील तरीके से सवाल पूछने और बिना पुष्टि की जानकारी फैलाने तक, भारत के कुछ अंग्रेजी और हिंदी टीवी न्यूज चैनलों के खिलाफ शिकायतों की कोई कमी नहीं है. अवस्थी ने याद किया कि कैसे द काठमांडू पोस्ट ने तब तक इंतजार करने का फैसला किया, जब तक उनकी टीम भोते कोशी बाढ़ की असली शुरुआत की पुष्टि नहीं कर लेती. वहीं कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों ने आधिकारिक जानकारी आने से पहले ही तुरंत खबर दे दी थी कि बाढ़ की शुरुआत चीन में हुई थी.

इन शिकायतों से आगे, कुछ नेपाली आलोचकों ने यह समझने की भी कोशिश की कि भारतीय टीवी न्यूज में सनसनीखेज रिपोर्टिंग इतनी ज्यादा क्यों हो गई है और नेपाल के अपने मीडिया ने कुछ हद तक ऐसे दबावों से खुद को कैसे बचाया है.

हिमाल मीडिया के सह-संस्थापक दीक्षित ने इसका कारण समाज के आकार को बताया.

दीक्षित ने कहा, “जब आप भारत जैसे बड़े समाज में होते हैं, तो टीआरपी और रेटिंग के लिए सनसनीखेज रिपोर्टिंग करने और अपनी कवरेज के लिए जवाबदेह न ठहराए जाने की संभावना ज्यादा होती है. अगर आप नेपाल जैसे छोटे समाज में हैं, तो जवाबदेही ज्यादा संभव है. यहां तक कि एक साधारण बात भी है – पत्रकार के दोस्तों का एक ग्रुप होगा, जो उससे पूछेगा, ‘तुमने यह क्या किया?'”

Kanak Mani Dixit, the founder of Himal Southasian and Himal Khabar, talks about the differences between Nepali and Indian media | Suraj Singh Bisht | ThePrint
कनक मणि दीक्षित, हिमाल साउथएशियन और हिमाल खबर के संस्थापक, नेपाली और भारतीय मीडिया के बीच अंतर के बारे में बात करते हुए | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

दीक्षित ने बाढ़ के दौरान मुश्किल हालात में मौके पर जाकर रिपोर्टिंग करने वाले नेपाली रिपोर्टरों के प्रयासों की सराहना की. उन्होंने यह भी कहा कि हिमालयी देश में मीडिया का माहौल धीरे-धीरे टीवी, डिजिटल और प्रिंट मीडिया की जरूरतों के हिसाब से बदला है, लेकिन नेपाली और भारतीय मीडिया में अभी भी बुनियादी अंतर हैं.

दीक्षित ने कहा, “नेपाली पत्रकारिता को अलग और ज्यादा वास्तविक बनाने वाली एक खास बात यह है कि हमारे यहां अंग्रेजी और स्थानीय भाषा के बीच वैसा बंटवारा नहीं है. जैसे हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में अंतर है, जहां एक खास सामाजिक वर्ग अंग्रेजी पढ़ता है. नेपाल में अब तक ऐसा बंटवारा नहीं है. पढ़ा-लिखा वर्ग भी वही नेपाली अखबार पढ़ता है, जो किसी दूरदराज गांव का व्यक्ति पढ़ता है.”

बाढ़ के बाद के दिन

जब बाढ़ का पानी उतरने लगा और अंतरराष्ट्रीय टीमें अपना सैटेलाइट सामान समेटकर लौट गईं, तब नेपाली एडिटरों ने अपना ध्यान लंबे समय तक चलने वाले और कम चमकदार असर की तरफ कर दिया: पुनर्वास, पुनर्निर्माण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े असहज सवाल.

बाढ़ के दो हफ्ते बाद तक द काठमांडू पोस्ट 200 से ज्यादा खबरें प्रकाशित कर चुका था. वह मौके पर मौजूद रिपोर्टरों को बदल-बदलकर भेज रहा था, ताकि सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार वापस आकर आराम कर सकें और फिर मौके पर जा सकें. ब्रेकिंग खबरों की होड़ में शामिल नहीं होने के बावजूद, द काठमांडू पोस्ट सुरंग बचाव के अपडेट, राहत केंद्रों में बाढ़ से बचे लोगों की स्थिति और राहत एवं बचाव अभियानों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच सहयोग की जांच से जुड़ी खबरें प्रकाशित करने वाला पहला मीडिया संस्थान भी बना.

दूसरे मीडिया संस्थानों ने आपदा की रिपोर्टिंग के अलग तरीके अपनाए. उदाहरण के लिए, हिमाल खबर ने सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल करके तबाही को दोबारा समझने और बाढ़ के उन हिस्सों की जांच करने की कोशिश की, जहां जमीन के रास्ते रिपोर्टरों का पहुंचना आसान नहीं था.

द काठमांडू पोस्ट उन मीडिया संस्थानों में शामिल था, जिन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि बाढ़ की शुरुआत किस वजह से हुई. उसने शुरुआती वैज्ञानिक आकलनों की रिपोर्ट की, जिनके मुताबिक बर्फ का हिमस्खलन और उसके बाद मलबे के जमा होने से एक अस्थायी झील बन सकती थी, जिसके बाद अचानक पानी का तेज बहाव नीचे की तरफ चला गया.

26 अगस्त की बाढ़ की नेपाल में हुई कवरेज ने देश में पहले से अच्छी तरह स्थापित जलवायु और विज्ञान पत्रकारिता की एक झलक भी दिखाई. वरिष्ठ नेपाली पत्रकार कुंडा दीक्षित ने कहा कि “नेपाल में जलवायु परिवर्तन को नकारने की प्रवृत्ति बहुत कम है” और मीडिया जलवायु परिवर्तन तथा आपदा के तत्काल भूगर्भीय कारणों को लेकर लगातार ज्यादा सावधान हो रहा है.

बाढ़ से सामने आने वाली कम दिखाई देने वाली कहानियों में से एक यह थी कि कैमरों के वहां से चले जाने के बाद लोगों के साथ क्या हुआ. नेपाली रिपोर्टरों ने बार-बार बताया कि उन्होंने पीड़ितों में आपदा के मानसिक असर को देखा. यह ऐसी बात है जो अक्सर मौतों की संख्या और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के आंकड़ों के नीचे दब जाती है.

Umesh Chauhan, the group editor of Himalaya TV and OnlineKhabar | Suraj Singh Bisht | ThePrint
हिमालय टीवी और ऑनलाइन खबर के ग्रुप एडिटर उमेश चौहान | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

चौहान, पौडेल और कुमार ने बताया कि उनकी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई, जिनकी आंखों में खालीपन था और जो शायद आपदा के पैमाने, अपने प्रियजनों को खोने या अब अपनी जिंदगी की हालत को समझ नहीं पा रहे थे.

चौहान ने कहा, “ऐसी स्थिति में हम लोगों के बारे में बात नहीं करते, हम लोगों की मानसिक सेहत के बारे में रिपोर्ट नहीं करते. लेकिन यही सबसे जरूरी, सबसे महत्वपूर्ण चीज है. जब लोगों को यह भी एहसास नहीं होता कि वे किस दौर से गुजर चुके हैं, तब वे सबसे ज्यादा कमजोर होते हैं.”

दोपहर बाद पौडेल KMG के ऑफिस में अपनी डेस्क पर बैठे थे. उत्तरी नेपाल में बाढ़ आए दो हफ्ते हो चुके थे. 26 अगस्त से ही उनके आसपास का न्यूजरूम लगातार तेज रफ्तार से काम कर रहा था—रिपोर्टरों को मौके पर भेजा जा रहा था, दूरदराज के जिलों से फोन आ रहे थे, तस्वीरें और प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी इतनी तेजी से आ रही थी कि उन्हें संभालना मुश्किल हो रहा था.

अब उन्हें इस बात की चिंता थी कि जब यह जल्दबाजी और तात्कालिकता खत्म हो जाएगी, तब क्या होगा. उन्हें आपदाओं के बाद होने वाला जाना-पहचाना चक्र याद आ रहा था: सुर्खियां, राहत सामग्री, राजनीतिक ध्यान और फिर खामोशी. लेकिन यह उनके लिए सिर्फ एक और आपदा नहीं थी और न ही सिर्फ एक और खबर थी. उन्हें अपने गांव, अपने परिवार के सदस्यों और उन परिचित इलाकों को खोने का सामना अभी भी करना था, जो उनके बचपन की यादों का हिस्सा थे.

उन्होंने कहा, “खबर कुछ समय तक खबर रहेगी. मीडिया कवरेज देगा, कुछ महीनों तक राहत सामग्री भेजी जाएगी, फिर यह कहानी बंद हो जाएगी. लेकिन फिर यह दोबारा होगा: नेपाल में, हिमालय में या कहीं और.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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