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Wednesday, 7 October, 2026
होममत-विमतचीन का ग्रोथ ट्रैप—बहुत ज़्यादा बिल्डिंग, बहुत कम खर्च, कमज़ोर फर्म जो खत्म नहीं होंगी

चीन का ग्रोथ ट्रैप—बहुत ज़्यादा बिल्डिंग, बहुत कम खर्च, कमज़ोर फर्म जो खत्म नहीं होंगी

चीन के गोल्डन वीक के दौरान भरी हुई ट्रेनें बताती हैं कि लोग घूमना चाहते हैं, लेकिन खाली कैश रजिस्टर आर्थिक असुरक्षा की ओर इशारा करते हैं. बीजिंग चाहे जो कदम उठाए, भारत को इसका फायदा मिलने की स्थिति में है.

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इस हफ्ते चीन में छुट्टियां हैं क्योंकि गोल्डन वीक मिड-ऑटम फेस्टिवल के साथ पड़ रहा है. इसके चलते 13 दिनों की छुट्टी है. एक हफ्ते या उससे ज्यादा समय तक ठहरने के लिए होटलों की बुकिंग पिछले साल की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा हो गई है. इस बीच, बीजिंग ने छुट्टियों में घूमने वालों को ज्यादा खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से एक महीने का कैंपेन शुरू किया है, लेकिन असली आंकड़े कुछ ज्यादा सावधानी वाली तस्वीर दिखाते हैं: पिछले साल के गोल्डन वीक के दौरान हर यात्रा पर औसत खर्च तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था और यह करीब 911 युआन था. हालांकि, चीन के लोग यात्रा कर रहे हैं, लेकिन वे पहले जितना खर्च नहीं कर रहे हैं और यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है.

खर्च में यह अंतर इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड की हाल की किताब ‘टुवर्ड अ न्यू इकोनॉमिक ग्रोथ मॉडल फॉर चाइना’ का भी मुख्य विषय है. इसे थॉमस हेलब्लिंग, सोनाली जैन-चंद्रा, सिद्धार्थ कोठारी और कृष्णा श्रीनिवासन ने एडिट किया है. किताब के 11 चैप्टर्स में घरेलू बचत से लेकर दिवालियापन कानून तक के मुद्दों पर चर्चा की गई है. ये सभी चैप्टर्स मिलकर ऐसी अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें इतिहास के सबसे बड़े बदलावों में से एक हुआ है, लेकिन अब वह तीन बड़ी समस्याओं के कारण दबाव में है: स्थानीय सरकारें कम होते फायदे के बावजूद निर्माण करती जा रही हैं, कमजोर कंपनियां बनी हुई हैं और परिवार खर्च करने से बच रहे हैं.

यह स्थिति भारत के लिए तुरंत महत्वपूर्ण है. चीन अपने देश के अंदर पर्याप्त खर्च नहीं करता है, तो उसे निर्यात पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा. बीजिंग इन तीन चुनौतियों से कैसे निपटता है, इसका असर आने वाले समय में भारत के व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और एशिया में उसकी स्थिति पर पड़ेगा.

वह देश जो निर्माण करना बंद नहीं कर सकता

चीन की आर्थिक उपलब्धि को स्वीकार किया जाना चाहिए. 1978 में खरीदने की क्षमता के हिसाब से चीन की प्रति व्यक्ति आय करीब 900 डॉलर थी, जो अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के 3 प्रतिशत से भी कम थी. चार दशकों में, करीब 9 प्रतिशत की औसत विकास दर के साथ, चीन की अर्थव्यवस्था लगभग 60 गुना बढ़ी. इससे 75 करोड़ से ज्यादा लोगों को शहरों में जाने में मदद मिली.

लेकिन अब चीन के आर्थिक मॉडल की सीमाएं दिखाई देने लगी हैं.

1956 में रॉबर्ट सोलो ने बताया था कि सिर्फ पूंजी जमा करने से आर्थिक विकास को हमेशा जारी नहीं रखा जा सकता क्योंकि मशीनरी या बुनियादी ढांचे में हर नई बढ़ोतरी से मिलने वाला फायदा धीरे-धीरे कम होता जाता है. पॉल क्रुगमैन ने 1994 के अपने लेख “द मिथ ऑफ एशियाज मिरेकल” में भी चेतावनी दी थी कि सिर्फ मेहनत के दम पर होने वाला विकास, नई खोजों के बिना, आखिरकार अपनी रफ्तार खो देता है.

इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड का एक खास चार्ट रॉबर्ट लुकास का ध्यान जरूर खींचता, जिन्होंने 1990 में सवाल उठाया था कि पूंजी अमीर देशों से गरीब देशों में क्यों नहीं जाती, जहां सैद्धांतिक रूप से उसे ज्यादा फायदा मिलना चाहिए. चीन की स्थिति में इसका उल्टा देखने को मिला है. आईएमएफ के मुताबिक, चीन में पूंजी की एक अतिरिक्त इकाई से मिलने वाला फायदा 1970 के दशक से आधे से भी ज्यादा घट गया है और अब यह अमेरिका से भी कम है. इसका नतीजा यह है कि अमेरिका की आय के एक हिस्से के बराबर आय रखने वाले देश के पास अब अतिरिक्त रूप से इतनी ज्यादा पूंजी है, जितनी वह प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं कर सकता.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

स्थानीय सरकारें सरकार के कुल खर्च का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा करती हैं, लेकिन उन्हें इससे जुड़ा सिर्फ करीब 50 प्रतिशत राजस्व मिलता है. अर्थशास्त्री इस अंतर को वर्टिकल फिस्कल इम्बैलेंस यानी केंद्र और स्थानीय सरकारों के बीच राजस्व और खर्च का असंतुलन कहते हैं. इस अंतर को भरने के लिए चीन के स्थानीय अधिकारियों ने ज़मीन बेचने और बजट से बाहर कर्ज लेने का सहारा लिया है. उनके करियर में आगे बढ़ना विकास के लक्ष्यों को पूरा करने पर निर्भर था, इसलिए लगातार निर्माण को बढ़ावा मिला.

जीडीपी के लक्ष्यों को लेकर चीन का अनुभव चार्ल्स गुडहार्ट की 1975 की उस बात को सही साबित करता है कि जब किसी आंकड़े को नीति का लक्ष्य बना दिया जाता है, तो वह आंकड़ा भरोसेमंद नहीं रह जाता. प्रॉपर्टी बाजार में गिरावट आने के साथ, जमीन की बिक्री से मिलने वाले राजस्व समेत स्थानीय सरकारों का बजट में शामिल राजस्व, महामारी से पहले के दशक में जीडीपी के 17.9 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 13.6 प्रतिशत रह गया.

इस बीच, स्थानीय सरकारों और उनके लिए फंड जुटाने वाली संस्थाओं का कुल कर्ज बढ़कर जीडीपी के 80 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है. वैश्विक वित्तीय संकट से पहले यह करीब 10 प्रतिशत था. इसके उलट, भारत इस समस्या से निपटने के लिए संविधान के तहत बने फाइनेंस कमीशन का इस्तेमाल करता है. यह आयोग हर पांच साल में केंद्र के टैक्स से मिलने वाले राजस्व का राज्यों के बीच बंटवारा करता है. इससे उस वित्तीय समस्या से निपटने के लिए भारत में लंबे समय से एक संस्थागत व्यवस्था मौजूद है, जिसका सामना चीन अभी कर रहा है.

ऐसी अर्थव्यवस्था जहां किसी चीज़ को खत्म नहीं होने दिया जाता

जोसेफ शुम्पीटर ने अपनी 1942 की किताब ‘कैपिटलिज्म, सोशलिज्म एंड डेमोक्रेसी’ में कहा था कि पूंजीवाद ‘क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन’ यानी रचनात्मक विनाश की प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ता है. इसमें नई और बेहतर कंपनियां पुरानी कंपनियों की जगह लेती हैं. आईएमएफ ने चीन में शुम्पीटर की बताई इस प्रक्रिया में कमी देखी है.

खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में, 10 साल से कम पुरानी कंपनियों का कुल राजस्व में हिस्सा 2004-05 में करीब 70 प्रतिशत था, जो 2017-18 तक घटकर करीब 30 प्रतिशत रह गया. सरकारी कंपनियों की उत्पादकता निजी कंपनियों की तुलना में औसतन 31 प्रतिशत कम है और उनकी पूंजी से होने वाली उत्पादकता करीब आधी है.

इसके बावजूद, इन कंपनियों को अब भी कर्ज देने में प्राथमिकता मिलती है, क्योंकि वे उस व्यवस्था के तहत काम करती हैं जिसे यानोस कोर्नाई ने अपनी 1980 की किताब ‘इकोनॉमिक्स ऑफ शॉर्टेज’ में “सॉफ्ट बजट कंस्ट्रेंट” कहा था. इसका मतलब है कि आर्थिक संकट आने पर ये कंपनियां वित्तीय मदद के लिए सरकार के हस्तक्षेप पर निर्भर रह सकती हैं.

जनवरी 2024 में, हांगकांग की एक अदालत ने एवरग्रांडे को बंद करने का आदेश दिया. यह एक बड़े प्रॉपर्टी कारोबारी समूह की मूल कंपनी थी, जिसकी करीब 100 सहायक कंपनियां थीं और जिस पर लगभग 330 अरब डॉलर का कर्ज था. यह फैसला एक अपवाद था, जिसने आम तौर पर चल रही व्यवस्था की पुष्टि की.

इसके अलावा, आईएमएफ का कहना है कि केंद्रीय बैंक की कर्ज आधारित नीतियों से छोटे निजी कारोबारों की तुलना में बड़ी सरकारी मदद वाली कंपनियों को ज्यादा फायदा मिलता है.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

इससे एक ऐसी पहेली समझ आती है, जिसने कई विश्लेषकों को उलझन में डाल रखा है. 2023 में दुनिया में दाखिल किए गए कुल पेटेंट में चीन की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत थी, जबकि अमेरिका की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत थी. लेकिन चीन की कुल उत्पादन क्षमता की उत्पादकता में बढ़ोतरी 2007 के बाद करीब आधी रह गई है और यह 2 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है.

एंटोनी डेशलेप्रेत्र और उनके साथियों की एक पुरानी स्टडी में पाया गया था कि चीन के करीब 72 प्रतिशत पेटेंट के बाद देश या विदेश में कोई और पेटेंट आवेदन नहीं किया गया, जबकि अमेरिका के पेटेंट में यह आंकड़ा 13 प्रतिशत था. फिर भी आईएमएफ का कहना है कि गुणवत्ता में यह अंतर कम हो सकता है.

नई खोजों और नए विचारों के लिए ऐसा माहौल जरूरी है, जहां नई कंपनियां बढ़ सकें और असफल कंपनियों को बाजार से बाहर निकलने की अनुमति हो. इसलिए सितंबर 2025 में जारी चीन के 2006 के दिवालियापन कानून में प्रस्तावित बदलाव, जो असफल कंपनियों के लिए बाजार से बाहर निकलना आसान बनाते हैं, बहुत महत्वपूर्ण सुधारों में से एक हैं, भले ही इन पर बहुत कम ध्यान दिया गया हो.

सेवाओं का क्षेत्र ज्यादा उम्मीद वाला नजर आता है. आईएमएफ की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में बाजार से जुड़ी सेवाएं, जिनमें फाइनेंस और सूचना तकनीक शामिल हैं, ऊंची उत्पादकता और उत्पादकता में मजबूत बढ़ोतरी दोनों दिखाती हैं. फिर भी अर्थव्यवस्था में सेवाओं की हिस्सेदारी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अंक कम है. इसका मतलब है कि जब पूंजी को कम उत्पादक कंपनियों तक सीमित रखने की जरूरत नहीं रहेगी, तो यहां विकास की काफी संभावना है.

खर्च करने को लेकर बहुत सावधान लोग

चीन के परिवार खर्च करने से काफी बचते हैं. 1954 में फ्रांको मोदिग्लियानी और रिचर्ड ब्रम्बरग ने ‘लाइफ-साइकिल हाइपोथेसिस’ यानी जीवन-चक्र परिकल्पना दी थी. इसके मुताबिक, लोग अपनी नौकरी के वर्षों के दौरान रिटायरमेंट के लिए पैसे बचाते हैं. 2004 में मोदिग्लियानी ने लैरी काओ शी के साथ मिलकर इस परिकल्पना का इस्तेमाल चीन में ज्यादा बचत की समस्या को समझाने के लिए किया.

1990 के दशक के आखिर में सरकारी कंपनियों में सुधारों के दौरान “आयरन राइस बाउल” व्यवस्था को खत्म किया गया. इस व्यवस्था में जीवनभर नौकरी और कंपनियों की ओर से घर, स्वास्थ्य सेवा और पेंशन जैसी सुविधाएं शामिल थीं. इस बदलाव के बाद इन जोखिमों की जिम्मेदारी परिवारों पर आ गई. इसके कारण चीनी परिवारों ने ज्यादा बचत करना शुरू कर दिया, जैसा कि अनिश्चितता का सामना कर रहे लोगों के बारे में हेन लेलैंड (1968) और माइल्स किमबॉल (1990) ने बताया था.

इस समय चीन में परिवारों की बचत जीडीपी के पांचवें हिस्से से ज्यादा है. यह किसी भी ओईसीडी अर्थव्यवस्था से ज्यादा है. स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा पर सरकारी खर्च, दोनों ही जीडीपी के करीब 3 प्रतिशत हैं, जबकि ओईसीडी देशों का औसत क्रमशः 7.2 और 8.2 प्रतिशत है. ग्रामीण हुकू पंजीकरण वाले शहरी परिवार, शहरी पंजीकरण वाले परिवारों की तुलना में करीब 7 प्रतिशत अंक ज्यादा बचत करते हैं.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

यह उस स्थिति का उदाहरण है जिसे कीन्स ने “पैराडॉक्स ऑफ थ्रिफ्ट” यानी बचत का विरोधाभास कहा था. इसमें किसी एक परिवार के लिए सावधानी से पैसे बचाना फायदेमंद होता है, लेकिन अगर हर कोई ऐसा करने लगे, तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है. 2023 के बीच से 2025 तक चीन में उपभोक्ता महंगाई 1 प्रतिशत से नीचे रही. इससे पता चलता है कि लोगों के कम खर्च करने की वजह से कीमतों में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई. इससे इरविंग फिशर ने 1933 में जिस ‘डेट डिफ्लेशन’ के खतरे के बारे में बताया था, वह बढ़ जाता है. इसमें कीमतें गिरने से कर्ज का बोझ और बढ़ जाता है.

हालांकि इसका समाधान उम्मीद से ज्यादा सस्ता है. ग्रामीण चीन के लिए महत्वपूर्ण ‘रेजिडेंट्स पेंशन प्रोग्राम’ के तहत मिलने वाले लाभ को दोगुना करने पर 2050 तक जीडीपी का अतिरिक्त 0.6 प्रतिशत खर्च होगा और इससे ग्रामीण परिवारों की खपत करीब 4 प्रतिशत बढ़ सकती है. यह खर्च 2013 से 2023 के बीच हर साल औद्योगिक नीति पर खर्च किए गए जीडीपी के करीब 4 प्रतिशत का छोटा सा हिस्सा है. इस औद्योगिक नीति का ज्यादातर पैसा मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में गया, जहां उत्पादन क्षमता घरेलू मांग की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ी है.

भारत के लिए इसका क्या मतलब है

यह सरप्लस कैपेसिटी ही वह जगह है जहां चीन के फैसले भारत के हितों से जुड़ते हैं. चीन का करंट अकाउंट सरप्लस 2025 में GDP का 3.7 परसेंट हो गया, जिससे भारतीय ट्रेड डिफेंस में लगातार सतर्कता की ज़रूरत है.

भारत एक्टिवली दूसरे मार्केट डेवलप कर रहा है. भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) 15 जुलाई 2026 को लागू हुआ था. इसके अलावा, भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA), जिसे लगभग दो दशकों की बातचीत के बाद जनवरी में फाइनल किया गया था, पर साल के आखिर तक साइन होने की उम्मीद है.

बड़ा ट्रेंड भारत के पक्ष में है. इसकी इकोनॉमिक ग्रोथ पहले से ही घरेलू डिमांड और सर्विसेज़ से चल रही है, वही सेक्टर जिनकी IMF बीजिंग के लिए वकालत कर रहा है. यूनाइटेड नेशंस का अनुमान है कि भारत की वर्किंग-एज आबादी 2054 तक बढ़ती रहेगी, जबकि चीन की आबादी 2024 में 984 मिलियन से घटकर 2050 तक 745 मिलियन होने की उम्मीद है.

1992 में, देंग शियाओपिंग के दक्षिणी दौरे के दौरान, उन्होंने सावधान चीन को यकीन दिलाया कि दौलत कमाना सुरक्षित है. उनके बाद आने वालों के सामने ज़्यादा मुश्किल हालात हैं, क्योंकि चीन ने लुकास के पैराडॉक्स को उलट दिया है और अब कैपिटल के अलावा दूसरे रिसोर्स की कमी का सामना कर रहा है. चीनी सरकार को परिवारों को यह यकीन दिलाना होगा कि खर्च करना सुरक्षित है, अधिकारियों को यह कि कंस्ट्रक्शन रोकना समझदारी है, और बैंकों को यह कि फेल हो रही कंपनियों को डूबने देना ठीक है.

इस गोल्डन वीक के दौरान भीड़ वाली ट्रेनें चीनी लोगों में आने-जाने की लगातार इच्छा दिखाती हैं, फिर भी खाली कैश रजिस्टर आर्थिक सुरक्षा में भरोसे की कमी दिखाते हैं. बीजिंग इस तनाव को कैसे भी सुलझाए, भारत को फायदा होने की स्ट्रेटेजिक स्थिति है.

बिदिशा भट्टाचार्य दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेल हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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