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Wednesday, 16 September, 2026
होममत-विमतक्या लाल से नीले की ओर बढ़ रही सपा अपने सामाजिक विस्तार की नई जमीन तैयार कर रही है?

क्या लाल से नीले की ओर बढ़ रही सपा अपने सामाजिक विस्तार की नई जमीन तैयार कर रही है?

सपा का लाल से नीले की ओर बढ़ता कदम सिर्फ रंग और प्रतीक का बदलाव नहीं, बल्कि दलित, अतिपिछड़े और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश है. 2027 में इसकी असली परीक्षा होगी.

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क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति लाल, नीले और भगवे के बीच एक बार फिर नए सामाजिक गठजोड़ की ओर बढ़ रही है? 2027 के विधानसभा चुनाव में काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी पार्टी दलित, अतिपिछड़े, पिछड़े और सवर्ण समाज के अलग-अलग हिस्सों को अपने साथ जोड़कर व्यापक सामाजिक गठबंधन बना पाती है. उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि कोई भी दल केवल अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के भरोसे लंबे समय तक सत्ता में नहीं रह सकता. चुनावी सफलता के लिए पुराने मतदाताओं को साथ रखते हुए नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनानी पड़ती है.

भाजपा ने अपने पारंपरिक सवर्ण-व्यापारी आधार से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों के बीच अपना आधार बनाया और एक व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा किया. दूसरी ओर, सपा ने यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़ते हुए पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए अपने सामाजिक आधार को विस्तार दिया. 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे इसका चुनावी लाभ भी मिला. अब सवाल यह है कि क्या सपा 2024 में दिखे इस सामाजिक विस्तार को 2027 के विधानसभा चुनाव तक टिकाऊ राजनीतिक गठबंधन में बदल पाएगी?

2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा के सामाजिक आधार के विस्तार की एक नई तस्वीर पेश की. लोकनीति के चुनाव बाद सर्वेक्षण के अनुसार, 92 प्रतिशत मुस्लिम और 82 प्रतिशत यादव मतदाताओं ने इंडिया गठबंधन के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन इस गठजोड़ की सबसे महत्वपूर्ण बात गैर-जाटव दलितों का समर्थन था. इस समूह के 56 प्रतिशत मत इंडिया गठबंधन के खाते में गए. जाटव मतदाताओं में भी 25 प्रतिशत ने गठबंधन का समर्थन किया. इसके उलट, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को गैर-जाटव दलितों के केवल 29 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2019 में उसे इस सामाजिक समूह के 48 प्रतिशत वोट मिले थे.

यह बदलाव केवल चुनावी आंकड़ा नहीं है. यह उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में चल रहे पुनर्संयोजन का संकेत भी है. भाजपा ने पिछले एक दशक में जाटवों के बाहर के दलित समुदायों, खासकर पासी, कोरी, धोबी, वाल्मीकि और अन्य छोटे दलित समूहों के बीच अपना आधार बनाने की रणनीति विकसित की थी. 2024 में उसे इस रणनीति के सामने चुनौती मिली. सपा के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके पारंपरिक सामाजिक आधार में दलितों की बढ़ती मौजूदगी उसके राजनीतिक विस्तार की संभावना को बढ़ाती है.

लेकिन लोकसभा चुनाव का सामाजिक गठबंधन विधानसभा चुनाव में उसी तरह काम करे, यह ज़रूरी नहीं है. लोकसभा में राष्ट्रीय मुद्दों और सत्ता-विरोधी भावनाओं का प्रभाव अधिक व्यापक हो सकता है. विधानसभा चुनाव में स्थानीय सामाजिक समीकरण, जातीय प्रतिनिधित्व, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और बूथ स्तर का संगठन ज्यादा निर्णायक हो जाते हैं. इसलिए 2027 के लिए सपा की चुनौती केवल पीडीए का नारा देने की नहीं, बल्कि उसे एक स्थायी सामाजिक गठबंधन में बदलने की है.

यहीं से सपा की ‘लाल से नीले’ की ओर बढ़ती राजनीति महत्वपूर्ण हो जाती है. लाल झंडे और लाल टोपी वाली सपा का नीले रंग को अपनाना महज़ प्रतीकात्मक बदलाव नहीं माना जा सकता. यह दलित और बहुजन राजनीति के उस सामाजिक क्षेत्र में प्रवेश की कोशिश है, जिसे लंबे समय तक बसपा और कांशीराम-मायावती की राजनीति का प्रमुख क्षेत्र माना जाता रहा है. 2024 में पीडीए की सफलता ने इस प्रयोग को राजनीतिक विश्वसनीयता भी दी है.

समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई के लिए नीली टी-शर्ट और नीली जींस को नए ड्रेस कोड के रूप में अपनाने का फैसला इसी व्यापक बदलाव का एक संकेत है. जिस छात्र संगठन की पहचान पहले लाल रंग के कुर्तों या शर्टों से होती थी, उसके पहनावे में नीले रंग का आना एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देता है. उत्तर प्रदेश में नीला सिर्फ एक रंग नहीं है. यह बहुजन राजनीति, कांशीराम के आंदोलन और बाद में मायावती की राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है.

लेकिन क्या केवल नीली टी-शर्ट पहन लेने से दलित राजनीति सपा के साथ आ जाएगी? निश्चित रूप से नहीं.

दलित राजनीति को अब एक समरूप वोट बैंक मानना मुश्किल है. जाटव, पासी, कोरी, वाल्मीकि, मुसहर, डोम और दूसरे समुदायों की सामाजिक परिस्थितियां और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं. यही बात पिछड़े वर्गों पर भी लागू होती है. यादव, कुर्मी, निषाद, राजभर, मौर्य और दूसरे समुदायों की राजनीतिक आकांक्षाएं एक जैसी नहीं हैं. मंडल के बाद जिस व्यापक ‘पिछड़ा’ पहचान ने राजनीति को प्रभावित किया था, वह अब कई उप-जातीय पहचानों और राजनीतिक दावेदारियों में बंट चुकी है.

इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल ‘दलित’, ‘पिछड़ा’ या ‘बहुजन’ जैसे व्यापक वर्गों को अपने साथ जोड़ लेना पर्याप्त नहीं है. उसे इन वर्गों के भीतर मौजूद अलग-अलग सामाजिक समूहों की आकांक्षाओं को समझना और उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना होगा.

यही सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. उसे एक ओर अपने पुराने सामाजिक आधार, खासकर यादवों और मुस्लिमों को बनाए रखना है और दूसरी ओर दलित तथा अतिपिछड़े समूहों के बीच अपनी जगह बनानी है. अगर लाल और नीला एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तो यह सपा के लिए बड़े सामाजिक विस्तार का आधार बन सकता है, लेकिन अगर नीला केवल प्रतीक बनकर रह जाता है और संगठन, टिकट वितरण तथा सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल पर पुराना सामाजिक ढांचा ही कायम रहता है, तो यह प्रयोग बहुत दूर तक नहीं जा पाएगा.

अखिलेश यादव की राजनीति में यह बदलाव केवल दलितों तक सीमित नहीं है. पीडीए के साथ हिंदू मतदाताओं, ब्राह्मणों, महिलाओं और युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश बताती है कि सपा अपने पारंपरिक सामाजिक दायरे को बड़ा करना चाहती है. मंदिरों से जुड़ी राजनीतिक सक्रियता, प्रस्तावित रथयात्रा और ब्राह्मणों के साथ संवाद की पहल इसी कोशिश का हिस्सा मानी जा सकती है. सवाल यह है कि क्या सपा अपने पुराने सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए इन नए समूहों को भी अपने साथ जोड़ सकती है.

यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भाजपा ने एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण को सपा के खिलाफ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है. अखिलेश यादव के लिए अब हिंदू समाज के उन वर्गों तक पहुंच बनाना ज़रूरी है, जो सपा को अपना स्वाभाविक राजनीतिक विकल्प नहीं मानते. लेकिन यहां सपा के सामने एक कठिन संतुलन है. उसकी धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी पहचान को बनाए रखते हुए उसे हिंदू समाज के साथ संवाद बढ़ाना है.

भाजपा की हिंदुत्व राजनीति की नकल करके सपा भाजपा को नहीं हरा सकती. संगठन, कैडर और वैचारिक ढांचे के स्तर पर भाजपा की बढ़त पहले से मौजूद है. सपा की वास्तविक ताकत तभी बन सकती है जब वह सांस्कृतिक पहचान के सवाल को सामाजिक न्याय, आर्थिक अवसर, रोजगार, शिक्षा और कल्याणकारी राजनीति से जोड़ पाए. यानी उसे हिंदू पहचान और सामाजिक न्याय के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा जो उसकी अपनी राजनीतिक पहचान को भी बनाए रखे.

इस पूरी प्रक्रिया में एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर उभरती है. सपा अब केवल लाल रंग की पार्टी नहीं रहना चाहती. वह लाल को छोड़ नहीं रही, बल्कि उसके ऊपर नीला चढ़ाने की कोशिश कर रही है. लाल उसकी समाजवादी विरासत और पिछड़े सामाजिक आधार का प्रतीक है, जबकि नीला दलित और बहुजन राजनीति की ओर बढ़ते उसके कदम का संकेत है. इसके साथ अगर सपा हिंदू समाज के अलग-अलग वर्गों, ब्राह्मणों, महिलाओं और युवाओं को भी जोड़ पाती है, तो उसका राजनीतिक कैनवास पहले से कहीं अधिक बड़ा हो सकता है.

लेकिन इतने अलग-अलग रंगों को एक ही राजनीतिक चित्र में टिकाए रखना आसान नहीं होगा. यादव और दलितों का साथ आना अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा. दोनों को यह भरोसा भी होना चाहिए कि संगठन और सत्ता में उनका प्रतिनिधित्व होगा. अतिपिछड़ी जातियों को सिर्फ चुनाव के समय याद करना पर्याप्त नहीं होगा; उन्हें नेतृत्व और टिकट वितरण में जगह देनी होगी. सवर्ण समाज के साथ संवाद भी केवल प्रतीकात्मक न होकर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होना चाहिए. इसी तरह मुस्लिम मतदाताओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि सपा के व्यापक सामाजिक विस्तार का अर्थ उनके राजनीतिक महत्व को कम करना नहीं है.

इसलिए 2027 के चुनाव को केवल पीडीए बनाम भाजपा के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा. असली सवाल इससे आगे का है. कौन-सी पार्टी दलित, अतिपिछड़ा, पिछड़ा, मुस्लिम, सवर्ण, महिला और युवा—इन अलग-अलग सामाजिक आकांक्षाओं को एक साझा राजनीतिक परियोजना में बदल पाती है?

2027 में सपा के लिए असली परीक्षा यह नहीं होगी कि उसने लाल के साथ नीला जोड़ा या नहीं. परीक्षा यह होगी कि क्या वह इन रंगों को संगठन, प्रतिनिधित्व और वोट में बदल पाती है. अगर वह ऐसा कर पाती है, तो 2024 का पीडीए प्रयोग महज एक चुनावी गठजोड़ नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा के सामाजिक विस्तार की नई जमीन बन सकता है.

डॉ. प्रांजल सिंह, दिल्ली यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.


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