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Sunday, 28 June, 2026
होममत-विमतब्राह्मणों को साधने में जुटी समाजवादी पार्टी लेकिन क्या इस समुदाय पर BJP की पकड़ सचमुच कमजोर हुई है?

ब्राह्मणों को साधने में जुटी समाजवादी पार्टी लेकिन क्या इस समुदाय पर BJP की पकड़ सचमुच कमजोर हुई है?

एसपी की नई ब्राह्मण राजनीति और बीजेपी की पुरानी सामाजिक इंजीनियरिंग के बीच, क्या उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित 2027 से पहले बदलने लगा है?

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क्या 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश का बदलता सामाजिक समीकरण भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राजनीतिक बेचैनियों को बढ़ा सकता है? यह सवाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस लिए जरूरी हो गया है क्योंकि 17 जून को समाजवादी पार्टी द्वारा आयोजित ब्राह्मण सभा ने एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया है.

प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की आबादी लगभग 10 से 11 प्रतिशत मानी जाती है, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव उसकी जनसंख्या से कहीं अधिक रहा है.

प्रदेश का हर राजनीतिक दल यह चाहता है कि स्वर्णों में, ख़ासतौर से ब्राह्मण समुदाय, उसके साथ रहे जिससे सरकार बनने में आसानी हो. इसी क्रम में, ब्राह्मण समुदाय को आकर्षित करने के लिए समाजवादी पार्टी (एसपी) भगवान परशुराम को एक नए राजनीतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही है, और “जय परशुराम” के नारे को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा रहा है. दूसरी तरफ, जनेश्वर मिश्र जिन्हें प्रदेश की राजनीति में छोटे लोहिया के नाम से जाना जाता है, उन्हें समाजवादी पार्टी ब्राह्मण नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है. 17 जून की ब्राह्मण सभा को इसी व्यापक सामाजिक और राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.

ब्राह्मण नाराज़गी और BJP की डैमेज कंट्रोल रणनीति

क्या समाजवादी पार्टी की इन राजनीतिक क्रियाकलापों को देखते हुए बीजेपी अपने पुराने रणनीतियों की ओर लौटेगी?

बात दिसंबर 2021 की है, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और यूपी के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान के घर पर यूपी के ब्राह्मण नेताओं की एक बड़ी बैठक हुई थी. बैठक में ब्राह्मणों की नाराजगी को लेकर मंथन हुआ. बैठक के आखिर में ब्राह्मणों को मनाने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला की अगुवाई में एक कमिटी बनाई गई. इस कमिटी का काम है हर विधानसभा में टीम बनाकर ब्राह्मणों के घर-घर जाकर उन्हें मनाया जाए.

लेकिन सवाल उस समय भी यहीं था कि योगी सरकार में 10 ब्राह्मण मंत्री और विधानसभा में पार्टी के 46 ब्राह्मण विधायक होने के बावजूद बीजेपी को अलग से ब्राह्मण कमिटी क्यों बनानी पड़ी? जबकि उस समय कांग्रेस से बीजेपी में आए जितिन प्रसाद को भी मंत्री विस्तार में मंत्री बनाया गया. इससे पहले, ब्राह्मणों का चेहरा बनाकर डॉ. दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम, बृजेश पाठक, श्रीकांत शर्मा, राम नरेश अग्निहोत्री को भी कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया. वहीं, सतीश चंद्र द्विवेदी, नीलकंठ तिवारी, स्वतंत्र प्रभार मंत्री और अनिल शर्मा, आनंद स्वरूप शुक्ला और चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय को राज्यमंत्री बनाया गया था. इस तरह योगी सरकार में दस ब्राह्मण मंत्री थे.

प्रदेश की राजनीति में आजादी के बाद से 1989 तक यूपी को छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री मिले. पहले की सियासत ही ब्राह्मण-मुस्लिम और दलित फैक्टर पर केंद्रित थी. लेकिन, मंडल आंदोलन से पिछड़ों का उभार हुआ और नारायण दत्त तिवारी के बाद कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को नहीं मिला, पर राम मंदिर आंदोलन के बाद से ब्राह्मण फिर से महत्वपूर्ण भूमिका में आ गए, वह जिसके साथ रहे, सत्ता उनके साथ रही. इसके बावजूद भी भाजपा में ठाकुर वर्चस्व का सवाल योगी सरकार को झेलना पड़ा.

हालांकि, इन सभाओं और राजनीतिक आकलन को समझने के लिए प्रदेश की राजनीति के चुनावी आंकड़ों पर नज़र डालना जरूरी है. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने 403 में से 273 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन को 125 सीटें मिली थीं. वहीं, बीजेपी को लगभग 41 प्रतिशत और समाजवादी पार्टी को लगभग 32 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. बीजेपी की यह सफलता लोगों की नाराज़गी और हिंदुत्व तथा गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित समुदायों के समर्थन का मिलाजुला रूप था. जबकि 2024 के लोकसभा चुनावों ने राजनीतिक तस्वीर में बदलाव के संकेत दिए. बीजेपी उत्तर प्रदेश में 80 में से 33 सीटों तक सिमट गई, वाराणसी तथा अयोध्या जो बीजेपी के हिंदुत्व की पाठशाला के रूप में देखा जाता था बीजेपी वहां चुनाव हार गई. जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. यह समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी जीत थी क्योंकि समाजवादी पार्टी का सूत्र पीडीए जिसने एक नया राजनीतिक ब्लॉक तैयार किया था. यह नतीजे इस बात का संकेत है कि उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरण स्थिर नहीं हैं और मतदाता नए राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.

ब्राह्मण वोट बैंक की परतें

ब्राह्मण समुदाय, राजनीतिक रूप से उत्तर प्रदेश की लगभग 100 से 125 विधानसभा सीटों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. हालांकि, ब्राह्मण समुदाय को एक समान और एकरूप सामाजिक समूह के रूप में देखना उचित नहीं होगा. इनके भीतर भी कई स्तरों पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विभाजन मौजूद हैं.

पहला हिस्सा, उन ब्राह्मण परिवारों का है, जो राजनीतिक रूप से अत्यंत सशक्त हैं और जिनका प्रदेश की सत्ता संरचना से लंबे समय से जुड़ाव रहा है. इस वर्ग में ऐसे परिवार शामिल हैं, जिनके सदस्य विधायक, सांसद, मंत्री और यहां तक कि मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुंच चुके हैं. उदाहरण के तौर पर, कमलापति त्रिपाठी का परिवार, हेमवती नंदन बहुगुणा का राजनीतिक नेटवर्क, नारायण दत्त तिवारी से जुड़ा राजनीतिक प्रभाव, कलराज मिश्र का राजनीतिक समूह, रीता बहुगुणा जोशी का परिवार, सतीश चंद्र मिश्र का राजनीतिक प्रभाव तथा पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के अनेक स्थानीय राजनीतिक परिवार इस श्रेणी में आते हैं. यह वर्ग राजनीतिक दलों के साथ प्रत्यक्ष संवाद, संसाधनों तक पहुंच और सत्ता के गलियारों में अपनी निरंतर उपस्थिति बनाए रखता है. अक्सर इसी वर्ग की नाराजगी को ही ब्राह्मण समुदाय की नाराज़गी मन लिया जाता है. अभी तक एसपी इन्हीं वर्गों को साधने लगी हुई है.

दूसरे हिस्से, को भी दो उपवर्गों में समझा जा सकता है. पहला वर्ग, उन ब्राह्मणों का है, जो सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थानों, प्रशासनिक सेवाओं और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में कार्यरत हैं. आमतौर पर, इस वर्ग का राजनीतिक झुकाव भारतीय जनता पार्टी की ओर अपेक्षाकृत अधिक देखा गया है. हालांकि, यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यह पूरा वर्ग एक समान राजनीतिक रुझान रखता है, क्योंकि इसके भीतर भी वैचारिक विविधताएं मौजूद हैं. दूसरा उपवर्ग, उन लोगों का है जिनका संबंध ब्राह्मण समुदाय के नाम पर गठित विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रतिनिधिक संगठनों से है. उदाहरण के तौर पर, अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा, भूमिहार ब्राह्मण सभा, परशुराम सेना और इसी प्रकार के अन्य संगठन समय-समय पर राजनीतिक दलों के साथ संवाद स्थापित करते हैं, राजनीतिक मोल-तोल की भूमिका निभाते हैं तथा समुदाय के प्रतिनिधित्व, सम्मान और भागीदारी से जुड़े मुद्दों को उठाते हैं. इन वर्गों का वैचारिक और सामाजिक जुड़ाव लंबे समय से हिंदुत्व से जुड़े संगठनों, विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के साथ भी देखा जाता रहा है.

यह भी एक अहम कारण रहा है कि इस वर्ग की वैचारिकता के कारण भारतीय जनता पार्टी से इसका जुड़ाव रहा है. इसके अलावा, लंबे समय तक बीजेपी के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसा सशक्त राजनीतिक विकल्प उभरकर सामने नहीं आया, जो इस वर्ग के भीतर व्यापक विश्वास स्थापित कर पाता. परिणामस्वरूप, इस समुदाय के एक महत्वपूर्ण हिस्से ने बीजेपी को ही अपना प्रमुख राजनीतिक विकल्प बनाए रखा. हालांकि, इसे स्थायी राजनीतिक निष्ठा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि बदलते सामाजिक समीकरण, नेतृत्व की विश्वसनीयता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भावना भविष्य में इसकी चुनावी प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकती है.

तीसरा हिस्सा उन ब्राह्मण परिवारों का है, जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा सीमित है और आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर या दयनीय है. यह वर्ग वैचारिक या संगठनात्मक राजनीति की अपेक्षा स्थानीय नेतृत्व, क्षेत्रीय समीकरणों और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पहुंच के आधार पर अपनी चुनावी भागीदारी तय करता है. कई बार यह समुदाय राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श की बजाय स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय नेताओं के प्रभाव से अधिक प्रभावित होता है.

क्या ब्राह्मण वोट में सेंध लगी है?

फिलहाल, यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ब्राह्मण मतदाता बीजेपी से बड़े पैमाने पर दूर हो रहे हैं. पिछले चुनावी अनुभव बताते हैं कि ब्राह्मण समुदाय ने भाजपा को अपनी पहली राजनीतिक प्राथमिकता के रूप में देखा है. हालांकि, इसके पीछे केवल वैचारिक प्रतिबद्धता ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और एक सशक्त राजनीतिक विकल्प की अनुपस्थिति जैसे कई कारकों की भी भूमिका रही है. अगर, 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद जारी CSDS-लोकनीति के पोस्ट-पोल सर्वेक्षणों को देखें, तो ब्राह्मणों सहित ऊंची जातियों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ खड़ा दिखाई देता है.

विभिन्न सर्वेक्षणों में अनुमान लगाया गया कि ब्राह्मण मतदाताओं का लगभग 70 से 80 प्रतिशत समर्थन भाजपा को मिला था, जबकि कुछ सर्वेक्षणों में यह आंकड़ा इससे भी अधिक दर्ज किया गया. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. हालांकि, उत्तर प्रदेश में बीजेपी को अच्छा-खासा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा और उसकी सीटें घटकर 33 रह गईं, फिर भी ऊंची जातियों का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ बना रहा. CSDS-लोकनीति के चुनावोत्तर सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में लगभग 79 प्रतिशत ऊंची जाति के मतदाताओं (जिसमें ब्राह्मण, राजपूत और अन्य सवर्ण समुदाय शामिल हैं) ने एनडीए का समर्थन किया.

इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि ब्राह्मण मतदाता बीजेपी से बड़े पैमाने पर दूर हो रहे हैं, अभी जल्दबाज़ी होगी. अधिक सटीक रूप से कहा जाए तो समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के पारंपरिक सामाजिक आधार के भीतर एक राजनीतिक हस्तक्षेप शुरू किया है, लेकिन इसे स्थायी राजनीतिक निर्णय कहना अभी समय से पहले होगा.

डॉ. प्रांजल सिंह, दिल्ली यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.


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