मुजफ्फरपुर: राम किशोर सिंह ने दो नई आम की किस्में विकसित कर खुद को इलाके का ‘मैंगो मैन’ बना दिया है. उनकी विकसित की गई दोनों किस्में—’नागेंद्र भोग’ और ‘रामजसी’—तोड़ने के बाद करीब 12 दिनों तक ताजा रहती हैं. इनमें से एक किस्म का एक आम करीब 800 ग्राम तक का होता है. यह सामान्य आम के मुकाबले लगभग चार गुना बड़ा और फीफा वर्ल्ड कप में इस्तेमाल होने वाली फुटबॉल से भी लगभग दोगुना भारी है. इन खास खूबियों ने देशभर के बागवानी विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है.
लखनऊ समेत कई बागवानी संस्थानों की विशेषज्ञ टीमें अब सिंह की नर्सरी में पहुंचकर इन पीले-लाल रंग के आमों का अध्ययन कर रही हैं और उनकी विशेषताओं का दस्तावेजीकरण कर रही हैं.
इन आमों के नमूनों और उनके गुणों का परीक्षण किया जा रहा है. यह प्रक्रिया आगे चलकर इन्हें किसान द्वारा विकसित नई आम की किस्म के रूप में आधिकारिक मान्यता दिलाने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है.
राम किशोर सिंह ने कहा, “मेरे पूर्वज भी खेती करते थे, इसलिए मैंने सोचा कि मुझे भी कुछ अलग करना चाहिए. मैंने आठ साल पहले इस पर काम शुरू किया था. करीब पांच साल पहले इस पेड़ पर पहली बार फल आए.”
अपनी दोनों नई किस्मों को विकसित करने की प्रक्रिया पर सिंह ज्यादा कुछ बताने को तैयार नहीं हैं.
उन्होंने कहा, “आम की बहुत सारी किस्में हैं, लेकिन मैंने अपने स्तर पर प्रयोग किया. यह मेरी मेहनत का नतीजा है और मैं इसे किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता.”
सफेद कुर्ता-पायजामा और सिर पर गमछा बांधे राम किशोर सिंह मुजफ्फरपुर के रहुआ गांव में बेहद साधारण जीवन जीते हैं. आर्थिक तंगी के कारण वह अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके. वह अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहते हैं और ज्यादातर समय नर्सरी की देखभाल में बिताते हैं.
इलाके के लोग उन्हें पहले से ही पौधों से जुड़ी हर समस्या का जानकार मानते थे. अब लोग खास तौर पर उनके विकसित किए गए आमों को देखने पहुंच रहे हैं, जिनकी वजह से वह स्थानीय स्तर पर काफी चर्चित हो गए हैं.
चूंकि सिंह अपनी तकनीक किसी के साथ साझा नहीं कर रहे हैं, इसलिए माना जा रहा है कि भविष्य में जब ये आम बाजार में लोकप्रिय होंगे तो इस तकनीक पर उनकी पकड़ बनी रह सकती है.
राम किशोर सिंह 1974 से बागवानी से जुड़े हुए हैं. उन्होंने यह काम अपने पिता और दादा से सीखा था. हालांकि आम की नई किस्मों पर प्रयोग उन्होंने करीब आठ साल पहले अपनी नर्सरी में शुरू किए.
सिंह के मुताबिक, पारंपरिक आम की किस्मों की सबसे बड़ी समस्या उनकी कम शेल्फ लाइफ है. आम पकने के सात से आठ दिन के भीतर खराब होने लगते हैं. इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए उन्होंने नई किस्में विकसित करने का प्रयास शुरू किया.

‘नागेंद्र भोग’ और ‘रामजसी’
राम किशोर सिंह द्वारा विकसित दोनों आम की किस्में—’नागेंद्र भोग’ और ‘रामजसी’—सामान्य आमों की तुलना में काफी अधिक समय तक ताजा रहती हैं. उनका दावा है कि तुड़ाई के बाद ये आम करीब दो सप्ताह तक खराब नहीं होते.
इन दोनों किस्मों के पेड़ों की एक और खासियत यह है कि इनकी ऊंचाई लगभग 15 फीट तक ही रहती है. इसलिए इन्हें पारंपरिक बड़े आम के पेड़ों की तुलना में कम जगह की जरूरत होती है. एक पेड़ से एक सीजन में 100 से 150 किलोग्राम तक आम का उत्पादन हो सकता है.
राम किशोर सिंह बताते हैं कि वह इन आमों की व्यावसायिक बिक्री नहीं करते. इसके बजाय वह इन दोनों किस्मों के पौधे तैयार कर इच्छुक किसानों और बागवानों को बेचते हैं.
हाल के दिनों में मीडिया में चर्चा के बाद वह करीब 100 पौधे बेच चुके हैं. प्रत्येक पौधे की कीमत 300 रुपये है. हालांकि वर्षों की मेहनत और प्रयोगों के बावजूद उन्हें अब तक इससे कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं मिला है.
सरकारी संस्थानों ने इन दोनों किस्मों के नमूने परीक्षण के लिए एकत्र किए हैं. अब इनका मूल्यांकन किया जाएगा ताकि यह तय किया जा सके कि इन्हें पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम (PPV&FR Act) के तहत “किसान द्वारा विकसित किस्म (Farmer’s Variety)” के रूप में मान्यता दी जा सकती है या नहीं.
मुजफ्फरपुर के बागवानी अधिकारी कृष्ण गोपाल ने कहा, “फिलहाल इन दोनों किस्मों का मूल्यांकन किसान द्वारा विकसित किस्म के रूप में किया जा रहा है. जब संबंधित संस्थान जांच पूरी कर इन्हें मंजूरी दे देंगे, तब इन्हें आधिकारिक तौर पर किसान किस्म के रूप में मान्यता मिल सकेगी.”
बिहार सरकार ने भी अनुसंधान संस्थानों को किसानों द्वारा विकसित ऐसी नई किस्मों की पहचान और उनका दस्तावेजीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया है, ताकि उन्हें PPV&FR कानून के दायरे में लाया जा सके.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अन्य बागवानी संस्थानों के विशेषज्ञ लंबे समय से किसानों द्वारा विकसित अनूठी फसल किस्मों की पहचान करने में जुटे हैं. राम किशोर सिंह के आम भी अब इसी प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं.
आईसीएआर के प्रमुख डॉ. संजय सिंह ने कहा, “राम किशोर सिंह की ‘रामजसी’ किस्म को नई दिल्ली स्थित पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण में पंजीकरण के लिए भेजा जा चुका है. यह बेहद मीठी है और इसकी खुशबू भी काफी तेज है. दूसरी किस्म ‘नागेंद्र भोग’ की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले एक और साल तक इसकी निगरानी की जाएगी.”
अगर यह मान्यता मिल जाती है तो राम किशोर सिंह उन चुनिंदा किसानों में शामिल हो जाएंगे, जिनकी विकसित की गई किस्मों को देशी फसलों की विविधता के संरक्षण और विकास में योगदान के लिए आधिकारिक मान्यता मिली है.
आईसीएआर-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार सिंह ने कहा, “आम की किसान किस्म का पंजीकरण होना बहुत दुर्लभ है. हर साल केवल 20 से 25 किसानों की किस्मों का पंजीकरण हो पाता है. राम किशोर सिंह का काम इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने खुद दो नई किस्में विकसित की हैं. दोनों बीज से विकसित हुई हैं और पंजीकरण के लिए उपयुक्त हैं.”
उन्होंने कहा, “भारत में आम की करीब 1,000 किस्में हैं. लेकिन किसान किस्म के रूप में पंजीकरण के लिए PPV&FRA, नई दिल्ली द्वारा तय किए गए DUS (Distinctiveness, Uniformity and Stability) मानकों पर खरा उतरना जरूरी होता है. वैज्ञानिकों ने राम किशोर सिंह की ‘रामजसी’ किस्म की पहचान पहले ही कर ली है.”
पैसे नहीं, पहचान मिली
पिछले आठ वर्षों से राम किशोर सिंह रहुआ गांव स्थित अपनी नर्सरी में इन दोनों नई आम की किस्मों पर काम कर रहे हैं. इसके साथ ही वह अन्य फल, फूल और पौधे भी उगाते हैं. उन्होंने अब तक इन दोनों पेड़ों का एक भी आम नहीं बेचा है. इन पेड़ों पर लगने वाले फल नर्सरी देखने आने वाले लोगों, किसानों और निरीक्षण के लिए पहुंचने वाले विशेषज्ञों में बांट दिए जाते हैं.
राम किशोर सिंह ने कहा, “कई किसानों ने इन पौधों को खरीदने में रुचि दिखाई है. मैं चाहता हूं कि पहले ये किस्में बाजार में अपनी जगह बना लें. उसके बाद ज्यादा से ज्यादा किसान इन्हें खरीदेंगे.”
राम किशोर सिंह अपनी एक एकड़ की नर्सरी अकेले संभालते हैं. यहां आम के अलावा करीब 20 किस्मों के आम के पेड़, चीकू, आंवला, बेल, सब्जियों और फूलों के पौधे भी तैयार किए जाते हैं.
आसपास के गांवों के किसान पौधों से जुड़ी समस्याओं पर सलाह लेने के लिए अक्सर उनके पास आते हैं. वह अपने यहां से आम के पौधे खरीदने वाले किसानों को पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का तरीका भी बताते हैं.
राम किशोर सिंह ने कहा, “मैं किसानों को बताता हूं कि पौधों को कितना पानी देना है और अलग-अलग मौसम में उनकी देखभाल कैसे करनी है. तीन से चार साल में इन पर फल आने लगते हैं. मुझे खुशी होती है क्योंकि वर्षों से मैं लोगों को दूसरे पौधे उगाने में मदद करता आया हूं. अब मेरी विकसित की हुई किस्में किसानों के खेतों तक पहुंच रही हैं. यह मेरे लिए गर्व की बात है.”
राम किशोर सिंह ने अपनी दोनों आम की किस्मों का नाम अपने माता-पिता के नाम पर रखा है. ‘नागेंद्र भोग’ का नाम उन्होंने अपने दिवंगत पिता के नाम पर रखा, जबकि ‘रामजसी’ का नाम अपनी 80 वर्ष से अधिक उम्र की मां के नाम पर रखा है.
इन दोनों किस्मों की कृषि विशेषज्ञों और किसानों ने भी सराहना की है. सिंह का कहना है कि इन आमों की लोकप्रियता मुख्य रूप से लोगों के बीच आपसी चर्चा के जरिए फैली है.
50 वर्षीय राजीव कुमार पहली बार इन आमों का स्वाद चखने और उनकी खासियत जानने के लिए सिंह की नर्सरी पहुंचे थे. वह तीन आम अपने घर ले गए और उन्हें 10 दिन तक रखा. इतने दिनों बाद भी आम खराब नहीं हुए. उनका स्वाद मीठा था और उनमें गूदा भी भरपूर था.
राजीव कुमार ने कहा, “मैंने पांच-छह पौधे खरीदे हैं और उन्हें अपने घर के सामने लगाया है. वहां उनकी देखभाल करना आसान रहेगा. अगर पौधे अच्छी तरह बढ़े और प्रयोग सफल रहा तो बाद में अपने खेत में व्यावसायिक खेती के लिए और पौधे लगाऊंगा.”
राम किशोर सिंह का कहना है कि उनकी दोनों किस्मों की अपनी-अपनी अलग विशेषता है.
उन्होंने कहा, “एक ‘नागेंद्र भोग’ आम का वजन 700 से 800 ग्राम तक होता है, जबकि ‘रामजसी’ सामान्य आकार का होता है और उसका वजन करीब 200 ग्राम रहता है. दोनों किस्मों की शेल्फ लाइफ लंबी है और स्वाद भी बेहतरीन है. इनसे मुझे सबसे बड़ी कमाई पैसे की नहीं, बल्कि पहचान की मिली है.”
उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि वर्षों की मेहनत को अब पहचान मिलने लगी है.
आईसीएआर ने ‘रामजसी’ आम के पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसके लिए जरूरी दस्तावेज पहले ही जमा किए जा चुके हैं.
आईसीएआर के प्रमुख डॉ. संजय सिंह के अनुसार, यदि भविष्य में संस्थान इस किस्म का व्यावसायिक स्तर पर प्रसार करता है, तो उससे होने वाले मुनाफे का 20 प्रतिशत हिस्सा राम किशोर सिंह को मिलेगा.
लेकिन राम किशोर सिंह के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि भविष्य में मिलने वाली कमाई नहीं है. उनके लिए सबसे अहम बात यह है कि जिज्ञासा और वर्षों के अनुभव से शुरू हुआ उनका प्रयोग अब गांव से निकलकर दूर-दूर तक चर्चा का विषय बन गया है.
राम किशोर सिंह ने कहा, “हो सकता है पैसे बाद में मिल जाएं. फिलहाल लोग मेरे काम को पहचान रहे हैं, किसान मेरी किस्मों को अपने खेतों में लगा रहे हैं और मेरे माता-पिता का नाम इन पेड़ों के जरिए हमेशा जिंदा रहेगा. मेरे लिए यही सबसे बड़ी खुशी है.”
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