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Tuesday, 26 May, 2026
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गोबर से लेकर शराब की बोतलें तक उठाने को मजबूर: ऐसे होती है दिल्ली के रग्बी खिलाड़ियों की प्रैक्टिस

दिल्ली की रग्बी टीमों के खिलाड़ियों का कहना है कि राजधानी के बाहर होने वाले टूर्नामेंट से राष्ट्रीय राजधानी में सुविधाओं, ट्रेनिंग और सरकारी मदद में बड़ा अंतर दिखता है.

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नई दिल्ली: हर शनिवार और रविवार सुबह 6 बजे, दक्षिण दिल्ली के मैदान गढ़ी में बच्चे रग्बी बॉल लिए धीरे-धीरे पहुंचने लगते हैं. लेकिन दौड़ की प्रैक्टिस और टैकल शुरू होने से पहले, वे मैदान से गाय का गोबर, फेंकी हुई शराब की बोतलें, टूटे हुए कांच और नुकीले पत्थर उठाकर फेंकते हैं.

करीब एक घंटे की सफाई के बाद ही प्रैक्टिस शुरू होती है.

जिस मैदान पर वे ट्रेनिंग करते हैं, उसे आधिकारिक तौर पर रग्बी स्टेडियम घोषित किया गया है. लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा छह साल पहले रग्बी के लिए यहां 3.25 एकड़ जमीन देने के बाद भी, इस मैदान में अब तक रग्बी पोस्ट, पीने के पानी की सुविधा, चेंजिंग रूम और सही शौचालय नहीं हैं.

“(पूर्व बीजेपी सांसद) रमेश बिधूड़ी ने इस जगह का उद्घाटन रग्बी स्टेडियम के रूप में किया था, लेकिन अब यहां क्या है, यह हर कोई खुद देख सकता है,” कोचों में से एक रोहित ने कहा. “यहां कुछ भी नहीं है — न पानी, न शौचालय, न चेंजिंग रूम और न ही कोई रखरखाव.”

मैदान के किनारे एक टूटा-फूटा कंक्रीट का ढांचा खड़ा है, जिसे कभी शौचालय ब्लॉक के रूप में इस्तेमाल किया जाना था. अब ज्यादातर खिलाड़ी खुले में कपड़े बदलते हैं या प्रैक्टिस के बाद आसपास शौचालय और पीने का पानी ढूंढने निकल जाते हैं.

“पीरियड्स के दौरान बहुत मुश्किल हो जाती है. हम यहां कपड़े कैसे बदलें? खुद को कैसे साफ करें?” 18 साल की सृष्टि ने वीरान इमारत की ओर इशारा करते हुए पूछा.

मैदान में न तो कोई बाउंड्री है और न ही सुरक्षा गार्ड, इसलिए यह लोगों के बैठने और घूमने की जगह भी बन गया है. गायें अक्सर मैदान में घुस आती हैं. कोचों का कहना है कि यहां से गुजरने वाले पुरुष अक्सर लड़कियों को परेशान करते हैं, जिसके कारण ट्रेनरों को प्रैक्टिस के दौरान छोटी खिलाड़ियों पर लगातार नजर रखनी पड़ती है.

फिर भी, हर सप्ताह सूरज निकलने से पहले, सैकड़ों युवा खिलाड़ी दिल्ली के इकलौते रग्बी स्टेडियम में जुटते रहते हैं.

कुछ खिलाड़ी प्रैक्टिस के लिए करीब 10 किलोमीटर का सफर तय करते हैं. कुछ लोग अजनबियों से लिफ्ट लेकर आते हैं क्योंकि मैदान तक सीधी परिवहन सुविधा नहीं है. कई खिलाड़ी ओडिशा और बिहार की टीमों पर नजर रखते हैं, जहां राज्य सरकार के समर्थन से टूर्नामेंट, व्यवस्थित क्लब और खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी के मौके बढ़े हैं. वे भारत के लिए खेलना चाहते हैं और अपने कोचों को गर्व महसूस कराना चाहते हैं.

लेकिन मैदान तक पहुंचने का सफर ही अक्सर असुरक्षित रहता है, खासकर उन लड़कियों के लिए जो सुबह अंधेरे में अकेले आती हैं.

“इन छोटी लड़कियों के लिए यह खतरनाक है,” रोहित ने कहा. “यहां कोई गार्ड नहीं है. कभी-कभी उन्हें परेशान किया जाता है. हम उन्हें एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ सकते.”

Young players come from across Delhi to practice in Maidan garhi's rugby "stadium" on the weekends. Vitasta Kaul | ThePrint
युवा खिलाड़ी वीकेंड पर मैदान गढ़ी रग्बी “स्टेडियम” में अभ्यास करने के लिए पूरे दिल्ली से आते हैं | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

नींव से रग्बी खड़ी करना

जब मिथुन गौर ने 1995 में पहली बार दिल्ली में रग्बी खेलना शुरू किया था, तब ज्यादातर लोगों ने रग्बी बॉल पहले कभी देखी भी नहीं थी.

“1990 के दशक में जब हम रग्बी बॉल लेकर चलते थे, तो लोग रुककर हमसे पूछते थे कि यह किस तरह की बॉल है,” दिल्ली रग्बी एसोसिएशन के अध्यक्ष गौर ने याद करते हुए कहा.

उस समय दिल्ली में रग्बी को लगभग कोई पहचान नहीं थी. लंबी अंडाकार बॉल, फुटबॉल और क्रिकेट बैट की पहचान के बीच अलग नजर आती थी, जिससे लोगों में जिज्ञासा और मजाक दोनों पैदा होते थे. आज गौर का अनुमान है कि अलग-अलग आयु वर्गों के 1,000 से ज्यादा खिलाड़ी दिल्ली के रग्बी सिस्टम से जुड़े हुए हैं, जिनमें से कई मैदान गढ़ी में ट्रेनिंग करते हैं.

इंग्लैंड के कुछ हिस्सों के विपरीत, जहां रग्बी यूनियन ऐतिहासिक रूप से बड़े और अमीर स्कूलों से जुड़ा रहा है, दिल्ली में रग्बी का बड़ा हिस्सा मेहनतकश वर्ग के सहारे चलता है. ज्यादातर खिलाड़ी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं — ड्राइवरों, सब्जी विक्रेताओं, सुरक्षा गार्डों और दिहाड़ी मजदूरों के बच्चे.

“हम रग्बी के जरिए उनकी जिंदगी बदलने की कोशिश कर रहे हैं,” गौर ने कहा. “इनमें से कुछ बच्चे महंगे स्कूल या कॉलेज का खर्च नहीं उठा सकते. रग्बी के जरिए उन्हें दाखिले और स्कॉलरशिप मिल रही है.”

इनमें से एक 24 वर्षीय संजू थापा हैं, जो एसोसिएशन के साथ कई सालों तक रग्बी खेलने के बाद अब फिजिकल एजुकेशन में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं. उन्होंने पिछले सात सालों से रग्बी खेली है, जिसकी शुरुआत उनके एक क्लासमेट के जरिए हुई थी.

स्कूल के खेलों से लेकर राष्ट्रीय चैंपियनशिप तक, रग्बी ने उनकी लगभग पूरी पढ़ाई का खर्च उठाया है.

अब वह लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी की तरफ से खेलो इंडिया गेम्स में खेलेंगे और इसके बाद शिक्षक के रूप में काम करने की उम्मीद रखते हैं.

Out of those who practice in Maidangarhi, several go on to play district, state and even national level tournaments. Vitasta Kaul | ThePrint
मैदानगढ़ी में अभ्यास करने वालों में से कई आगे चलकर ज़िला, राज्य और यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट भी खेलते हैं | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

मैदान पर युवा खिलाड़ी

मैदान के एक किनारे छोटी लड़कियां पालथी मारकर अपनी ट्रेनिंग की बारी का इंतजार करती हैं, जबकि पास में सीनियर खिलाड़ी टैकलिंग ड्रिल कर रहे होते हैं. प्रैक्टिस के बीच-बीच में मैदान में लगातार मजाक और चिल्लाने की आवाजें गूंजती रहती हैं.

18 वर्षीय सृष्टि, 17 वर्षीय संध्या और 15 वर्षीय आयशा को रग्बी से परिचय स्कूल आउटरीच कार्यक्रमों के जरिए हुआ, जिन्हें डागर और दिल्ली रग्बी एसोसिएशन चलाते हैं. इनमें से ज्यादातर पहले कबड्डी या खो-खो खेलती थीं.

“हमें इसका आक्रामक अंदाज पसंद आया,” उनमें से एक ने हंसते हुए कहा. “टैकल, दौड़ना, सब कुछ.”

ये लड़कियां अक्सर दिल्ली के बाहर होने वाले टूर्नामेंट्स में साथ यात्रा करती हैं. उन्हें पता होता है कि उनमें सबसे तेज कौन दौड़ता है, टैकल के दौरान कौन घबरा जाता है और मैच से पहले टीम को कौन शांत कर सकता है.

हाल ही में जब संध्या ने एक टूर्नामेंट में 3,000 रुपये की इनामी राशि जीती, तो उसने उससे कपड़े और जूते खरीदे.

“असल में मुझे एक स्कूटी चाहिए,” उसने मजाक में कहा. “ताकि मुझे हर सुबह अजनबियों से लिफ्ट न लेनी पड़े.”

लेकिन इस मजाक के पीछे वह सच्चाई छिपी है, जिसका सामना उन्हें खेल जारी रखने के लिए करना पड़ता है.

संध्या ने बताया कि टूर्नामेंट में जाने की अनुमति के लिए उन्हें अपने परिवार से बार-बार बहस करनी पड़ी. जब परिवार ने इस खेल पर आपत्ति जताई, तो विरोध में उन्होंने अपने बाल छोटे करवा लिए.

इसके बाद उनकी रग्बी यात्रा उन्हें दिल्ली टीम के साथ उत्तराखंड और ओडिशा तक ले गई.

दिल्ली के बाहर यात्रा करने से उन्हें उन कमियों का भी एहसास हुआ, जिनका वे सामना करते हैं.

The toilets near the ground are in ruins, putting especially women athletes in a tough spot. Vitasta Kaul | ThePrint
मैदान के पास बने शौचालय खस्ताहाल हैं, जिससे खासकर महिला खिलाड़ियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

“सिर्फ दिल्ली में ही रग्बी अब भी एक नया खेल लगता है,” आयशा ने कहा. “जब हम दूसरे राज्यों में जाते हैं, तब समझ आता है कि ट्रेनिंग, सुविधाओं और समर्थन में हमारे पास कितनी कमी है.”

सिर्फ 14 साल के कृष पिछले तीन सालों से रग्बी खेल रहे हैं और ओडिशा, गुजरात, बिहार और मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में हिस्सा ले चुके हैं.

“इस मैदान की वजह से चोट लगना बहुत आसान है,” उन्होंने कहा. “रग्बी अपने स्वभाव से आक्रामक खेल है और इसमें टैकलिंग जरूरी होती है. लेकिन यहां खेलते समय हमें बहुत सावधान रहना पड़ता है, नहीं तो गंभीर चोट लग सकती है.”

कृष का कहना है कि उनका अगला लक्ष्य भारत का प्रतिनिधित्व करना, रग्बी प्रीमियर लीग में खेलना और “अपने कोचों को गर्व महसूस कराना” है.

उन सभी के लिए — लड़कियां हों या लड़के — सपना एक ही है: एक दिन भारत के लिए खेलना.

A tackle on uneven ground can lead to severe injuries for the training athletes. Vitasta Kaul | ThePrint
ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर टैकल करने से ट्रेनिंग ले रहे एथलीटों को गंभीर चोटें लग सकती हैं | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

दिल्ली के रग्बी आंदोलन के पीछे एक कपल

जब तक ज्यादातर बच्चे मैदान में पहुंचना शुरू करते हैं, तब तक उनके आदर्श और कोच गौतम डागर और नेहा परदेशी आमतौर पर मैदान में नुकीली चीजें तलाश रहे होते हैं.

पूर्व भारतीय कप्तानों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा रग्बी टीमों के इर्द-गिर्द ही बीता है.

बातचीत के दौरान यह दंपति आसानी से अलग-अलग भूमिकाओं में आ जाता है — प्रशासक, माता-पिता और मार्गदर्शक — और राष्ट्रीय कैंप, चोटें, भारतीय रग्बी की राजनीति से लेकर हर खिलाड़ी पानी लाया या नहीं, जैसी बातों पर एक-दूसरे की बातें पूरी करते रहते हैं.

उनके लिए रग्बी सिर्फ वह खेल नहीं है जिसके जरिए उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया — बल्कि यही वह वजह भी है जिसके कारण वे मिले, साथ जिंदगी बनाई और अब मैदान गढ़ी के धूल भरे मैदान में बच्चों को कोचिंग देते हुए अपने सप्ताहांत बिताते हैं.

परदेशी ने पहली बार 2009 में पुणे में 15 साल की उम्र में रग्बी खेलना शुरू किया, जब एक कोच ने उन्हें एक प्रदर्शनी मैच देखने के लिए बुलाया. वह कई खेलों में राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रह चुकी थीं और हर खेल को आजमाने वाली बच्ची थीं.

“मैंने अपना पहला टैकल किया और फिर मैं इसी में रम गई,” उन्होंने अपने शुरुआती रग्बी दिनों को याद करते हुए कहा.

प्रैक्टिस शुरू करने के सिर्फ दो महीने के भीतर उनका चयन भारतीय महिला रग्बी टीम में हो गया और बाद में वह राष्ट्रीय टीम की कप्तान भी बनीं.

“तब कोई व्यवस्था नहीं थी,” उन्होंने कहा. “न पहचान थी, न सुविधाएं और न ही आगे बढ़ने का सही रास्ता. हम सब बस खेलते-खेलते सीख रहे थे.”

डागर की यात्रा इससे पहले 2004 में शुरू हुई थी, और वह भी उसी जगह के करीब जहां अब वह कोचिंग देते हैं. मैदान गढ़ी में जन्मे और पले-बढ़े डागर ने उसी सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां अब वह फिजिकल एजुकेशन शिक्षक के रूप में काम करते हैं.

For former India captains, Neha Pardeshi and Gautam Dagar, most of their adult lives have revolved around rugby dreams. Vitasta Kaul | ThePrint
भारत की पूर्व कप्तान नेहा परदेशी और गौतम डागर के लिए, उनकी वयस्क ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा रग्बी के सपनों के इर्द-गिर्द ही बीता है | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

उन्होंने भारत की पुरुष रग्बी टीम की कप्तानी की और 17 साल से ज्यादा समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया.

लेकिन ज्यादा स्थापित खेलों के खिलाड़ियों के विपरीत, यह दंपति कहता है कि उनके करियर का ज्यादातर हिस्सा बिना स्पॉन्सरशिप, स्थायी ढांचे या संस्थागत समर्थन के बीता. कई साल बाद भी, रग्बी आज भी उनकी जिंदगी को तय करती है.

आज परदेशी दिल्ली रग्बी एसोसिएशन की सचिव हैं, जबकि डागर संचालन और विकास की जिम्मेदारी संभालते हैं. वे स्कूल आउटरीच कार्यक्रमों का समन्वय करते हैं, जिला कैंप आयोजित करते हैं, खिलाड़ियों की यात्रा की व्यवस्था करते हैं, मैदानों के लिए बातचीत करते हैं, स्पॉन्सर ढूंढते हैं और अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों को कोचिंग देते हैं.

“हम हर साल लाखों रुपये खर्च करते हैं,” परदेशी ने कहा. “लेकिन कोई व्यक्ति अकेले कब तक यह सब करता रहेगा?”

कोचिंग अक्सर सिर्फ रग्बी तक सीमित नहीं रहती.

कुछ बच्चों को खेल कोटे के जरिए स्कूलों में दाखिला दिलाने में मदद की जाती है. बाद में कुछ खिलाड़ी सहायक कोच बन जाते हैं. डागर और परदेशी बड़े खिलाड़ियों को विश्वविद्यालयों और निजी स्कूलों से भी जोड़ते हैं, जहां फिजिकल एजुकेशन शिक्षक या स्पोर्ट्स कोच की जरूरत होती है.

“हम इन बच्चों को सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि लगभग अपने बच्चों की तरह देखते हैं,” डागर ने कहा. “इनमें से कुछ के लिए यह मैदान उनकी जिंदगी की सबसे सुरक्षित जगह है.”

लड़कियों के मामले में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.

“इनमें से ज्यादातर लड़कियां यहां आने के लिए पूरी ताकत लगा देती हैं,” एक कोच ने कहा. “इसलिए हमें यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि उनके माता-पिता हम पर भरोसा करें.”

रग्बी स्टेडियम से सार्वजनिक पार्क तक

मौजूदा मैदान मिलने से पहले कई सालों तक खिलाड़ी पास के एक खुले मिट्टी वाले मैदान में प्रैक्टिस करते रहे, जबकि दिल्ली के अलग-अलग पार्कों और सार्वजनिक मैदानों में जगह के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता था.

कभी प्रैक्टिस के दौरान क्रिकेट मैच शुरू हो जाते थे. कई बार खिलाड़ियों को सीधे मैदान छोड़ने के लिए कह दिया जाता था.

“दिल्ली में मैदान मिलना सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक है,” डागर ने कहा. “या तो मैदान पहले से क्रिकेट या फुटबॉल के कब्जे में होते हैं, या फिर उन्हें निजी बना दिया जाता है.”

2019 में DDA द्वारा रग्बी स्टेडियम के लिए जमीन दिए जाने के बाद भी, एसोसिएशन का कहना है कि यह सुविधा कभी पूरी तरह शुरू ही नहीं हो सकी.

परदेशी के अनुसार, बाद में एसोसिएशन को RTI दस्तावेजों से पता चला कि मैदान की पहचान रग्बी स्टेडियम से बदलकर बागवानी विभाग के तहत एक सार्वजनिक पार्क के रूप में कर दी गई थी.

“बाद में हमें कागजों से पता चला कि यह एक सार्वजनिक पार्क बन चुका था,” उन्होंने कहा. “हमारा सवाल था: अगर इसका उद्घाटन रग्बी स्टेडियम के रूप में हुआ था, तो यह पार्क कैसे बन गया?”

RTI दस्तावेजों में इस जगह को “सभी के लिए खुला” बताया गया था.

यह दंपति भारतीय रग्बी में बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी आलोचनात्मक है, खासकर कोचिंग के अवसरों और रग्बी प्रीमियर लीग (RPL) जैसी पेशेवर लीगों तक पहुंच को लेकर.

“खेल पेशेवर बन रहा है, जो अच्छी बात है,” परदेशी ने कहा. “लेकिन विकास वाला हिस्सा अब भी गायब है. जमीनी स्तर के कोचों और राज्य संघों को समर्थन नहीं मिल रहा.”

उन्होंने खेलों में लैंगिक समानता पर लगातार होने वाली चर्चाओं के बावजूद कोचिंग और प्रबंधन भूमिकाओं में महिलाओं की कमी की ओर भी इशारा किया.

“हाल ही में हुई एक कोचिंग कॉन्फ्रेंस में, पुरुषों से भरे कमरे में मैं सिर्फ दो महिलाओं में से एक थी,” उन्होंने कहा. “लोग सशक्तिकरण की बात करते हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व अब भी नहीं है.”

For many training on the field, rugby has become more than a sport. Vitasta Kaul | ThePrint
मैदान पर अभ्यास करने वाले कई लोगों के लिए, रग्बी महज़ एक खेल से कहीं बढ़कर बन गया है | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

एक बड़ा अंतर

दिल्ली की स्थिति देश के दूसरे हिस्सों में रग्बी के विकास से बिल्कुल अलग दिखाई देती है.

ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों ने पिछले एक दशक में जिला स्तर के टूर्नामेंट, समर्पित सुविधाएं और सरकारी समर्थन के साथ रग्बी के मजबूत ढांचे तैयार किए हैं.

रग्बी इंडिया के मानद सचिव जेराल्ड प्रभु के अनुसार, कुछ राज्य अब खेल कोटे के जरिए रग्बी खिलाड़ियों को सरकारी नौकरियां दे रहे हैं, जबकि कुछ जगहों पर अब भी बुनियादी ट्रेनिंग मैदान हासिल करना मुश्किल है.

“ओडिशा और बिहार इस समय सबसे मजबूत रग्बी सिस्टम वाले राज्यों में हैं,” प्रभु ने कहा. “वहां कई जिलों में सक्रिय रूप से रग्बी खेली जाती है.”

ओडिशा भारतीय रग्बी के सबसे बड़े केंद्रों में से एक बनकर उभरा है, जहां राष्ट्रीय टूर्नामेंट और अस्मिता लीग फाइनल जैसी महिला प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं. बिहार ने हाल ही में राजगीर में सीनियर राष्ट्रीय टूर्नामेंट की मेजबानी की थी.

महाराष्ट्र, खासकर पुणे, ने भी वर्षों में मजबूत रग्बी सिस्टम विकसित किए हैं, जिसमें मैदानों तक बेहतर पहुंच और संस्थागत नेटवर्क ने मदद की है.

रग्बी इंडिया का अब दावा है कि यह खेल लगभग 50 शहरों तक फैल चुका है, और महिला खिलाड़ियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. महासंघ के अनुमान के अनुसार, अब राष्ट्रीय स्तर पर इस खेल में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो सकती है.

इसी बीच, पिछले साल शुरू हुई रग्बी प्रीमियर लीग — जिसमें अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और शहर आधारित फ्रेंचाइजी शामिल हैं — ने रग्बी को एक ज्यादा व्यावसायिक पहचान देने की कोशिश की है.

लेकिन प्रभु ने कहा कि दिल्ली के बुनियादी ढांचे की समस्याएं पूरी तरह अलग नहीं हैं. कई शहरों में रग्बी अब भी व्यावसायिक रूप से मजबूत खेलों के कारण पीछे धकेली जा रही है.

“मैदानों तक पहुंच हर जगह बड़ी चुनौती बनती जा रही है. बेंगलुरु जैसे शहरों में मैदान या तो निजी हो चुके हैं या हमेशा के लिए क्रिकेट के कब्जे में हैं.”

The Rugby ground was inaugurated in 2019 by Ramesh Bidhuri but six years later, there is no posts, no water and no washrooms. Vitasta Kaul | ThePrint
रग्बी मैदान का उद्घाटन 2019 में रमेश बिधूड़ी ने किया था, लेकिन छह साल बाद भी वहां न तो कोई पोस्ट हैं, न पानी और न ही वॉशरूम | वितस्ता कौल | दिप्रिंट

‘मेहनत करो’

मैदान गढ़ी के मैदान में यह कमी रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों में भी साफ दिखाई देती है.

लंबी प्रैक्टिस के दौरान पीने के पानी के लिए खिलाड़ी अक्सर पास की दुकानों, पड़ोसियों या यहां तक कि एक ब्लिंकिट डार्क स्टोर पर निर्भर रहते हैं. फिर भी ड्रिल्स के बीच मजाक चलता रहता है.

“हर दिन मैदान तक पहुंचना भी एक संघर्ष है,” खिलाड़ी सृष्टि ने हंसते हुए कहा. “अब तो सरकार को इस परेशानी के लिए मुझे 1 लाख रुपये दे देने चाहिए.”

“अगर मेहनत करोगी, तो सब मिल जाएगा,” आयशा ने तुरंत जवाब दिया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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