पिछला हफ्ता कईं दिलचस्त चीज़ें देखने को मिलीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने काफिले को घटाकर सिर्फ दो गाड़ियों तक सीमित कर दिया. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बाइक से ऑफिस पहुंचे. ताकि राष्ट्रीय राजधानी में लक्षित दर्शक इसे मिस न करें, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दिल्ली मेट्रो से सफर करना चुना.
मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता सभी प्रधानमंत्री के कदमों पर चलने की होड़ में लगे दिखे—सारा कुछ कैमरों के सामने. बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तो सबसे आगे निकल गए. वह अपने सरकारी आवास से राज्य सचिवालय तक पैदल चले, जो सिर्फ 300-400 मीटर की दूरी थी. यह सादगी का काफी दिलचस्प प्रदर्शन था.
फिर इसे कैमरे हटने के बाद भी क्यों नहीं जारी रखें? अगर हमारे नेता देश को प्रेरित करने के लिए एक-दो दिन तक ताकत और रुतबे के इन प्रतीकों के बिना रह सकते हैं, तो वे इसे हर दिन भी कर सकते हैं. कौन जाने, यह बात प्रधानमंत्री मोदी के मन में नीदरलैंड की अपनी वीकेंड यात्रा के दौरान आई हो. नीदरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री मार्क रुटे ऑफिस साइकिल से जाते थे. जब उन्होंने 2024 में पद छोड़ा, तब भी वह साइकिल चलाकर ही वहां से गए.
2017 में प्रधानमंत्री मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान रुटे ने उन्हें एक साइकिल गिफ्ट की थी, लेकिन मोदी उसका इस्तेमाल नहीं कर पाए. यह सिर्फ उनकी उम्र की बात नहीं है. यह भारत में दूरी और हालात की बात है. भारत जैसे बड़े और जटिल देश के प्रधानमंत्री को बड़ी सुरक्षा व्यवस्था और दूसरी सुविधाओं की ज़रूरत होती है, जिसके कारण बड़ा काफिला ज़रूरी हो जाता है.
बीजेपी का असहज बचाव
पिछले हफ्ते भारत के वीआईपी नेताओं द्वारा दिखाई गई सादगी के बावजूद विपक्ष ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर और सीएनजी में 2 रुपये की बढ़ोतरी को लेकर सरकार की आलोचना जारी रखी. कांग्रेस की आलोचना पर बीजेपी का जवाब काफी उलझा हुआ लगता है. 13 मई को पार्टी के लंबे एक्स थ्रेड को देखिए. पिछली मनमोहन सिंह सरकार पर हमला करने की कोशिश में बीजेपी के एक्स पोस्ट आखिरकार मोदी सरकार को भी आर्थिक चुनौतियों से निपटने के मामले में उसी श्रेणी में खड़ा करते नज़र आए.
एक पोस्ट में लिखा था: “सोने की नीति पर पीएम मोदी पर हमला करना कांग्रेस की सबसे बड़ी पाखंड भरी राजनीति है. 2013 में, जब यूपीए सरकार के वर्षों के आर्थिक कुप्रबंधन ने रुपये को कमजोर कर दिया और अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया, तब के केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भारतीयों से ‘सोने की भूख कम करने’ की अपील की थी…” इसे आप फिर से पढ़ना चाहेंगे. सत्ताधारी पार्टी खुद कह रही है कि आर्थिक कुप्रबंधन की वजह से रुपया कमजोर हुआ.
2013 में अगस्त के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था, जब यह थोड़ी देर के लिए 68 के पार चला गया था. रविवार को, जब मैं यह लिख रहा था, रुपया लगभग 96 प्रति डॉलर तक पहुंच रहा था. शुक्रवार को पहली बार यह इस स्तर को पार कर गया था.
जुलाई 2013 में, जब रुपया 60 प्रति डॉलर के पार गया था, तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गिरते रुपये की तुलना उस समय की सरकार की विश्वसनीयता से की थी.
रिपोर्ट्स के मुताबिक मोदी ने कहा था, “आज़ादी के समय एक रुपये की कीमत एक डॉलर के बराबर थी….जब अटलजी सत्ता छोड़कर गए, तब एक डॉलर 44 रुपये का था…और जब से हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) ने जिम्मेदारी संभाली है, रुपया गिरकर 60 प्रति डॉलर तक पहुंच गया है. ऐसा लगता है कि रुपये और दिल्ली की हमारी सरकार के बीच गिरने की होड़ लगी हुई है.”
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लगातार गिरते रुपये को लेकर मनमोहन सिंह सरकार पर तंज कसते रहे थे. अब जबकि मोदी सरकार के दौरान रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंच गया है, ऐसे में यह काफी अजीब लगता है कि बीजेपी ने विनिमय दर को ‘आर्थिक कुप्रबंधन’ से जोड़ने का फैसला किया है.
एक्स पोस्ट में आगे लिखा गया: “यूपीए ने आधिकारिक तौर पर सोने के आयात और दूसरे ‘गैर-ज़रूरी आयात’ को कम करने की नीति अपनाई थी क्योंकि उन्होंने अर्थव्यवस्था को संकट में डाल दिया था.” सच में? मोदी सरकार भी आज यही कर रही है. क्या यह भी उस ‘आर्थिक संकट’ की वजह से है जो उसने पैदा किया है? बीजेपी आखिर केंद्र की अपनी सरकार का बचाव कर रही है या उसकी आलोचना?
13 मई के लंबे एक्स थ्रेड में बीजेपी का एक और पोस्ट पढ़िए: “अगस्त 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक रूप से भारतीयों से अपील की थी: ‘हमें सोने की भूख कम करनी होगी. हमें पेट्रोलियम उत्पादों के इस्तेमाल में भी बचत करनी होगी.’ यह सिर्फ प्रतीकात्मक बयान नहीं था. यूपीए सरकार ने साथ ही सोने के आयात शुल्क बढ़ाए, बुलियन आयात पर रोक लगाई, डीजल की कीमतें बढ़ाईं और ईंधन बचाने का संदेश दिया क्योंकि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव था.”
आखिर बीजेपी यहां क्या करने की कोशिश कर रही है? 2013-14 में उस समय के गुजरात मुख्यमंत्री मोदी ने अपने प्रधानमंत्री पद के चुनाव अभियान को काफी हद तक मनमोहन सिंह सरकार की नीतिगत सुस्ती और आर्थिक कुप्रबंधन के मुद्दे पर खड़ा किया था. इसलिए यह बेहद अजीब है कि बीजेपी अब यह कह रही है कि मोदी सरकार वही कर रही है, जो 2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने किया था.
तब और अब
अब जब सत्ताधारी पार्टी खुद दोनों सरकारों की तुलना कर रही है, तो यह भी देख लेते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी पर दोनों सरकारों ने कैसे प्रतिक्रिया दी. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2011-12, 2012-13 और 2013-14 यानी मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी तीन सालों में, भारत द्वारा खरीदे गए कच्चे तेल की कीमतें क्रमशः 113.5 डॉलर, 108.1 डॉलर और 105.5 डॉलर प्रति बैरल थीं. इन तीन सालों में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत क्रमशः 64.4 रुपये, 68.1 रुपये और 70.3 रुपये प्रति लीटर थी.
अब मोदी सरकार के आखिरी तीन सालों में कच्चे तेल की कीमतों (प्रति बैरल) को देखिए: 2023-24 में 82.5 डॉलर प्रति बैरल, 2024-25 में 78.6 डॉलर और 2025-26 में 71.7 डॉलर. इन तीन सालों में दिल्ली में पेट्रोल की कीमत क्रमशः 96.7 रुपये, 94.8 रुपये और 94.8 रुपये प्रति लीटर रही.
सीधे शब्दों में कहें तो, मनमोहन सिंह सरकार की तुलना में मोदी सरकार अब तक काफी कम कीमत पर कच्चा तेल खरीद रही थी, लेकिन भारत के उपभोक्ता पिछले शासन के मुकाबले कहीं ज्यादा पैसे चुका रहे थे.
2014-15 में, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार 84.1 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल खरीद रही थी, तब दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 66.6 रुपये प्रति लीटर थी. वहीं 2020-21 में, जब मोदी सरकार 44.6 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल खरीद रही थी—जो छह साल पहले पिछली सरकार द्वारा दी गई कीमत का लगभग आधा था, तब दिल्ली में लोग 80.9 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल खरीद रहे थे, यानी छह साल पहले के मुकाबले 14 रुपये ज्यादा.
बेशक, आज कच्चे तेल की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. कोई भी यह नहीं कह रहा कि सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम रखने के लिए घाटे में चलें, लेकिन कीमतें राजनीतिक सुविधा और चुनावी ज़रूरत का मामला नहीं बननी चाहिए क्योंकि पिछला विधानसभा चुनाव सत्ताधारी बीजेपी के लिए काफी अहम था, इसलिए कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम रखी गईं.
सरकार ने OMCs के घाटे की भरपाई करने के लिए पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाने का फैसला किया. चुनाव खत्म होने के बाद खुदरा कीमतें बढ़ानी पड़ीं. इसके बाद पीएम मोदी की सादगी वाली अपील आई और फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी गई.
यह बहुत कम है. अनुमान है कि इससे OMCs को रोजाना सिर्फ 150 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई होगी, जबकि सरकार का कहना है कि पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर कंपनियों को हर दिन 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है.
मनमोहन सिंह सरकार ने 2010 में पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण से मुक्त कर दिया था और नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में डीजल की कीमतों को भी नियंत्रण से मुक्त कर दिया. यानी बाज़ार को उनकी कीमतें तय करने की आजादी दे दी गई. हालांकि, व्यवहार में चुनावी कारणों से इसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका.
अब जब बीजेपी 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का हवाला देकर पीएम मोदी की सादगी वाली अपील को सही ठहराने की कोशिश कर रही है, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि मनमोहन सिंह सरकार ने ज्यादा राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई थी और 2012 में OMCs को पेट्रोल की कीमत 10 रुपये प्रति लीटर बढ़ाने की अनुमति दी थी.
सब कुछ मोदी के नाम पर
OMCs के पास आज खुदरा कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी करने की और भी ज्यादा वजहें हैं, लेकिन सरकार जाहिर तौर पर हिचकिचा रही है. कठिन फैसले लेने में पीएम नरेंद्र मोदी की झिझक समझ से परे है. 2024 लोकसभा चुनाव में हल्के झटके के बाद भी लोगों ने हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में बार-बार बीजेपी पर भरोसा जताया है.
लोग निर्णायक मोदी के नाम पर वोट देते हैं. नोटबंदी जैसे फैसले के बाद भी वे उनके और उनकी पार्टी के साथ खड़े रहे. मोदी ने लोगों से सिर्फ 50 दिन मांगे थे और इस फैसले से हुई परेशानियों को सहने की अपील की थी. लोगों ने सारी तकलीफें झेलीं और सिर्फ तीन महीने बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बीजेपी को भारी बहुमत दे दिया.
इसलिए अगर पीएम मोदी लोगों से कहें कि पश्चिम एशिया संकट के बीच कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के कारण ईंधन की कीमतों में—मान लीजिए 10 रुपये प्रति लीटर, बढ़ोतरी ज़रूरी है, तो लोगों को इससे ज्यादा परेशानी नहीं होगी. लेकिन बीजेपी को लोगों के साथ ईमानदार होना पड़ेगा.
अगर लोग पूछें कि जब इतने सालों तक कच्चे तेल की कीमतें बहुत कम थीं, तब उन्हें कीमतों में राहत क्यों नहीं मिली, तो सत्ताधारी पार्टी यह कह सकती है कि मुफ्त राशन और सीधे नकद ट्रांसफर जैसी योजनाएं, जिनके लिए लोग वोट देते हैं, उनका खर्च तेल से होने वाली कमाई से पूरा किया गया.
मिडिल क्लास शायद इस जवाब से ज्यादा खुश न हो, लेकिन उसकी परवाह कौन करता है? उसके पास जाने के लिए और कोई जगह नहीं है.
ईमानदारी की बात करें, तो बीजेपी का मनमोहन सिंह और मोदी सरकार—दोनों को गिरते रुपये के पीछे आर्थिक कुप्रबंधन के एक ही पैमाने पर आंकना काफी साहसिक शुरुआत है. इसके बाद, इसे जनता को अर्थशास्त्रियों की बात बतानी चाहिए कि मुद्रा कोई झंडा नहीं है और विनिमय दर का राष्ट्रीय गौरव से कोई संबंध नहीं है. जैसा कि राजेश्वरी सेन गुप्ता और भार्गवी ज़ावेरी शाह ने सोमवार को दिप्रिंट में एक लेख में तर्क दिया, रुपये की गिरावट समस्या का हिस्सा नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा है. अगर इसका मतलब 2013 में कही गई बातों से मुकरना है, तो ऐसा ही सही. लोग ईमानदारी की सराहना करते हैं.
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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