बरेली: बत्तीस साल के मोहित भारद्वाज जंतर-मंतर के प्रदर्शन से बरेली लौटे तो उनका हौसला बहुत ऊंचा था. छात्रों की जीत हो चुकी थी. धर्मेंद्र प्रधान केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे, लेकिन बरेली के इस असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए घर लौटते ही बुरी खबर इंतज़ार कर रही थी—कॉलेज प्रशासन की ओर से निलंबन का नोटिस.
भारद्वाज ने दिप्रिंट से कहा, “22 जुलाई को जैसे ही मैं कॉलेज लौटा, प्रिंसिपल ने मुझे बुलाया. उन्होंने कहा कि प्रशासन ने प्रदर्शन में शामिल होने वाले मेरे वीडियो देख लिए हैं. मुझे कॉलेज प्रशासन की तरफ से एक पत्र दिया गया, जिसमें लिखा था कि अब मुझे नौकरी में रखने की ज़रूरत नहीं है. मुझे कुछ समय के लिए सस्पेंड भी नहीं किया गया, सीधे कह दिया गया कि मुझे नौकरी से हटा दिया गया है. उस पत्र में किसी शिकायतकर्ता का नाम भी नहीं है.”
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर सात हफ्ते चला प्रदर्शन 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ राजनीतिक जीत पर खत्म हुआ, लेकिन प्रदर्शन के साथ-साथ, राष्ट्रीय खबरों से दूर, एक कम दिखने वाली कार्रवाई भी चल रही थी. इसमें प्रदर्शन में शामिल होने या उसका समर्थन करने वाले टीचर्स, प्रोफेसरों और दूसरे नागरिकों के खिलाफ सेवा नियमों, निलंबन आदेशों और नौकरी से निकालने के नोटिस का लगातार इस्तेमाल किया गया. इन मामलों से दमन का एक कम दिखने वाला तरीका सामने आता है—लोगों की रोज़ी-रोटी पर हमला करके विरोध की आवाज़ दबाना.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिक्षक और लेखक अपूर्वानंद ने कहा कि अब यह “साफ” हो गया है कि शैक्षणिक संस्थानों ने अपनी स्वायत्तता छोड़ दी है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने झुककर काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “हम यह मान सकते हैं कि अगर कोई बीजेपी के समर्थन वाले कार्यक्रम में शामिल होता, तो उसके खिलाफ निलंबन या नौकरी से निकालने जैसी कार्रवाई नहीं होती.”
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई में मोहित भारद्वाज को कोई चोट नहीं लगी थी, लेकिन बरेली लौटने पर उनके सामने इससे भी बड़ी मुश्किल खड़ी थी.
‘स्टूडेंट्स के मुद्दे उठाए; टर्मिनेशन लेटर दिया’
18 जुलाई को, जब क्लाइमेट एक्टिविस्ट और एजुकेशनिस्ट सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर उनकी लंबी भूख हड़ताल के बीच दिल्ली पुलिस ने उठा लिया, तो भारद्वाज ने स्टूडेंट्स के आंदोलन के साथ एकजुटता दिखाते हुए एक फेसबुक पोस्ट किया. उन्होंने बरेली भर से लगभग 35 स्टूडेंट्स, बिज़नेस ओनर्स, यंग इंजीनियर्स और मेडिकल ग्रेजुएट्स के एक ग्रुप को इकट्ठा किया और जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए निकल पड़े.
भारद्वाज ने कहा, “मैंने देखा है कि 2024 में उत्तर प्रदेश पुलिस सर्विसेज़ एग्जाम लीक ने मेरे कई स्टूडेंट्स पर कैसे असर डाला. मैंने हमेशा पब्लिक एजुकेशन, हमारे कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर की क्वालिटी और भी बहुत कुछ से जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंताएं जताई हैं. मेरे लिए इस आंदोलन में शामिल होना स्वाभाविक था. जब हमने देखा कि वांगचुक के साथ क्या किया गया, तो लोगों ने 20 जुलाई को पार्लियामेंट मार्च में जाने का फैसला किया.”
भारद्वाज ने दावा किया कि उन्हें गन्ना उत्पादक पीजी कॉलेज से कभी कोई नोटिस नहीं मिला, जहां वह अकाउंट्स और बिज़नेस स्टडीज़ पढ़ाते थे. लेकिन, 22 जुलाई के टर्मिनेशन लेटर में मई में उनके खिलाफ एक और नोटिस का ज़िक्र था. उसमें उनके खिलाफ आरोपों की कोई खास जानकारी नहीं थी. उसमें सिर्फ इतना कहा गया था कि उनके खिलाफ “बार-बार शिकायतें” उनके टर्मिनेशन का कारण थीं.
उन्होंने कहा, “मुझे पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई थी, कोई नोटिस नहीं दिया गया था, या टर्मिनेशन का कोई फॉर्मल कारण नहीं बताया गया था. मैंने प्रिंसिपल, कॉलेज चलाने वाले ट्रस्ट के मैनेजिंग हेड और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को लिखा, जिसमें मैंने अपनी बात रखने का मौका देने और मेरे खिलाफ तथाकथित शिकायतों की निष्पक्ष जांच की मांग की.”
5 अगस्त को, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारद्वाज के टर्मिनेशन को रद्द कर दिया, लेकिन उन्हें अभी भी अपनी नौकरी पर वापस आने का इंतज़ार है.
अपने पांच लोगों के परिवार में अकेले कमाने वाले भारद्वाज ने लगभग तीन हफ्ते क्लास से दूर रहने का दुख जताया. उन्होंने कहा, “शुक्र है, मेरा साइड में फलों का होलसेल बिज़नेस है. मुझे अपनी बीमार मां, अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों की देखभाल करनी है. असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर मुझे जो सैलरी मिलती थी, वह चली गई है.”
‘सोशल मीडिया पोस्ट पर नज़र रखी जा रही थी’
जिस तरह से भारद्वाज जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में आए, वह हैरान करने वाला है. जब उन्होंने फेसबुक पर वांगचुक की पोस्ट का जवाब दिया और ऐलान किया कि वह 20 जुलाई को पार्लियामेंट मार्च में शामिल होंगे, तो बरेली पुलिस उनके दरवाज़े पर थी. उन्होंने याद करते हुए कहा, “मेरी पोस्ट पर साफ तौर पर नज़र रखी जा रही थी क्योंकि उस शाम, पुलिस हमें हिरासत में लेने और दिल्ली जाने से रोकने के लिए मेरे घर आई थी.”
भारद्वाज ने कहा, “खुशकिस्मती से, मेरे घर के आस-पास सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. जैसे ही मैंने उन्हें मॉनिटर पर देखा, मैं अपने घर की दीवार फांदकर रेलवे स्टेशन गया और कुछ स्टूडेंट्स के साथ दिल्ली के लिए निकल गया.”
समाजवादी पार्टी के यूथ सेल के मेंबर के तौर पर भारद्वाज के पिछले काम ने भी कॉलेज मैनेजमेंट को परेशान कर दिया था. दिप्रिंट से बात करते हुए, ट्रस्ट के दो सदस्यों प्रेसिडेंट राजेंद्र कुमार और वाइस-प्रेसिडेंट चौधरी नरेंद्र सिंह ने दावा किया कि कॉलेज के प्रति भारद्वाज का व्यवहार “शुरू से ही गलत” था.

चौधरी नरेंद्र सिंह ने कहा, “वह जानबूझकर जंतर-मंतर गए थे. हमने उन्हें पहले भी नोटिस दिए हैं. यूनिवर्सिटी शिक्षा का मंदिर है और पढ़ाई करना पूजा करने जैसा है. स्टूडेंट्स यहां यह पूजा करने आते हैं, प्रोटेस्ट में शामिल होकर पढ़ाई में रुकावट डालने नहीं.”
भारद्वाज के स्टूडेंट्स इससे सहमत नहीं हैं.
बैचलर ऑफ कॉमर्स डिग्री के फाइनल ईयर के स्टूडेंट क्षितिज ने पूछा, “सर ने जंतर-मंतर जाकर स्टूडेंट्स के लिए आवाज़ उठाई, हमारे लिए ही तो आवाज़ उठाई. तो इसमें गलत बात क्या है?”
24 साल की ज्योति चौधरी, जो फाइनल ईयर की स्टूडेंट हैं, उन्होंने याद किया कि कैसे भारद्वाज ने उन्हें और कई दूसरे स्टूडेंट्स को कॉलेज में एडमिशन दिलाने में मदद की. उन्होंने कहा, “उनकी वजह से ही मेरे जैसे स्टूडेंट्स को यहां पढ़ने का मौका मिला. मैं यहां बीकॉम की डिग्री अफोर्ड नहीं कर सकती थी, लेकिन उन्होंने मेरी और मेरे जैसे कई और लोगों की मदद की.”
भारद्वाज का कहना है कि प्रोटेस्ट CJP या किसी पॉलिटिकल पार्टी तक लिमिटेड नहीं थे और “वे लोगों के हैं, स्टूडेंट्स के हैं.” उन्होंने कहा कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 की दिक्कतें ही प्रोटेस्ट में शामिल होने के लिए “काफी वजह” हैं, लेकिन भारद्वाज की यह हालत कोई खाली जगह नहीं है.
टीचर्स, प्रिंसिपल, डॉक्टर: रोज़गार पर चला एक्शन
20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई से कई हफ्ते पहले ही रोहतक के रैनकपुरा स्थित सरकारी मिडिल स्कूल की एक गेस्ट टीचर को अपना समर्थन दिखाने की कीमत चुकानी पड़ी थी.
सुलेखा दलाल अपने 21 साल के बेटे का समर्थन करने के लिए जंतर-मंतर के प्रदर्शन में शामिल हुई थीं. उनका बेटा पुलिस सेवा में जाने की तैयारी कर रहा था. प्रदर्शन स्थल से उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी शेयर हुआ. प्रदर्शन में शामिल होने के दो दिन बाद, 8 जून को उन्हें सस्पेंड कर दिया गया.
सस्पेंशन के आदेश में कार्रवाई की कोई खास वजह नहीं बताई गई थी—जैसा भारद्वाज के मामले में हुआ था. हालांकि, जिला प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी बिजेंद्र हुड्डा ने मीडिया को बताया था कि दलाल ने “सरकारी कर्मचारियों के आचरण नियमों का उल्लंघन किया है.”
इस घटना पर सीजेपी का ध्यान गया. पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया चैनलों पर बयान जारी किए और उन्हें कानूनी मदद देने की पेशकश भी की. चार दिन बाद सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने बताया कि उनका सस्पेंशन रद्द कर दिया गया है और उन्हें नौकरी पर वापस ले लिया गया है.
हालांकि, दूसरी जगहों पर दूसरे लोगों की किस्मत सुलेखा दलाल जैसी नहीं रही. रोहतक से 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर, हरियाणा के कनीना गांव में 55 साल के नरेश कुमार कौशिक अब यह पता लगाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं कि उन्हें सस्पेंड क्यों किया गया.
कौशिक महेंद्रगढ़ जिले के कनीना स्थित सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल थे. उनका मानना है कि उनका मामला “प्रक्रिया के स्तर पर बेहद गलत” है, क्योंकि प्रशासन की अपनी जांच में उनके खिलाफ कुछ नहीं मिला था, फिर भी उन्हें सज़ा दी जा रही है.
17 जुलाई को उनके स्कूल की 15 छात्राओं ने वांगचुक के समर्थन में स्कूल परिसर के बाहर प्रदर्शन किया था. इसके कुछ ही समय बाद उनके प्रदर्शन के वीडियो स्थानीय न्यूज चैनलों ने बड़े स्तर पर शेयर किए.
वीडियो में छात्राओं को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “गूंगे-बहरे मत बनो. देश का भविष्य खराब मत करो!” इसके साथ “BJP, हाय-हाय!” के नारे भी लगाए गए.
प्रदर्शन के जवाब में स्थानीय ब्लॉक शिक्षा अधिकारी सुरेश कुमार की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रदर्शन स्कूल की छुट्टी के बाद और स्कूल परिसर के बाहर हुआ था. स्कूल के शिक्षकों और स्टाफ ने छात्रों को प्रदर्शन करने के लिए न तो उकसाया था और न ही उनका समर्थन किया था.
बीईओ कुमार ने कहा कि कमेटी ने स्कूल के प्रिंसिपल, शिक्षकों, छात्रों और उनके माता-पिता के बयान दर्ज करने के बाद अपनी रिपोर्ट दी थी.
कौशिक ने कहा, “इस जांच में यह बात सामने आने के बाद भी मुझे पद से क्यों हटा दिया गया, मैं नहीं जानता. मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैं दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहा हूं.” उन्होंने उस समय को याद करते हुए कहा, “प्रदर्शन वाले दिन सुबह स्कूल की प्रार्थना सभा के दौरान एक लड़की ने मुझसे वांगचुक की खबर के बारे में पूछा था. मैंने उससे कहा था, ‘बेटा, कुछ चीज़ों में तुम्हें शामिल होने से बचना चाहिए.’ इन लड़कियों ने अपनी मर्जी से प्रदर्शन किया था.”
दिप्रिंट ने जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) विश्वेश्वर कौशिक से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. हालांकि, उन्होंने कहा कि “नियमों के अनुसार उचित कार्रवाई की गई है.”
दिप्रिंट को 20 जुलाई को नरेश कौशिक को दिया गया सस्पेंशन आदेश मिला. यह आदेश हरियाणा सिविल सर्विसेज (पुनीशमेंट एंड अपील) रूल्स, 2016 के नियम 5 के तहत जारी किया गया था. उन्होंने आरोप लगाया कि यह आदेश बीईओ सुरेश कुमार की जांच के बाद आया, जिसमें पहले ही उनके शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला था. सस्पेंड होने के बाद कौशिक ने अपनी बहाली के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए, जबकि वह दिव्यांग हैं. उनके दोनों पैर 80 प्रतिशत दिव्यांग हैं.
कौशिक ने सावधानी बरतते हुए कहा, “हरियाणा सरकार बदले की कार्रवाई कर सकती है. मैं अपनी नौकरी वापस चाहता हूं और मीडिया से ज्यादा बात करके कोई विवाद नहीं खड़ा करना चाहता.”
उन्होंने कहा कि उनके पांच लोगों के परिवार में वह अकेले कमाने वाले हैं. उनके परिवार में 90 साल से ज्यादा उम्र की बीमार मां, पत्नी और दो बच्चे हैं.

स्कूल के प्रिंसिपल के तौर पर कौशिक ने अपने सरकारी स्कूल की सुविधाओं को बेहतर बनाने में मदद की थी. पिछले साल दिसंबर में एक हिंदी राष्ट्रीय अखबार में उनकी इस उपलब्धि के बारे में खबर भी छपी थी. आठ महीने बाद कौशिक अपने नौकरी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं.
उन्होंने कहा, “मैं अदालत के जरिए कार्रवाई की मांग करना चाहता हूं और मीडिया से बात करने की वजह से सरकार का निशाना नहीं बनना चाहता. इसलिए जब तक मुझे कानूनी रास्ता नहीं मिल जाता, मैं ज्यादा जानकारी नहीं देना चाहता. मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि BEO की अध्यक्षता वाली कमेटी को मेरे खिलाफ कुछ भी भरोसेमंद नहीं मिला है. फिर भी मुझे अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया गया और मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों हुआ. इसमें कोई पारदर्शिता नहीं है.”
अपूर्वानंद ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों के राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होने पर कुछ पाबंदियां हैं. लेकिन ऐसे कई मामले दर्ज हैं, जहां स्कूल और कॉलेज बीजेपी/आरएसएस के समर्थन वाले कार्यक्रम आयोजित करते हैं और छात्रों तथा शिक्षकों से उनमें अनिवार्य रूप से शामिल होने के लिए कहा जाता है.
उन्होंने कहा, “अगर किसी प्रदर्शन में शामिल होने पर सरकारी कर्मचारी सेवा नियमों का उल्लंघन कर रहा है, तो सत्तारूढ़ पार्टी या आरएसएस की ओर से आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होना समस्या क्यों नहीं है?”
उन्होंने आगे कहा कि शैक्षणिक संस्थान बीजेपी की शाखाओं की तरह काम कर रहे हैं. इसका सबूत उन सर्कुलर से मिलता है, जिनमें छात्रों को CJP के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों में शामिल नहीं होने का निर्देश दिया गया है. उन्होंने कहा, “तो यही सामान्य प्रवृत्ति है, जो गलत है.”
अपूर्वानंद ने सवाल किया, “इसके अलावा, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारें दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल होने वाले शिक्षकों को सजा क्यों दे रही हैं?”
‘मीडिया से बात नहीं करना चाहते; बस नौकरी वापस चाहिए’
मीडिया से बात करने का कौशिक का डर उन लोगों में भी है, जिन्हें नौकरी पर वापस लिया जा चुका है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में महाराजा सुहेल देव सरकारी मेडिकल कॉलेज के एक रेजिडेंट डॉक्टर को रविवार, 19 जुलाई को सस्पेंड कर दिया गया था, लेकिन करीब 10 दिन बाद उन्हें फिर से नौकरी पर बहाल कर दिया गया.
डॉ. रूपक इखे ने अब चुप रहने का फैसला किया है. 20 जुलाई को दिल्ली में संसद मार्च से कुछ दिन पहले उन्होंने बहराइच में वांगचुक के समर्थन में अकेले मार्च निकाला था. 17 जुलाई को इखे वांगचुक के समर्थन में संदेश वाली टी-शर्ट पहनकर और हाथ में एक बड़ा पोस्टर लेकर अपने घर से निकले थे. पोस्टर पर लिखा था, “ये देश नहीं बिकने दूंगा. ये देश नहीं मिटने दूंगा.”

महाराष्ट्र के अमरावती के रहने वाले इखे ने कहा कि उन्होंने न तो किसी को अपने साथ आने के लिए बुलाया था और न ही यूनिवर्सिटी में कोई पोस्टर लगाया था. वह अपनी मर्जी से अकेले बाहर निकले थे.
उन्होंने स्थानीय न्यूज़ संस्थानों से कहा था, “मेरा जमीर जाग गया है, इसलिए मैं यहां खड़ा हूं. यह ऐसा ही है जैसे मैं शाम की सैर पर निकला हूं.” डॉ. इखे ने कहा था, “हमारी व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट और खराब हो चुकी है. इसमें अब बदबू आने लगी है और इससे पहले कि यह खराबी और फैले, हमें कुछ करना होगा.”
इसके बाद वाले वीकेंड में उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए.
इसके तुरंत बाद सरकारी मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. संजय खत्री ने डॉ. इखे को सस्पेंड कर दिया. उन्होंने इखे के खिलाफ विभागीय जांच का आदेश दिया और घटना की वजहों की जांच करने तथा अपनी रिपोर्ट देने के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई.
इखे को बाद में बहाल कर दिया गया, हालांकि यह काम चुपचाप किया गया. उन्होंने दिप्रिंट से इसकी पुष्टि की, लेकिन उन्होंने आगे कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. उन्होंने इसकी वजह “परिवार और शुभचिंतकों की तरफ से बहुत ज्यादा दबाव” बताया. युवा डॉक्टर को उम्मीद है कि मामला “धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा” और अब वह सितंबर में होने वाली अपनी अंतिम परीक्षाओं में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं.
नौकरी से निकाले जाने के सभी मामलों में कार्रवाई बहुत जल्दी की गई, लेकिन आधिकारिक वजह या तो बहुत कमजोर थी या बिल्कुल नहीं बताई गई. भारद्वाज बताते हैं कि कैसे बिना किसी खास आरोप, उचित प्रक्रिया या सस्पेंड किए गए व्यक्ति को अपनी बात रखने का मौका दिए बिना आचरण नियमों का इस्तेमाल किया गया.

लेकिन बरेली में भारद्वाज के छात्रों के बीच अब माहौल कुछ अलग और विरोध वाला दिखाई दे रहा है. उनकी बहाली का इंतजार कर रही चौधरी ने कहा कि अगर उनके प्रोफेसर कॉलेज छोड़ भी देते हैं, तो उनके छात्र अपनी कक्षाओं में जाना बंद कर देंगे.
हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनकी नौकरी से निकाले जाने की कार्रवाई रद्द होते ही भारद्वाज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया, जिसमें लिखा था, “सत्यमेव जयते (सिर्फ सत्य की जीत होती है).”
दिप्रिंट से बात करते हुए भारद्वाज ने कहा, “मुझे नहीं पता कि उत्तर प्रदेश के कितने और शिक्षक और ग्रेजुएट इस प्रदर्शन में शामिल हुए या खुले तौर पर इसका समर्थन किया. अपनी नौकरियों को लेकर बहुत ज्यादा डर है. मुझे उम्मीद है कि वे समझेंगे कि जब वे अपने लिए आवाज़ उठाएंगे, तभी यह डर खत्म होगा.”
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