जैसलमेर: राजस्थान के सम गांव में स्थित डेजर्ट नेशनल पार्क के रेतीले इलाके में R1 और R2 धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं. वे थोड़ी-थोड़ी देर के लिए मुश्किल से उड़ान भरते हैं. उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि रविवार को जंगल में छोड़े जाने के बाद से ही विशेषज्ञ उन पर नजर रख रहे हैं. इन दोनों ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पक्षियों को कैद में पाला गया था और अब उन्हें आजाद हुए पांच दिन हो चुके हैं. शुरुआती निगरानी से थोड़ी उम्मीद जगी है. दोनों पक्षी भोजन की तलाश कर रहे हैं, पानी ढूंढ रहे हैं और धीरे-धीरे उन प्राकृतिक आदतों को सीख रहे हैं, जो उन्हें इस कठिन इलाके में जिंदा रहने में मदद करेंगी. लेकिन इस परियोजना से जुड़े वन्यजीव वैज्ञानिकों के लिए हर दिन चिंता में बीत रहा है.
R1 और R2 पर नजर रखना सुबह से शाम तक चलने वाला लगातार काम है. जीव वैज्ञानिकों और संरक्षण विशेषज्ञों की फील्ड टीम डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) के वीरान इलाके में वन विभाग की निगरानी मीनारों और अन्य ऊंची जगहों पर घंटों बैठी रहती है. उनकी नजरें कभी दूर तक फैले पीले रेगिस्तान में दूरबीन से पक्षियों को खोजती हैं, तो कभी उनकी पीठ पर लगे 30 ग्राम के ट्रैकर से मिलने वाले संकेतों पर जाती हैं.
सुतिर्थ दत्ता की जैतून के हरे रंग की टोपी पर धूल की बारीक परत जम गई है. भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वैज्ञानिक दत्ता ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के प्रजनन और संरक्षण कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे हैं. पिछले कुछ हफ्तों में वह अपने चश्मे पर जमी धूल की पतली परत को अनगिनत बार साफ कर चुके हैं.
दत्ता ने द प्रिंट को बताया, “इन दिनों काम बहुत लंबा खिंच जाता है. यह सिर्फ शारीरिक थकान की बात नहीं है. ये पक्षी आपको पूरी तरह अपने में उलझा लेते हैं. आप हर समय इनके बारे में सोचते रहते हैं. जब पक्षियों को छोड़ा जाता है, तो खुशी के पल आते हैं, क्योंकि इसके पीछे कई सालों की मेहनत होती है. लेकिन इन खुशी के पलों को महसूस करने से पहले ही चिंता वापस लौट आती है. सोते समय भी आप अगले दिन के बारे में, पक्षियों के बारे में और उनके जिंदा रहने के बारे में सोचते हैं. हममें से कई लोगों को रात भर ठीक से नींद नहीं आती, क्योंकि हम सोचते रहते हैं कि अगले दिन पक्षियों के साथ क्या होगा, खासकर इस शुरुआती दौर में.”
दांव बहुत बड़ा है. R1 और R2 को जंगल में छोड़ना एक बहुत बड़ी संरक्षण परियोजना की सिर्फ शुरुआत है. गंभीर रूप से विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रहे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का अस्तित्व रेगिस्तानी इलाके के अस्तित्व से जुड़ा है. पिछले दो दशकों में यह इलाका धीरे-धीरे खराब हुआ है. इस पक्षी को हर तरफ से खतरा है. आवारा कुत्ते इसका शिकार करते हैं, पवन चक्कियां और सौर ऊर्जा पार्क इसके इलाके को ऐसी बाधाओं से भर देते हैं, जिनके बीच से गुजरना मुश्किल है. वहीं, आसमान में फैली हाई-वोल्टेज बिजली की लाइनें मौत का जाल बुन देती हैं.
इस पक्षी को विलुप्त होने से बचाने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण और प्रजनन के लिए दो केंद्र बनाए. इनमें से एक सम में और दूसरा रामदेवरा में है, जो जैसलमेर से ज्यादा दूर नहीं है. लेकिन इस पक्षी का प्रजनन कराना रेगिस्तानी इलाके को फिर से बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया सिर्फ एक कदम है.
सम में स्थित केंद्र की स्थापना 2019 में एक शुरुआती प्रायोगिक परियोजना के तौर पर की गई थी, जबकि रामदेवरा में केंद्र 2022 में स्थापित किया गया था.

बस्टर्ड को बचाना, रेगिस्तान को बचाना
इन पक्षियों को जंगल में छोड़ने से पहले सात साल तक संरक्षण के प्रयास किए गए. छह महीने के दोनों नर पक्षियों को जंगल में छोड़े जाने की खबर पूरे भारत में सुर्खियां बनी. हालांकि, दत्ता और उनकी टीम इस सफलता को लेकर सतर्क थी. वे जानते हैं कि कैद में पाले गए पक्षियों, खासकर बस्टर्ड प्रजाति के पक्षियों के जंगल में छोड़े जाने के बाद जिंदा बचने की दर सिर्फ 10 से 30 प्रतिशत होती है. उनके लिए जश्न मनाना तो बस शुरुआत थी. इसके बाद उन्हें लंबे समय तक पक्षियों पर नज़र रखनी थी.
दत्ता ने कहा, “ये पक्षी खुद को नए माहौल में कैसे ढाल रहे हैं और जंगल में कैसे रहना सीख रहे हैं, इससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. इसके आधार पर हम भविष्य में उन्हें दोबारा जंगल में बसाने की प्रक्रिया में बदलाव और सुधार कर सकेंगे और जंगल में उनके जिंदा रहने की संभावना बढ़ा सकेंगे. फिलहाल, हम उनके व्यवहार पर नजर रख रहे हैं और देख रहे हैं कि समय के साथ उनकी प्राकृतिक प्रवृत्तियां कैसे विकसित हो रही हैं.”
सम में मौजूद सभी शोधकर्ताओं की बातचीत का मुख्य विषय यही बस्टर्ड हैं. शाम को जब फील्ड टीम सम में किराए के घर लौटती है, तो रात के खाने के दौरान भी इन्हीं पक्षियों की चर्चा होती है. टीम बात करती है कि कैसे दोनों पक्षी झाड़ियों से टिड्डे तोड़कर खाने के लिए झुकते हैं. वे यह भी देखते हैं कि दोनों में से एक नर, जो शुरुआती छह महीनों में पालने के दौरान काफी शांत और साधारण दिखता था, अब अचानक आगे रहने लगा है, जबकि दूसरा उसके पीछे चलता है.
हालांकि, दत्ता का कहना है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड तो सिर्फ एक “छतरी” है.
उन्होंने कहा, “यह एक ऐसी खास प्रजाति है, जिसके संरक्षण के लिए लोगों से समर्थन मिलता है. इसका फायदा आसपास की दूसरी प्रजातियों को भी होता है. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए जिन घास के मैदानों को फिर से बहाल किया गया है, वहां टिड्डों और मकड़ियों जैसे कीड़ों की प्रजातियों की विविधता काफी ज्यादा है. यहां तक कि चिंकारा को भी इससे फायदा होता है, जिसे इस इलाके में बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता है. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को प्रभावित करने वाले खतरे दूसरी प्रजातियों को भी प्रभावित करते हैं. अगर आप ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का संरक्षण करते हैं, तो आप उन वन्यजीवों को भी बचा पाते हैं, जिन्हें अपने दम पर लोगों का उतना समर्थन नहीं मिल पाता.”

कैद में रहने वालों के नाम, आजाद पक्षियों के नंबर
R1 और R2 से कुछ ही दूरी पर उनके माता-पिता सम संरक्षण प्रजनन केंद्र के जैव-सुरक्षित बाड़ों में कैद हैं. इंसानों के हाथों पले-बढ़े और उनकी देखभाल करने वालों के आदी हो चुके लियो, फीनिक्स, अमन और सैम को कभी जंगल में नहीं छोड़ा जाएगा. उनकी भूमिका प्रजनन करने और ऐसे नए ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पैदा करने की है, जिन्हें उस आजादी का अनुभव मिल सके, जो इन पक्षियों को खुद कभी नहीं मिली.
वन्यजीव वैज्ञानिक हृषिका शर्मा की बांहों पर पड़े खरोंचों के निशान अब हल्के पड़ गए हैं. लेकिन हर साल फरवरी से जून के बीच, प्रजनन के मौसम में, जब हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, तो कैद में रहने वाले ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अपनी चोंच से शर्मा के शरीर के जिस भी हिस्से तक पहुंच पाते हैं, वहां प्यार भरी खरोंचें छोड़ देते हैं. शर्मा को इससे कोई परेशानी नहीं है. 33 साल की शर्मा ने करीब आठ साल पहले वन्यजीव विज्ञान में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करते ही इस प्रजनन परियोजना से जुड़ गई थीं.
2019 में जब केंद्र की शुरुआत हुई, तब शर्मा और उनके साथियों ने जंगल से बस्टर्ड के अंडे इकट्ठा किए और चूजों को अपने हाथों से पाला. 2023 तक जब ये पक्षी वयस्क हो गए, तब प्राकृतिक और कैद में प्रजनन की प्रक्रिया शुरू हुई.
शर्मा ने कहा, “कभी-कभी प्राकृतिक तरीके से प्रजनन करने में दिक्कतें आती हैं. मादा तैयार हो सकती है, लेकिन नर तैयार नहीं होता, या इसका उल्टा होता है. इस समस्या को हल करने के लिए हम मादा पक्षी का एक नकली मॉडल इस्तेमाल करते हैं और नर से शुक्राणु इकट्ठा करते हैं. जब मादा तैयार हो जाती है, तो उसमें शुक्राणु डाल दिए जाते हैं. कृत्रिम गर्भाधान (AI) से अंडों के निषेचित होने की संभावना बढ़ जाती है.” फिर उन्होंने हंसते हुए जल्दी से जोड़ा, “हमारे लिए AI का मतलब आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन यानी कृत्रिम गर्भाधान है.”
शर्मा इस टीम के सबसे लंबे समय से काम कर रहे सदस्यों में से एक हैं. उनके साथ 28 साल की पशु चिकित्सक डॉ. प्रेरणा करडिले काम करती हैं, जो करीब छह महीने पहले मुंबई की भीड़भाड़ और अफरातफरी छोड़कर सम आई थीं. इससे पहले करडिले ने मुंबई के चिड़ियाघर में चार साल तक हम्बोल्ट पेंगुइन की देखभाल की थी. जब वह यहां आईं, तब उन्हें बस्टर्ड के बारे में बहुत कम जानकारी थी.
करडिले ने इस साल के प्रजनन मौसम को याद करते हुए कहा, “एक पक्षी शून्य से नीचे के तापमान में रहता है, जबकि दूसरा 50 डिग्री की गर्मी में! एक तैरता है, दूसरा उड़ता है! लेकिन दोनों में एक बात समान है—वे काटते हैं!”
हर सुबह जब शर्मा और करडिले प्रजनन केंद्र पहुंचती हैं, तो सबसे पहले अपने जूते बाहर उतारती हैं, साबुन से हाथ-पैर धोती हैं और अपने कपड़ों के ऊपर साफ नीले रंग के कपड़े पहनती हैं. दफ्तर के अंदर लगी दो स्क्रीन की मदद से वे केंद्र में मौजूद सभी 18 बस्टर्ड पर नजर रखती हैं. ये पक्षी लंबे और छायादार बाड़ों में रखे गए हैं.
उन्हें खाना खिलाना पांच चरणों वाली एक प्रक्रिया है, जो सुबह 6:30 बजे शुरू होती है. इसका मकसद उनकी प्राकृतिक दिनचर्या की नकल करना है. सबसे पहले उन्हें प्रोटीन से भरपूर दाने दिए जाते हैं. कभी-कभी तरबूज, रेगिस्तान में उगने वाला ताजा कद्दू या काचरी भी दी जाती है. इसके अलावा, उन्हें झींगुर और कीड़े जैसे जीवित भोजन भी दिए जाते हैं.
जब शर्मा और करडिले CCTV पर आरंभ को देखती हैं, तो दोनों खिलखिलाकर हंसने लगती हैं. कृत्रिम गर्भाधान से पैदा हुआ पहला बस्टर्ड आरंभ, खाने के समय को एक खेल में बदल देता है. वह देखभाल करने वाले के हाथों और पैरों पर चोंच मारता है.
करडिले ने कहा, “मुझे लगता है कि छोटे पक्षी मुझे ज्यादा पसंद करते हैं. वे इंसानों के साथ ज्यादा सहज रहते हैं और उनके प्रति ज्यादा जिज्ञासा दिखाते हैं. पक्षी जितना बड़ा होता जाता है, उतना ही ज्यादा डरने लगता है. अगर दो से ज्यादा इंसान उनके बाड़े में आ जाएं, तो वे घबराने लगते हैं. बड़े पक्षी तो बस यही चाहते हैं कि आप उन्हें खाना दें और वहां से चले जाएं.”

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की अनोखी आदतें और उनकी अलग-अलग पहचान भी इस परियोजना के इतिहास का हिस्सा हैं. शर्मा का भांजा, जो हर कुछ महीनों में केंद्र आता है, पूरे झुंड के हर पक्षी को उसके नाम से पहचानता है.
इनमें लियो है, जिसने केंद्र में प्राकृतिक तरीके से पैदा हुए ज्यादातर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को जन्म देने में भूमिका निभाई है. हाल ही में जंगल में छोड़े गए पक्षियों में से एक भी उसी की संतान है. फिर शार्की है, आठ साल की मादा, जो चूजा रहते हुए ही शार्क की तरह तेज रफ्तार से कीड़ों का शिकार करती थी. टोनी का जन्म नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका टोनी मॉरिसन की मृत्यु वाले दिन हुआ था. कोरोना ने लॉकडाउन के दौरान अंडे का खोल तोड़कर बाहर आने का काम किया. इसके अलावा, व्योमिका, एटम, मिश्री और कई दूसरे पक्षी भी हैं, जिनका जन्म मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ था. उस समय पोखरण के आसपास ड्रोन को रोकने की कार्रवाई और तोपों से हो रही गोलाबारी के कारण वैज्ञानिकों को पक्षियों को निकालकर पास की एक दूसरी जगह ले जाना पड़ा था.
इन नामों में पक्षियों के प्रति प्यार झलकता है, लेकिन जिन पक्षियों के नाम रखे जाते हैं, उन्हें कभी पिंजरे से बाहर की आजादी नहीं मिलेगी. किसी पक्षी को जंगल में छोड़ने का फैसला उसके पैदा होने से बहुत पहले ही कर लिया जाता है.
करडिले ने कहा, “कृत्रिम गर्भाधान की प्रक्रिया में मिलने वाले आनुवंशिक आंकड़ों के आधार पर हम उन चूजों के लिए जीन का सबसे अच्छा मेल चुनते हैं, जिन्हें हम जंगल में छोड़ना चाहते हैं. यह फैसला पहले ही करना पड़ता है, क्योंकि चूजे के अंडे से बाहर आते ही हम यह सुनिश्चित करते हैं कि वह किसी इंसान का चेहरा न देखे. उसे रामदेवरा के रिलीज एवियरी यानी जंगल में छोड़ने से पहले रखने के लिए बने बड़े बाड़े में भेज दिया जाता है. वहां उसे इंसानों से पूरी तरह अलग रखा जाता है. यहां तक कि उसे वाहनों की आवाजें भी सुनाई नहीं देतीं.”
शोधकर्ता ऐसे मास्क पहनते हैं, जिनसे उनका चेहरा दिखाई नहीं देता. वे ऐसे गाउन भी पहनते हैं, जिनसे वे इंसानों जैसे न दिखें. इसका मकसद यह है कि चूजों का इंसानों से लगाव न हो. रामदेवरा का एवियरी सम के किसी भी बाड़े से काफी बड़ा है. यहां पक्षियों को उड़ना, भोजन ढूंढना और जंगल में रहने के लिए खुद को तैयार करना सीखने का मौका मिलता है.
करडिले ने कहा, “कैद में रहने वाले हर पक्षी का एक नाम होता है. लेकिन जिन पक्षियों को हम जंगल में छोड़ने की योजना बनाते हैं, उन्हें शुरुआत से ही R1, R2 और इसी तरह के नंबरों से बुलाते हैं.”

बाड़ों के बाहर सिमटता रेगिस्तान
प्रजनन केंद्र की चारदीवारी के भीतर वैज्ञानिकों का नियंत्रण है. लेकिन इसके बाहर की दुनिया कहीं ज्यादा मुश्किल है. उरास खान की खुली छत वाली जिप्सी डेजर्ट नेशनल पार्क की ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ती है. एक हाथ स्टीयरिंग पर है और दूसरे में पुरानी दूरबीन है. डूबते सूरज की रोशनी में आंखें सिकोड़कर खान पूरे इलाके में सफेद रंग की जानी-पहचानी झलक तलाश रहे हैं—ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की.
पिछले दो दशकों में सम के निवासी खान ने खुद ही डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) में रहने वाले पक्षियों को पहचानना सीखा है. लंबे लेंस वाले कैमरे लेकर आने वाले फोटोग्राफरों के उलट, खान अपने फोन का कैमरा निकालते हैं, उसे दूरबीन के सामने लगाते हैं और तस्वीरें खींच लेते हैं. बाद में इन तस्वीरों की मदद से पक्षियों के नाम पता करते हैं. जिप्सी डेजर्ट नेशनल पार्क की घुमावदार पगडंडी पर आगे बढ़ती है और चारों ओर लगी जालीदार बाड़ के पास से गुजरती है. खान को भागती हुई एक गोह, अकेली डाल पर बैठा एक वेरिएबल व्हीटियर पक्षी, सुनहरी घास पर फुदकती छोटी चोंच वाली कई लार्क और कुछ टैनी पिपिट दिखाई देते हैं. लेकिन ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहीं नजर नहीं आता.
खान ने कहा, “वे वहीं जाते हैं, जहां उन्हें खाना मिलता है. जब टिड्डे, जंगली बेर और दूसरे कीड़े-मकोड़े बहुतायत में होते थे, तब ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के पास खाने के लिए काफी कुछ होता था. अगर बारिश नहीं होती, तो प्राकृतिक भोजन की कमी हो जाती है. भूख से मरने के कारण ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की आबादी भी घट जाती है.” उन्होंने इसके घटने की असली वजह के तौर पर उसके प्राकृतिक आवास के विनाश की ओर इशारा किया.
डेजर्ट नेशनल पार्क भले ही एक संरक्षित क्षेत्र हो, लेकिन दूर तक फैले इलाके में बिजली के खंभे बिजूकों की तरह खड़े दिखाई देते हैं और सैकड़ों पवन चक्कियां चुपचाप घूमती रहती हैं. 43 साल के किसान पार्थ जागरानी का कहना है कि इन जमीनों पर कभी प्राचीन ओरन हुआ करते थे. ओरन यानी पवित्र वन, जिन्हें कभी इस रूप में दर्ज ही नहीं किया गया.
इनमें से कई जमीनों को आज भी “बंजर भूमि” कहा जाता है. इस वजह से इन्हें सौर ऊर्जा पार्क और पवन चक्कियां लगाने के लिए आसानी से आवंटित किया जा सकता है. नतीजतन, वे ओरन उजाड़ दिए गए, जहां कभी घास के मैदान और झाड़ियों से भरे इलाके हुआ करते थे और वन्यजीव रहते थे.
जागरानी ने नाराजगी जताते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट पहले ही आदेश दे चुका है कि बिजली की लाइनों को जमीन के नीचे बिछाया जाना चाहिए, लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी इस आदेश का पालन नहीं हुआ है. जहां लाइनों को जमीन के नीचे नहीं बिछाया जा सकता था, वहां पक्षियों को बिजली की तारों से बचाने के लिए बर्ड डायवर्टर लगाने का आदेश दिया गया था. लेकिन कंपनियां इन्हें सिर्फ मुख्य सड़कों के पास लगाती हैं, जहां लोगों की नजर पड़ सके. अंदरूनी इलाकों में इन्हें नहीं लगाया जाता, जबकि वहां बिजली की लाइनें कई किलोमीटर तक फैली हैं. कंपनियों ने ज्यादातर ऐसे डायवर्टर लगाए हैं, जो रात में रोशनी पड़ने पर ही चमकते हैं. क्या उन्हें लगता है कि पक्षी हेडलाइट पहनते हैं या टॉर्च लेकर चलते हैं?”
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के शरीर की बनावट भी बिजली के तारों को उसके लिए और खतरनाक बना देती है. उसकी आंखें खोपड़ी के दोनों तरफ होती हैं, जिसके कारण सामने देखने की उसकी क्षमता बहुत कमजोर होती है. जब यह भारी शरीर वाला पक्षी कम ऊंचाई पर उड़ता है, तो सामने पतला तार दिखाई देने के बावजूद वह अपना रास्ता नहीं बदल पाता और न ही समय रहते रुक पाता है.
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक अध्ययन में कहा गया है, “पिछले अध्ययनों से पता चला है कि बिजली की लाइनें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और इससे जुड़े अन्य पक्षियों के लिए मौजूदा समय में एक बड़ा खतरा हैं. 2017-2018 में थार के इलाके में किए गए सर्वेक्षणों के अनुमान के मुताबिक, हर साल करीब 88,000 पक्षी बिजली की लाइनों से जुड़ी घटनाओं के कारण मर जाते हैं. इस इलाके में बिजली की लाइनें लगभग 2,000 किलोमीटर तक फैली हैं और पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या कई गुना बढ़ गई है.”

जमीन पर एक और शिकारी छिपा है—आवारा कुत्ते. ये आक्रामक झुंड रेगिस्तान में घूमते रहते हैं. ऐसे पक्षी के लिए, जिसे उड़ान भरने के लिए लंबी खुली जगह चाहिए, ये कुत्ते जानलेवा साबित हो सकते हैं. वे पक्षियों का शिकार करते हैं और उनके अंडों को कुचल देते हैं. ये अंडे ज्यादातर खुली रेत पर मिलते हैं. हालांकि, खान के मुताबिक, इस इलाके में नसबंदी अभियान चलाए जाने के कारण पिछले कुछ वर्षों में इन कुत्तों की संख्या घटी है.
डेजर्ट नेशनल पार्क के इलाके में भले ही बहुत ज्यादा आवारा कुत्ते न हों, लेकिन कुछ किलोमीटर दूर स्थित गांवों में रहने वाले कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर माना कि वे अब भी कभी-कभी बंदूक लेकर इलाके में घूमते हैं, ताकि कुत्तों को गोली मार सकें या उन्हें डरा कर भगा सकें.
जिला वन अधिकारी (DFO) चंद्रपाल सिंह चावन ने कहा, “डेजर्ट नेशनल पार्क 3,162 वर्ग किलोमीटर में फैला है. हमारा मुख्य ध्यान प्राकृतिक आवास की सुरक्षा पर है, खासकर घास के मैदानों को बचाने पर, ताकि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, रेगिस्तानी लोमड़ी, रेगिस्तानी बिल्ली, चिंकारा और सरीसृप जैसे वन्यजीव सुरक्षित रहें और उनका प्राकृतिक आवास बरकरार रहे.”
चावन और दत्ता, दोनों का मानना है कि घास के मैदानों के विनाश के कारण ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संख्या घटी है और वे इस इलाके से गायब होते जा रहे हैं. काफी जमीन दूसरी परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल की जा चुकी है, जबकि बचे हुए घास के मैदानों में भी पशुओं को बड़े पैमाने पर चराया जाता है. इसे रोकने के लिए वन विभाग ने कुछ इलाकों में बाड़ लगाई है, ताकि वहां पशु न घुस सकें.
खान को इन बाड़ों पर भरोसा नहीं है. आखिरकार, पक्षी इनसे बहुत दूर तक उड़कर जाते हैं.
हालांकि, दत्ता के मुताबिक, बाड़ लगाने से उस इलाके में वनस्पति को दोबारा उगने का मौका मिला है और कीड़ों की संख्या भी बढ़ी है. डेजर्ट नेशनल पार्क के सिर्फ करीब 5 प्रतिशत हिस्से में बाड़ लगाई गई है, लेकिन ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लगभग 80 प्रतिशत घोंसले इसी हिस्से में हैं.
दत्ता ने कहा, “इस (प्रजनन) कार्यक्रम को बहुत बड़ी सफलता मिली है. अंडे से लेकर वयस्क होने तक 80 प्रतिशत पक्षी जीवित बचे हैं. हम ऐसा इसलिए कर पाए, क्योंकि हमें शांति से काम करने और वैज्ञानिक प्रक्रिया का पालन करने का मौका मिला. जंगल में दोबारा बसाने की प्रक्रिया में भी इसी वैज्ञानिक तरीके का पालन करना होगा. रास्ते में मुश्किलें आएंगी, लेकिन हम उनका हल ढूंढ लेंगे, ठीक वैसे ही जैसे हमने संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम में किया.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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