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Thursday, 15 October, 2026
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SIR की असली नाकामी चुनाव आयोग में ही नहीं, न्यूजरूम में भी हो सकती है

सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैलने वाली खबरें और आंकड़ों की कम समझ आधी-अधूरी बातों को बढ़ा सकती है. संदर्भ को समझकर विश्लेषण न कर पाने से मीडिया लोगों की सोच और लोकतंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाता है.

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कभी-कभी दिनभर की बहसों और विवादों से थोड़ा पीछे हटकर यह समझना ज़रूरी होता है कि लोकतंत्र असली मुद्दों से निपटने में नाकाम क्यों रहते हैं. लोकतंत्र में तानाशाही वाले शासन की तुलना में जानकारी ज्यादा आसानी से मिलती है, लेकिन जानकारी उतनी ही अच्छी होती है, जितना अच्छा उसका स्रोत होता है और उसे सच्चाई के जितना करीब पहुंचने के लिए कितनी गहराई से जांचा-परखा गया है.

आज सोशल मीडिया पर हर तरफ इतनी आवाज़ें हैं कि स्मार्टफोन रखने वाला लगभग कोई भी व्यक्ति खुद को ‘पत्रकार’ कह सकता है. इसके साथ ही टीवी एंकर और यहां तक कि अखबार भी सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल होने वाली खबरों की होड़ में लोगों का ध्यान खींचने वाली सनसनीखेज हेडलाइन बनाने की कोशिश करते हैं. ऐसे में आम नागरिक के लिए असली ‘तथ्यों’ तक पहुंच पाना बहुत मुश्किल है. इंसानों की यह आम आदत भी इसमें जुड़ जाती है कि वे उन लोगों की बात ज्यादा सुनते हैं जिन्हें पसंद करते हैं, न कि उन्हें जिन्हें पसंद नहीं करते. सोशल मीडिया के एल्गोरिदम भी लोगों को बार-बार उन्हीं विचारों और बातों के बीच रखते हैं, जिनसे वे पहले ही सहमत होते हैं. ऐसे में मतदाताओं के किसी मुद्दे की असलियत या सच्चाई के बजाय तेज़ आवाज़ों और अपनी ‘भावनाओं’ से प्रभावित होने की आशंका ज्यादा रहती है.

इस लेख में मैं यह तर्क देने जा रहा हूं कि आंकड़ों की समझ न रखने वाले पत्रकार, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान गलत तरीके से मतदाताओं के नाम हटाने के मामले में चुनाव आयोग से ज्यादा दोषी हैं. नाम गलत तरीके से हटाए जाने की समस्या का समाधान पाने के रास्ते अब भी मौजूद हैं. लेकिन पत्रकारों में आंकड़ों और संख्याओं को समझने की कमी सच्चाई के खिलाफ एक गंभीर अपराध है.

समस्या की शुरुआत उस सलाह से होती है जो नए पत्रकारों को अपना करियर शुरू करते समय दी जाती है: खबर का एक पहलू खोजो, पता लगाओ कि खबर में खास क्या है. किसी खबर का ‘पहलू’ तय करने का मतलब ही है कि असलियत को सीमित नज़रिए से देखा जाए, यहां तक कि उसे एक तरफ झुककर भी पेश किया जा सकता है. हम हाथी को उसके उस हिस्से के आधार पर परिभाषित करने लगते हैं, जिसे हमने पकड़ा है, न कि पूरे हाथी को देखकर. असल दुनिया में सच्चाई सिर्फ सही या गलत, काले या सफेद जैसी नहीं होती. इसमें कई तरह के पहलू और बीच के रंग होते हैं. लेकिन आज सोशल मीडिया की इस तेज़ रफ्तार दुनिया में सच्चाई के बजाय ‘कहानी गढ़ने’ और उसे ‘वायरल करने’ पर ध्यान दिया जाता है. जंतर-मंतर पर ऐसे युवाओं की बड़ी संख्या को देखिए, जो अपने स्मार्टफोन से वीडियो बनाकर उन्हें वायरल करने की कोशिश कर रहे हैं.

नौसिखियों को छोड़ भी दें, तो आज ज्यादातर ‘पत्रकारों’ को भी आंकड़ों की सही समझ नहीं है. तीन-चार घटनाओं को जोड़कर एक चलन या बड़ी समस्या के तौर पर पेश कर दिया जाता है. हमने 2014-15 में ऐसा ही देखा था, जब चर्चों से जुड़ी कुछ अप्रिय घटनाओं के बाद यह बात फैलने लगी कि ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं. बाद में जब पुलिस ने कहा कि मंदिरों और गुरुद्वारों में भी ऐसी घटनाएं इससे कहीं ज्यादा नियमित रूप से हो रही थीं, तो इस कहानी को चुपचाप दबा दिया गया. इसके बावजूद, इस बात की भी पूरी आशंका है कि उस समय खबर को दबाने की वजह ‘तथ्य’ नहीं थे, बल्कि पश्चिम बंगाल में एक बुजुर्ग नन के साथ बलात्कार की घटना थी. मीडिया को उम्मीद थी कि यह काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े किसी व्यक्ति ने किया होगा, लेकिन आरोपी बांग्लादेश का एक अवैध प्रवासी निकला. इस घटना की रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया को हुई शर्मिंदगी ने खबर को दबा दिया, न कि तथ्य सामने आने से ऐसा हुआ.

पत्रकार आसानी से बातों में आ जाते हैं और उन्हें आंकड़ों की समझ भी कम होती है. ऐसे में अगर आप संख्याओं को लेकर सबसे बड़े और चौंकाने वाले दावे करते हैं, तो आपकी खबर आसानी से सुर्खियों में आ सकती है. यही वजह है कि जब कोई कहता है कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से ‘13 करोड़ मतदाताओं’ के नाम हटा दिए गए, तो हर कोई इस पर ध्यान देने लगता है, लेकिन इस बड़े आंकड़े की जरूरी जांच-पड़ताल नहीं की जाती. जब मीडिया में किसी आंकड़े को 10 बार दोहरा दिया जाता है, तो लोगों के मन में वही आंकड़ा सही मान लिया जाता है.

मनोवैज्ञानिक इसे शुरुआती आंकड़े का असर यानी ‘एंकरिंग इफेक्ट’ कहते हैं. अगर आप किसी दुकान में दुकानदार से मोलभाव कर रहे हैं, तो वह जानबूझकर शुरुआत में बहुत ज्यादा कीमत बताएगा. इससे मोलभाव करने के बाद भी आप उस कीमत से ज्यादा पैसे दे सकते हैं, जितने आपको देने चाहिए थे. जब किसी बड़े आंकड़े को दिमाग में शुरुआती आधार बना दिया जाता है, तो मोलभाव करने वाला व्यक्ति शुरुआत में ही मुकाबला हार जाता है.

एक और मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें लोग किसी चीज़ को हासिल करने के मुकाबले उसे खोने से ज्यादा डरते हैं. अगर लोगों को 5 रुपये पाने और 5 रुपये खोने में से एक विकल्प चुनना हो, तो ज्यादातर लोग 5 रुपये पाने का मौका छोड़ देते हैं और संभावित नुकसान पर ज्यादा ध्यान देते हैं. यही वजह है कि जिन लोगों के अपने हित जुड़े होते हैं और जिन्हें कुछ खोने का डर होता है, वे नीतियों से जुड़े फैसलों पर ज्यादा बोलते हैं और उनका असर भी ज्यादा होता है. जबकि उन नीतियों से फायदा पाने वाले लोगों की संख्या उनसे कहीं ज्यादा हो सकती है. एसआईआर में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर चल रहे मौजूदा विवाद में भी, जिन लोगों को अपना नाम हटने का डर है, वे उन भारी संख्या में लोगों के मुकाबले ज्यादा सक्रिय और मुखर होने की आशंका रखते हैं, जिनके नाम नहीं हटाए गए हैं.

सोच को प्रभावित करने वाले ये दोनों मनोवैज्ञानिक जाल- शुरुआती आंकड़े का असर और नुकसान का डर-यह समझने के लिए अहम हैं कि नीतियों के मामले में क्या होता है. इसकी वजह यह है कि नीतियों पर फैसले लेने वाले नेताओं को भी इस बात की चिंता करनी पड़ती है कि मतदाता किसी मुद्दे को किस तरह देखेंगे. आंकड़ों की समझ न रखने वाले पत्रकार अक्सर गलत या आधी-अधूरी कहानी को और बड़ा बना देते हैं.

अतीत में भी शुरुआती आंकड़े के असर ने नीतियों को प्रभावित किया है. जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) विनोद राय ने 2008 में बिना नीलामी के दूरसंचार लाइसेंस दिए जाने के मामले में सरकारी खजाने को 1,76,000 करोड़ रुपये के ‘अनुमानित नुकसान’ का आंकड़ा दिया, तो उन्होंने सरकारी खजाने को होने वाले संभावित नुकसान के तीन और, इससे कम आंकड़े भी बताए थे, लेकिन राजनीतिक बहस का मुद्दा सिर्फ सबसे बड़ा आंकड़ा बना. विपक्ष या टीवी पर बहस करने वालों को इससे फर्क नहीं पड़ा कि अनुमान के आधार पर बताया गया नुकसान असल नुकसान नहीं होता. इसके अलावा, स्पेक्ट्रम कम कीमत पर देने के अच्छे कारण भी हो सकते हैं. लेकिन नुकसान का बड़ा आंकड़ा सामने आने से पूरी प्रक्रिया संदिग्ध दिखने लगी. दूरसंचार लाइसेंस देने में पक्षपात होने की वास्तविक आशंका भी इस भारी-भरकम नुकसान के आंकड़े के नीचे दब गई. इसके बाद भविष्य की किसी भी सरकार के लिए बहुत ज्यादा शुरुआती कीमत तय किए बिना स्पेक्ट्रम बेचने पर विचार करना मुश्किल हो गया.

यही बात दूसरे बड़े आंकड़ों पर भी लागू होती है, जिन्हें समझने के लिए जरूरी दूसरे पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता. ऐसा ही एक उदाहरण किसानों के लिए लोगों की भारी सहानुभूति है. खेती से जुड़े मतदाताओं के समर्थन में अपना हित देखने वाले नेता किसानों की आत्महत्याओं की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं. इससे लोगों का ध्यान इस बात से हट जाता है कि बड़े पैमाने पर कर्ज माफी देने या न्यूनतम समर्थन मूल्य को बाजार की कीमत से काफी ऊपर बढ़ाने के क्या असर हो सकते हैं. ‘डाउन टू अर्थ’ की एक स्टडी के मुताबिक, 1995 से लेकर हाल के वर्षों तक करीब 3,90,000 किसानों ने आत्महत्या की. आज भी संभवतः हर साल करीब 10,000 किसान अपनी जान दे रहे हैं.

यह निश्चित रूप से एक मानवीय त्रासदी है, जिस पर ध्यान देना और इसे रोकने के लिए कदम उठाना जरूरी है. लेकिन इस आंकड़े से यह तथ्य छिप जाता है कि इसकी संख्या इतनी बड़ी होना तय था, क्योंकि भारत के 45-46 प्रतिशत कामकाजी लोग खेती या उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर हैं. यानी 60 करोड़ से ज्यादा लोग. अरबों की आबादी के आधार पर देखें, तो कुल 3.9 लाख आत्महत्याओं की संख्या उतनी बड़ी नहीं है कि उसके आधार पर पूरे मामले को देखा जाए. (ध्यान दें: किसानों की आत्महत्या की दर निकालते समय केवल आज की आबादी को आधार नहीं बनाया जाता, बल्कि 1995 से हर साल खेती करने वाली आबादी को जोड़कर एक बहुत बड़ा आधार तैयार करना पड़ता है.) अगर इस नजरिए से देखा जाए, तो किसानों की आत्महत्या का मुद्दा सही संदर्भ में समझ आएगा. यह एक मानवीय त्रासदी है, लेकिन इसे सब्सिडी और कर्ज माफी की नीतियों को ऐसे रास्ते पर ले जाने का आधार नहीं बनाना चाहिए, जिन्हें लंबे समय तक जारी रखना संभव न हो.

एक उलटा उदाहरण भी देखिए, जहां आंकड़े असली हैं, लेकिन किसी को उनकी परवाह नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि भारत में पुरुषों की आत्महत्या की दर महिलाओं की तुलना में ढाई गुना है. फिर भी, अभी तक कोई पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आपात स्थिति घोषित करने की मांग करता नहीं दिख रहा. ऐसा इसलिए है क्योंकि पितृसत्ता का असर अब भी बना हुआ है और हम पुरुषों की तकलीफ को कम करके आंकने के आदी हो गए हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि महिलाओं की तकलीफ ज्यादा साफ दिखाई देती है. जब यह साफ लगता है कि महिलाएं ज्यादा तकलीफ झेलती हैं, तो हम यह जानना ही नहीं चाहते कि पुरुष अपनी जान क्यों लेते हैं. दोनों बातें सच हो सकती हैं, लेकिन हम सिर्फ एक पर विश्वास करना चाहते हैं.

अब उस बड़े आंकड़े पर आते हैं, जिसकी वजह से भारत में लोकतंत्र के तेजी से बर्बाद होने की आशंका जताई जा रही है. यह आंकड़ा चुनाव आयोग की ओर से चल रही एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाए जाने का है. सितंबर 2026 में ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ में लिखे अपने लेख में मैंने दो दूसरे आंकड़े दिए थे, जो इस आंकड़े से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं. इनसे पता चलता है कि हटाए गए नामों की संख्या वास्तव में इतनी बड़ी नहीं भी हो सकती है. भारत में करीब 45 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो देश के भीतर ही एक जगह से दूसरी जगह जाकर रहते हैं. इसके अलावा, हर साल प्राकृतिक और दूसरे कारणों से एक करोड़ तक लोगों की मौत हो जाती है. 2002-04 में हुए पिछले एसआईआर और आज के बीच कम से कम 10-12 करोड़ नागरिकों की मौत हो चुकी होगी. इनमें से ज्यादातर के नाम अब भी मतदाता सूची में हो सकते हैं, क्योंकि नाम हटाने की चिंता कोई नहीं करता. आखिर ऐसा करने की जरूरत ही क्या है, जब मर चुके लोग वोट तो दे नहीं सकते.

13 करोड़ का यह आंकड़ा पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और यहां तक कि मौजूदा और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को भी इस आशंका को लेकर उत्साहित कर रहा है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है. हाल ही में नालसर में बोलते हुए न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने दावा किया कि भारत के “लाखों और लाखों” लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है. एक अन्य पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन ने इससे भी आगे बढ़कर आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं के नाम इसलिए हटा दिए गए, ताकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जीत सके. यह पूरी तरह बेतुकी बात है. यह भी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट का एक पूर्व न्यायाधीश ऐसा कह रहा है. पहली बात, जरूरी नहीं कि हटाए गए सभी 90 लाख लोग ऐसे भारतीय नागरिक हों, जिन्हें कानूनी तौर पर वोट देने का अधिकार था. इनमें से कई लोगों की मौत हो चुकी थी या वे हमेशा के लिए दूसरी जगह जा चुके थे.

एसआईआर के दौरान नाम हटाए जाने के मौजूदा 13 करोड़ के आंकड़े में, अपील की प्रक्रिया के जरिए नाम दोबारा जुड़वाए भी जा सकते हैं. इनमें से करीब 2.8 करोड़ लोगों को मृत बताया गया, 6.3 करोड़ के हमेशा के लिए दूसरी जगह चले जाने की आशंका जताई गई और एक करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची में एक से ज्यादा बार दर्ज थे. एसआईआर सर्वे के दौरान करीब तीन करोड़ लोग अपने घरों पर नहीं मिले. देश में मौतों और काम के लिए दूसरी जगह जाने वाले लोगों के असली आंकड़ों को देखते हुए मौत और पलायन से जुड़े ये आंकड़े असामान्य नहीं हैं, लेकिन मीडिया में बार-बार उसी आंकड़े की चर्चा हो रही है, जो हर बार दोहराया जाता है: 13 करोड़ नाम हटाए गए.

इसका मतलब बिल्कुल भी यह नहीं है कि मतदाता सूची से बहुत से लोगों के नाम गलत तरीके से नहीं हटाए गए. यही वह समस्या है, जिसे ठीक करने की जरूरत है. ऐसे लोगों की संख्या कम हो सकती है. संभव है कि पूरे देश में यह संख्या 50 लाख से भी कम हो, जो मतदाताओं का आधा प्रतिशत होगा. फिलहाल मतदाताओं की कुल संख्या एक अरब से थोड़ी कम मानी जा रही है. यहां नुकसान का डर काम करता है. जिन लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है, उनकी आवाज़ उन 99 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं के मुकाबले ज्यादा नकारात्मक बातें फैलाएगी, जिनके नाम एसआईआर में नहीं हटाए गए.

चुनाव आयोग के सामने असल चुनौती यह है कि उसकी नाकामियों को कुल आंकड़ों के आधार पर नकारात्मक तरीके से पेश किया जा रहा है. भारत में अक्सर ऐसा ही होता है. आयोग को मतदाता सूची को साफ और सही रखने के लिए एक बेहतर, मजबूत और लगातार चलने वाली प्रक्रिया तैयार करनी होगी. साथ ही, जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए जाते हैं, उनके लिए शिकायत दूर करने और नाम वापस जुड़वाने की व्यवस्था भी ज्यादा मजबूत करनी होगी.

सच्चाई यह नहीं है कि चुनाव आयोग ने किसी साजिश के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटा दिए. सच्चाई यह है कि आयोग ने ऐसे देश में अपनी प्रक्रिया की मजबूती की ठीक से जांच नहीं की, जहां आंकड़े हमेशा बहुत बड़े होते हैं. जहां तक पत्रकारों की बात है, तो अब समय आ गया है कि वे आंकड़ों को समझने की अपनी क्षमता थोड़ी बेहतर करें. यह मामला चुनाव आयोग पर लगाए गए बड़े पैमाने पर मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित करने के आरोप से भी ज्यादा शर्मनाक है.

आर. जगन्नाथन ‘स्वराज्य’ पत्रिका के संपादक और पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. उनका एक्स हैंडल @TheJaggi हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

यह लेख लेखक के पर्सनल ब्लॉग से दोबारा पब्लिश किया गया है. ओरिजिनल लेख यहां पढ़ें.


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