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Thursday, 15 October, 2026
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डॉक्टर बनेंगे इंजीनियर, इंजीनियर सीखेंगे मेडिकल साइंस: IIT मद्रास की लैब में क्या हो रहा है?

IIT मद्रास के डिपार्टमेंट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ एंड टेक के ये प्रोजेक्ट्स, एक हॉस्पिटल के साथ, एक पूरे स्कूल ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ के लिए भी बेसवर्क हैं.

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चेन्नई: IIT मद्रास की एक लैब में साथ-साथ लगी दो स्क्रीन पर एक कर्सर इंसानी दिमाग के 3D मॉडल में घूमता है. PhD रिसर्चर नवीन कुमार पहले एक ट्यूमर पर निशान लगाते हैं, फिर उसके आसपास मौजूद खून की नसों और दूसरी नाजुक संरचनाओं को दिखाते हैं.

MRI स्कैन से तैयार किया गया यह मॉडल न्यूरोसर्जन को ऑपरेशन शुरू करने से काफी पहले ही ट्यूमर तक पहुंचने का सबसे सुरक्षित रास्ता तय करने और उसकी प्रैक्टिस करने में मदद करता है.

कुमार डॉक्टर नहीं हैं. उन्होंने सूरत के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) से इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. इसके बाद करीब डेढ़ साल तक टाटा मोटर्स में काम किया और फिर इंटीग्रेटेड मास्टर डिग्री और PhD करने के लिए IIT मद्रास आ गए. उनका काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और मेडिकल इमेज प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों से जुड़ा है.

एक दूसरी लैब में PhD का एक छात्र गणित के समीकरणों की मदद से यह मॉडल तैयार कर रहा है कि दिल के इलेक्ट्रिकल सिग्नल कैसे चलते हैं. इस मॉडल से उसे यह समझने में मदद मिलती है कि इन सिग्नल में गड़बड़ी होने से दिल की धड़कन अनियमित कैसे हो सकती है और अलग-अलग दवाओं का दिल पर क्या असर पड़ सकता है.

ये दोनों प्रोजेक्ट IIT के मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी विभाग से जुड़े हैं, जिसे मई 2023 में शुरू किया गया था. ये प्रोजेक्ट एक बहुत बड़े लक्ष्य की नींव भी हैं. यह लक्ष्य IIT मद्रास में मेडिकल साइंसेज का एक पूरा स्कूल स्थापित करना है, जिसके साथ एक अस्पताल भी होगा. IIT मद्रास देश के प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक है.

संस्थान के डायरेक्टर प्रोफेसर वी. कामकोटि ने पिछले हफ्ते दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “IITs को मेडिकल क्षेत्र में भी जाना चाहिए. अगर मेडिकल टेक्नोलॉजी नहीं होगी, तो हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा.”

भारत में मेडिकल सुविधाओं और डॉक्टरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में बताया कि देश के 846 मेडिकल कॉलेजों में MBBS की 1,39,864 सीटें हैं. 2014 से पहले यह संख्या 51,348 थी. यानी इसमें 172.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

लेकिन सीटों की इस बढ़ती संख्या के पीछे कुछ पुरानी और गंभीर समस्याएं भी हैं. भारत में दुनिया के किसी भी दूसरे देश के मुकाबले ज्यादा मेडिकल कॉलेज हैं. यहां हर साल करीब 1 लाख से 1.3 लाख MBBS ग्रेजुएट निकलते हैं, लेकिन कई संस्थानों में नई खोजों और व्यावहारिक जरूरतों पर आधारित पढ़ाई की कमी है.

IIT मद्रास के मेडिकल साइंसेज एंड इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर आर. कृष्ण कुमार ने सवाल किया, “क्या भारत में मेडिकल की पढ़ाई डॉक्टरों को उन समस्याओं से निपटने के लिए तैयार करती है, जिनके लिए नए वैज्ञानिक तरीकों, टेक्नोलॉजी और उपकरणों की जरूरत होती है?”

उन्होंने कहा कि यह समस्या बहुत पहले ही शुरू हो जाती है. इसकी शुरुआत इस बात से होती है कि बच्चों को अपनी पढ़ाई का क्षेत्र चुनने के लिए कैसे कहा जाता है.

उन्होंने कहा, “स्कूल में ही छात्रों से कहा जाता है कि वे डॉक्टर बनना चाहते हैं या इंजीनियर. मुझे लगता है कि इस बंटवारे ने तरक्की को नुकसान पहुंचाया है.”

प्रोफेसर कुमार 25 साल से ज्यादा समय से डॉक्टरों के साथ काम कर रहे हैं. वह मेडिकल साइंस को तीन स्तरों वाली सीढ़ी की तरह समझाते हैं.

सबसे निचले स्तर पर सेलुलर फिजियोलॉजी है, जहां गणित की मदद से यह समझा जा सकता है कि कोशिकाएं कैसे काम करती हैं. बीच के स्तर पर फंक्शनल फिजियोलॉजी है, जिसमें खून के बहाव जैसी चीजों को मापा जाता है और मेडिकल जांच में उनके नतीजे दर्ज किए जाते हैं. सबसे ऊपर क्लिनिकल फिजियोलॉजी है, जहां डॉक्टर इन नतीजों के आधार पर मरीज के इलाज से जुड़ा फैसला लेते हैं.

उन्होंने कहा, “इस देश में वह बुनियादी कड़ी ही मौजूद नहीं है, जो कोशिकाओं के कामकाज को समझने वाली फिजियोलॉजी को अस्पतालों में मरीजों के इलाज से जोड़ती है.”

प्रोफेसर कुमार ने कार का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि BMW चलाने वाले व्यक्ति को ड्राइविंग लाइसेंस और गाड़ी चलाने की कला की जरूरत होती है, लेकिन इंजन और स्टीयरिंग का डिजाइन किसी और ने बनाया होता है.

इसी तरह डॉक्टर मरीज तक इलाज पहुंचाने वाली आखिरी कड़ी होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे हर उपकरण को खुद डिजाइन करें.

दवाओं के मामले में फार्माकोलॉजिस्ट होते हैं, जो यह अध्ययन करते हैं कि शरीर कैसे काम करता है और उसी के हिसाब से दवाएं तैयार करते हैं. लेकिन उनके मुताबिक, मेडिकल उपकरणों के क्षेत्र में ऐसे विशेषज्ञ नहीं हैं. इंजीनियर उपकरण बनाते हैं और डॉक्टर उनका इस्तेमाल करते हैं. लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं, जिन्हें दोनों क्षेत्रों की इतनी अच्छी समझ हो कि वे शरीर की जरूरतों के हिसाब से उपकरण डिजाइन कर सकें.

उन्होंने कहा कि इस कमी का असर ऑपरेशन थिएटर में भी दिखाई देता है.

उन्होंने कहा, “मैं चाहूंगा कि ऐसे इंजीनियर अस्पतालों में काम करें, जिन्हें शरीर के काम करने के तरीके की समझ हो. साथ ही, ऐसे डॉक्टर भी हों जो जानते हों कि इंजीनियरों से क्या सवाल पूछने हैं और उनसे क्या मदद लेनी है.”

उन्होंने कहा कि विभाग में चल रहे प्रोजेक्ट दिखाते हैं कि इन दोनों क्षेत्रों के बीच ऐसी कड़ी कैसे बनाई जा सकती है.

Naveen Kumar, a PhD researcher who trained as an electrical engineer, works on a 3D brain model built from MRI scans | Sneha Richhariya/ThePrint
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले PhD रिसर्चर नवीन कुमार MRI स्कैन से तैयार किए गए दिमाग के 3D मॉडल पर काम करते हुए | स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

‘कंप्यूटर पर मरीज का इलाज करना’

यहां कई दूसरे बड़े और नए विचारों पर भी काम हो रहा है. इनमें से एक है डिजिटल ट्विन. यह किसी खास मरीज के शरीर के काम करने के तरीके के आधार पर कंप्यूटर पर तैयार की गई उसकी एक डिजिटल कॉपी होती है. इसमें सिर्फ सामान्य डेटा ही नहीं, बल्कि शरीर के अंदर होने वाले काम, उनके पीछे के तरीके और भौतिक व रासायनिक प्रक्रियाओं को भी शामिल किया जाता है.

डिजिटल ट्विन प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए प्रोफेसर कुमार ने कहा, “पांच साल के अंदर अच्छे अस्पतालों में सिमुलेशन के विशेषज्ञ काम करेंगे. डॉक्टर वार्ड में मरीज का इलाज करने से पहले कंप्यूटर पर ही उसका इलाज करके देख सकेंगे.”

प्रोफेसर कामकोटि ने कहा कि कोविड-19 के दौरान भारत के अपने वैक्सीन अनुभव ने दिखाया कि देश में अपनी तकनीक और क्षमता होने से स्वास्थ्य सेवाओं को कितना फायदा हो सकता है.

उन्होंने कहा, “IITs और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस को ऐसे मेडिकल प्रोग्राम शुरू करने चाहिए, जिनमें डॉक्टरों को इंजीनियरिंग के सिद्धांत सिखाए जाएं. दोनों क्षेत्रों को केवल खास रिसर्च प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं रखना चाहिए.”

दिल के मॉडल बनाने से लेकर AI से कैंसर का पता लगाने तक

विभाग की लैब में घूमने पर प्रोफेसर कामकोटि की बात को समझना आसान हो जाता है. यहां रिसर्च करने वाले लोग अपने काम के बारे में बताने के लिए उत्साहित रहते हैं.

यहां जिन डॉक्टरों को गणित की बुनियादी बातें सिखाई जा रही हैं, उनमें डॉ. जोसन मैथ्यू भी शामिल हैं. वह इस विभाग में PhD कर रहे हैं. उन्होंने भारत में मेडिकल की पढ़ाई की है और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की है. वह एक ऐसे मॉडल पर काम कर रहे हैं, जो किसी खास मरीज की किडनी के काम करने के तरीके को दिखाता है.

उनका गणितीय मॉडल यह बताता है कि हार्ट फेल होने के दौरान किडनी कैसे काम करती है.

विभाग के एक दूसरे छात्र विट्ठल राव अलग-अलग मरीजों के दिल के कंप्यूटर मॉडल तैयार कर रहे हैं. उनका मकसद यह समझना है कि दिल की बनावट उसके इलेक्ट्रिकल सिग्नल को कैसे प्रभावित करती है और ये सिग्नल इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) में कैसे दर्ज होते हैं.

इन मॉडलों से डॉक्टरों को दिल की धड़कन अनियमित होने के कारण समझने और यह अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी मरीज का दिल इलाज पर कैसी प्रतिक्रिया देगा.

यहां सारा काम कंप्यूटर स्क्रीन पर नहीं होता. कुछ गलियारों में आगे इसी सोच को जीवित कोशिकाओं और टिश्यू पर लागू किया जाता है. यहां यह पता लगाने की कोशिश होती है कि किसी दवा का असर मरीज को देने से पहले ही देखा जा सकता है या नहीं.

यहां रिसर्च करने वाले लोग ऑर्गेनॉइड्स पर काम कर रहे हैं. ये कोशिकाओं से लैब में तैयार की गई बहुत छोटी, तीन आयामी संरचनाएं होती हैं, जो इंसानी टिश्यू की कुछ खास विशेषताओं को दोहराती हैं.

Dr Joson Mathew, a doctor who studied medicine in India and did a postgraduate degree at University College London, is now a PhD student in the department. He is building a patient-specific model of how the kidney functions during heart failure, using tools like linear algebra and probability that are not typically part of a medical degree | Sneha Richhariya/ThePrint
डॉ. जोसन मैथ्यू ने भारत में मेडिकल की पढ़ाई की और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की. वह अब इस विभाग में PhD कर रहे हैं. वह लीनियर अलजेब्रा और प्रोबेबिलिटी जैसे गणितीय तरीकों का इस्तेमाल करके यह मॉडल तैयार कर रहे हैं कि हार्ट फेल होने पर किसी खास मरीज की किडनी कैसे काम करती है. आमतौर पर मेडिकल की डिग्री में ये विषय नहीं पढ़ाए जाते | स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

कैंपस में सेल बायोलॉजिस्ट डॉ. गौतम शंकर नारायण, दोबारा प्रोग्राम की गई वयस्क कोशिकाओं से दिल के छोटे-छोटे टिश्यू तैयार कर रहे हैं, जिन्हें ऑर्गेनॉइड्स कहा जाता है. इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व डॉ. अनबुमा राजन कर रही हैं, जो बायलर मेडिकल स्कूल से प्रशिक्षित स्टेम सेल विशेषज्ञ हैं. ये तीन आयामी संरचनाएं असली अंग की कुछ विशेषताओं की नकल करती हैं.

डॉ. नारायण ने कहा, “ऐसे मॉडल की मदद से दवाओं की जांच के शुरुआती चरणों में संभावित इलाज को परखा जा सकता है. इससे आगे होने वाली महंगी जांच से पहले ही कुछ जानकारी मिल सकती है. सिद्धांत के तौर पर, किसी मरीज की अपनी कोशिकाओं से तैयार किए गए ऑर्गेनॉइड्स यह दिखा सकते हैं कि उसका शरीर किसी दवा पर कैसी प्रतिक्रिया देगा.”

उन्होंने बताया कि रिसर्च करने वाले लोग इन टिश्यू में हार्ट फेल होने जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं और फिर जांच सकते हैं कि कोई दवा दिल की धड़कन को बेहतर बनाती है या नहीं.

उन्होंने कहा कि लंबे समय में इस काम का लक्ष्य जानवरों पर होने वाले प्रयोगों को कम करना है. इसके लिए इंसानों पर दवाओं का परीक्षण करने से पहले लैब में इंसानी कोशिकाओं और टिश्यू पर उनके असर का अध्ययन किया जाएगा.

दुनियाभर में रिसर्च करने वाले लोग ऑर्गेनॉइड्स और इंसानों पर आधारित दूसरे मॉडलों का अध्ययन कर रहे हैं. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि दवाओं की जांच से मिलने वाले नतीजे यह बेहतर तरीके से दिखाएं कि दवाएं इंसानी शरीर में कैसे काम करती हैं.

सितंबर 2026 में अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने एक नियम जारी किया. इसके मुताबिक, जहां उचित हो, वहां दवाओं की सुरक्षा जांचने के लिए मान्यता प्राप्त ऐसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है जिनमें जानवरों की जरूरत नहीं होती. इनमें कोशिकाओं पर आधारित जांच और कंप्यूटर मॉडल शामिल हैं. नियामक प्रक्रिया के अधीन यह नियम फरवरी 2027 में लागू होना है.

अगर ऑर्गेनॉइड्स की मदद से लैब में जीवित टिश्यू के काम करने के तरीके का अध्ययन किया जा सकता है, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मेडिकल तस्वीरों की मदद से बीमारियों को समझने का एक और तरीका देता है.

IIT मद्रास की हेल्थ इन्फॉर्मेटिक्स एंड इमेजिंग लैब में 26 साल के वैज्ञानिक चिन्मय राउत, मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर प्रदीबा श्रीधर के साथ काम कर रहे हैं. वे भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की मदद से ब्रेस्ट कैंसर की मेडिकल तस्वीरों का विश्लेषण करने से जुड़ी रिसर्च कर रहे हैं.

राउत ने 2023 में IIT मद्रास से इंजीनियरिंग डिजाइन में डुअल डिग्री पूरी की थी. इसमें उन्होंने बायोमेडिकल डिजाइन में विशेषज्ञता हासिल की. इसके बाद उन्होंने इलेक्ट्रिक स्कूटर बनाने वाली कंपनी एथर एनर्जी में कुछ समय काम किया और फिर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी रिसर्च में आ गए.

इस बदलाव के लिए उन्हें सिर्फ कंप्यूटर की जानकारी से ज्यादा सीखना पड़ा.

उन्होंने कहा, “शरीर की बनावट के बारे में पढ़ना बहुत जरूरी है.”

इंजीनियरिंग के छात्रों को इंसानी शरीर की बनावट सिखाने के लिए विभाग एक आर्टिफिशियल कैडवर का इस्तेमाल करता है. इससे छात्रों को उस शरीर को समझने में मदद मिलती है, जिसका वे कंप्यूटर मॉडल तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं.

राउत का प्रोजेक्ट उस सवाल पर केंद्रित है, जिसका सामना डॉक्टरों को ब्रेस्ट कैंसर का इलाज करते समय करना पड़ता है: क्या कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल गया है?

कैंसर के इस तरह फैलने को मेटास्टेसिस कहा जाता है. इससे इलाज से जुड़े फैसले प्रभावित हो सकते हैं. डॉक्टर लिम्फ नोड्स की जांच के लिए अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन कैंसर फैला है या नहीं, इसकी पुष्टि करने के लिए बायोप्सी की जाती है. इसमें टिश्यू का एक नमूना लेकर उसकी जांच की जाती है.

राउत और श्रीधर एक ऐसा AI मॉडल तैयार कर रहे हैं, जो अल्ट्रासाउंड की तस्वीरों का विश्लेषण करके यह अनुमान लगा सके कि कैंसर के दूसरे हिस्सों तक फैलने की आशंका है या नहीं.

मॉडल को ट्रेन करने के लिए रिसर्च करने वाले लोग ‘ग्राउंड ट्रुथ’ का इस्तेमाल करते हैं. इसमें कैंसर वाले और कैंसर नहीं होने वाले मरीजों की बायोप्सी की तस्वीरें संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं. हर अल्ट्रासाउंड तस्वीर को बायोप्सी के नतीजे से जोड़ा जाता है.

मॉडल इन लेबल वाली तस्वीरों से कैंसर से जुड़े पैटर्न पहचानना सीखता है. इसके बाद वह इन पैटर्न का इस्तेमाल नई तस्वीरों के बारे में अनुमान लगाने के लिए करता है.

टीम ने एक फाउंडेशन मॉडल तैयार करने के लिए ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध करीब 55,000 अल्ट्रासाउंड तस्वीरों का इस्तेमाल किया. यह मॉडल ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड की तस्वीरों में मौजूद सामान्य विशेषताओं को सीखता है.

इसके बाद टीम ने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के करीब 200 मरीजों की लगभग 400 तस्वीरों का इस्तेमाल करके अपने तरीके की जांच की. इन मरीजों के बायोप्सी के नतीजे उपलब्ध थे, जिनसे यह पुष्टि की जा सकती थी कि कैंसर फैला था या नहीं.

मॉडल की सटीकता करीब 74 प्रतिशत रही.

प्रोफेसर श्रीधर ने कहा, “80 प्रतिशत से ज्यादा सटीकता को अच्छा माना जाता है.”

हालांकि, इस मॉडल की कुछ सीमाएं भी हैं. जिन मरीजों की बायोप्सी होती है, जरूरी नहीं कि वे ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हों. इसके अलावा, इस्तेमाल किए गए डेटा में ऐसे मामलों का अनुपात काफी ज्यादा है, जिनमें कैंसर फैल चुका है.

इस वजह से यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि बीमारी के अलग-अलग चरणों और अलग-अलग तरह के मरीजों में यह मॉडल कितनी भरोसेमंद तरीके से काम करेगा.

रिसर्च करने वाले लोग ऐसे तरीके तलाश रहे हैं, जिनसे रेडियोलॉजिस्ट को सिर्फ अनुमान ही नहीं, बल्कि यह भी बताया जा सके कि मॉडल अपने अनुमान को लेकर कितना आश्वस्त है.

आखिरकार, इस टूल का मकसद डॉक्टरों को मरीज के इलाज से जुड़े फैसले लेने में मदद करना होगा.

यह प्रोजेक्ट मेडिकल AI से जुड़ी एक बड़ी चुनौती को भी दिखाता है. सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कई डेटा सेट पश्चिमी देशों की आबादी से लिए गए हैं. ऐसे डेटा पर ट्रेन किए गए मॉडल भारतीय मरीजों के लिए उतने अच्छे तरीके से काम नहीं कर सकते.

राउत ने कहा, “AIIMS के डेटा का इस्तेमाल करने से रिसर्च करने वाले लोग भारतीय मरीजों पर अपने तरीके की जांच कर सकते हैं. हालांकि, यह साबित करने के लिए कि यह तरीका इलाज में कितना उपयोगी है, और बड़े और अलग-अलग तरह के मरीजों को शामिल करने वाले अध्ययनों की जरूरत होगी.”

The department uses an artificial cadaver, a touch-enabled anatomy table, to teach engineering students the human body they are trying to model | Sneha Richhariya/ThePrint
विभाग इंजीनियरिंग के छात्रों को इंसानी शरीर की बनावट सिखाने के लिए एक आर्टिफिशियल कैडवर यानी टच स्क्रीन वाली एनाटॉमी टेबल का इस्तेमाल करता है. इससे छात्र उस शरीर को समझ पाते हैं, जिसका वे मॉडल तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं | स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

डॉक्टर गणित सीखते हैं, इंजीनियर मेडिकल साइंस 

राउत का इलेक्ट्रिक स्कूटर से सोनोग्राम की रिसर्च तक पहुंचना इस विभाग की सोच को दिखाता है. प्रोफेसर कुमार ने समझाया, “डॉक्टर और इंजीनियर एक-दूसरे के क्षेत्र की इतनी जानकारी सीख सकते हैं कि वे एक ही समस्या पर मिलकर काम कर सकें.”

पढ़ाई के तरीके के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस विभाग में इंजीनियरिंग के छात्र फिजियोलॉजी और एनाटॉमी जैसे विषय पढ़ते हैं. वहीं, डॉक्टरों को फिजियोलॉजिस्ट के लिए गणित और शरीर के काम करने वाले सिस्टम के लिए मशीन लर्निंग जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं.

डॉ. मैथ्यू भी ऐसे ही छात्रों में शामिल हैं. लीनियर अलजेब्रा और प्रोबेबिलिटी जैसे नए टूल आमतौर पर मेडिकल की डिग्री का हिस्सा नहीं होते.

प्रोफेसर कुमार ने कहा कि इन कोर्स को छात्रों के अलग-अलग रिसर्च प्रोजेक्ट के हिसाब से तैयार किया जाता है.

उन्होंने कहा, “हम उनसे इंजीनियरिंग का पूरा पाठ्यक्रम पढ़ने की उम्मीद नहीं कर सकते.”

डॉक्टरों को सिखाया जाता है कि शरीर के काम करने के तरीके से जुड़े किसी सवाल को गणित के सवाल में कैसे बदला जाए और फिर उसके जवाब को कैसे समझा जाए.

उन्होंने कहा कि इसके बीच होने वाली मुश्किल गणनाओं का काम सॉफ्टवेयर से कराया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि विभाग में दो ऐसे डॉक्टर हैं, जिनके पास MD की डिग्री है और जो पूरा समय रिसर्च पर काम कर रहे हैं. इनमें से एक डायबिटीज के मरीजों के डिजिटल ट्विन तैयार कर रहे हैं.

एक-दूसरे से सीखने का सिलसिला जारी रखने के लिए छात्र और रिसर्च करने वाले लोग अनौपचारिक क्लास के जरिए अपने-अपने विषयों के बारे में एक-दूसरे को समझाते हैं.

औपचारिक कोर्स में क्विज और सेमेस्टर के अंत में परीक्षाएं होती हैं. कुछ कोर्स में छात्रों को असली डेटा सेट के साथ काम करना और रिसर्च पेपर में बताए गए तरीकों को लागू करना भी होता है.

हालांकि, इस योजना को लेकर कुछ लोगों को संदेह भी है.

आलोचकों का कहना है कि IIT मद्रास को अलग तरह की जरूरतों वाले क्षेत्र में जाने के बजाय अपनी मौजूदा खूबियों को और मजबूत करना चाहिए.

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) और कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Caltech) जैसे संस्थान अपने मेडिकल स्कूल चलाने के बजाय मेडिकल स्कूलों के साथ साझेदारी करते हैं.

आलोचकों ने यह भी चेतावनी दी कि डॉक्टरों को ट्रेनिंग देना, मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, नियमों का पालन करना और अस्पताल चलाना जैसे काम संस्थान के नेतृत्व का समय और संसाधन उसकी मुख्य रिसर्च से दूर कर सकते हैं.

प्रोफेसर कुमार ने इस सोच से असहमति जताई.

उन्होंने कहा, “आज की रिसर्च में अलग-अलग क्षेत्रों की जानकारी होना गहराई से अध्ययन करने के उलट नहीं है. मुश्किल समस्याओं को गहराई से समझने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की जानकारी होना जरूरी है.”

उन्होंने कहा कि आज मेडिकल क्षेत्र में इमेजिंग से लेकर AI तक हर जगह टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में संस्थानों को भी समय के साथ बदलना होगा.

उन्होंने कहा कि मेडिकल स्कूल की योजना पहले से तय रास्ते पर अगला कदम है, न कि अचानक लिया गया कोई बड़ा फैसला.

उन्होंने बताया कि दूसरे संस्थानों के साथ साझेदारी और समझौता ज्ञापन (MoU) उपयोगी होते हैं, लेकिन इनसे हमेशा दोनों क्षेत्रों का गहरा मेल नहीं हो पाता.

उनके मुताबिक, दोनों क्षेत्रों के बीच ज्यादा करीबी संबंध होने से डॉक्टर खुद रिसर्च करने वाले बन सकते हैं. वे रिसर्च से जुड़े सवाल तैयार कर सकते हैं और शुरू से लेकर आखिर तक इंजीनियरों के साथ काम कर सकते हैं. ऐसा नहीं होगा कि किसी खास प्रोजेक्ट की जरूरत पड़ने पर ही डॉक्टर और इंजीनियर एक-दूसरे से मिलें.

मेडिकल स्कूल क्यों जरूरी है?

अगर डॉक्टर और इंजीनियर पहले से ही एक-दूसरे के क्षेत्र की भाषा सीख सकते हैं, तो IIT मद्रास को अपना अस्पताल बनाने की जरूरत क्यों है?

प्रोफेसर कुमार ने बताया कि विभाग पहले से ही सात अस्पतालों के साथ मिलकर काम कर रहा है. लेकिन किसी अस्पताल के साथ मिलकर काम करना और अपना अलग अस्पताल होना, दोनों अलग बातें हैं.

किसी निजी अस्पताल में काम करने वाला डॉक्टर अपनी दिलचस्पी के कारण विभाग के साथ काम कर सकता है. लेकिन उसकी पूरी समय की नौकरी कहीं और मरीजों का इलाज करना है.

उन्होंने कहा, “अगर कोई हृदय रोग विशेषज्ञ आज की मीटिंग में नहीं आता है, तो मैं उससे सवाल नहीं कर सकता. मैं सिर्फ उससे आने का अनुरोध कर सकता हूं.”

उन्होंने तर्क दिया कि मेडिकल स्कूल बनने से ऐसे डॉक्टर मिलेंगे, जिनके पास रिसर्च के लिए अलग से समय होगा.

उन्होंने कहा, “दूसरी जगहों पर पहले अस्पताल और मेडिकल कॉलेज होता है और फिर रिसर्च शुरू होती है. हमें लगता है कि मेडिकल कॉलेज शुरू करने से पहले ही मेडिकल रिसर्च शुरू कर देनी चाहिए.”

उन्होंने आगे कहा कि विभाग में प्रकाशित होने वाले रिसर्च पेपर ही अमेरिका के मेयो क्लिनिक जैसे संस्थानों को उनके साथ काम करने के लिए आकर्षित करते हैं.

उन्होंने कहा कि इसका मकसद 150 MBBS सीटों वाला एक और मेडिकल कॉलेज बनाना नहीं है.

उन्होंने कहा कि असली बात यह है कि इंजीनियरिंग के माहौल में पढ़ने के बाद एक मेडिकल छात्र की सोच कैसे बदलती है.

उनके मुताबिक, डॉक्टर कई बार बड़े जोखिम उठाते हैं, लेकिन उनका काम तय नियमों और प्रक्रियाओं से चलता है.

उन्होंने कहा, “हमें उन 90 प्रतिशत मामलों की चिंता नहीं है, जिनका इलाज सामान्य तरीके से हो जाता है. असली जरूरत उन मुश्किल 10 प्रतिशत मामलों के लिए अलग तरह की ट्रेनिंग की है, जहां इलाज का कोई तय तरीका लागू नहीं होता.”

प्रोफेसर कामकोटि ने कहा कि प्रस्तावित अस्पताल में प्राथमिक और द्वितीयक स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं दी जाएंगी. इसके साथ ही रिसर्च करने वाले लोग तृतीयक स्तर के इलाज से जुड़ी समस्याओं पर भी काम करेंगे.

उन्होंने तर्क दिया कि स्वास्थ्य व्यवस्था के हर स्तर पर काम करने का अनुभव मिलने से डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मेडिकल टेक्नोलॉजी को किन-किन समस्याओं का समाधान करना है.

उन्होंने बताया कि जरूरी मंजूरियां हासिल करने के लिए वह भारत की मेडिकल नियामक संस्था नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के संपर्क में हैं.

उन्होंने कहा, “हमें इसे शुरू करना ही है. इस बारे में कोई दूसरा विचार नहीं है.”

नोट: इस रिपोर्टर ने इंस्टीट्यूशन के बुलावे पर IIT मद्रास का दौरा किया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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