जूट मिलों में काम करने वाले मजदूरों को ट्रकों में भरकर पहले के कलकत्ता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड लाया गया था. उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के आखिरी सूर्यास्त के मौके पर अपनी भूमिका निभानी थी. वे अपनी नई सरकार के शासकों को लेकर आने वाली हर कार का स्वागत तालियां बजाकर कर रहे थे. जैसे-जैसे आधी रात करीब आई, उत्साहित भीड़ ने गवर्नमेंट हाउस के दरवाजों पर तैनात पहरेदारों को पीछे धकेल दिया और बड़े-बड़े झूमरों वाले सिंहासन कक्ष में इकट्ठा हो गई. यह राज की सबसे अंदरूनी और खास जगह थी. आखिरी औपनिवेशिक गवर्नर फ्रेड बरोज कर्मचारियों के लिए बनी सीढ़ियों और पिछले दरवाजे से चुपचाप बाहर निकल गए. उन्होंने अपने उत्तराधिकारी सी. राजगोपालाचारी को अचानक आए मेहमानों के बीच छोड़ दिया.
अगली सुबह अमृत बाजार पत्रिका ने खबर छापी, “भाइयों के बीच खून-खराबा अचानक खत्म हुआ.” 1946 के ग्रेट कलकत्ता हत्याकांड के बाद पहली बार कोई हिंसा नहीं हुई थी. हिंदू और मुसलमान सड़कों पर एक साथ जश्न मना रहे थे.
आज जब नागरिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि भारतीयों से पढ़ने, बोलने और यहां तक कि जंतर-मंतर के पास खड़े होने का अधिकार कैसे छिन गया, तो इसके बाद जो हुआ, वह बहुत अहम है. गवर्नमेंट हाउस में हुए जश्न के तीन महीने बाद किसान उसी सड़क से गुजरते हुए प्रदर्शन करने निकले. वे खाने की भारी कमी और राशन व्यवस्था के पूरी तरह बिगड़ जाने के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे.
उनके इंतज़ार में लाठियां और आंसू गैस थी. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पीसी घोष ने कहा कि उनकी सरकार “हर कीमत पर अव्यवस्था को रोकेगी.”
इतिहासकार शेखर बंद्योपाध्याय ने व्यंग्य करते हुए लिखा है, “कुछ महीने पहले जिस राजनीतिक कार्रवाई की तारीफ सत्याग्रह के तौर पर की जाती, उसे अब ‘अव्यवस्था’ कहा जाने लगा.”
राज फिर से लौट आया था.
पिछले हफ्ते देश की राजधानी को दीवारों और बैरिकेड से घेर दिया जाना अपने बड़े पैमाने के कारण कोई खास बात नहीं थी. 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने से पहले वहां 40,000 केंद्रीय पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था. इनके अलावा सेना और राज्य पुलिस भी मौजूद थी. दो साल पहले मणिपुर में करीब 29,000 सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे. प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस्तेमाल की गई ताकत भी कोई असाधारण बात नहीं थी. इस मामले में सबसे खराब रिकॉर्ड अब भी 2016 में हरियाणा में हुई हिंसा के नाम है, जब पुलिस और सेना की गोलीबारी में 14 लोगों की मौत हो गई थी. किसी घटना को रोकने के नाम पर लोगों को हिरासत में लेना भी कोई नई बात नहीं है. सिख कट्टरपंथी नेता अमृतपाल सिंह को बिना किसी आरोप के तीन साल तक हिरासत में रखा गया था.
आखिर दमन इतना आम कैसे हो गया?
टुकड़ों में बंटी ज़मीन
एक पेड़ से बिना सिर का शव लटक रहा था. गर्दन के बचे हुए हिस्से पर एक तख्ती रखी थी, जिस पर लिखा था, “हबीब को पाकिस्तान मिल गया.” हबीबुर रहमान, जिसे दोस्त और दुश्मन दोनों ‘हबू’ कहते थे, शराब पीने वाला एक खूंखार गैंगस्टर था. लालबागान बस्ती में उसका राज चलता था और वह वहां का अघोषित लीडर था. इतिहासकार नारीआकी नाकाजातो के मुताबिक, 1937 से मुस्लिम लीग के संरक्षण में उसका दबदबा बढ़ा. वह परिवहन का कारोबार चलाता था और पेट्रोलियम की तस्करी करता था. इन कामों से मिलने वाले पैसे से पार्टी सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखती थी. अगस्त 1946 में हुए ग्रेट कलकत्ता हत्याकांड में उसकी अहम भूमिका थी. इस हिंसा में हज़ारों लोगों की जान गई थी. ग्रे स्ट्रीट और चितपुर रोड के चौराहे पर हुई सड़क की लड़ाई में उसकी मौत हो गई.
फोटोग्राफर मार्गरेट बॉर्क-व्हाइट की तस्वीरों में गिद्धों को मृतकों के शवों को नोचकर खाते हुए दिखाया गया है. इन तस्वीरों से साफ होता है कि आजादी के समय शहर में सड़ते शवों और मल की बदबू फैली हुई थी. यह उस रातरानी की खुशबू जैसा नहीं था, जो गर्मी का मौसम खत्म होने पर शरद ऋतु में पूरे शहर को महका देती है.
नए देश के नेताओं को पता था कि उसका बच पाना बिल्कुल तय नहीं है. 15 अगस्त के जश्न के दो हफ्ते भी नहीं बीते थे कि कांचरापाड़ा में सांप्रदायिक हिंसा शुरू हो गई. हिंदू संगठनों ने एक मस्जिद के सामने संगीत बजाया था, जिसके बाद हिंसा भड़क गई. पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई. अगले दिन फिर दंगे भड़क उठे. एमके गांधी का बहुत बड़ा नैतिक प्रभाव था. उनके भूख हड़ताल पर बैठने से दोनों समुदायों के नेताओं को शर्मिंदगी महसूस हुई और उन्होंने शांति बनाए रखने का वादा किया. हालांकि, 1949 के आखिर से पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा शुरू हुई, जिससे फिर बड़े पैमाने पर खून-खराबा हुआ.
1948 से भारतीय राज्य को विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा. पाकिस्तान सेना के अधिकारियों की अगुवाई वाले अनियमित सशस्त्र समूहों ने कश्मीर पर हमला किया. इससे एक ऐसा संघर्ष शुरू हुआ, जिसका अब तक कोई हल नहीं निकला है. तेलंगाना में भारतीय सेना और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लड़ाकों के बीच लंबी और बेहद खूनी लड़ाई चली.
पश्चिम बंगाल में कई जगहों पर औद्योगिक हिंसा भड़क उठी. 1949 में कम्युनिस्टों के एक कट्टरपंथी गुट ने हमला किया, जिसमें तीन ब्रिटिश मैनेजरों को जिंदा जला दिया गया. गांवों में भी झड़पें हुईं, क्योंकि बीमारियों और खाने की कमी ने लोगों की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी थीं. पूंजी के देश से बाहर चले जाने और अराजकता फैलने के खतरे को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने सख्ती से कार्रवाई की. पश्चिम बंगाल सुरक्षा कानून, 1948 के तहत सैकड़ों लोगों को एहतियात के तौर पर गिरफ्तार किया गया. जब इस कानून को रद्द कर दिया गया, तो भारत के नए शासकों ने 1930 में बनाए गए कानून का सहारा लिया.
कमजोर कर दिया गया लोकतंत्र
औपनिवेशिक शासन से निकलकर भारत एक संकट के दौर में पहुंचा था. ऐसे में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने तेज़ी से वे अधिकार अपने हाथ में लेने शुरू कर दिए, जिनकी उसे ज़रूरत महसूस हो रही थी, लेकिन संविधान सभा के कई सदस्य खुद भी पहले इन अधिकारों के दुरुपयोग का शिकार हो चुके थे. इस मुद्दे पर तीखी बहस के बाद संविधान सभा ने मनमाने तरीके से गिरफ्तारी से बचाने वाले संवैधानिक अधिकारों में कुछ छूट दे दी. संविधान लागू होने के एक महीने से भी कम समय बाद संसद ने निवारक नजरबंदी कानून, 1950 पास कर दिया. इसके साथ ही गणराज्य के केंद्र में अंग्रेजों के शासन के समय का दमनकारी ढांचा फिर से आ गया. वी. कृष्ण अनंत ने लिखा है कि इस कानून को एक साल तक लागू रखने का इरादा था, लेकिन यह 1969 तक लागू रहा.
हर कोई इस बात से सहमत नहीं था कि खतरा इतना बड़ा है कि ऐसे कदम उठाने ज़रूरी हैं. इंटेलिजेंस ब्यूरो के पहले निदेशक टीजी संजीवी को शक था कि कम्युनिस्टों की कोई बड़ी साजिश चल रही है. उनके मुताबिक, जिस गतिविधि को क्रांतिकारी बताया जा रहा था, वह असल में भ्रष्टाचार और खराब प्रशासन के खिलाफ स्थानीय लोगों की शिकायतों का नतीजा थी.
आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने का कानून (MISA) 1971 में लागू हुआ. इसके पीछे दलील दी गई कि युवाओं के बीच माओवादी आंदोलन का असर बढ़ रहा है.
संसद के एक सदस्य ने कहा, “लाइब्रेरी में आग लगाई जा रही है. राष्ट्रीय नेताओं की मूर्तियों और तस्वीरों को नष्ट किया जा रहा है…हथियार और गोलियां छीनी जा रही हैं…यहां तक कि पुलिसकर्मियों की भी हत्या की जा रही है.”
चार साल बाद सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को दबाने के लिए MISA का इस्तेमाल विपक्ष के खिलाफ किया गया. हालांकि, 1977 में इंदिरा गांधी की हार के बाद आई नई सरकार ने भी इस कानून को कुछ मामूली बदलावों के साथ बनाए रखा. हर पार्टी ने सत्ता से बाहर होने के बाद दमनकारी कानूनों की शिकायत की है, लेकिन किसी ने भी इन्हें खत्म नहीं किया.
पूर्व सैनिक महावीर त्यागी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में ब्रिटिश भारतीय सेना से इस्तीफा दिया था, जिसके बाद उनका कोर्ट मार्शल किया गया था. बाद में उन्हें भारत रक्षा नियमों के तहत भी कई बार हिरासत में रखा गया. जब निवारक नजरबंदी से जुड़े प्रस्ताव पास किए जा रहे थे, तब उन्होंने खड़े होकर बीआर आंबेडकर को फटकार लगाई.
उन्होंने कहा, “डॉ. आंबेडकर मुझे माफ करेंगे, जब मैं अपनी यह इच्छा जाहिर करता हूं कि काश, उन्हें और मसौदा समिति के दूसरे सदस्यों को भी जेल में नजरबंद रहने का अनुभव मिला होता.”
1946 में संविधान सभा में त्यागी ने कहा था, “कस रहे हैं अपनी मिंकारों से हल्का-हल्का” यानी “पक्षी अपनी ही चोंच से शिकारी के जाल को अपने चारों ओर कस रहे हैं.”
रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर मंडराता खतरा
लियो स्ट्रॉस अमेरिका के जाने-माने दर्शनशास्त्र के इतिहासकार थे. वह 1937 में एडोल्फ हिटलर के जर्मनी से बचकर निकल गए थे. उन्होंने तर्क में होने वाली एक गलती के बारे में चेतावनी दी थी. सत्ता और मूल्यों के बीच संबंध पर किसी भी चर्चा के बाद, उन्होंने कहा था, “हम अनिवार्य रूप से एक ऐसे बिंदु पर पहुंच जाएंगे, जहां हिटलर की छाया के कारण सब कुछ अंधेरे में डूब जाएगा.”
भारत के उदारवादी लोगों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका भी कुछ ऐसी ही है. वे उन्हें भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने वाली फासीवादी सोच का चेहरा मानते हैं. इससे पहले की पीढ़ी के लिए आपातकाल ने इंदिरा गांधी को फासीवादी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण बना दिया था.
यूरोप में फासीवाद की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के बाद आए बड़े संकट से हुई थी. इसने राज्य और समाज की बुनियादी व्यवस्था को बदल दिया था. इसके उलट, भारत में तानाशाही सोच एक रूढ़िवादी ताकत थी, जो पहले से चले आ रहे सामाजिक ढांचे को बनाए रखना चाहती थी. नए गणराज्य पर अराजकता हावी होने का खतरा था. ऐसे में देश के नए शासकों ने अंग्रेज़ों के शासन से मिली एक अहम विरासत को अपना लिया: राज्य की ताकत का इस्तेमाल करके लोगों को दबाने के तरीके.
1952 के आखिर में नेहरू ने संसद में निवारक नजरबंदी पर चल रही बहस को खत्म करते हुए कहा, “ऐसे कई मामले थे, जिनमें इस कानून का गलत इस्तेमाल किया गया. या अगर आप चाहें, तो कह सकते हैं कि इसका बहुत गंभीर गलत इस्तेमाल हुआ.” उन्होंने कहा, “उस समय हालात ऐसे थे कि युद्ध जैसी स्थिति करीब आ रही थी और राज्य के अधिकार को चुनौती दी जा रही थी. उस समय गृहयुद्ध जैसे हालात थे.” भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के नेता टीबी विट्ठल राव ने पूछा कि कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई थी. नेहरू ने इस सवाल को अनसुना कर दिया.
वास्तव में भारत पर एक खतरा मंडरा रहा है, लेकिन यह फासीवाद का खतरा नहीं है. यह उस बिगड़ी हुई रोजमर्रा की व्यवस्था का खतरा है, जिसे गणराज्य के संस्थापकों ने हमारी विरासत के रूप में चुना था.
प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @praveenswami है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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