दो सीटें, लेकिन कहानी एक ऐसी पार्टी के राजनीतिक रूप से धीरे-धीरे अप्रासंगिक होने का संकेत देती है. तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजों से कई बातें सामने आई हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल AIADMK के भविष्य को लेकर है.
कुछ विश्लेषकों ने इस बात पर जोर दिया है कि दोनों सीटों पर 25 प्रतिशत से कुछ ज्यादा वोट पाने वाली AIADMK पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. यह बात कुछ राहत दे सकती है, लेकिन तीन पार्टियों के बीच मुकाबले में एक चौथाई वोट पाकर हारना भले ही सम्मानजनक माना जा सकता है, लेकिन यह सिर्फ कागज़ों पर अच्छी बात लगती है. AIADMK के प्रदर्शन की बारीकी से जांच करने पर कुछ ऐसी सच्चाइयां सामने आती हैं, जो पार्टी के लिए अच्छी नहीं हैं.
अप्रैल 2026 में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में AIADMK ने जिन 47 सीटों पर जीत हासिल की थी, मदुरंतकम और धारापुरम उनमें शामिल थीं. पिछले हफ्ते दोनों सीटों पर उपचुनाव इसलिए हुए, क्योंकि वहां के मौजूदा विधायक पाला बदलकर सत्तारूढ़ टीवीके में चले गए थे.
अप्रैल के चुनाव में AIADMK ने धारापुरम सीट 16,727 वोटों के बड़े अंतर से जीती थी. यहां पार्टी को कुल वोटों का 40.56 प्रतिशत हिस्सा मिला था. जीत के अंतर के हिसाब से यह उसकी 47 जीती हुई सीटों में सबसे ऊपर की 25 प्रतिशत सीटों में शामिल होने से थोड़ा पीछे थी. मदुरंतकम में जीत का अंतर काफी कम, 7,194 वोट था. हालांकि, यहां पार्टी को 35 प्रतिशत वोट मिले थे, जो उसकी करीब आधी दूसरी जीती हुई सीटों पर मिले वोटों से ज्यादा थे.
सीधे शब्दों में कहें तो AIADMK को इन दोनों सीटों पर इससे कहीं बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए था. दोनों सीटों पर तीसरे स्थान पर खिसक जाना और धारापुरम में करीब 15.5 प्रतिशत अंक और मदुरंतकम में 9.3 प्रतिशत अंक का नुकसान होना पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.
AIADMK के खराब प्रदर्शन की वजह बताते हुए उपचुनाव में PMK के तटस्थ रहने के फैसले को ज़रूरत से ज्यादा अहमियत देना गलत होगा. इसमें कोई शक नहीं है कि PMK का मुख्य वोटर समुदाय वन्नियार, मदुरंतकम में बड़ी संख्या में है और चुनाव में उसकी अहम भूमिका है. लेकिन धारापुरम में AIADMK के खिलाफ वोटों का बदलाव कहीं ज्यादा था. इससे पता चलता है कि PMK के तटस्थ रहने से पार्टी के कुल प्रदर्शन में आई गिरावट की पूरी वजह नहीं समझाई जा सकती.
इससे भी बुरी बात यह है कि नतीजों से पता चलता है कि टीवीके को धारापुरम में करीब 13.8 प्रतिशत अंक और मदुरंतकम में 8.6 प्रतिशत अंक का जो फायदा हुआ, वह लगभग पूरी तरह AIADMK के नुकसान से मिला. इससे उस पार्टी की परेशानी और बढ़ जाती है, जिसके कई विधायक और स्थानीय नेता पहले ही पार्टी छोड़कर टीवीके में जा चुके हैं.
दो पार्टियों का दबदबा या पार्टी का बिखरना?
क्या अक्टूबर के उपचुनावों के नतीजे आगे और नेताओं के पाला बदलने की वजह बनेंगे और क्या इससे एडप्पादी पलानीस्वामी के नेतृत्व के सामने चुनौती और बढ़ेगी, यह देखना दिलचस्प होगा. अपने आप में इन दोनों उपचुनावों से न तो दो पार्टियों के दबदबे का संकेत मिलता है और न ही किसी पार्टी के बिखरने का, लेकिन शायद यह हैरानी की बात नहीं है कि लोग पहले ही पूछने लगे हैं कि क्या यह इन दोनों स्थितियों की शुरुआत है.
AIADMK के नेताओं को अपने साथ जोड़ने से पीछे नहीं हटने वाली टीवीके इस प्रक्रिया को तेज़ करना चाहेगी. उपचुनावों के अगले दौर में पांच सीटों- पेरुंदुरई, अंबासमुद्रम, विरालीमलाई, करूर और तिरुचिरापल्ली ईस्ट- पर चुनाव होंगे. इनमें से चार सीटें पहले AIADMK के विधायकों के पास थीं, जो पाला बदलकर टीवीके में चले गए. वहीं, तिरुचिरापल्ली ईस्ट सीट मुख्यमंत्री विजय के इस्तीफे के बाद खाली हुई. अप्रैल में दोनों सीटों पर जीतने के बाद विजय ने पेरम्बूर सीट अपने पास रखने का फैसला किया था.
टीवीके की जीत उसे बहुमत के आंकड़े के और करीब ले जाएगी और सहयोगी पार्टियों पर उसकी निर्भरता कम करेगी. लेकिन इन उपचुनावों से यह भी पता चला कि वह मतदाताओं को हल्के में नहीं ले सकती. मदुरंतकम में जीत उसके लिए काफी आसान रही होगी, लेकिन धारापुरम में मुकाबला काफी करीबी था. यहां टीवीके की जीत का अंतर अप्रैल के चुनाव में AIADMK की जीत के अंतर से काफी कम था. धारापुरम में शुरुआती दौर की गिनती में AIADMK आगे भी रही, लेकिन बाद में पिछड़ गई और तीसरे स्थान पर पहुंच गई. इससे टीवीके को कुछ समय के लिए चिंता जरूर हुई होगी.
इन उपचुनावों में टीवीके ने जिस तरह बड़े पैमाने पर प्रचार किया, उससे पता चलता है कि वह इन्हें कितना अहम मान रही थी. अगर पार्टी एक भी सीट हार जाती, तो इससे उसकी राजनीतिक कहानी को झटका लग सकता था और विजय की छवि को नुकसान पहुंच सकता था.
इस बीच, डीएमके ने हार में भी जीत का दावा करके नुकसान को फायदे में बदलने की कोशिश की. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी के वोटों का प्रतिशत लगभग पहले जैसा ही रहा. वोटों में मामूली गिरावट की वजह आसानी से यह बताई जा सकती है कि उसके कई सहयोगी दल इस बार उसके साथ नहीं थे. इनमें से कुछ टीवीके के साथ चले गए, जबकि सीपीएम, सीपीआई और सीपीआई-एमएल ने अलग गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ा.
पार्टी यह दावा कर सकती है कि उसके मतदाताओं का समर्थन अब भी बना हुआ है. लेकिन अगर वह चुनावी माहौल को अपने पक्ष में बदलना चाहती है, तो उसे सिर्फ अपनी जगह बनाए रखने से बेहतर प्रदर्शन करना होगा.
अगर चुनाव नतीजों को एक पंक्ति में समेटना हो, तो टीवीके की कड़ी मुकाबले के बाद जीत, डीएमके का औसत प्रदर्शन और AIADMK की हार आने वाले समय में और मुश्किलों का संकेत हो सकती है.
मुकुंद पद्मनाभन क्रिया यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और द हिंदू के पूर्व संपादक हैं. वह द ग्रेट फ्लैप ऑफ 1942 के लेखक हैं, जो भारत और द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास पर आधारित किताब है. उनका एक्स हैंडल @muk22 है. लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं.
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