अब तक, पूरे भारत में जेन जी के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से तीखे व्यंग्य और हास्य के ऐसे नज़ारे देखने को मिलना आम बात हो गई है. इस आंदोलन का दूसरा दौर इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया में गड़बड़ियों को निशाना बना रहा है. यह आंदोलन पहले से कहीं ज्यादा गंभीर रहा है, लेकिन इस वीकेंड एक ड्रामा देखने को मिला.
दिल्ली के आरके आश्रम में पुलिस ने एक बार फिर नेहा बोरा को पकड़ लिया और उन्हें हिरासत में लेने की तैयारी करने लगी. कम से कम पुलिस को यही लगा कि उसने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष को पकड़ लिया है. बोरा अपने खास ढीले टी-शर्ट और काले चश्मे में थीं. वे अपने लिए ‘वे/उनके’ सर्वनाम का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन असली बोरा उसी समय कनॉट प्लेस में दौड़ती-भागती नज़र आईं, जहां उनके साथी उनका हौसला बढ़ा रहे थे.
जुलाई में जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक और दूसरे लोगों के साथ विरोध में भूख हड़ताल करने और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलवाने के बाद से बोरा लगातार हमारे फोन की स्क्रीन पर नज़र आ रही हैं. उनके लिए लोगों की दीवानगी हर मिनट बढ़ रही है. उनके युवा और बुजुर्ग प्रशंसकों की बड़ी संख्या उनके वीडियो के नीचे दिल वाले निशान भेजती है, ऑनलाइन जोर-जोर से ‘क्वीन’ यानी रानी कहकर उनका स्वागत करती है या उनके ‘रौब’ और ‘असर’ की तारीफ करती है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पुलिसकर्मी महिलाओं उन्हें बेफिक्र मुस्कान के साथ उठाकर ले जा रही हैं या वे ऐसी सरकार को जवाब दे रही हैं, जो सोचती है कि ‘हम कुत्ते, कॉकरोच और कीड़े-मकोड़े हैं.’
सिर्फ कुछ महीनों में ही बोरा ने उन लोगों की सोच भी बदल दी है, जो खुद को ‘राजनीति से दूर’ बताते थे और किसी भी पक्ष में जाने से बच रहे थे. 29 साल की बोरा ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर इस कदर खींचा है कि उनकी तारीफ में लिखे गए एक लेख में उन्हें ‘एक ऐसे आंदोलन की मार्क्सवादी मैडोना’ कहा गया, जिसमें अलग-अलग तरह के तरीके शामिल हैं.
नेहा बोरा का असर
बोरा की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह विरोध जताने का उनका अपना खास तरीका है. उनकी मुस्कुराते हुए विरोध करने की अदा, उन्हें सड़क पर घसीटने वाले अधिकारियों का मज़ाक उड़ाने की उनकी तैयारी और अंग्रेज़ी के साथ-साथ काव्य वाली हिंदी पर उनकी बराबर की पकड़, लोगों को आकर्षित करती है. दिल्ली पुलिस के साथ लुका-छिपी के खेल में उन्होंने जिस शरारती अंदाज में पुलिस को छकाया, वह भी लोगों को पसंद आया. अपने साथ हिरासत में लिए गए लोगों के लिए खाना मांगते समय उनके चेहरे पर दिखने वाली शरारती मुस्कान भी खास है. वे कहती हैं, “दिल्ली पुलिस खाना खिलाओ.”
वे यह बात जानती हैं और यह भी जानती हैं कि हम भी यह बात जानते हैं.
उनके इस असर का कुछ हिस्सा उनके हुनर का नतीजा है, जिसे उन्होंने कई साल तक नुक्कड़ नाटक करने वाले कलाकार के तौर पर सीखा है, लेकिन इंस्टाग्राम पर किसी को बहुत लोकप्रिय बना देने के लिए भी सिर्फ एक छोटी वीडियो से ज्यादा गहराई की ज़रूरत होती है. कैमरों का ध्यान अपनी ओर खींचने से बहुत पहले ही बोरा करीब एक दशक तक वामपंथी आंदोलन से जुड़ी एक कार्यकर्ता रही थीं. इस दौरान वे एक शहर से दूसरे शहर जाती थीं और बिना किसी दिखावे के अपना काम करती थीं. मिसाल के तौर पर, झारखंड में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ खड़ी होती थीं. सिर्फ पिछले एक साल में ही बोरा को जान से मारने की धमकियां मिलीं और उन पर स्याही फेंकी गई, लेकिन उन्होंने इन बातों को खुद पर हावी नहीं होने दिया.
नेहा बोरा के असर को उनसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता. कई इंटरव्यू में उनसे बार-बार कहा गया कि वे बिना किसी नेता वाले आंदोलन की अनौपचारिक नेता हैं, लेकिन हर बार वे शांत रहते हुए धैर्य के साथ इस बात से सहमत होने से इनकार कर देती हैं. एक इंटरव्यू में जब उनसे कन्हैया कुमार के बारे में पूछा गया, तो बोरा ने किसी एक व्यक्ति पर चुनिंदा रूप से ध्यान देने की सोच की आलोचना की. उन्होंने सवाल किया कि कोई इस रोजमर्रा के काम में दिलचस्पी क्यों नहीं लेता, जो छात्र नेता आगे चलकर मजदूर संगठनों और महिला संगठनों के साथ करते हैं.
वे कहती हैं, “किसी के प्रति इस तरह मोहित हो जाना भी एक समस्या है. इसकी वजह वे बुद्धिजीवी हैं, जो एक ऐसे ‘शुद्ध’ नेता को ढूंढना चाहते हैं, जिसके पीछे वे सभी एकजुट हो सकें. ऐसे नेता होते ही नहीं हैं.” बोरा कहती हैं कि कुछ युवा नेता आंदोलन छोड़कर ‘पूंजीपति वर्ग की सत्ताधारी पार्टी’ के साथ जुड़ सकते हैं, लेकिन दूसरे लोग लगातार अपना जीवन जनता के आंदोलनों के लिए समर्पित करते रहते हैं.
नेहा बोरा से आगे
उनकी बात को आसानी से साबित किया जा सकता है. बस इस गर्मी में हमारे असंतोष के बीच अपनी पहचान बना रही उनकी पीढ़ी की दूसरी महिला नेताओं को देख लीजिए.
10 अक्टूबर की सुबह, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह अपनी जंगपुरा स्थित घर से कार में बैठकर शहर में हो रहे कई विरोध प्रदर्शनों में से एक में शामिल होने निकलीं. दिल्ली पुलिस के करीब दो दर्जन जवानों ने उनकी गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया. पुलिसवालों ने दावा किया कि उन्हें सिंह को हिरासत में लेने के लिए ‘ऊपर से’ निर्देश मिले हैं, लेकिन उन्होंने कोई वारंट या लिखित आदेश दिखाने से इनकार कर दिया. सिंह ने कार के अंदर से ही पूरी घटना का वीडियो बनाया और जोर से सवाल किया कि पुलिसवाले किस ‘ऊपर’ की बात कर रहे हैं. 11 अक्टूबर को एक अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपने शांत और सीधे अंदाज में कहा, “ये डरी हुई सरकार है.”
हिरासत में लेना, बदसलूकी करना और हिंसा- ये इन विरोध प्रदर्शनों की सबसे बड़ी खबरें हैं. इसमें दिल्ली पुलिस और दक्षिणपंथी गुंडे, दोनों शामिल हैं. जेएनयू छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष और एसएफआई की सदस्य आइशी घोष के लिए इनमें से कुछ भी नया नहीं है. छोटे कद वाली घोष 2020 में दिल्ली में हुए छात्र आंदोलन की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक हैं. उस आंदोलन के दौरान नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ भी प्रदर्शन हो रहे थे.
जनवरी 2020 में, अपने कैंपस में नकाब पहने लोगों की भीड़ के बेरहमी से किए गए हमले में घायल होने के बाद भी घोष सार्वजनिक रूप से सामने आती रहीं. उनका एक हाथ पट्टी में था और सिर सफेद पट्टियों से बंधा था, लेकिन इसके बावजूद वे तब भी उतने ही साफ और भरोसे के साथ अपनी बात रखती थीं, जितना आज रखती हैं. रविवार को सीजेपी की उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोष ने कहा कि बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के लाठी चलाने वाले गुंडों को भेजने के संकेत देने और दिल्ली भर में प्रदर्शनकारियों को डराने-धमकाने के बीच एक सीधा संबंध है. इनमें कुछ प्रदर्शनकारी नाबालिग भी हैं.
पीढ़ियों के बीच एकजुटता
निराशा के इस माहौल के बावजूद, बोरा और उनके साथियों को अब कुछ बेहद मजबूत साथ मिला है. पिछले कुछ हफ्तों से विपक्ष की वरिष्ठ महिला नेता उनके साथ खड़ी हैं. इनमें से कुछ ने उस समय से सत्ता को चुनौती दी है, जब इनमें से कई युवा नेता पैदा भी नहीं हुई थीं. अलग-अलग पीढ़ियों की इन महिलाओं को एक साथ देखना, उन महिलाओं को हाथ थामे देखना जिन्होंने लंबी लड़ाइयां लड़ी हैं और उन महिलाओं को भी जो अभी अपनी शुरुआत कर रही हैं, दिल को सुकून देने वाला है.
इनमें सबसे खास नाम लंबे समय बाद लौटीं रेणुका चौधरी का है. 2018 में राज्यसभा में उनकी हंसी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रामायण से जुड़ी विवादित टिप्पणी के बाद से वे राजनीति में बहुत कम नज़र आई थीं. 72 साल की उम्र में भी वे स्कूल की सख्त प्रिंसिपल जैसी हैं. इस हफ्ते एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया. उन्होंने पुलिसवालों से कहा कि अगर उन्होंने उन्हें जरा भी छुआ, तो वे उनकी खाल उधेड़ देंगी. मीडिया से बात करते समय जब एक बस का अपने आप बंद होने वाला दरवाजा उनके आसपास बंद होने लगा, तब भी उनका यही सख्त अंदाज़ देखने को मिला. जुलाई में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर आंसू गैस और लाठियों के इस्तेमाल पर नाराज़गी जताते हुए उन्होंने कहा था, “वे ‘जेन जी’ नहीं हैं. वे हमारे बच्चे हैं. हमारे छात्र हैं. हमारे नागरिक हैं.”
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी से हारने के बाद कुछ समय तक शांत रहीं ममता बनर्जी भी अब वापस आ गई हैं. जेन जी के अंदाज़ को अपनाते हुए बनर्जी ने ‘जॉनी जॉनी यस पापा’ की तर्ज पर व्यंग्य भरा गाना गाया और ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग की. पूर्व मुख्यमंत्री ने कोलकाता की सड़कों पर अपना राजनीतिक करियर बनाया था. इसलिए दक्षिण एवेन्यू के पास सड़क पर बैठना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. बाद में उन्हें उनके सांसदों के साथ हिरासत में ले लिया गया.
वृंदा करात को भी अपने पुराने अंदाज में लौटते देखना अच्छा रहा. उनके साथ तीखे अंदाज में अपनी बात रखने वाली जया बच्चन भी थीं. जब एक पत्रकार ने उनके सामने माइक करके सवाल पूछा, तो उन्होंने माइक को एक तरफ कर दिया और कहा, “नहीं बताऊंगी.” हालांकि, मेरे जैसी मिलेनियल पीढ़ी की महिलाओं के लिए वह पल बेहद खुशी का था, जब निवेदिता मेनन ने मीडिया से कहा कि युवाओं ने डर को तोड़ दिया है और 12 साल की चुप्पी खत्म कर दी है.
आज दिल्ली की सड़कों पर उतरी महिलाओं पर न तो डर काम कर रहा है और न ही उसका साथी, अकेलापन. न 29 साल की महिला पर और न ही 72 साल की महिला पर.
करनजीत कौर पत्रकार हैं, Arré की पूर्व संपादक हैं और TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
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