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Saturday, 10 October, 2026
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नेहा बोरा का साहस काबिल-ए-तारीफ है, लेकिन उन्हें मसीहा न बनाएं

कभी-कभी, बिना शर्त तारीफ़ तीखी आलोचना से ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकती है, क्योंकि इससे समर्थक बारीकियों और जटिलताओं को देख नहीं पाते.

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नेहा बोरा से प्रभावित हुए बिना रहना मुश्किल है. जंतर-मंतर 1.0 के दौरान 23 दिनों तक भूख हड़ताल करने से लेकर दिल्ली पुलिस के साथ रोज होने वाली उनकी झड़पों तक, हर जगह उनका साहस, अपने विचारों पर भरोसा और साफ सोच नजर आती है. AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बिना किसी शक के विरोध प्रदर्शन के आंदोलन के सबसे खास चेहरों में से एक बन गई हैं, खासकर इसके दूसरे चरण यानी 2.0 में. उन्हें देखकर इरोम शर्मिला की याद आती है, हालांकि दोनों के काम करने का तरीका काफी अलग है.

शर्मिला को पूरे देश में सरकार और सेना के अन्याय के खिलाफ मजबूती से आवाज उठाने वाली अकेली महिला के तौर पर जाना जाता था. लंबे समय तक उनकी भूख हड़ताल और नाक में लगी फीडिंग ट्यूब की तस्वीर उनकी पहचान का हिस्सा बन गई थी. उन्होंने लंबे समय तक बार-बार सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी.

नेहा के अंदर एक अलग तरह की आग है. शर्मिला की तरह वह भी एक लड़ाकू हैं, लेकिन इस छात्र नेत्री ने भूख हड़ताल के बजाय सड़कों पर उतरकर लड़ने का रास्ता चुना. इस फैसले ने उन्हें अन्यायपूर्ण व्यवस्था की शिकार के रूप में नहीं, बल्कि सक्रिय और ऊर्जा से भरी एक ताकत के रूप में सामने लाया है. उन्हें बार-बार हिरासत में लिया जाना, पुलिस के साथ आमने-सामने होना और बैरिकेड्स के ऊपर खड़े होकर विरोध करना, ये सब ऐसे दृश्य हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते हैं. ऐसे देश में, जहां लंबे समय से खुले तौर पर विरोध प्रदर्शन कम देखने को मिलते हैं, उनका यह अंदाज ताजी हवा के झोंके जैसा है. उनका हमेशा पहना जाने वाला काला चश्मा और सादा पहनावा उन्हें एक पारंपरिक वामपंथी नेता जैसा रूप देता है. उनकी सीधी-सादी बात करने की शैली और अपनी बात को साफ तरीके से रखने की क्षमता भी इस छवि को मजबूत करती है.

एक जानी-पहचानी चिंता

भारतीय राजनीति में वामपंथ की आवाज अब बहुत कमजोर हो गई है. वह ज्यादातर विश्वविद्यालयों के कैंपस तक ही सिमटकर रह गया है, जहां JNU उसका सबसे मजबूत गढ़ है. नेहा से पहले JNU में AISF के नेता रहे कन्हैया कुमार की तरह, AISA की नेहा के सामने भी यही चुनौती है कि CPI (M-L) के बैनर तले अपने आंदोलन को कैंपस की सीमाओं से बाहर कैसे ले जाएं. ऐसा उस समय हो रहा है, जब मुख्यधारा की राजनीति में वामपंथ के लिए बहुत कम जगह बची है.

फिलहाल, नेहा ने अपने साहस, नेतृत्व और करिश्मे के दम पर खुद को पार्टी की पहचान से ऊपर उठाया है. उनके प्रशंसक उन्हें शेरनी और आज के दौर की झांसी की रानी कहते हैं. इस तरह की तारीफ समझ में आती है और कई मायनों में वह इसकी हकदार भी हैं. लेकिन इससे एक जानी-पहचानी चिंता भी पैदा होती है. भारत में किसी व्यक्ति को हद से ज्यादा बड़ा बना देने की पुरानी परंपरा रही है. अक्सर इसकी शुरुआत अच्छी भावना से होती है, लेकिन आखिर में इसका उल्टा असर पड़ता है. इतिहास बताता है कि किसी की हद से ज्यादा तारीफ करना, उसके सवालों के जवाब मांगने के बजाय उसे एक आदर्श या महान हस्ती बना देना, उस संघर्ष के असली मकसद को ही कमजोर कर सकता है.

इसका मतलब यह नहीं है कि नेहा जैसी युवा नेत्री की तारीफ नहीं होनी चाहिए. लेकिन उत्साह के साथ संतुलन भी जरूरी है. कभी-कभी बेहिसाब तारीफ, कड़ी आलोचना से भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है, क्योंकि इससे समर्थक किसी मुद्दे की बारीकियों और उसकी जटिलताओं को देख नहीं पाते. इस मायने में, जरूरत से ज्यादा तारीफ करने वाली भीड़ विरोधियों से भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है.

ऐसा लगता है कि नेहा खुद भी इस खतरे को समझती हैं. जब उनकी तुलना CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके से की गई, तो उन्होंने आपसी मुकाबले के बजाय एकता की बात कही. फिर भी, आगे का रास्ता लंबा है. खतरा उनके अपने फैसलों से कम और लोगों की नायकों की तलाश से ज्यादा है. ऐसे देश में जहां लोग आदर्श व्यक्तित्वों की कमी महसूस करते हैं, नेहा को मसीहा मान लेना बहुत आसान है. ऐसा करते हुए लोग उनके संघर्ष की मुश्किल हकीकत और उनके साहसी नेतृत्व की व्यक्तिगत कीमत को नजरअंदाज कर सकते हैं.

हमारी प्रकृति ही ऐसी है कि हम किसी को अपना नायक मानकर उसकी पूजा करने लगते हैं. हम किसी को पूरी तरह अच्छा या पूरी तरह बुरा मानना पसंद करते हैं, बजाय इसके कि उसके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को समझने की कोशिश करें. इसका नतीजा यह होता है कि नेहा जैसी नेत्री को हद से ज्यादा ऊंचा उठा दिया जाता है. उनकी हर बात को बहुत बड़ा बना दिया जाता है और उनके हर कदम की तारीफ होने लगती है. ऐसे में उनकी निष्पक्ष और गंभीर आलोचना की गुंजाइश खत्म होने लगती है. आम लोग आसान कहानियां पसंद करते हैं. बहुत कम लोग किसी मुद्दे के आधार पर फैसला करने की मेहनत करना चाहते हैं, ताकि जहां तारीफ जरूरी हो वहां तारीफ करें और जहां आलोचना जरूरी हो वहां आलोचना.

बेशक, नेतृत्व के लिए करिश्मा और लोगों को प्रभावित करने की क्षमता जरूरी है. लेकिन इसका एक नुकसान यह भी है कि इससे सच्चे साथियों के बजाय अंधभक्त और प्रशंसक ज्यादा पैदा होने लगते हैं. इसका इलाज यह है कि नेता अपने आसपास अलग-अलग क्षेत्रों के ऐसे लोगों को रखें, जो उनके जितने ही सक्षम हों या उनसे भी ज्यादा काबिल हों. ऐसा न होने पर बिना सोचे-समझे तारीफ करने की धारा में बह जाना बहुत आसान हो जाता है. और आखिरकार, यह धारा एक दिन कमजोर पड़ ही जाती है.

सीख हमें ही लेनी है

यह याद रखना भी बहुत जरूरी है कि नेहा अकेली नहीं हैं. कई दूसरे लोग भी उतने ही साहस और दृढ़ निश्चय के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. उनके नेतृत्व को कम करके देखे बिना भी, इस आंदोलन की कहानी किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं घूमनी चाहिए. जंतर-मंतर के मामले में यह बात खास तौर पर सही है. वहां अनगिनत लोग पुलिस के दबाव के बावजूद डटे हुए हैं. स्वतंत्र पत्रकार मुश्किल सवाल पूछ रहे हैं और इस संघर्ष की आवाज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा रहे हैं. इन सभी लोगों ने पूरे दृढ़ निश्चय के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाया है.

खतरा इस बात में है कि हम सब मिलकर किसी मसीहा का इंतिजार करते रहते हैं. अक्सर लोग ऐसे लोगों के झांसे में आ जाते हैं, जिन्हें भगवान जैसा महान बताकर पेश किया जाता है, जबकि वे वास्तव में ऐसे नहीं होते. हमने देखा है कि कैसे बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने कभी नरेंद्र मोदी को मसीहा मान लिया था और अपने सामने मौजूद साफ-साफ दिखने वाली बड़ी समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया था.

भारत को ऐसे मसीहाओं की जरूरत नहीं है जिन्हें जानबूझकर महान बनाकर पेश किया जाए, चाहे वह इंदिरा गांधी हों, नरेंद्र मोदी हों या कोई और. हमें ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो अपनी कमियों को स्वीकार करने, आलोचना सुनने, खुद के कामों पर विचार करने, अपनी गलतियां मानने और अपना रास्ता बदलने के लिए तैयार हों. हमें इसी तरह के नेतृत्व की उम्मीद करनी चाहिए.

हमें नेहा बोरा, CJP के नेताओं और यहां तक कि राहुल गांधी के लिए भी यही कामना करनी चाहिए कि वे इंसान बने रहें. उनमें भी अपनी कमियां और असफलताएं हों, लेकिन साथ ही उनमें सीखने और अपनी गलतियों को सुधारने की विनम्रता भी हो.

आखिर में, यह फैसला हमें ही करना है कि हम किस तरह के नेता चाहते हैं. क्या हमने ऐसे स्वार्थी तानाशाहों को काफी नहीं देख लिया, जो लोकतंत्र के रास्ते सत्ता में आए और फिर कुर्सी पर बैठने के बाद उसी लोकतंत्र का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगे?

सीख हमें ही लेनी है. अगर हमें लगता है कि हम बेहतर नेताओं के हकदार हैं, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन नेताओं को बेहतर साथी, सहयोगी और समर्थक मिलें.

उर्वीश कोठारी अहमदाबाद में रहने वाले एक कॉलमिस्ट और लेखक हैं. वे @urvish2020 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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