नई दिल्ली: केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शुक्रवार को स्पेसएक्स के CEO एलन मस्क के उस आरोप पर जवाब दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में ‘कुछ खास अमीर कारोबारी’ स्टारलिंक की सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू होने से रोक रहे हैं. सिंधिया ने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में किसी एक कंपनी का दबदबा नहीं चलने देता.
मस्क ने गुरुवार को एक्स पर एक पोस्ट के जवाब में यह आरोप लगाया था. DogeDesigner नाम के अकाउंट की पोस्ट में कहा गया था कि मई 2026 तक भारत के 11,256 सूचीबद्ध गांवों में 4G नेटवर्क की सुविधा नहीं थी.
शुरुआत में मस्क ने किसी का नाम नहीं लिया और लिखा, “आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं.” शुक्रवार को मस्क ने इस मुद्दे पर आगे सवाल उठाते हुए पूछा कि 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिलने के बावजूद स्टारलिंक को भारत में सेवाएं शुरू करने का लाइसेंस क्यों नहीं मिला है. उन्होंने पूछा, “क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं?”
Starlink is licensed in over 165 countries and has spent five years complying with every single law and requirement of the government of India, so why still no license?
Is Ambani the real boss of India? https://t.co/KUSgfJRynZ
— Elon Musk (@elonmusk) October 8, 2026
सिंधिया ने बताया कि तीन कंपनियों के पास सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) सेवाओं के लाइसेंस हैं. इनमें स्टारलिंक, रिलायंस जियो की सैटेलाइट कंपनी और भारती के समर्थन वाली यूटेलसैट वनवेब शामिल हैं. अभी तक इनमें से किसी भी कंपनी को सुरक्षा मंजूरी नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से स्पेक्ट्रम की कीमतें तय होने और हर कंपनी के जरूरी सुरक्षा नियम पूरे करने के बाद ये कंपनियां अपनी सेवाएं शुरू कर सकती हैं.
सिंधिया ने कहा, “हमारा रुख बिल्कुल साफ है. तीन कंपनियों को लाइसेंस मिला है. जब भी सरकार राजस्व के आधार पर शुल्क तय करेगी, तब उन्हें स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया जाएगा. इसी तरह, जब-जब ये कंपनियां अलग-अलग जरूरी सुरक्षा शर्तें पूरी कर लेंगी, तब वे अपनी सेवाएं शुरू कर सकती हैं.”
संचार राज्य मंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने कहा कि दूरसंचार विभाग (DoT) ने सैटकॉम कंपनियों को लाइसेंस जारी कर दिए हैं और उन्हें अस्थायी रूप से स्पेक्ट्रम भी आवंटित किया है. लेकिन गृह मंत्रालय (MHA) से सुरक्षा मंजूरी मिलना अभी बाकी है.
उन्होंने कहा, “अब सुरक्षा मंजूरी का मामला गृह मंत्रालय के पास लंबित है. जैसे ही मंजूरी मिल जाएगी, उन्हें यह मिल जाएगी. इसका किसी एक कंपनी से कोई लेना-देना नहीं है.”
सिंधिया ने मस्क के बयान का समर्थन करने के लिए कांग्रेस की आलोचना भी की. उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी इस मुद्दे पर अपना रुख बदल रही है.
उन्होंने कहा, “जहां तक कांग्रेस पार्टी की बात है, मुझे नहीं लगता कि उसे खुद पता है कि वह बाईं ओर जा रही है या दाईं ओर. शुरुआत में उसे एक खास व्यक्ति को लाइसेंस मिलने पर परेशानी थी. अब उसे इस बात से परेशानी है और वह उसी व्यक्ति के साथ मिलकर सवाल उठा रही है कि उसे लाइसेंस क्यों नहीं मिल रहा है.”
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी अंबानी का जिक्र करते हुए मस्क के ट्वीट का जवाब दिया था. उन्होंने एक्स पर लिखा था, “भारत में आपका स्वागत है, एलन. जरा इंतजार कीजिए, जब आप दूसरे व्यक्ति के बारे में जानेंगे.”
‘ग्राहक खुद चुनेंगे’
गुरुवार को इंडिया मोबाइल कांग्रेस (IMC) में CEO की एक बैठक के दौरान सिंधिया ने कहा कि सरकार किसी भी कंपनी का पक्ष नहीं लेगी.
उन्होंने कहा, “सरकार किसी एक तकनीक का समर्थन नहीं करती. हमारा काम कई तरह की सेवाएं उपलब्ध कराना है. खुले बाजार में ग्राहक खुद चुनेंगे कि उन्हें कौन-सी सेवा पसंद है.”
उन्होंने आगे कहा कि अमेजन की कुइपर को सेवाएं देने से पहले लाइसेंस लेने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. उन्होंने बताया कि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) और दूरसंचार विभाग (DoT) भी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम की कीमतें तय करने के मामले में अंतिम फैसले के करीब हैं.
बुधवार को स्पेसएक्स में स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की उपाध्यक्ष लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में बताया था कि कंपनी ने भारत में 20 गेटवे साइट बनाई हैं और भारतीय यूजर्स का डेटा देश के भीतर ही रखा जाएगा.
ड्रेयर ने कहा, “भारत की सेवा करने के लिए हम तैयार हैं, जैसे ही भारत तैयार होगा.”
मंजूरियों की स्थिति क्या है?
स्टारलिंक को जून 2025 में दूरसंचार विभाग (DoT) से ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट (GMPCS) लाइसेंस मिला था. इसके बाद जुलाई 2025 में उसे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) से भी मंजूरी मिली. हालांकि, स्पेक्ट्रम आवंटित होने और सुरक्षा मंजूरी मिलने तक कंपनी व्यावसायिक सेवाएं शुरू नहीं कर सकती. पूरी तरह विदेशी स्वामित्व वाली कंपनी होने के कारण उसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की मंजूरी भी चाहिए.
3 सितंबर को दूरसंचार विभाग की सबसे बड़ी फैसला लेने वाली संस्था डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन (DCC) ने एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) का 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम इस्तेमाल शुल्क तय करने को मंजूरी दी थी. ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के लिए यह दर घटाकर 4 प्रतिशत रखने का प्रस्ताव है. इस प्रस्ताव को अंतर-मंत्रालयी समिति की मंजूरी और केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलना अभी बाकी है.
जून में ब्लूमबर्ग ने खबर दी थी कि गृह मंत्रालय (MHA) के तहत काम करने वाली सुरक्षा एजेंसियों ने स्टारलिंक को अंतिम मंजूरी देने से रोक दिया है. इसकी वजह ईरान में कंपनी के टर्मिनलों का इस्तेमाल बताया गया था, जहां स्टारलिंक को सेवाएं देने का लाइसेंस नहीं है. ड्रेयर ने इस खबर का खंडन किया था.
स्पेक्ट्रम को लेकर विवाद
2024 में रिलायंस जियो और भारती एयरटेल ने कहा था कि सैटेलाइट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी होनी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल सेवाओं के लिए होती है. दोनों कंपनियों की भारत के टेलीकॉम बाजार में 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी है. वहीं, स्टारलिंक ने प्रशासनिक तरीके से स्पेक्ट्रम आवंटित करने का समर्थन किया था. मस्क ने प्रस्तावित नीलामी को “अभूतपूर्व” बताया था.
जियो ने नियामक से कहा था कि “सैटेलाइट आधारित सेवाओं के साथ किसी भी तरह के पक्षपातपूर्ण व्यवहार” को खारिज किया जाना चाहिए. रिलायंस स्पेक्ट्रम की नीलामी में करीब 19 अरब डॉलर खर्च कर चुकी थी.
दूरसंचार अधिनियम, 2023 में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के प्रशासनिक आवंटन का प्रावधान है. सरकार ने इसी तरीके को अपनाने का फैसला किया.
मार्च 2025 में एयरटेल और जियो ने स्पेसएक्स के साथ अलग-अलग समझौते किए थे. इनके तहत दोनों कंपनियां स्टारलिंक के उपकरण बेचेंगी, लेकिन इसके लिए स्टारलिंक को जरूरी मंजूरियां हासिल करनी होंगी. उस समय कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि ये समझौते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अच्छे संबंध बनाने के लिए “तय करवाए” थे. उस समय मस्क ट्रंप को सलाह दे रहे थे.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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