नई दिल्ली: ट्रंप प्रशासन ने गुरुवार को कई भारतीय और अमेरिकी आईटी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की. प्रशासन ने इन कंपनियों पर भर्ती प्रक्रिया में धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया और उन्हें ऐसे कार्यक्रम से निलंबित कर दिया, जिसके तहत विदेशी कर्मचारी अमेरिका में स्थायी रूप से रहने की अनुमति हासिल कर सकते हैं.
इस कार्रवाई का ऐलान अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने किया. इनमें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी शामिल थे. स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम (Permanent Labour Certification Programme) से जिन कंपनियों को निलंबित किया गया है, उनमें इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, HCL, कैपजेमिनी और अमेरिकी कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कॉग्निजेंट शामिल हैं.
वेंस ने कहा, “H-1B वीजा कार्यक्रम का मकसद कंपनियों को अमेरिका के बाहर से सबसे अच्छे कर्मचारियों को लाने की अनुमति देना है. इन कर्मचारियों को ऐसे पदों पर रखा जाता है, जिन्हें अमेरिकी कर्मचारियों की मदद से भरना पूरी तरह असंभव होता है. दुर्भाग्य से, इस कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होने लगी है.”
उन्होंने आगे कहा, “यह व्यवस्था मूल रूप से दो तरीकों से काम करती है. H-1B वीजा के जरिए कर्मचारी सबसे पहले अमेरिका में प्रवेश करते हैं और PERM (स्थायी श्रम प्रमाणन) कार्यक्रम के जरिए वे वहां रह सकते हैं. इसलिए, H-1B वीजा के लिए दोबारा आवेदन करने के कुछ दौर के बाद कंपनियां PERM के लिए आवेदन करती हैं. इससे कर्मचारी को अमेरिका में रहने, ग्रीन कार्ड हासिल करने और संभावित रूप से जब तक वे चाहें वहां रहने की अनुमति मिल जाती है.”
अमेरिका के लेबर मिनिस्टर कीथ सोंडरलिंग ने कहा कि विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देने के कारण अमेरिकी कर्मचारियों से नौकरियां “छीन ली गईं”. उन्होंने अमेरिकी कर्मचारियों को “सबसे प्रतिभाशाली और सबसे अच्छे” लोगों में से बताया. उन्होंने कहा कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ऊपर बताई गई टेक्नोलॉजी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करके समस्या की “जड़” पर चोट कर रहा है.
अब लेबप डिपार्टमेंट इन कंपनियों के कर्मचारियों के लिए स्थायी श्रम प्रमाणन के किसी भी नए या पहले से लंबित आवेदन पर कार्रवाई नहीं करेगा.
सोंडरलिंग ने बताया कि 2009 से अब तक ऊपर बताई गई कंपनियों को करीब 2,30,000 H-1B वीजा और 1,00,000 से ज्यादा स्थायी श्रम प्रमाणन मिले हैं. उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि अमेरिकी कर्मचारियों से सैकड़ों हजार नौकरियां छीन ली गईं. हमारी यह ऐतिहासिक कार्रवाई धोखाधड़ी और गलत इस्तेमाल को रोकने की दिशा में पहला अहम कदम है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इन कार्यक्रमों की वजह से अमेरिकी कर्मचारियों को नुकसान न हो.”
वेंस ने खास तौर पर माइक्रोसॉफ्ट पर निशाना साधते हुए कहा, “आप एक शानदार अमेरिकी कंपनी हैं, लेकिन आपको शानदार अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी पर रखना होगा.”
उन्होंने कहा, “अमेरिका में किसी भी कंपनी ने इस व्यवस्था का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा गलत इस्तेमाल नहीं किया है…माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया. वहीं, कंपनी को 6,300 H-1B वीजा और करीब 3,000 ग्रीन कार्ड का फायदा मिला.”
अमेरिका में विदेशी कुशल कर्मचारियों को आखिरकार ग्रीन कार्ड दिलाने की प्रक्रिया में स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम एक अहम कदम है. मौजूदा प्रक्रिया के तहत, कंपनियों को श्रम विभाग से प्रमाणन के लिए आवेदन करना होता है. उन्हें यह बताना होता है कि जिस क्षेत्र में नौकरी दी जानी है, वहां उस पद को स्वीकार करने के लिए कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी “सक्षम, इच्छुक, योग्य और उपलब्ध” नहीं है. श्रम विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, इसी प्रक्रिया को PERM कहा जाता है.
यह प्रमाणन मिलने के बाद ही अमेरिकी सरकार रोजगार के आधार पर ज्यादातर ग्रीन कार्ड जारी कर सकती है. इससे किसी विदेशी नागरिक को अमेरिका में स्थायी रूप से रहने की अनुमति मिलती है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला मौजूदा प्रशासन पिछले साल के ज्यादातर समय से H-1B वीजा व्यवस्था पर कार्रवाई कर रहा है. इसका मकसद अमेरिका आने वाले ज्यादा कुशल विदेशी कर्मचारियों की संख्या कम करना है. इस वीजा व्यवस्था का सबसे ज्यादा फायदा पाने वालों में भारतीय शामिल हैं. 2024 में जारी किए गए सभी H-1B वीजा में से 71 प्रतिशत तक भारतीय नागरिकों को मिले थे.
2024 में अमेरिका में भारतीय समुदाय की आबादी बढ़कर 32 लाख हो गई. इसके साथ ही भारतीय वहां का दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी समूह बन गए. पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा आवेदनों पर 1,00,000 डॉलर की फीस लगा दी थी. हालांकि, आगे की कानूनी समीक्षा लंबित रहने तक अदालतों ने इस फैसले पर रोक लगा दी है.
भारत सरकार ने इस ताजा कार्रवाई पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है. हालांकि, वह पहले कह चुकी है कि वीजा जारी करना किसी देश का “संप्रभु अधिकार” है. भारत सरकार ने यह मुद्दा अमेरिकी सरकार के सामने भी उठाया है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले हफ्ते एशिया सोसाइटी में बोलते हुए कहा था कि विदेशी कर्मचारियों और H-1B वीजा व्यवस्था को लेकर हो रही बातचीत भारत-अमेरिका संबंधों की बड़ी चुनौतियों का हिस्सा है.
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