अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में म्यांमार में सेना के समर्थन से बनी सरकार की ओर जो हाथ बढ़ाया है, वह काफी हैरान करने वाला फैसला है. इसकी वजह यह है कि अमेरिका अब तक इस सरकार की कड़ी आलोचना करता रहा है.
फरवरी 2021 में म्यांमार में सेना ने तख्तापलट किया था. इसके बाद पश्चिमी देशों समेत कई देशों ने इस नई सरकार से दूरी बना ली थी. इस सरकार पर कई प्रतिबंध लगाए गए और राजनयिक संबंध तोड़ लिए गए. तख्तापलट करने वाले गुट के नेता सीनियर जनरल मिन आंग ह्लेंग, जो अब राष्ट्रपति बन गए हैं, खुद को दुनिया के देशों से अलग-थलग महसूस करने लगे थे.
सेना के इस तख्तापलट की सबसे कड़ी आलोचना करने वाले देशों में अमेरिका भी शामिल था. उसने म्यांमार में लोकतंत्र बहाल करने की मांग की थी और निर्वासन में रह रही ‘नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट’ (एनयूजी) का समर्थन किया था. एनयूजी, पहले की ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी’ (एनएलडी) के राजनीतिक नेताओं का विपक्षी समूह है.
म्यांमार की नई सरकार के प्रति अमेरिका का विरोध इतना ज्यादा था कि उसने 2022 में ‘बर्मा एक्ट’ नाम का कानून बनाया. इस कानून के तहत अमेरिका को म्यांमार की सैन्य सरकार पर प्रतिबंध लगाने और वहां के स्थानीय हथियारबंद संगठनों को गैर-घातक मदद देने का अधिकार मिला. अमेरिका म्यांमार के लिए ‘बर्मा’ नाम का ही इस्तेमाल करता रहा है. इससे पता चलता है कि वह म्यांमार के नेतृत्व को मान्यता देने से कितना हिचकता रहा है.
रॉयटर्स ने 8 अक्टूबर को खबर दी कि ट्रंप प्रशासन ने म्यांमार की सेना के समर्थन से बनी सरकार के साथ चुपचाप सीधे बातचीत शुरू कर दी है. अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन, आंतरिक सुरक्षा विभाग और वित्त विभाग के अधिकारियों ने जून में टोक्यो में म्यांमार सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी.
इसके बाद 15-16 सितंबर को अमेरिकी खुफिया और अनुसंधान विभाग के सहायक सचिव माइकल वान्स ने म्यांमार के राष्ट्रपति ह्लेंग से मुलाकात की. इस मुलाकात का मकसद अमेरिकी कारोबारी एडम कास्टिल्लो की रिहाई करवाना था. रॉयटर्स की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस मुलाकात से दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति और साइबर अपराध से निपटने के मुद्दों पर बातचीत का रास्ता खुला है.
हालांकि, म्यांमार के कूटनीतिक इतिहास में यह पहली बार नहीं है, जब उसकी स्थिति अचानक बदली हो. 1988 में लोकतंत्र बहाल करने के आंदोलन को दबाए जाने के बाद पश्चिमी देशों की सरकारों ने म्यांमार की सेना को अलग-थलग करना शुरू कर दिया था. लेकिन इसके उलट, चीन ने म्यांमार को ज्यादा सहयोग देना शुरू कर दिया था.
अमेरिका और भारत की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं
म्यांमार के साथ भारत के रिश्ते विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिक रणनीतिक ज़रूरतों पर आधारित रहे हैं. पिछले छह दशकों में भारत ने अपनी सुरक्षा ज़रूरतों, म्यांमार से जुड़ाव की इच्छा, भौगोलिक मजबूरियों और दोनों देशों के लोगों के आपसी संबंधों को ध्यान में रखते हुए यांगून और नेपिदाव में बनी हर सरकार के साथ रिश्ते बनाए रखे हैं.
इसके उलट, पश्चिमी देशों के कूटनीतिक रिश्ते मुख्य रूप से उनकी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और खासकर चीन को ध्यान में रखकर तय होते रहे हैं.
2011 में जब बराक ओबामा के प्रशासन ने म्यांमार की ओर हाथ बढ़ाया था, तो इसे एक कूटनीतिक पहल बताया गया था. हिलेरी क्लिंटन 50 साल से ज्यादा समय में म्यांमार का दौरा करने वाली पहली अमेरिकी विदेश मंत्री बनी थीं. म्यांमार पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई और वहां राजनीतिक सुधार शुरू हुए. राजनीतिक बदलावों के लिए रास्ते खुलने से अमेरिका को म्यांमार में अपना रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का मौका मिला था, लेकिन 2021 के सैन्य तख्तापलट ने इस पूरी योजना को बेकार कर दिया.
अब, पांच साल बाद ऐसा लगता है कि अमेरिका की नीति को एक और रणनीतिक हित प्रभावित कर रहा है. यह हित है दुर्लभ खनिज.
अमेरिका और चीन के बीच आयात शुल्क को लेकर विवाद शुरू होने के बाद से दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति का मुद्दा लगातार चर्चा में है. चीन ने इन खनिजों के निर्यात पर रोक लगा दी थी. दुनिया भर में इन खनिजों की आपूर्ति की व्यवस्था पर चीन का दबदबा रहा है.
म्यांमार में भारी दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार हैं. वहां इन खनिजों का काफी उत्पादन चीन की आपूर्ति व्यवस्था की जरूरतें पूरी करता है. अमेरिका इस मामले में चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. इसलिए म्यांमार के खनिज संसाधन उसके लिए रणनीतिक रूप से बहुत अहम हो गए हैं.
लेकिन समस्या यह है कि दुर्लभ खनिजों का उत्पादन करने वाले कई इलाकों पर ‘कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी’ जैसे स्थानीय हथियारबंद संगठनों का कब्जा है. इनमें कुछ इलाके नेपिदाव की सरकार के नियंत्रण में हैं, लेकिन हकीकत यह है कि दुर्लभ खनिजों के खनन, उनसे पैसा वसूलने और उन्हें इस्तेमाल के लायक बनाने के काम में शामिल लगभग हर दूसरा पक्ष चीन से काफी पीछे है.
नेपिदाव की सरकार और स्थानीय हथियारबंद संगठनों के साथ संबंध बनाने, व्यापार के नेटवर्क तैयार करने और अपना रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने में चीन दशकों से लगा हुआ है.
अमेरिका ने हाल ही में म्यांमार की ओर जो हाथ बढ़ाया है, उसका बचाव करते हुए अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा, “समस्याओं का समाधान उनकी अनदेखी करने से नहीं होता. उनका समाधान उनसे निपटकर ही हो सकता है.”
इस बयान से अमेरिका के इरादे साफ होते हैं.
अमेरिका की दिलचस्पी म्यांमार के लिए चीन के एक विकल्प का रास्ता खोल सकती है. लेकिन इससे म्यांमार महाशक्तियों के बीच मुकाबले के एक नए दौर का शिकार भी बन सकता है. म्यांमार में अस्थिरता का सीधा असर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों पर पड़ेगा. अमेरिका की प्राथमिकताएं भारत की प्राथमिकताओं जैसी नहीं हैं.
भारत के उत्तर-पूर्व में नई मुश्किल?
भारत को म्यांमार के साथ लगी 1,643 किलोमीटर लंबी खुली सीमा पर विद्रोह और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसी समस्याओं से भी निपटना पड़ता है. भारत की सीमा के पास खनन बढ़ने से सुरक्षा से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
म्यांमार के स्थानीय हथियारबंद संगठन सीमा के आर-पार होने वाले व्यापार पर गैरकानूनी तरीके से टैक्स वसूलकर और नशीले पदार्थों की तस्करी करके पैसा कमाते हैं. दुनिया भर के देशों की म्यांमार के खनिज संसाधनों में बढ़ती दिलचस्पी उन हथियारबंद गुटों के लिए कमाई का एक और जरिया बन सकती है, जिनका इन संसाधनों वाले इलाकों पर कब्जा है.
इससे ये गुट आधुनिक हथियार खरीदकर अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं और अपने संघर्ष को लंबे समय तक जारी रख सकते हैं.
इनमें से कई गुटों के उन भारतीय विद्रोही संगठनों से भी संपर्क रहे हैं, जो इन इलाकों में सक्रिय हैं. जब तक इन गुटों की कमाई के रास्ते बंद करने के असरदार कदम नहीं उठाए जाते, तब तक म्यांमार के अहम खनिजों को हासिल करने की होड़ वहां की अस्थिरता को और बढ़ाएगी. भारत दशकों से इसी अस्थिरता को रोकने की कोशिश करता रहा है.
इस साल की शुरुआत में म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लेंग के भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अहम और दुर्लभ खनिजों के मुद्दों पर भी बातचीत हुई थी. लेकिन खनिजों को लेकर कोई भी समझौता तब तक बेकार होगा, जब तक खनिज वाले इलाकों और उन्हें इस्तेमाल के लायक बनाने वाली व्यवस्थाओं तक पहुंच पक्की नहीं हो जाती.
जब तक भारत असम को म्यांमार के खनिजों से भरपूर कचिन राज्य से जोड़ने वाली पुरानी स्टिलवेल रोड को फिर से खोलने पर विचार नहीं करता, तब तक व्यापार के लिए एक असरदार आपूर्ति व्यवस्था बनाना मुश्किल होगा.
अंत में, भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ यानी पूर्वी देशों के साथ जुड़ाव बढ़ाने की नीति का सवाल है. स्थानीय हथियारबंद गुटों और नेपिदाव की सरकार पर जब किसी दूसरे बड़े देश का प्रभाव बढ़ रहा है, तो भारत के लिए रणनीतिक मौके कम हो सकते हैं. इससे पूर्वी देशों के साथ अपना जुड़ाव बढ़ाने की भारत की महत्वाकांक्षा भी प्रभावित हो सकती है.
भारत म्यांमार को केवल लेन-देन के रिश्तों या अमेरिका और चीन के बीच ताकत की होड़ के नजरिए से नहीं देख सकता.
इससे मिलने वाली बड़ी सीख यह है कि दूसरे देश म्यांमार के प्रति अपना रवैया अपने रणनीतिक हितों के हिसाब से बदल सकते हैं. लेकिन भारत के लिए भौगोलिक स्थिति और म्यांमार के साथ अच्छे संबंधों का इतिहास ऐसी गुंजाइश नहीं छोड़ते. अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और इन अच्छे संबंधों का किस तरह फायदा उठाता है.
रामी निरंजन देसाई इंडिया फाउंडेशन, नई दिल्ली में एक प्रतिष्ठित फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ramindesai है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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