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Wednesday, 14 October, 2026
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महंगाई और भारतीय परिवारों को लेकर RBI के 3 वर्किंग पेपर क्या बताते हैं

भारतीय घरों की रसोई में महंगाई का असर आंकड़े जुटाने वालों से पहले ही दिखने लगा था. अब RBI भी इस पर ध्यान दे रहा है.

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अगर किसी से पूछें कि भारतीय रसोई चलाने वाले लोगों के हिसाब से चीज़ों के दाम कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं, तो वे यह नहीं कहेंगे कि “5.54 फीसदी”. वे कहेंगे “10 फीसदी”. ऐसा इसलिए, क्योंकि वे रोज प्याज और खाना पकाने का तेल खरीदते हैं और LPG सिलेंडर भरवाते हैं. पहले अर्थशास्त्री ऐसे जवाबों को बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई बात मानते थे, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इन्हें सही आंकड़ों के तौर पर देखा है. RBI के हाल के वर्किंग पेपर बताते हैं कि ऐसा करना सही है. इनसे पता चलता है कि महंगाई का सबसे सही अनुमान मुंबई के ट्रेडिंग रूम में बैठे लोगों के बजाय भोपाल में खाना बनाने वाले लोगों से मिल सकता है.

सितंबर में घर पर बनी शाकाहारी थाली की कीमत पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी बढ़ गई. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त तक उपभोक्ता सामान की टोकरी में शामिल 37 फीसदी चीज़ों के दाम 4 फीसदी से ज्यादा बढ़ रहे थे. 7 अक्टूबर को मौद्रिक नीति समिति ने रेपो रेट बढ़ाकर 5.5 फीसदी कर दिया. फरवरी 2023 के बाद यह पहली बढ़ोतरी थी. पांच दिन बाद सितंबर के आंकड़ों ने पहले कही गई बातों की पुष्टि कर दी. खुदरा महंगाई अगस्त के 4.83 फीसदी से बढ़कर 5.54 फीसदी हो गई. खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़कर 7.74 फीसदी हो गई और प्याज के दाम पिछले साल के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा हो गए. असली सवाल यह नहीं है कि RBI ने क्या कदम उठाए, बल्कि यह है कि फैसला लेने से पहले उसने किन जानकारियों पर भरोसा किया.

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हर दो महीने में RBI 19 शहरों के करीब 6,000 शहरी परिवारों का सर्वे करता है. इसमें उनसे पूछा जाता है कि उनके हिसाब से अभी और आने वाले समय में चीजों के दाम कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं. अर्थशास्त्र के आम सिद्धांतों के मुताबिक, ये जवाब सही नहीं होते, क्योंकि भारतीय परिवार महंगाई का अंदाजा असल से ज्यादा लगाते हैं. ऐसा दुनिया के दूसरे देशों में भी होता है. उदाहरण के लिए, जर्मनी में जब महंगाई 0.3 फीसदी थी, तब एक सर्वे में करीब आधे लोगों का मानना था कि यह 5 फीसदी से ज्यादा है. अर्थशास्त्री इस स्थिति को “महंगाई को लेकर धारणा की पहेली” कहते हैं.

इन जवाबों में सटीकता की कमी होने के बावजूद, परिवारों की प्रतिक्रिया काफी हद तक सही संकेत देती है. वे अक्सर पांच, 10 या 15 जैसे पूरे अंकों में जवाब देते हैं. भाषा के जानकार मैनफ्रेड क्रिफ्का ने कहा था कि पूरे अंक आम तौर पर किसी बात का सामान्य अर्थ बताते हैं. अर्थशास्त्री कैरोला बाइंडर ने बताया कि इस तरह पूरे अंकों में जवाब देना अनिश्चितता का संकेत है. जब भोपाल का कोई परिवार कहता है कि महंगाई “10 फीसदी” है, तो वह कोई सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं दे रहा होता, बल्कि अपनी परेशानी जाहिर कर रहा होता है. पूर्णिमा शॉ और आरके सिन्हा के 2024 के RBI वर्किंग पेपर में बताया गया कि ऐसे जवाब, जो देखने में सटीक नहीं लगते, असल महंगाई के बारे में सटीक आंकड़ों से भी ज्यादा जानकारी देते हैं.

जब परिवारों के जवाबों का सही तरीके से अनुवाद करके उन्हें सरकारी महंगाई के आंकड़ों से मिलाया जाता है, तो लोगों की यह परेशानी महंगाई का अनुमान लगाने में काफी मदद करती है. 2020 के आखिरी महीनों से 2024 की शुरुआत तक, इस तरीके से लगाए गए महंगाई के अनुमान असल महंगाई से औसतन 1 फीसदी अंक से भी कम अलग थे. वहीं, पेशेवर लोगों के अनुमानों में औसतन 1.7 फीसदी अंक की गलती थी. वे अक्सर महंगाई का अनुमान असल से कम लगाते थे.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

कोविड-19 महामारी शुरू होने के बाद से परिवारों की आर्थिक रुझानों का अनुमान लगाने की क्षमता बढ़ी है. महामारी से पहले पेशेवर अनुमान लगाने वाले लोग महंगाई में होने वाले बदलावों का बेहतर अनुमान लगा पाते थे, लेकिन महामारी के बाद के आंकड़े बताते हैं कि परिवारों ने पेशेवर लोगों को पीछे छोड़ दिया. परिवारों ने करीब 65 फीसदी बार महंगाई के रुझान का सही अनुमान लगाया, जबकि पेशेवर लोगों के अनुमान 39 फीसदी बार ही सही रहे.

कोविड-19 महामारी के बाद परिवार महंगाई का सही अनुमान लगाने में ज्यादा बेहतर हो गए.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

जब महंगाई के आंकड़े जुटाने वालों ने काम करना बंद कर दिया

इसका सबसे मजबूत सबूत लॉकडाउन के सबसे मुश्किल महीनों में सामने आया. अप्रैल और मई 2020 में दुकानें बंद होने के कारण राज्यों के हिसाब से महंगाई के आंकड़े तैयार करने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाई. इससे आंकड़ों में जो कमी आई, वह छह साल तक बनी रही. हालांकि, RBI का परिवारों का सर्वे बिना किसी रुकावट के चलता रहा. पिछले हफ्ते प्रकाशित एक वर्किंग पेपर में शॉ और सिन्हा ने फोन पर किए गए इस सर्वे के जवाबों का इस्तेमाल करके उन महीनों के गायब आंकड़ों का फिर से अनुमान लगाया. उनके अनुमान पूरे भारत के आधिकारिक आंकड़ों के काफी करीब थे. दोनों में सिर्फ करीब 0.2 फीसदी अंक का अंतर था. ऐसे समय में, जब आधार वर्ष में बदलाव और आंकड़ों की कमी जैसी समस्याएं हैं, परिवारों का यह सर्वे भारत में कीमतों के आंकड़ों के लिए एक अहम विकल्प साबित होता है. यह सिर्फ महंगाई का अनुमान लगाने का तरीका नहीं है.

अप्रैल 2020 से मई 2021 के दौरान परिवारों के जवाबों की मदद से महंगाई के आंकड़ों का दोबारा अनुमान लगाया गया. ये आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से एक चौथाई फीसदी अंक से भी कम अलग थे.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

परिवारों को अर्थव्यवस्था में होने वाले बदलावों का एहसास एक खास विचार के कारण होता है. इसे फिलिप कैगन ने 1956 में बहुत ज्यादा महंगाई पर अपनी स्टडी के दौरान समझाया था. बाद में मिल्टन फ्रीडमैन ने भी इसे अपने उपभोग से जुड़े सिद्धांत में शामिल किया. इसे ‘अनुकूल उम्मीदें’ कहा जाता है. इसका मतलब है कि लोग अपने मौजूदा खर्चों के आधार पर भविष्य में होने वाले बदलावों का अनुमान लगाते हैं. बाद में उलरिके मालमेंडियर और स्टीफन नागेल ने भी बताया कि लोग उस महंगाई को ज्यादा महत्व देते हैं, जिसे वे खुद महसूस कर चुके होते हैं. भारत में लोगों का ऐसा अनुभव मुख्य रूप से खाने-पीने की चीज़ों और ईंधन की कीमतों से जुड़ा होता है. 2022 में RBI के एक अध्ययन में पाया गया कि दालों और मसालों जैसी चीजों का आधिकारिक उपभोक्ता सामान की टोकरी में हिस्सा भले ही कम हो, लेकिन वे परिवारों की महंगाई को लेकर उम्मीदों पर जरूरत से ज्यादा असर डाल सकती हैं, क्योंकि रोजमर्रा के खाने में इनका इस्तेमाल ज्यादा होता है.

यही वजह है कि RBI को परिवारों की महंगाई को लेकर उम्मीदों के असर को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. एक स्टडी बताती है कि जब परिवारों को लगता है कि महंगाई बढ़ेगी, तो वे बैंक की फिक्स्ड डिपॉजिट यानी सावधि जमा में अपना निवेश कम करने लगते हैं. इसका उदाहरण 2012-13 का वह दौर है, जब महंगाई बहुत ज्यादा थी और लोगों का पैसा बैंक जमा से निकलकर सोने और प्रॉपर्टी में जाने लगा था. करीब एक सदी पहले इरविंग फिशर ने इस स्थिति के बारे में बताया था. उन्होंने कहा था कि बचत करने वाले व्यक्ति की असली कमाई का पता ब्याज दर में से अनुमानित महंगाई दर घटाने पर चलता है, न कि सरकारी आंकड़ों में दर्ज महंगाई दर से. मौजूदा आंकड़े दिखाते हैं कि बचत से मिलने वाला यह आर्थिक सहारा कम हो रहा है. अगस्त में नई फिक्स्ड डिपॉजिट पर 5.67 फीसदी ब्याज मिल रहा था, जबकि जुलाई में सर्वे में शामिल परिवारों ने अनुमान लगाया था कि अगले एक साल में कीमतें 9.4 फीसदी बढ़ेंगी. इस वजह से असल में फिक्स्ड डिपॉजिट पर लोगों को नुकसान हो रहा है, क्योंकि महंगाई के मुकाबले उन्हें कम ब्याज मिल रहा है.

इसके बावजूद, लोगों की बचत करने की आदत में अभी तक कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. मार्च 2022 से मार्च 2026 के बीच बैंक की कुल जमा राशि में सावधि जमा का हिस्सा 55 फीसदी से बढ़कर करीब 62 फीसदी हो गया. इसके अलावा, अगस्त में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में निवेश बढ़ने की वजह बचत करने वालों की चिंता के बजाय मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और बाजार में सोने की कीमतों में तेजी को ज्यादा माना जा रहा है. हालांकि, हालात ऐसे बन रहे हैं कि बचत करने वालों की आदत बदल सकती है. खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतें इसकी पहली वजह हो सकती हैं. इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए उपलब्ध पैसा कम हो सकता है. यह पैसा कारखाने बनाने और छोटे कारोबारों को चलाने के लिए कर्ज देने में जरूरी होता है. RBI ने रेपो रेट बढ़ाने का फैसला इसी आर्थिक सहारे को फिर से मजबूत करने के लिए लिया है. उम्मीद है कि इससे आगे चलकर बैंक जमा पर ब्याज दरें भी बढ़ेंगी. RBI का मकसद परिवारों की महंगाई को लेकर बनी सोच के पूरे अर्थव्यवस्था में गहरी धारणा बनने से पहले ही इस आर्थिक सहारे को बहाल करना है.

अब रसोई तक RBI की बात पहुंचनी चाहिए

कई दशकों से केंद्रीय बैंक की बातचीत मुख्य रूप से उसके गवर्नर और बॉन्ड बाजार के बीच होती रही है. इस बातचीत के पीछे की सोच को अर्थशास्त्री माइकल वुडफोर्ड ने सिद्धांत के रूप में समझाया था. उन्हें और रॉबर्ट हॉल को इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया. करीब दो दशक पहले वुडफोर्ड ने कहा था कि केंद्रीय बैंक के लिए “सिर्फ नीतियों को लेकर लोगों की उम्मीदें ही मायने नहीं रखतीं, बल्कि कम से कम मौजूदा हालात में इनके अलावा बहुत कम चीजें मायने रखती हैं.” हालांकि, भारत के हाल के आंकड़े बताते हैं कि इस बातचीत को और ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. ओलिवियर कोइबियन, यूरी गोरोदनिचेंको और माइकल वेबर के शोध से पता चलता है कि जब केंद्रीय बैंक अपनी बात आसान भाषा में कहता है, तो परिवार उस पर ध्यान देते हैं और उसके हिसाब से अपनी सोच बनाते हैं. इसके अलावा, RBI के शोधकर्ताओं ने भी परिवारों से सीधे बातचीत करने की सलाह दी है.

पिछले 20 सालों में RBI ने भारत के परिवारों की आर्थिक स्थिति को समझने की कोशिश की है. अब चुनौती यह है कि परिवार RBI की बातों को समझ सकें. मौद्रिक नीति कितनी असरदार है, यह इस बात से तय नहीं होता कि मुंबई की मिंट स्ट्रीट पर रेपो रेट कब बदला गया. इसका असली असर समय के साथ दिखाई देता है, जब लोग अपने पिछले अनुभवों के आधार पर LPG सिलेंडर जैसी चीजों की कीमतें स्थिर रहने की उम्मीद करने लगते हैं. केंद्रीय बैंक के अधिकारी इसे उम्मीदों को स्थिर करना कहते हैं, जबकि एक भारतीय परिवार के लिए इसका मतलब है मन की शांति.

बिदिशा भट्टाचार्य दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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