नई दिल्ली: 1990 के दशक में जब हौज खास विलेज दिल्ली का अपना सोहो बन गया, तब शहर के फैशन और लाइफस्टाइल जगत के लोग अगले ऐसे शहरी गांव की तलाश में थे जिसे नया रूप दिया जा सके. उनकी नजर कुछ किलोमीटर दूर स्थित शाहपुर जाट पर पड़ी. यह एक शहरी गांव था, जहां खेत, तालाब और राजधानी के फैशन उद्योग का पर्दे के पीछे का काम होता था. आज यह दिल्ली के अमीर तबके के लिए चांदनी चौक बन चुका है.
उस समय शाहपुर जाट डिजाइनर लहंगों या शादी की खरीदारी के लिए नहीं जाना जाता था. तंग कमरों और कम रोशनी वाली गलियों में कारीगर कपड़े सिलते थे, कढ़ाई करते थे और मोती व सितारे लगाते थे, जो बाद में दिल्ली के शोरूम और फैशन वीक तक पहुंचते थे. लेकिन गांव खुद लगभग लोगों की नजरों से दूर था.
फिर डिजाइनरों की नजर इस जगह पर पड़ी.
कम किराये और अलग तरह की जगहों से आकर्षित होकर रितु कुमार और दस्तकार जैसे ब्रांडों ने शाहपुर जाट के पुराने घरों में स्टूडियो और वर्कशॉप खोलना शुरू किया. 1990 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती वर्षों तक NIFT और पर्ल अकादमी से निकली नई पीढ़ी के स्वतंत्र डिजाइनर भी इस गांव की ओर आने लगे. इसके बाद यहां रेस्तरां, होम डेकोर स्टोर और रचनात्मक व्यवसाय भी आने लगे.
जैसी प्रकाशन कंपनियां जैसे जगरनॉट बुक्स और पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया भी अलग-अलग समय पर शाहपुर जाट से काम करती रहीं. इससे मवेशियों और भैंसों से भरा यह इलाका एक चमकदार रचनात्मक केंद्र में बदल गया. 2010 के दशक के आखिर तक Vogue पत्रिका इसे दिल्ली की नई डिजाइन डेस्टिनेशन कहने लगी. कई लोगों ने यह भी कहना शुरू कर दिया कि इसने हौज खास विलेज को भी पीछे छोड़ दिया है, जिसमें हौज खास के सामाजिक और व्यावसायिक पतन की भी भूमिका रही.
उत्तर प्रदेश के रहने वाले और 20 साल से ज्यादा समय से शाहपुर जाट में काम कर रहे कारीगर संदीप ने कहा कि यह बदलाव लगभग रातोंरात हुआ.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “एक दिन यह गांव था और अगले ही दिन यह एक ग्लैमरस बाजार बन गया. जहां पहले गाय और भैंसें खड़ी रहती थीं, वहां अब शानदार बुटीक और लहंगे पहने पुतले दिखाई देने लगे.”
लेकिन शादी के कपड़ों की दुकानों और खूबसूरती से सजाए गए स्टोरों के नीचे एक दूसरा शाहपुर जाट भी है. यह अब भी भीड़भाड़, खराब बुनियादी ढांचे, खत्म होती खेती की जमीन और कुछ निवासियों में बढ़ती इस भावना से जूझ रहा है कि जिस गांव ने इस इलाके को पहचान दी, वह धीरे-धीरे गायब हो रहा है. नतीजा यह है कि यहां हाई फैशन और शहरी बदहाली साथ-साथ मौजूद हैं.
दिल्ली देहात प्रोजेक्ट के संस्थापक पुनीत सिंहल कहते हैं कि शाहपुर जाट की चमकदार छवि के पीछे यहां के निवासियों की असल समस्याएं छिपी हुई हैं.
उन्होंने कहा, “परिवार बेहद तंग जगहों में रह रहे हैं, जहां मुश्किल से धूप पहुंचती है. दुख की बात यह है कि यहां के लोग प्रशासन की व्यवस्था में कहीं फिट नहीं बैठते. न तो उन्हें पूरी तरह DDA की सेवाएं मिलती हैं और न ही राज्य सरकार उनकी समस्याओं का प्रभावी समाधान कर पाती है. उन्हें राम भरोसे छोड़ दिया गया है.”
मवेशियों से फैशन तक
45 वर्षीय संदीप 2000 के शुरुआती वर्षों में जौनपुर से काम की तलाश में दिल्ली आए थे. शाहपुर जाट में उनकी पहली नौकरी का वेतन 3,000 रुपये प्रति महीना था. वह गांव की कई कपड़ा वर्कशॉप में से एक में धागे गूंथने का काम करते थे. वह उस विशाल लेकिन लगभग अदृश्य श्रमिक वर्ग का हिस्सा थे, जो पर्दे के पीछे से दिल्ली के फैशन उद्योग को चलाता था.
उस समय शाहपुर जाट अब भी साफ तौर पर शहर के किनारे स्थित एक गांव था.
परिवार आसपास की जमीन पर खेती करते थे. खुले आंगन, तालाब और सामुदायिक जगहें गांव के सामाजिक जीवन का केंद्र थीं.
पहला बड़ा बदलाव 1982 के एशियाई खेलों से पहले एशियन गेम्स विलेज के निर्माण के साथ आया. इसके लिए लगभग 135 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहित की गई, जिससे शाहपुर जाट की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल गई. खेती करना धीरे-धीरे मुश्किल होता गया.
फिर 1990 के दशक में गांव में दूसरा बड़ा बदलाव आया. डिजाइनरों के आने के बाद द विशिंग चेयर जैसे होम डेकोर स्टोर और द पॉटबेली व पूचकी जैसे रेस्तरां खुले और जल्दी ही लोगों को आकर्षित करने लगे. दिल्ली का पहला डॉग-फ्रेंडली कैफे पपीचीनो भी शाहपुर जाट में खुला और आज भी चल रहा है.
जल्द ही गलियां सिलाई यूनिटों, कढ़ाई वर्कशॉप और छोटे पारिवारिक कारोबारों से भर गईं. इसने ऐसा तंत्र तैयार किया, जैसा दिल्ली के बहुत कम इलाकों में देखने को मिलता है. यहां आने वाले ज्यादातर लोग मजदूर, सप्लायर और व्यापारी थे. खरीदारी के लिए बहुत कम लोग आते थे.
संदीप ने कहा, “काम लगातार आता रहा. पहले मजदूरों की कमी होती थी. आज अगर तुलना करूं तो काम में गिरावट जरूर आई है, लेकिन स्थिति इतनी खराब नहीं है. यह मौसम के हिसाब से ऊपर-नीचे होती रहती है.”
फैशन डिजाइनर शिवा जांगड़ा नौ साल पहले अपना ब्राइडल कुट्योर ब्रांड शुरू करने के लिए शाहपुर जाट आई थीं. उनके कढ़ाई वाले लहंगों की कीमत 33,000 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक थी. उनके जैसे डिजाइनरों के लिए शाहपुर जाट सबसे सही विकल्प था.
उन्होंने कहा, “तब तक हौज खास विलेज ज्यादा पार्टी डेस्टिनेशन बन चुका था. डिजाइनर एक गंभीर फैशन मार्केट की तलाश में थे और शाहपुर जाट ने वह दिया. एक के बाद एक ब्रांड यहां आने लगे और कुछ ही समय में यह शादी की खरीदारी का बड़ा केंद्र बन गया.”
यह सिर्फ जेंट्रीफिकेशन नहीं था. शाहपुर जाट में भारत के अरबों डॉलर के शादी उद्योग पर आधारित एक नया विशेष तंत्र तेजी से विकसित हो रहा था.

शाहपुर जाट के मकान मालिक और 62 वर्षीय शिखर तिवारी, जिन्होंने अपनी दो दुकानें डिजाइनरों को किराये पर दी हैं, कहते हैं कि उन्हें लगा कि अब उनके गांव को पहचान मिल रही है.
तिवारी ने कहा, “हमें लगा कि शाहपुर जाट आखिरकार अपनी पहचान बना रहा है. पैसा आने लगा. कुछ हद तक हमें लगा कि हमारी खोई हुई जमीन का मुआवजा भगवान इस तरह दे रहा है.”
जैसे-जैसे गांव एक रिटेल डेस्टिनेशन में बदलता गया, यहां का तंत्र भी बदलने लगा. बुटीक तो लोगों की नजर में आ गए, लेकिन मजदूर नजरों से ओझल होने लगे.
कई कारीगर, जिनमें कुछ उत्तर प्रदेश और बंगाल से आए प्रवासी भी थे, बढ़ते व्यावसायिक किरायों के कारण गांव के अंदरूनी हिस्सों में जाने को मजबूर हो गए. आज शाहपुर जाट आने वाले लोगों को सबसे पहले डिजाइनर स्टोर दिखाई देते हैं. उन्हें सहारा देने वाली वर्कशॉप अक्सर रिहायशी गलियों और बिना किसी निशान वाली सीढ़ियों के पीछे छिपी रहती हैं.
ऐसी ही एक तंग और कम रोशनी वाली गली में स्थित वर्कशॉप के अंदर कारीगर लकड़ी के कढ़ाई वाले फ्रेम के चारों ओर पालथी मारकर बैठे हैं. वे बड़े ध्यान से दुल्हन के कपड़ों पर सितारे और जरी का काम कर रहे हैं. उनकी नाक पर चश्मे टिके हैं. यह काम आज भी पूरी तरह हाथ से होता है. एक कपड़े को तैयार होने में कई दिन, कभी-कभी कई हफ्ते भी लग जाते हैं.
फिर भी कई मजदूर कहते हैं कि अब यह उद्योग पहले जितना स्थिर नहीं रहा. लगभग दो दशक पहले कढ़ाई करने वाले कारीगर आम तौर पर 150 से 300 रुपये रोज कमाते थे, जबकि आज प्रीमियम ऑर्डर पर वे 600 से 1,500 रुपये रोज तक कमा सकते हैं. लेकिन ऑर्डर पहले जितने नियमित नहीं रहे और मुनाफा भी कम हो गया है, क्योंकि अब ज्यादा से ज्यादा डिजाइनर अपने खुद के कारीगर रखने लगे हैं.
तिवारी ने कहा, “हम फूलगोभी की खेती से जरी के काम में आए और अब वह भी हमारे हाथ से निकलता जा रहा है. कारोबार मुश्किल हो गया है. काम में लगभग 20 से 25 प्रतिशत की गिरावट आई है.”
एक शहरी गांव का विरोधाभास
आज शाहपुर जाट दुल्हन के कपड़ों और डिजाइनर फैशन के लिए जाना जाता है, लेकिन इसकी शुरुआती पहचान एक लाल डोरा गांव के रूप में थी.
यह शब्द 1908-09 के औपनिवेशिक दौर की जमीन व्यवस्था से आया है, जब गांव की आबादी वाले इलाके के चारों ओर लाल रेखा खींची गई थी, जिससे रिहायशी इलाकों को कृषि भूमि से अलग किया गया.
दिल्ली के कई शहरी गांवों की तरह शाहपुर जाट भी सामान्य शहरी नियोजन नियमों से काफी हद तक बाहर विकसित हुआ. लेकिन इसकी यात्रा दिल्ली के दूसरे शहरी गांवों से अलग रही. जहां हौज खास विलेज नाइटलाइफ, कैफे और बार के लिए जाना जाने लगा, और खिड़की एक्सटेंशन कलाकारों के समूहों और सस्ते किराये के लिए मशहूर हुआ, वहीं शाहपुर जाट मुख्य रूप से फैशन और डिजाइन के केंद्र के रूप में विकसित हुआ.
मेहरौली की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक स्मारकों के आसपास के पर्यटन पर आधारित रही, और लाडो सराय गैलरियों और रचनात्मक स्टूडियो के लिए जाना जाने लगा. इसके विपरीत, शाहपुर जाट ने अपनी पहचान फैशन, कपड़ों और शादी से जुड़े कारोबार के आसपास बनाई.
इससे शाहपुर जाट को दूसरे मशहूर शहरी गांवों से अलग पहचान मिली.
पूर्व डिजाइनर अव्नी कपूर बताती हैं कि उस समय डिजाइनरों के लिए शाहपुर जाट एक “आफ्टरथॉट” या “बैकअप विकल्प” जैसा था. 48 वर्षीय कपूर कहती हैं कि क्योंकि लोग बीना रमानी से प्रभावित हौज खास विलेज का खर्च नहीं उठा सकते थे, इसलिए शाहपुर जाट उनका दूसरा सबसे अच्छा विकल्प बन गया.

उन्होंने कहा, “यह कहना सुरक्षित है कि शाहपुर जाट समय की कसौटी पर खरा उतरा है. इसने हौज खास विलेज से बेहतर प्रदर्शन किया है. लेकिन स्वाभाविक रूप से हमने अपने सबसे अमीर ग्राहकों का एक बड़ा हिस्सा मेहरौली और धन मिल को खो दिया है.”
करीब दो दशक पहले कढ़ाई करने वाले कारीगर रोजाना 150 से 300 रुपये तक कमाते थे, जबकि आज प्रीमियम ऑर्डर पर वे 600 से 1,500 रुपये प्रतिदिन तक कमा सकते हैं.
आज शाहपुर जाट आने वाले ग्राहक पारंपरिक बाजारों जैसे चांदनी चौक की मोलभाव वाली संस्कृति के बजाय चुनिंदा डिजाइनर अनुभव चाहते हैं.
लेकिन जब संपन्न लोग गांव में आने लगे, तो गांव वालों का सामना ऐसी जीवनशैली और सामाजिक मान्यताओं से हुआ जो उनकी अपनी दुनिया से बिल्कुल अलग थीं.
अकेले कार चलाकर आने वाली महिलाएं, कारोबार संभालने वाली महिलाएं या सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीने वाली महिलाएं, ये सब शुरुआत में गांव वालों के लिए अलग तरह के दृश्य थे. तिवारी जैसे लोगों के लिए, जो एक रूढ़िवादी माहौल में बड़े हुए, महिलाओं को बिना किसी पुरुष साथी के अकेले घूमते और पश्चिमी कपड़ों में देखना बदलती दुनिया का संकेत था.
उन्होंने कहा, “ऐसा लगता था जैसे बाहरी दुनिया जबरदस्ती अंदर आ रही है.”
एक दुकानदार ने इसे दूसरे नजरिये से समझाया.
उन्होंने हंसते हुए कहा, “हमारी महिलाओं ने तो कभी आईब्रो बनवाने जैसी चीजों के बारे में सुना भी नहीं था.” फिर उन्होंने तुरंत साफ किया कि उनका किसी का अपमान करने का इरादा नहीं है. “आज उन्हें फिल्मी सितारों, ब्यूटी ट्रेंड्स, मेकअप, हर चीज के बारे में पता है.”
लेकिन समय के साथ ये दृश्य सामान्य हो गए.
स्पेगेटी टॉप और बेज रंग की शॉर्ट्स पहने दिल्ली की खरीदार रीटा थप्पर गांव के चमकदार दुकानों वाले हिस्से से आगे, उसकी भूलभुलैया जैसी गलियों में जाने से नहीं हिचकतीं, जहां उन्हें बुटीक की कीमत के एक हिस्से में ही दुल्हन का लहंगा मिल जाता है.
उन्होंने कहा, “आपको ऐसा लहंगा मिल सकता है जो 1 लाख रुपये के लहंगे जैसा दिखे, लेकिन सिर्फ 20,000 रुपये में. अंदर से यह बहुत सजा-संवरा नहीं दिखता और गलियां थोड़ी अव्यवस्थित लग सकती हैं, लेकिन मैंने यहां कभी खुद को असुरक्षित महसूस नहीं किया. सच कहूं तो मुझे शाहपुर जाट में घूमना सरोजिनी नगर या चांदनी चौक से ज्यादा आरामदायक लगता है.”
शाहपुर जाट के दुकानदारों के लिए अब ये टकराती संस्कृतियां “पूरी तरह सामान्य” हो चुकी हैं.
दुकानदार ने कहा, “आज महिलाएं शॉर्ट्स पहनकर गांव में घूमती हैं और कोई उन्हें घूरता तक नहीं. महिलाओं के लिए यह बहुत सुरक्षित बाजार है.”
लेकिन जब यह चमक-दमक सामान्य और एक जैसी लगने लगी, तो लोगों को अपना पुराना गांव याद आने लगा.
दुकानों के पीछे का गांव
फैशन की दुनिया में पहचान मिलने के बावजूद, कई निवासी शाहपुर जाट की कहानी इस बात से बताते हैं कि यहां क्या खो गया, न कि क्या मिला. वह चीज है जमीन.
58 वर्षीय जयकरण पवार अपने तीन मंजिला घर के बाहर खड़े होकर आसपास की घनी इमारतों की ओर इशारा करते हैं और उस दृश्य का वर्णन करने लगते हैं, जो अब मौजूद ही नहीं है.
उन्होंने कहा, “यहां एक तालाब था. जहां आज एशियन गेम्स विलेज है, वह पूरी जमीन हमारी थी. यहां हमारे खेत थे.”
इस अधिग्रहण ने सिर्फ किसानों की आजीविका नहीं छीनी, बल्कि जमीन के साथ गांव के रिश्ते को भी बदल दिया.
पवार ने कहा, “अब हम शहर का हिस्सा बन गए हैं. गांव सिर्फ नाम में बचा है, शाहपुर जाट विलेज. जाहिर है हमें दुख होता है. हमारी जमीन ले ली गई और हमारे पिता को बदले में कुछ नहीं मिला.”

इसके बाद कई लोगों ने अपने पास बची एकमात्र संपत्ति की ओर रुख किया, यानी मकान और जमीन.
घर ऊंचे बनने लगे और कमरे किराये पर दिए जाने लगे. धीरे-धीरे शाहपुर जाट खेती पर आधारित बस्ती से किराये की अर्थव्यवस्था में बदल गया, जहां व्यापारिक किराया और किरायेदारों से होने वाली आय कई परिवारों के लिए संपत्ति का मुख्य स्रोत बन गई.
इससे शाहपुर जाट दो हिस्सों में बंट गया. मूल निवासी और किरायेदार.
पुनीत सिंहल ने कहा, “गांव के लोगों का दूसरी तरफ स्वागत नहीं होता. उन्हें पार्क में भी जाने नहीं दिया जाता. लेकिन किसी को उन्हें रोकने का अधिकार नहीं है. आपने उनकी जमीन ले ली और अब उन्हें अंदर जाने से भी रोक रहे हैं.”
बाहर से चमकदार दुकानें और पार्किंग की व्यवस्था इसे एक पॉश इलाका दिखाती हैं. लेकिन अंदर की तरफ, जहां मूल निवासी आज भी रहते हैं, तस्वीर बदल जाती है. संकरी गलियां एक-दूसरे से सटी ऊंची इमारतों के बीच से गुजरती हैं. ऊपर बिजली के तार लटके रहते हैं.
एक पुराना दरवाजा शाहपुर जाट के गांव वाले अतीत की याद दिलाता है.
मुख्य बाजार की ओर खुलने वाली दुकानों का मासिक किराया कई लाख रुपये तक पहुंचता है. अंदर की गलियों में स्थित संपत्तियों का किराया अक्सर सिर्फ 40,000 रुपये के आसपास होता है. वहीं कार्यस्थलों का किराया लगभग 12,000 से 15,000 रुपये के बीच है.
जातीय परिधानों के बुटीक कोमल्या की स्टोर मैनेजर ने कहा, “इधर ज्यादा क्लाइंट्स नहीं आते. महीने में मुश्किल से 4-5 ग्राहक आते हैं. वे लोग सोशल मीडिया या किसी की सिफारिश से हमारे पास पहुंचते हैं.”
जमीन अधिग्रहण के बाद भले ही शाहपुर जाट का क्षेत्रफल घट गया, लेकिन इसकी आबादी बढ़ती रही.
परिवार बाहर की ओर फैलने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ते गए, जिससे आज का घना शहरी जंगल तैयार हुआ.
सिंहल कहते हैं कि शाहपुर जाट 5,000 से 10,000 लोगों के लिए बनाया गया था. लेकिन आज यहां करीब 25,000 लोग रहते हैं.
उन्होंने कहा, “हम शहरी गांवों में रहने वाले लोग एक विरोधाभास में जी रहे हैं. यह न पूरी तरह गांव है और न शहर. यह एक द्वीप की तरह है, जो किसी के अधिकार क्षेत्र में ठीक से नहीं आता. ऐसे गांव पूरी दिल्ली में फैले हुए हैं और बहुत ज्यादा तंग हो गए हैं.”
समृद्धि, लेकिन गड्ढों के साथ
शाहपुर जाट में समृद्धि और उपेक्षा अक्सर एक ही गली में साथ दिखाई देती हैं.
बुटीक, व्यापारिक किराये और शादी से जुड़े कारोबार से आई संपन्नता हर जगह दिखती है. साथ ही गड्ढे, जाम नालियां और भीड़भाड़ वाली सड़कें भी.
थोड़ी सी बारिश होते ही पानी भर जाता है. रिक्शा, स्कूटर, डिलीवरी कर्मचारी और पैदल चलने वाले लोग उसी थोड़ी सी जगह में रास्ता बनाने की कोशिश करते हैं और जमा पानी तथा उफनती नालियों के बीच से निकलते हैं.

एक छोटी रंगाई की दुकान के अंदर, उत्तर प्रदेश से आए 40 वर्षीय प्रवासी मजदूर नवाब यह सब देख रहे थे. उन्हें काम या भीड़ से नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की हालत से परेशानी है.
उन्होंने पूछा, “हम जाएंगे कहां. अब यही हमारा घर है.”
शाहपुर जाट के बचे हुए कुछ पशु बाड़ों में से एक. ऐसे कई ढांचे अब डिजाइनर स्टूडियो और बुटीक में बदल चुके हैं.
निवासियों और मजदूरों का कहना है कि पानी और सीवेज की व्यवस्था, जो कभी बहुत छोटी आबादी के लिए बनाई गई थी, अब कई गुना बड़ी आबादी का बोझ उठा रही है. मानसून में जलभराव और उफनती नालियां लगातार समस्या बनी रहती हैं.
22 वर्षीय रंगाई यूनिट कर्मचारी रिंकू ने कहा, “हम अपने दम पर जिंदा हैं यहां.”
सिंहल कहते हैं कि यह उपेक्षा संस्थागत है.
उन्होंने कहा, “यूरोप में हम उनकी पुरानी इमारतों और ढांचे की तारीफ करते हैं, लेकिन यहां 5,000 साल पुरानी हवेलियां टूट रही हैं और कोई उनके बारे में सोचने को भी तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसे कानून ही नहीं हैं.”
पवार ने कहा कि गांव के सामने वाले हिस्से में महंगी व्यावसायिक संपत्तियों के मालिक कई मकान मालिक भी यहां से जा चुके हैं. उन्होंने दूसरी जगह बड़े घर बना लिए हैं, लेकिन शाहपुर जाट से किराया लेते रहते हैं.
यह विभाजन पीढ़ियों के बीच भी दिखता है. बुजुर्ग लोग खोए हुए खेतों, तालाबों और गांव की जिंदगी की बात करते हैं, जबकि युवा पीढ़ी शाहपुर जाट को मुख्य रूप से आगे बढ़ने के एक पड़ाव के रूप में देखती है.
रिंकू, जिसका परिवार कई दशकों से इस गांव में रह रहा है, कहता है कि वह बेहतर अवसरों की तलाश में एक दिन नोएडा या गुरुग्राम जाना चाहता है.
उसने कहा, “मेरा परिवार इस जगह से मुझसे कहीं ज्यादा जुड़ा हुआ है.”
असली दिल्ली क्या है?
कांग्रेस कार्यकर्ता मन्नत शर्मा के लिए शाहपुर जाट के सामने सबसे बड़ा खतरा पुनर्विकास या बढ़ता किराया नहीं है. सबसे बड़ा खतरा है लोगों का भूल जाना.
उन्होंने कहा, “मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि जेन जेड को इसके बारे में कुछ नहीं पता होगा. उन्हें हमारे अस्तित्व या हमारे इतिहास के बारे में कुछ नहीं मालूम होगा. और हमने देखा है कि इतिहास में लोग और समुदाय कैसे मिटा दिए जाते हैं. हम नहीं चाहते कि लोग हमें भूल जाएं.”
इस इतिहास को बचाने के लिए शर्मा शाहपुर जाट में हेरिटेज वॉक आयोजित करना चाहते हैं. इसका मकसद लोगों को उस “असली दिल्ली” से परिचित कराना है, यानी उन गांवों और समुदायों से, जो शहर के चारों ओर फैलने से बहुत पहले यहां मौजूद थे.

इन वॉक में बुटीक के पीछे छिपी कहानियों पर ध्यान दिया जाएगा. जैसे वे तालाब जो अब नहीं रहे, वे आंगन जो किराए के कमरों में बदल गए, और वे परिवार जिनकी खेती की जमीन कभी दक्षिण दिल्ली के कई हिस्सों तक फैली हुई थी.
शर्मा ने कहा, “दिल्ली के इस हिस्से को बचाने का यही एक तरीका है. लोककथाओं के जरिए.”
किसी भी दिन शाहपुर जाट में लोग लहंगे, गहने और डिजाइनर ब्रांड खरीदने आते हैं. बहुत कम लोग उन बुटीक के नीचे छिपे गांव के बारे में सोचते हैं.
लेकिन पवार जैसे बुजुर्ग निवासियों के लिए वह गांव आज भी उनका घर है.
उन्होंने कहा, “हमने एक बार अपनी जमीन छोड़ दी थी. अब हम वह गलती दोबारा नहीं करेंगे. चाहे कितना भी बदलाव आ जाए, आपका गांव आपका गांव ही रहता है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: सत्ता से बाहर होते ही कई दल टूट क्यों जाते हैं, और कुछ दल बचे रहते हैं?