सामूहिक दलबदल (सब के सब BJP की ओर) के इस मौसम में एक-दूसरे से जुड़े तीन सवाल उभरते हैं: पार्टियां आखिर टूटती क्यों हैं? व्यक्ति दल क्यों बदलते हैं? क्या विचारधारा, सिद्धांत, या वफादारी की भी कोई अहमियत है?
इन सवालों के साथ एक केंद्रीय, तार्किक सवाल उभरता है: कुछ पार्टियां क्यों टूट जाती हैं, घातक रूप से लहूलुहान क्यों हो जाती हैं मगर कुछ पार्टियां क्यों नहीं टूटतीं?
पहले हम यह व्यापक जांच करें कि भारी ‘आवाजाही’ के इन महीनों में क्या-क्या हुआ. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का विनाश, या आंतरिक तख्तापलट सबसे बड़ी खबर बनी. लेकिन उससे होड़ लेते हुए उद्धव ठाकरे की बची-खुची शिवसेना भी फिर टूटी. झारखंड में ‘इंडिया’ गठबंधन के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग करके एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी को जिता दिया. कांग्रेस पार्टी खुश हो सकती है कि कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार ने एमएलसी के चुनाव में एनडीए के कुछ विधायकों से क्रॉस वोटिंग करवा ली.
आम आदमी पार्टी ने अपने सात सदस्य गंवाए, बीजू जनता दल ने BJP/NDA की झोली में अपने तीन सदस्यों का ‘योगदान’ दिया, अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी की ‘YSRCP’ ने भी अपने कुछ सदस्य कम किए. सबने NDA (BJP) की संख्या में इजाफा किया. धर्म की गोंद और अनूठी विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद शिरोमणि अकाली दल के अंदर से भी विदाई हुई, मनप्रीत सिंह बादल समेत. उनमें मनजिंदर सिंह सिरसा भी हैं, जो अब दिल्ली में मंत्री हैं.
अगर मैं BJP में शामिल होने वाले कॉंग्रेसियों की सूची बनाने लगूं तो यह पूरा कॉलम भी छोटा पड़ेगा. इसलिए मैं केवल उनके नाम लूंगा जो भाजपा में जाकर मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बने, या कांग्रेस में मुख्यमंत्री थे. मुख्यमंत्री का पद आखिर उन सबसे बड़े पदों में है, जिसकी पेशकश कोई पार्टी कर सकती है.
आज भाजपा के मुख्यमंत्रियों में से तीन कांग्रेस से आए हैं: असम के हिमंत बिस्वा सरमा, अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू, और त्रिपुरा के माणिक साहा. हाल तक मणिपुर के मुख्यमंत्री रहे एन. बीरेन सिंह का नाम भी आप इनमें शामिल कर सकते हैं. ये चारों कांग्रेस में प्रमुख पदों पर थे. नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल ज्योतिरादित्य सिंधिया, किरण रिजिजू, राव इंदरजीत सिंह, जितिन प्रसाद, और रवनीत सिंह बिट्टू का नाम भी लिया जा सकता है.
लगभग ये सारे नेता कांग्रेस के ख्यात परिवारों के हैं. BJP में शामिल होने वाले कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों की संख्या एक फुटबॉल टीम के बराबर है : कैप्टन अमरिंदर सिंह, पेमा खांडू, अशोक चव्हाण, एस.एम. कृष्ण, नारायण दत्त तिवारी, दिगंबर कामत, किरण कुमार रेड्डी, विजय बहुगुणा, आदि-आदि. पेमा खांडू के सिवा किसी को भाजपा से कोई लाभ नहीं हासिल हुआ, सिवा सुरक्षा के, या नुकसान से बचाव के.
कहा जा सकता है कि सभी पार्टियों में नुकसान में रहे नेताओं के लिए BJP चुंबक जैसी है, क्योंकि लाभ वहीं जाकर मिल सकता है. इसके अलावा, BJP विरोधियों को तोड़ने के लिए ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति अपनाती है. जिन नेताओं के खिलाफ पहले वह भ्रष्टाचार के आरोप लगाती है उनके लिए ‘लाउंड्री’ बनने की उसकी राजनीति भी इस एकतरफा दलबदल का कारण है. सामूहिक दलबदल कराने के लिए भाजपा ने फूट डालने की कला में महारत हासिल कर ली है. उनके दो-तिहाई सदस्यों को पाला बदलने के लिए तैयार कर लो, और दावा करो कि अलग हुआ गुट ही असली पार्टी है. इससे दो सवाल पैदा होते हैं : एक तो यह कि विरोधी पार्टियों में तोड़फोड़ करने का चलन क्या अब शुरू हुआ है? दूसरा सवाल यह, जिसे हमने पहले ही उठाया था, कि अधिकतर पार्टियां क्यों टूट जाती हैं या अपने प्रतिभाशाली सदस्यों को क्यों गंवा देती हैं जबकि कुछ पार्टियों में ऐसा क्यों नहीं होता? बावजूद इसके कि वे लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहती हैं.
काँग्रेस इस खेल की उस्ताद रह चुकी है. वास्तव में, सुप्रीम कोर्ट ने जब तक बोम्मई मामले में (11 मार्च 1994 को) फैसला नहीं सुनाया था तब तक कांग्रेस अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल करके विरोधी दलों की सरकारों को गिराती रही. अब फर्क यह आया है कि अपना विस्तार करने के लिए सिर्फ ‘अधिग्रहण’ का सहारा लिया जा रहा है. BJP यह उद्योग वाले पैमाने पर कर रही है.
यह हमें हमारे दूसरे सवाल के सामने ला खड़ा करता है. अधिकतर पार्टियां क्यों टूट जाती हैं, और कुछ पार्टियों में टूट क्यों नहीं होती? जो नहीं टूटतीं उनमें केवल तीन के नाम मैं बता रहा हूं. भाजपा तो है ही, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, और वाम दल. वामपंथियों में ट्रोट्स्की, लेनिन, बीजिंग, और मॉस्को को लेकर खूब बहस और टूट-फूट हो चुकी है लेकिन वे एक मोर्चे के रूप में एकजुट रहे हैं. विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता इन पार्टियों को एकजुट रखती है. वाम दल आज सत्ता से बिल्कुल बाहर हैं और अपने इतिहास में सबसे निचले स्तर पर हैं. लेकिन उनमें से कोई भी कहीं जाने का रास्ता नहीं तलाश रहा है.
कांग्रेस लोकसभा में अपने सबसे निचले स्तर (44 सीटें) पर 2014 में पहुंची. 1984 के आम चुनाव में BJP मात्र दो सीटों पर सिकुड़ गई थी, फिर भी एकजुट रही. वास्तव में, अपनी स्थापना (भारतीय जनसंघ के रूप में) के 75 वर्षों में BJP 2014 से पहले केवल छह साल सत्ता में रही. लेकिन उसमें कोई विभाजन नहीं हुआ, और उसमें से केवल एक उल्लेखनीय और अल्पकालिक दलबदल का मामला गुजरात में शंकर सिंह वाघेला का है. इसके उलट कांग्रेस कई बार टूटी और हालत यहां तक पहुंची कि टूटने वाले गुट को अपना नाम तय करने के लिए मूल नाम ‘कांग्रेस’ के साथ जोड़ने लायक शब्द का अकाल पड़ गया.
भाजपा से कुछ उल्लेखनीय अलगाव हुए जिनका जिक्र जरूरी है. पहला उदाहरण बलराज मधोक का है, जो जम्मू से ‘स्वयंसेवक’ थे और जिनकी अध्यक्षता में पार्टी ने 1967 के चुनाव में 35 सीटें जीतीं, जो सबसे बड़ी संख्या थी. मधोक आर्थिक नीति के मामले में स्वतंत्र पार्टी जैसी ‘सही सोच वाली’ ताकतों से पार्टी को जोड़ने के मुद्दे पर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सरीखे साथी नेताओं से लड़ पड़े थे. विरोधाभास यह था कि RSS इस मामले में गांधीवाद के ज्यादा करीब था और मधोक इसे वामपंथी झुकाव के रूप में देखते थे या इंदिरा गांधी के विचारों से समानता मानते थे. 1973 में मधोक को जनसंघ के अंदर किनारे कर दिया गया, और वे नाराज हो गए. उन्होंने पार्टी के नेताओं, खासकर वाजपेयी पर तीखे हमले किए, लेकिन किसी विरोधी दल में नहीं गए. इंदिरा गांधी फिर भी उन्हें खतरा मानती रहीं और इमरजेंसी के दौरान उन्हें जेल में डाल दिया था.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापकों में शामिल रहे मधोक करीब एक दशक पहले, एकाकी जीवन जीकर 96 की उम्र में दुनिया से रुखसत हुए. 2010 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि इंदिरा गांधी ने 1980 में उन्हें मंत्री पद की पेशकश की थी, लेकिन स्वयंसेवक होने के नाते वे लालच में नहीं फंसे.
बाद में हमने पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्रियों कल्याण सिंह, उमा भारती और बी.एस. येदयुरप्पा को बगावत करते देखा. लेकिन इन सबने घर वापसी की. ऐसे नेताओं में केवल एक ने ही थोड़ी सफलता हासिल की लेकिन वे टिके नहीं. वाघेला ने 1995 में भाजपा के 47 विधायकों के साथ बगावत की थी और केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी पर, जो उस समय पार्टी के आज्ञाकारी सदस्य थे, आरोप लगाया था कि इन लोगों ने उन्हें पार्टी में दरकिनार किया. वाघेला कांग्रेस के सहयोग से एक साल तक मुख्यमंत्री रहे. बाद में, उन्होंने अपने गुट का कांग्रेस में विलय कर दिया, उसके टिकट पर दो बार सांसद चुने गए और 2004 में केंद्रीय कपड़ा मंत्री बने. इसके बाद धीर-धीरे वे कमजोर पड़ते गए. आज 85 साल की उम्र में वे अलगथलग जीवन जी रहे हैं.
भाजपा और वाम दलों के बियावान वाले दौर की बराबरी आश्चर्यजनक रूप से समाजवादी पार्टी ने की, जिसकी स्थापना मुलायम सिंह यादव ने की थी. 1992 (बाबरी मस्जिद विध्वंस) के बाद ओबीसी-मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर रहीं पार्टियों में सपा ही सबसे टिकाऊ रही. उसकी विचारधारा काफी स्पष्ट है और अखिलेश यादव ने अपने वोट बैंक का भरोसा कायम रखा है. इसलिए यह विश्वास बना हुआ है कि सत्ता एक-न-एक दिन तो वापस मिलेगी ही.
यह विश्वास जिस राजनीतिक शक्ति में बना हुआ है वह कांग्रेस भी है. कई क्षेत्रीय पार्टियां,TMC, NCP, YSRCP आदि इससे अलग होकर ही बनीं. इनके अपने नेता निरंतर अवसरों की तलाश में रहे हैं. जाहिर है, समय बीतने के साथ सत्ता ही उनकी मुख्य विचारधारा बन गई. सत्ता गई, और इसके साथ उनके कई लोग भी गए. TMC, उद्धव-शिवसेना समेत दूसरे क्षेत्रीय दल कुलमिलाकर एक परिवार वाली पार्टियां रहीं. परिवार वोट जीतने में विफल हुआ तो पार्टी भी टूट गई. अकाली दल के पतन की मूल वजह यह रही कि धार्मिक विचारधारा से गहरे जुड़ी यह पार्टी भी पारिवारिक उपक्रम में तब्दील हो गई.
अपनी विचारधारा से जुड़ाव BJP में अब तक तो कायम रहा है. इसके अंदर असंतोष तो उभरता रहा है लेकिन बगावत नहीं हुई है. शाखा संस्कृति के आपसी दबाव, RSS और कार्यकर्ताओं के बीच गुरु-शिष्य वाले रिश्ते ने इसे एकजुट बनाए रखा है. इसने कई परिवारों को आयात किया है और अपने भी कुछ परिवारों को पोषण दिया है, लेकिन सत्ता अपने घर में उभरे नेताओं के हाथों में ही रही है, जिनमें वैचारिक शुद्धता रही है. इसी ने तब भी इसमें एकता बनाए रखी है जब आज वह सत्ता में है, और तब भी जब छह दशकों तक वह सत्ता से बाहर रही.
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