मुंबई: रात के 11 बजे तक, जब डिनर कर लिया जाता है और वर्सोवा के पीछे की तंग गलियों में बर्तन धो दिए जाते हैं, तब परिवार समुद्र तट की ओर चलना शुरू कर देते हैं. पुरुष बनियान और शॉर्ट्स पहनकर निकलते हैं, महिलाएं नाइटगाउन में होती हैं, बच्चे आंखों से नींद मलते हुए चलते हैं और छोटे बच्चे गोद में होते हैं.
कुछ लोग बुनी हुई चटाइयां लाते हैं, तो कुछ पुराने गलीचे और पतली चादरें. वे इन्हें रेत पर बिछा देते हैं, इतने पास कि समुद्र की हवा महसूस हो सके, लेकिन इतने दूर कि पानी तक न पहुंचे, और फिर खुले आसमान के नीचे रात बिताने के लिए लेट जाते हैं.
लेकिन खुले में सोने का यह साधारण सा काम अब वर्सोवा बीच को एक वर्ग संघर्ष की जगह बना चुका है, जिससे पलायन और इस सवाल को लेकर पुरानी चिंताएं फिर सामने आ गई हैं कि मुंबई के सार्वजनिक स्थानों पर किसका हक है.
“अगर आपके पास रहने की जगह नहीं है तो कृपया मुंबई छोड़ दें.” पिछले हफ्ते एक्स पर की गई यह पोस्ट वायरल हो गई. इसके बाद अपेक्षाकृत संपन्न लोगों ने बीच पर सोते लोगों की तस्वीरें साझा कीं और एक्स व इंस्टाग्राम पर “अतिक्रमण” और “बिहारिफिकेशन” की शिकायतें कीं. कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री को टैग करके “कार्रवाई” की मांग भी की.
एक पोस्ट में शिकायत की गई, “सागर कुटीर के लोग इधर-उधर घूमते रहते हैं, इसलिए वर्सोवा बीच लोगों की पहुंच से बाहर हो गया है.” इसमें पास की सरकारी अधिसूचित झुग्गी बस्ती सागर कुटीर का जिक्र था.
लेकिन सागर कुटीर के ये “बाहरी” लोग मुंबई को चलाने वाली उसी मशीन का हिस्सा हैं. इनमें दक्षिण मुंबई के दफ्तरों में खाना पहुंचाने वाले डब्बावाले, सुबह की भीड़ में ऑटो चलाने वाले ड्राइवर और समुद्र किनारे बने हवादार अपार्टमेंटों की सफाई करने वाली घरेलू कामगार शामिल हैं.
“लोग सोचते हैं कि हम मजे करने के लिए बीच पर आते हैं. यह कोई पिकनिक नहीं है. यही एक तरीका है जिससे हमें थोड़ी हवा मिलती है. रात में भी गर्मी कम नहीं होती. सुबह तक पसीना आता रहता है. कोई ऐसे कैसे सो सकता है? मैं अपने स्कूल जाने वाले बच्चों को ऐसे कैसे सुलाऊं?”
— सदाशिव पाटिल, सागर कुटीर में रहने वाले ऑटो-रिक्शा चालक
उनके लिए बीच कोई मनोरंजन की जगह नहीं, बल्कि मुंबई की भीषण गर्मी से राहत पाने का जरूरी जरिया है. शहर में कुछ लोग दिन-रात कई एसी चला सकते हैं. वहीं कुछ लोग एक चटाई लेकर समुद्र किनारे आते हैं और उम्मीद करते हैं कि सुबह तक हवा चलती रहे.
सुरेखा बाचे ने कहा, “हम रात में बीच पर इसलिए आते हैं क्योंकि यहां हम कुछ घंटे बिना लगातार पसीना बहाए सो सकते हैं.” वह दिन में सेवन बंगलो इलाके के एयर कंडीशन वाले घरों में सफाई का काम करती हैं और रात में मुंबई के उत्तर-पश्चिमी उपनगर में वर्सोवा बीच के पास सागर कुटीर स्थित अपने घर लौटती हैं. उनके घर की रसोई में एग्जॉस्ट फैन तक नहीं है.
सागर कुटीर संघ में 150 वर्ग फुट के घरों में पूरे परिवार रहते हैं. टिन की छतें हैं, छोटी खिड़कियां हैं, हवा आने-जाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और एसी भी नहीं हैं. गर्मी बढ़ने पर ये कमरे दम घोंटने वाली भट्ठियों में बदल जाते हैं.

इस साल कमजोर मानसूनी हवाओं और विकसित हो रहे एल नीनो, यानी प्रशांत महासागर के गर्म होते पानी, जिसने बारिश के पैटर्न को प्रभावित किया है, के कारण महाराष्ट्र को बारिश का इंतजार करना पड़ रहा है और शहर कई हफ्तों से उमस भरे प्री-मानसून मौसम में फंसा हुआ है. जैसा पिछले महीने दिल्ली में देखा गया, गर्मी के दौर में रातें सबसे ज्यादा मुश्किल हो सकती हैं. खासकर तंग और खराब हवादार घर सूर्यास्त के बाद भी ठंडे नहीं हो पाते.
26 वर्षीय मार्शल आर्ट ट्रेनर और कराटे में ब्लैक बेल्ट हासिल कर चुके बबलू मंडल का कहना है कि वर्सोवा बीच के पास मैंग्रोव के कटने से भी गर्मी बढ़ी है. ये मैंग्रोव वर्सोवा और भायंदर को जोड़ने वाली कोस्टल रोड परियोजना के उत्तरी विस्तार के लिए काटे गए थे.
मंडल ने कहा, “आप समुद्र किनारे जो लकड़ियां देख रहे हैं, वे उन्हीं मैंग्रोव पेड़ों की हैं जिन्हें कोस्टल रोड परियोजना शुरू होने से पहले काटा गया था. ये पेड़ हमें कुछ ठंडक और आश्रय देते थे. हमारे घर समुद्र से मुश्किल से 100 मीटर दूर हैं. ये मैंग्रोव बाढ़ और पानी को हमारे घरों में आने से भी रोकते थे. अब हमारे पास सिर्फ उमस और पसीना बचा है.” वह अपने परिवार के साथ बीच पर सोने आए थे.
मंडल ने कहा, “मेरा जन्म मुंबई में हुआ, लेकिन मेरे पिता 1980 के दशक के आखिर में अपने माता-पिता के साथ बिहार से यहां आए थे. मेरे पिता ऑटो-रिक्शा चालक हैं और लंबे समय तक काम करते हैं. यहां सो रहे लगभग सभी लोगों की तरह उन्हें भी बिना घुटन और लगातार पसीना बहाए 6-7 घंटे की शांति भरी नींद चाहिए.”

दिन में डब्बावाले, रात में बीच पर सोने वाले
मुंबई के डब्बावाले शहर की सौ साल से भी पुरानी पहचान हैं, जो घर का बना खाना शहर भर के दफ्तरों तक पहुंचाते हैं. सफेद वर्दी और गांधी टोपी पहने, लोकल ट्रेनों में एक से दूसरी ट्रेन पकड़ते हुए वे अपनी “सिक्स सिग्मा” डिलीवरी सटीकता के लिए मशहूर हैं. लेकिन डब्बावाले भी थकते हैं. सागर कुटीर में वे अगले दिन की भागदौड़ शुरू होने से पहले बस कुछ घंटे आराम करना चाहते हैं.
46 वर्षीय मौली मोहन दिन में डब्बावाले का काम करते हैं. रात में वे वर्सोवा बीच पर लाल-सफेद प्लास्टिक की बुनी हुई चटाई पर बैठते हैं. तब उन्होंने अपनी वर्दी नहीं, बल्कि एक पुरानी पीली टी-शर्ट और रेत से सने काले शॉर्ट्स पहने होते हैं.
“सुबह जब मैं दादर में डिब्बे लेने जाता हूं, तो लोगों के दरवाजे पर इंतजार करता हूं. कभी-कभी मैं उनके ड्रॉइंग रूम के अंदर देखता हूं. एसी चल रहे होते हैं और छत के पंखे पूरी रफ्तार पर होते हैं. कुछ के पास इतनी हवा वाली बालकनियां हैं. मुझे उनसे ईर्ष्या नहीं है, लेकिन हमारी जिंदगी ऐसी नहीं है.”
— मौली मोहन, डब्बावाला और सागर कुटीर निवासी
उन्होंने कहा, “मैं एक सामान्य नागरिक से ज्यादा कुछ नहीं हूं, जो एक असामान्य जिंदगी जी रहा है.” उनका घर 200 वर्ग फुट का एक कमरा है, जहां हवा आने-जाने की बहुत कम व्यवस्था है. उनकी मासिक आय 20,000 रुपये है और घर में सिर्फ एक पंखा है.
“सुबह जब मैं दादर में डिब्बे लेने जाता हूं, तो लोगों के दरवाजे पर इंतजार करता हूं. कभी-कभी मैं उनके ड्रॉइंग रूम के अंदर देखता हूं. एसी चल रहे होते हैं और छत के पंखे पूरी रफ्तार पर होते हैं. कुछ के पास इतनी हवा वाली बालकनियां हैं. मुझे उनसे ईर्ष्या नहीं है, लेकिन हमारी जिंदगी ऐसी नहीं है.”
उन्होंने कहा कि लोग बिना अनुमति बीच पर सो रहे लोगों की तस्वीरें खींच रहे हैं, इससे वे परेशान हैं.
उन्होंने तीखे स्वर में कहा, “यह किसी की पसंद नहीं है. हमें ऐसे देखा जा रहा है जैसे हमने बीच पर कब्जा कर लिया हो. यह सच नहीं है. हम घर पर सोना ज्यादा पसंद करेंगे. लेकिन वहां इतनी गर्मी और पसीना है कि सोना नामुमकिन है. हम यहां रात में सिर्फ कुछ घंटों के लिए आते हैं और सुबह ज्यादातर लोगों के उठने से पहले ही चले जाते हैं.”

अब समुद्र किनारे की रात की अपनी एक लय बन गई है. पुरुष रात 8 या 9 बजे काम से लौटते हैं, खाना खाते हैं और चटाई व चादरें लेकर बीच पर पहुंच जाते हैं. महिलाएं और बच्चे बर्तन धोने के बाद, आधी रात के करीब आते हैं. जैसे-जैसे रात गहराती है, बीच पड़ोसियों के लिए मजेदार किस्से साझा करने और शहर में रोजमर्रा की जद्दोजहद पर बात करने की जगह बन जाता है.
52 वर्षीय डब्बावाला विलास शिंदे, जो दो दशक पहले पुणे से मुंबई आए थे, सागर कुटीर के अन्य निवासियों के साथ गोल बैठकर अपना नया दुःस्वप्न सुना रहे थे. वह था उनका बिजली बिल.
उन्होंने कहा, “अप्रैल का मेरा बिजली बिल 22,550 रुपये आया. मई में सिर्फ 2,290 रुपये आया. अब इस महीने उन्होंने कुल बकाया बिल 24,840 रुपये भेज दिया है.” उनके दोस्तों ने हैरानी से उनकी तरफ देखा और पूछा कि क्या वह मजाक कर रहे हैं.

यह साबित करने के लिए शिंदे ने अपना फोन निकाला, व्हाट्सऐप पर आया अदानी इलेक्ट्रिसिटी का संदेश खोला और सभी को बिल दिखाया. उनके दोनों बच्चे कॉलेज में पढ़ते हैं और पार्ट टाइम काम भी करते हैं, जबकि शिंदे पूरे दिन लोगों तक ताजा घर का बना खाना पहुंचाते हैं.
उन्होंने कहा, “मैंने पिछले एक महीने में इसे ठीक कराने के लिए तीन अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाए. मेरे बिल में सिर्फ ‘एडजस्टमेंट्स’ के तहत ‘नेट चार्जेज’ अप्रैल में 22,550 रुपये दिख रहे हैं. कोई मुझे यह भी नहीं समझा पा रहा कि इसका मतलब क्या है.”
उनके दोस्त संतोष शिवेकर, जो हर दिन टिफिन पहुंचाते हैं, ने गंभीरता से बिल पढ़ा और फिर अपने फोन में आया एक संदेश दिखाया. इस बार बिल 8,000 रुपये का था. सभी ने हैरानी जताई.
एक दोस्त ने पूछा, “तुम्हारा बिल भी इतना ज्यादा कैसे आया?”
शिवेकर ने जवाब दिया कि उन्हें कोई अंदाजा नहीं है. दिनभर घर पर कोई नहीं रहता. उनकी पत्नी घरेलू कामगार हैं और बेटा एक छोटी फाइनेंस कंपनी में काम करता है.
उन्होंने कहा, “मेरे घर में भी टीवी या एसी नहीं है. दिनभर घर पर कोई नहीं रहता. फिर बिल इतना ज्यादा कैसे आ सकता है?”
दोनों दोस्तों ने अगले हफ्ते अंधेरी के एमआईडीसी स्थित अदानी इलेक्ट्रिसिटी कस्टमर केयर सेंटर जाकर शिकायत करने का फैसला किया.
शिवेकर ने कहा, “चलो, साथ चलते हैं.”
जैसे ही लोगों का वह समूह उठने लगा, उनकी पत्नियां और बच्चे रंग-बिरंगी बुनी हुई चटाइयां और प्लास्टिक की पानी की बोतलें लेकर समुद्र किनारे पहुंच गए, रात बिताने के लिए तैयार.
150 वर्ग फुट की भट्ठियां
सागर कुटीर की तंग गलियों के अंदर घर कमरों में बंटे हुए नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से ढाले गए हैं.
150 वर्ग फुट की जगह एक साथ रसोई, बेडरूम, बैठक, स्टोर रूम और पढ़ाई का कोना बन जाती है. कपड़े फ्रिज और दरवाजों के ऊपर टंगे रहते हैं, स्टील के बर्तन खुली अलमारियों में ऊपर तक रखे होते हैं, मसालों के डिब्बे टाइल लगी दीवारों की छोटी जगहों में सजे होते हैं और गैस सिलेंडर रसोई के स्लैब के नीचे रखे रहते हैं.
जहां भी लोगों को थोड़ा रंग और खुशी जोड़ने का मौका मिला, उन्होंने ऐसा किया है. दीवारों को चमकीले रंगों से रंगा गया है और उन पर डिजाइन वाली टाइलें लगी हैं. हर उपलब्ध कोने में छोटे मंदिर, परिवार का सामान और दूसरी चीजें जितनी व्यवस्थित हो सकती हैं, उतनी रखी गई हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक, ग्रेटर मुंबई नगर निगम के तहत आने वाली इस सरकारी मान्यता प्राप्त झुग्गी बस्ती में 2,414 परिवार और 10,595 लोग रहते थे. आज यहां के निवासी कहते हैं कि 2 एकड़ के इस इलाके में करीब 3,000 परिवार और 15,000 से 20,000 लोग रहते हैं. ज्यादातर घर यहां के लोगों के अपने हैं, हालांकि कुछ परिवार किराये पर रहते हैं और हर महीने 2,000 से 5,000 रुपये किराया देते हैं.
कई घरों में घरेलू काम करके हर महीने 18,000 रुपये कमाने वाली सुरेखा बाचे के लिए समस्या सिर्फ घर के छोटे होने की नहीं है, बल्कि रात में गर्मी का असर भी है.
उन्होंने कहा, “पूरा दिन हम दूसरे लोगों के घरों में काम करते हैं. झाड़ू-पोछा करते हैं, बर्तन धोते हैं, खाना बनाते हैं, सफाई करते हैं. जब हम वापस आते हैं तो हमें सिर्फ कुछ घंटे की अच्छी नींद चाहिए.”
उन्होंने कहा, “लेकिन घर के अंदर इतनी गर्मी हो जाती है कि लेटना भी मुश्किल लगता है. पंखा सिर्फ गर्म हवा फेंकता है.”
“अगर हम ठीक से नहीं सोएंगे तो अगले दिन काम कैसे करेंगे? हमें लोगों के घरों में जाकर झाड़ू-पोछा करना है, कपड़े धोने हैं, बर्तन साफ करने हैं. फिर घर लौटकर अपने घर और बच्चों के लिए भी यही सब करना है. हमारे शरीर को आराम चाहिए.”
— उज्ज्वला पडवाल, सागर कुटीर निवासी
उनकी 20 वर्षीय बेटी विधिशी बाचे, जो बीकॉम के तीसरे वर्ष की छात्रा हैं, ने कहा कि वे जगह की कमी के आदी हो चुके हैं, लेकिन गर्मी ने सामान्य जीवन को बिगाड़ दिया है.
उन्होंने कहा, “रात में जब बहुत गर्मी होती है तो बच्चे और बुजुर्ग बेचैन हो जाते हैं. छोटे बच्चे रोने लगते हैं. इसलिए लोग बीच पर जाते हैं. कम से कम यहां थोड़ी हवा तो मिलती है.”
कुछ हफ्ते पहले स्थिति और खराब हो गई, जब इलाके में नागोरी डेयरी के पास एक बिजली के मीटर बॉक्स में शॉर्ट सर्किट और आग लग गई.
विधिशी ने कहा, “हम लगातार चार दिन तक बिजली के बिना रहे. तब पूरे सागर कुटीर को रात बिताने के लिए बीच पर जाना पड़ा.”
उनकी पड़ोसी उज्ज्वला पडवाल ने बताया कि बस्ती की महिलाएं बिना सोए रात नहीं काट सकतीं, क्योंकि उनकी सुबह सूरज निकलने से पहले शुरू हो जाती है. जिन अपार्टमेंटों में वे काम करती हैं, वहां पहुंचने के लिए उन्हें सूर्योदय से पहले या उसके तुरंत बाद बीच छोड़ना पड़ता है. एसी वाले फ्लैटों में उनका इंतजार करने वाले मालिक देर से आने वालों को पसंद नहीं करते.
उन्होंने कहा, “अगर हम ठीक से नहीं सोएंगे तो अगले दिन काम कैसे करेंगे? हमें लोगों के घरों में जाकर झाड़ू-पोछा करना है, कपड़े धोने हैं, बर्तन साफ करने हैं. फिर घर लौटकर अपने घर और बच्चों के लिए भी यही सब करना है. हमारे शरीर को आराम चाहिए.”
उनके लिए चटाइयां, गलीचे, बेटियों और छोटे बच्चों को लेकर बीच तक जाना कोई शाम की सैर नहीं है. यह सिर्फ इतना आराम पाने का तरीका है कि वे अगले दिन फिर दूसरे लोगों के घरों की सफाई करने जा सकें.
55 वर्षीय ऑटो-रिक्शा चालक सदाशिव पाटिल इस बात से नाराज हैं कि लोग उनके जैसे लोगों को सार्वजनिक जगहों का गलत इस्तेमाल करने वाला समझते हैं.
उन्होंने कहा, “लोग सोचते हैं कि हम मजे करने के लिए बीच पर आते हैं. यह कोई पिकनिक नहीं है. यही एक तरीका है जिससे हमें थोड़ी हवा मिलती है.”
उन्होंने कहा, “रात में भी गर्मी कम नहीं होती. सुबह तक पसीना आता रहता है. कोई ऐसे कैसे सो सकता है? मैं अपने स्कूल जाने वाले बच्चों को ऐसे कैसे सुलाऊं?”

निजता का विशेषाधिकार
मुंबई की एक चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म में काम करने वाले 30 वर्षीय सागर ठाकुर के लिए गर्मी समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है. उनके मुताबिक दूसरी समस्या सागर कुटीर का पुराना और जरूरत से ज्यादा दबाव झेल रहा बिजली नेटवर्क है. यहां कई लोग चाहकर भी एसी नहीं लगा सकते.
ठाकुर, जो सागर कुटीर में अपने माता-पिता और छोटी बहन के साथ 200 वर्ग फुट के घर में रहते हैं, ने कहा, “यहां की बिजली की लाइनें पुरानी हैं. इस लोड पर नया एसी नहीं चल सकता. अगर बहुत से लोग भारी बिजली वाले उपकरण इस्तेमाल करेंगे तो लाइनें उसका बोझ नहीं उठा पाएंगी.”
उन्होंने भी उस बिजली की आग की घटना को याद करते हुए सिहरन जताई, जिसके कारण चार दिन तक बिजली नहीं रही.
उन्होंने कहा, “उस समय हमारी मदद के लिए कोई नहीं आया. लोगों को खुद ही सब संभालना पड़ा. इतनी गर्मी में, बिना बिजली और पंखों के, परिवार क्या करें?”
भीड़ से भरे बीच की तस्वीरें वायरल होने के बाद इस मामले ने राजनीतिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है. कांग्रेस सांसद वरषा गायकवाड़ ने गुरुवार को एक्स पर एक पोस्ट में महायुति सरकार की आलोचना की.
मुंबई नॉर्थ सेंट्रल का प्रतिनिधित्व करने वाली और मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस समिति की अध्यक्ष सांसद ने लिखा, “बेकाबू निर्माण के कारण बन रहे हीट आइलैंड की परवाह न करने वाली और बार-बार होने वाली बिजली कटौती को लेकर बेपरवाह सरकार ने सचमुच गरीबों को सड़क पर ला दिया है.”
A government unmindful of the heat island they are creating due to the rampant construction, uncaring about the frequent power cuts has literally brought the poor on the road. People sleeping at Versova beach due to the extreme heat amid power cuts. This government came to power… pic.twitter.com/TWsdV1ixWi
— Prof. Varsha Eknath Gaikwad (@VarshaEGaikwad) June 18, 2026
कुछ लोगों ने उनकी बात से सहमति जताई. वहीं कुछ लोगों ने प्रवासियों और झुग्गियों को लेकर वही पुरानी बातें दोहराईं.
एक व्यक्ति ने लिखा, “यह तब होता है जब आप और आपकी पार्टी 50 साल से ज्यादा समय तक लगातार प्रवासियों की बड़ी-बड़ी झुग्गियां बनाती रहती है. आज ये झुग्गी निवासी, जिनमें ज्यादातर प्रवासी हैं, बीच पर सो रहे हैं, कल वे सार्वजनिक बगीचों में होंगे.”
इस बीच, लोग इस बात को लेकर और ज्यादा नाराज हो रहे हैं कि जब वे अपनी सबसे मुश्किल स्थिति में होते हैं, तब उनकी वीडियो बनाई जाती है और उन्हें अतिक्रमण करने वाला बताया जाता है.
ठाकुर ने कहा, “यहां के लोग बहुत गुस्से में हैं. हमें ऐसे देखा जा रहा है जैसे हम अतिक्रमण करने वाले हैं, जैसे हमारा कोई घर नहीं है और हमें जीने का कोई अधिकार नहीं है.”
उन्होंने कहा, “निजता हर किसी के लिए होती है. क्या अपार्टमेंट में रहने वाले लोग आधी रात को अपनी तस्वीरें खींचे जाने में सहज महसूस करेंगे? हमारी सोने की स्थिति पहले ही बहुत असुविधाजनक है. हमें हर रात आकर हमारी वीडियो बनाने वाले लोगों की वजह से और परेशानी नहीं चाहिए.”
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