गुरुग्राम: हरियाणा पुलिस ने पिछले हफ्ते कुरुक्षेत्र के एक पुलिस थाने के अंदर बोन कैंसर से पीड़ित एक युवक द्वारा दो पुलिसकर्मियों और एक होमगार्ड पर उसके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगाने के बाद यौन उत्पीड़न का नहीं, बल्कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 114 के तहत साधारण “चोट पहुंचाने” का मामला दर्ज किया है.
जांच अधिकारी इस बात से इनकार नहीं करते कि युवक की शिकायत में ये आरोप शामिल हैं.
लाडवा के पुलिस उपाधीक्षक निर्मल सिंह ने शनिवार को दिप्रिंट को बताया कि तीनों आरोपियों के खिलाफ “चोट पहुंचाने” का मामला दर्ज किया गया है. जब उनसे पूछा गया कि शिकायतकर्ता ने स्पष्ट रूप से अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया है, फिर भी यौन उत्पीड़न की धाराएं क्यों नहीं लगाई गईं, तो सिंह ने कहा कि पुलिस अभी आरोप की सच्चाई की जांच कर रही है, लेकिन इससे शायद कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.
उन्होंने कहा कि जुलाई 2024 में भारतीय न्याय संहिता लागू होने के बाद पुरानी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377, जो प्रकृति के विरुद्ध बिना सहमति बनाए गए यौन संबंधों को कवर करती थी, हटा दी गई और उसकी जगह कोई नई धारा नहीं लाई गई.
“अगर आरोप सही भी पाए जाते हैं,” सिंह ने कहा, “तो नए कानूनों में इसके लिए कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है.”
क्या बदला और क्या खत्म हो गया
आईपीसी की धारा 377 में कहा गया था, “जो कोई किसी पुरुष, महिला या जानवर के साथ स्वेच्छा से प्रकृति के विरुद्ध यौन संबंध बनाता है, उसे आजीवन कारावास या 10 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा दी जा सकती है.”
सुप्रीम कोर्ट के 2018 के नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ फैसले के बाद इस धारा को सीमित कर दिया गया था. वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंध अपराध नहीं रहे. लेकिन यह धारा पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी. यह बिना सहमति पुरुषों के साथ यौन संबंध, ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ यौन अपराध और पशुओं के साथ यौन संबंधों पर लागू होती रही.
1 जुलाई 2024 को बीएनएस लागू होने के साथ धारा 377 को पूरी तरह हटा दिया गया. बीएनएस में बलात्कार की परिभाषा केवल महिला पीड़िता के संदर्भ में दी गई है. नए कानून में लैंगिक रूप से तटस्थ यौन उत्पीड़न का कोई प्रावधान नहीं जोड़ा गया.
आज अगर किसी वयस्क पुरुष के साथ यौन उत्पीड़न होता है, तो उसे चोट, गंभीर चोट, गलत तरीके से बंधक बनाने या धमकी देने से जुड़ी धाराओं का सहारा लेना पड़ता है. इनमें से किसी में भी यौन अपराध जैसी विशेष कानूनी जिम्मेदारी या सजा की गंभीरता नहीं है.
कुरुक्षेत्र मामले में इसका सीधा असर दिख रहा है. बीएनएस के तहत स्वेच्छा से चोट पहुंचाने का अपराध जमानती और गैर-संज्ञेय है. आरोपियों को बिना वारंट गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. जमानत उनका अधिकार है. दोषी साबित होने पर अधिकतम एक साल की जेल और 10,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.
संसद को पहले ही बताया गया था कि ऐसा होगा
धारा 377 को हटाया जाना ऐसी गलती नहीं थी जिसे पहले किसी ने नहीं देखा.
भाजपा के राज्यसभा सांसद बृज लाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने बीएनएस की जांच की थी और 10 नवंबर 2023 को अपनी रिपोर्ट राज्यसभा में सौंपी थी.
समिति ने कहा था कि धारा 377 के प्रावधान वयस्कों के साथ बिना सहमति बनाए गए अप्राकृतिक यौन संबंधों, नाबालिगों के साथ ऐसे सभी कृत्यों और पशुओं के साथ यौन संबंधों पर लागू होते थे. समिति ने यह भी कहा कि बीएनएस में पुरुषों, महिलाओं या ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ बिना सहमति वाले यौन अपराधों के लिए कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए सरकार को प्रस्तावित कानून में धारा 377 शामिल करनी चाहिए.
समिति ने यह भी कहा कि बीएनएस के अपने घोषित उद्देश्य, यानी लैंगिक रूप से तटस्थ अपराधों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए, “आईपीसी की धारा 377 को दोबारा लाना और बनाए रखना अनिवार्य है.”
सरकार ने इस सिफारिश को नहीं माना और अंतिम बीएनएस में ऐसा कोई प्रावधान नहीं रखा गया.
संसद में विधेयकों पर चर्चा के दौरान भी यह चिंता उठाई गई थी. दिसंबर 2023 में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल किया था कि क्या पीछा करने और बलात्कार का शिकार केवल महिलाएं होती हैं, और क्या पुरुष तथा ट्रांसजेंडर पीड़ितों के बारे में सोचा गया है. उनकी टिप्पणियों का मजाक उड़ाया गया. उनकी चिंता का समाधान किए बिना कानून पारित कर दिया गया.
जनहित याचिका और केंद्र का कोई जवाब नहीं
यह कानूनी खालीपन अब अदालत तक पहुंच चुका है.
बीएनएस से बिना सहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंधों से जुड़े दंडात्मक प्रावधान हटाने को चुनौती देने वाली अधिवक्ता गंतव्य गुलाटी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने अगस्त 2024 में केंद्र को इसे एक प्रतिनिधित्व के रूप में लेने का निर्देश दिया और कहा कि सरकार छह महीने के भीतर इस पर फैसला करे.
याचिका में कहा गया था कि धारा 377 में पहले शामिल प्रावधानों को पूरी तरह हटाने से कमजोर वर्गों पर अनुचित असर पड़ा है और समानता तथा गरिमा के संवैधानिक वादे को नुकसान पहुंचा है. साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है.
यह मामला इस साल फरवरी में फिर दिल्ली हाई कोर्ट में सूचीबद्ध हुआ, लेकिन केंद्र ने अब तक कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया है. केंद्र पहले यह कह चुका है कि अदालतें संसद को कोई विशेष कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकतीं.
‘फौजदारी कानून भेदभावपूर्ण हो गया है’
हिसार के वरिष्ठ आपराधिक वकील और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले पी.के. संधीर ने दिप्रिंट से कहा कि धारा 377 को बिना किसी विकल्प के हटाने से एक बड़ा कानूनी खालीपन पैदा हो गया है.
उन्होंने कहा, “आईपीसी के तहत एक पुरुष द्वारा दूसरे पुरुष के साथ, चाहे सहमति से हो या बिना सहमति, यौन संबंध बनाना अपराध था. अगर सरकार एलजीबीटीक्यू समुदाय के लिए इसे अपराध की श्रेणी से बाहर करना चाहती थी, तो कम से कम उन मामलों के लिए प्रावधान रख सकती थी जहां किसी पुरुष के साथ बिना सहमति यौन उत्पीड़न किया जाता है. अब ऐसे मामलों से निपटने के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है.”
संधीर ने एक और असंगति की ओर इशारा किया. जब 18 साल से कम उम्र के किसी बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न होता है, तो पॉक्सो कानून लागू होता है, चाहे पीड़ित या आरोपी किसी भी लिंग का हो. आरोप गंभीर होते हैं और सजा भी कड़ी होती है. लेकिन अगर पीड़ित 18 साल से ज्यादा उम्र का पुरुष है, तो अपराध के यौन पहलू का कानून में कोई नाम ही नहीं है.
संधीर ने कहा, “फौजदारी कानून भेदभावपूर्ण हो गया है. एक ही अपराध के दो पीड़ितों के साथ केवल उम्र के आधार पर अलग व्यवहार किया जा रहा है. 18 साल से कम उम्र का लड़का पॉक्सो कानून के तहत संरक्षित है. लेकिन 18 साल से अधिक उम्र के पुरुष के लिए कानून चुप है.”
‘संस्थागत विफलता’
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और वकील राजबीर देसवाल ने दिप्रिंट से कहा कि कुरुक्षेत्र मामले ने हिरासत में हिंसा के मुद्दे को फिर से सामने ला दिया है और यह कोई नया पैटर्न नहीं है.
उन्होंने कहा, “चाहे अस्पताल हों, पुलिस थाने, जेलें या कल्याण संस्थान, मूल समस्या एक ही है. अधिकार का दुरुपयोग होता है, भरोसा तोड़ा जाता है और कमजोर स्थिति का फायदा उठाया जाता है. हिरासत में यौन उत्पीड़न सिर्फ व्यक्तिगत अपराध नहीं है. कई मामलों में यह संस्थागत विफलता है.”
देसवाल ने कहा कि इस घटना से सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि सुधार होना चाहिए. उन्होंने डी.के. बसु दिशा-निर्देशों को पुलिस व्यवस्था से आगे बढ़ाकर हर उस संस्था में लागू करने की मांग की जहां कोई व्यक्ति किसी भी रूप में हिरासत में रखा जाता है.
डी.के. बसु दिशा-निर्देश 1997 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से जुड़े हैं. यह मामला पश्चिम बंगाल लीगल एड सर्विसेज के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष डी.के. बसु की एक याचिका से शुरू हुआ था. उन्होंने पुलिस हिरासत और लॉकअप में मौतों और हिंसा की ओर ध्यान दिलाते हुए अदालत को पत्र लिखा था. अदालत ने इस पत्र को जनहित याचिका माना और सभी गिरफ्तारियों और हिरासत के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए.
इन दिशा-निर्देशों के तहत गिरफ्तारी करने वाले अधिकारियों को अपना नाम और पहचान स्पष्ट रूप से दिखानी होगी. गिरफ्तारी के समय एक मेमो तैयार किया जाना चाहिए और उस पर कम से कम एक गवाह के हस्ताक्षर होने चाहिए. गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताए जाने चाहिए और उसे अपने मित्र, रिश्तेदार या वकील को सूचना देने का अधिकार है. गिरफ्तारी का समय, स्थान और हिरासत का स्थान 8 से 12 घंटे के भीतर परिजनों को बताया जाना चाहिए. गिरफ्तारी के समय और उसके बाद हर 48 घंटे में मेडिकल जांच अनिवार्य है.
सुप्रीम कोर्ट ने डी.के. बसु मामले में कहा था कि हिरासत में हिंसा संविधान के अनुच्छेद 21, 22 और 32 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.
देसवाल ने कहा कि ये सुरक्षा उपाय, जो अभी पुलिस हिरासत पर लागू होते हैं, अब उन सभी संस्थानों में अनिवार्य किए जाने चाहिए जहां कोई व्यक्ति किसी दूसरे के अधिकार के अधीन हो. इसके साथ ही जमीनी स्तर पर ऐसे अधिकार का इस्तेमाल करने वाले कर्मियों के लिए समय-समय पर मनोवैज्ञानिक परामर्श भी होना चाहिए.
आईपीसी की धारा 377 हटने के बाद बने कानूनी खालीपन पर देसवाल ने कहा कि पुलिस के पास अभी भी बीएनएस की कुछ अन्य धाराएं लगाने का विकल्प है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि कुरुक्षेत्र पुलिस ने कहा है कि यौन उत्पीड़न के आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं.
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