मेरे यहां, कम-से-कम जिस दुनिया में मैं बड़ा हुआ, वहां पिता “डैड” नहीं होते थे. दोस्त तो बिल्कुल नहीं. वो गंभीर, सख्त और कुछ-कुछ अजनबी किस्म के लोग होते थे, जिनसे सीधी बातचीत शायद ज़िंदगी में एक-दो बार ही नसीब होती थी.
मेरे साथ तो वह भी नहीं हुआ.
नवंबर की एक सुबह वो चले गए. न कोई चेतावनी आई कि क्या होने वाला है, और न यह समझ कि अब आगे क्या होगा. मैं 13 साल का था. इतना बड़ा कि उन्हें याद कर सकूं, उनके लिए शोक मना सकूं. और इतना छोटा कि यह उम्मीद करूं कि उनकी कुछ यादें मेरे पास होंगी, जिन्हें मैं बार-बार जी सकूं और ज़रूरत पड़ने पर उनमें सुकून तलाश सकूं.
बस दिक्कत यह थी कि मेरे पास कुछ था नहीं.
मैंने उनकी यादों को खोजना शुरू किया और हर बार खाली हाथ लौटा. मुझे पता था कि वो मेरी ज़िंदगी में थे. हमेशा थे. लेकिन यादों में कहीं भी हम दोनों साथ नहीं दिखते थे. न किसी बातचीत में, न किसी साझा पल में. मैं कभी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया और शायद उन्हें भी मुझसे सीधे बात करने की कोई वजह या ज़रूरत नहीं लगी. उलझन में, मैं मां के पास गया. लेकिन उनके पास भी ऐसा कुछ नहीं था जिसे पकड़कर मैं अपने बचपन में लौट पाता.
तो फिर वो थे कहां?
मैंने अपने दिमाग को टटोला. घर में बची कुछ तस्वीरों को बार-बार देखा. शायद कोई सुराग मिल जाए. कुछ नहीं मिला. समय बीतता गया. दिन साल बने, साल दशकों में बदल गए. तलाश की बेचैनी कम होती गई. फिर एक दिन खत्म हो गई. उस खालीपन के पीछे भागते रहने का कोई मतलब नहीं था.
आज मैं दो साल की बेटी का पिता हूं. और मैं इस इंतिज़ार में नहीं हूं कि बचपन की कोई याद सपने में चली आए या डेजा वू की तरह अचानक सामने आ खड़ी हो. मैं यहां हूं, अपनी बेटी की यादों का हिस्सा बनने की पूरी कोशिश करते हुए, ताकि बीस साल बाद उसे मेरे बारे में सोचते हुए वैसा खालीपन महसूस न हो जैसा मुझे हुआ.
हर पीढ़ी के पुरुषों ने बच्चों की देखभाल को आम तौर पर मां की जिम्मेदारी माना है. बच्चे को खिलाना, नहलाना, नैपी बदलना, उसके साथ खेलना, उसे सुलाना या रात में उठकर उसके पास जाना. इन सब चीज़ों से वो यह कहकर किनारा कर लेते हैं कि “यह मेरा काम नहीं है.”
और जो पुरुष यह सब करते हैं, उन्हें अलग किस्म का इंसान घोषित कर दिया जाता है. “अरे, ये तो बाकी लोगों जैसा नहीं है.” लीजिए, ये रहा आपका मेडल.
कुछ लोगों का मज़ाक भी उड़ाया जाता है. लेकिन मौजूद रहने की कीमत अगर यही है, तो यह कोई बड़ी कीमत नहीं.
नतीजा यह है कि ऐसे पुरुषों की कमी नहीं जो अपने बच्चों को दूर खड़े होकर बड़ा होते देखते हैं. वो घर में मौजूद होते हैं, लेकिन उन कामों में नहीं जो धैर्य की परीक्षा लेते हैं. बच्चे की किसी अच्छी आदत का श्रेय माँ को जाता है. किसी महफ़िल में एक आदमी बता रहा था कि उसकी छह साल की बेटी कभी स्क्रीन नहीं देखती. मैंने पूछा, “कैसे कर लिया यह सब?” उसने कहा, “मेरी पत्नी संभालती है.” शाबाश, पिता.
दूर खड़े होकर मत देखिए. उस दुनिया में उतर जाइए. अपने दिमाग को उलझने दीजिए, अपने दिल को पिघलने दीजिए. किसी बच्चे की ज़िंदगी आपके सामने खुलती चली जाए और आप उसे दूर से देखते रह जाएं. यह बहुत बड़ी भूल होगी. इसलिए नहीं कि दो या तीन साल का बच्चा आपसे जवाब मांगेगा. वह नहीं मांगेगा. बल्कि इसलिए कि एक दिन आप खुद हर दूसरे पल ठिठक कर रह जाएँगे.
अगर पिछले दो साल मुझे कुछ सिखाते हैं, तो यह कि मेरे पिता. और उनके जैसे बहुत से दूसरे पिता. उस खुशी से खुद को वंचित रख बैठे, जो अपने बच्चे के साथ सचमुच मौजूद रहने से मिलती है.
क्या उन्हें इस बात की परवाह करनी चाहिए थी कि उनके बेटे की यादों में उनके हिस्से लगभग खालीपन ही बचा है? मैं नहीं जानता. लेकिन एक सवाल मेरे साथ बना रहता है. इंसान यह तय कर सकता है कि लोग उसे किस बात के लिए याद रखें. लेकिन क्या खालीपन भी कोई चुनाव हो सकता है?
मैं अपने पिता जैसा नहीं बनना चाहता. यह कोई क्रूर बात नहीं है. मैं उनके जैसा नहीं बनना चाहता क्योंकि आज मुझे दिखता है कि वो किस चीज़ से वंचित रह गए.
पुरुष अक्सर खुद को बच्चों की परवरिश के रोज़मर्रा के कामों से बाहर रखते हैं. कहीं-न-कहीं उन्हें पता होता है कि समाज उन्हें ऐसा करने की छूट देता है. वो उस छूट का फायदा उठाकर सारे मुश्किल पल अपनी पत्नी, यानी बच्चे की माँ, के हवाले कर देते हैं, इस भरोसे के साथ कि वो कर भी क्या सकते हैं.
लेकिन हम कर सकते हैं. और हमें करना चाहिए. हमें बच्चे के गुस्से और जिद का सामना करना चाहिए. उसके अप्रत्याशित व्यवहार के साथ तालमेल बैठाना चाहिए. उसकी कभी न खत्म होने वाली ऊर्जा का साथ देना चाहिए. उसके पीछे भागना चाहिए ताकि वह एक कौर और खा ले. उसके साथ इतना समय बिताना चाहिए कि हमारी पीठ और हड्डियाँ खुद आराम की गुहार लगाने लगें. हमें यह सब करना चाहिए. क्योंकि कोई पहले से यह सब कर रहा है.
अगर हमारी आज़ादी की बुनियाद ही गैर-मौजूदगी पर टिकी हो, तो वह कैसी आज़ादी है?
हम उस भावना को अच्छी तरह जानते हैं. अच्छा है, वह संभाल रही है. चलो, मुझे उठना नहीं पड़ा. मैं बाद में चला जाऊँगा, जब मामला शांत हो जाएगा. मैं बताऊंगा क्या करना चाहिए, बिना यह जाने कि वह काम होता कैसे है.
लेकिन एक सक्रिय पिता बनना अपराधबोध का अभ्यास नहीं होना चाहिए. यह अपने लिए कीजिए.
हां, हम खुद को यह कहकर अलग कर सकते हैं कि हम “बाकी सब” कर रहे हैं. हम पुरुष हैं. हम “घर संभालते” हैं. तो अपने बच्चे को क्यों नहीं संभालते? हो सकता है, तब आपको पता चले कि आपका बच्चा आपके भीतर की ऐसी कमी भर रहा है, जिसके बारे में आपको कभी पता ही नहीं था.
मैंने अपनी दो साल की बेटी से पूछा कि इस कॉलम के लिए उसके पास कोई सुझाव है क्या.
उसने कहा, “पेंगुइन.”
तो आइए, फ़ादरलैंड में आपका स्वागत है.
विचार निजी हैं.
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