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Saturday, 20 June, 2026
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न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ EOW और ED के मामले कैसे ताश के पत्तों की तरह बिखर गए

‘यह बिना किसी अपराध के याचिकाकर्ताओं के वित्तीय मामलों में दखलंदाजी है.’ हाई कोर्ट ने दोनों मामलों को खारिज करते हुए कहा, लेकिन UAPA का मामला अभी भी लंबित है.

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नई दिल्ली: न्यूज पोर्टल न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को भारत में किसी मीडिया संस्थान के खिलाफ हाल के वर्षों की सबसे बड़ी जांच के केंद्र में आए लगभग छह साल हो चुके हैं.

2020 में अवैध विदेशी फंडिंग और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपों वाले एक पत्र से शुरू हुआ मामला बाद में तीन जांच, छापों और गिरफ्तारियों तक पहुंच गया. इस मामले की जांच दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और बाद में कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत स्पेशल सेल ने की. मामले में आरोप वित्तीय गड़बड़ियों से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उल्लंघनों तक थे.

जांच एजेंसियों को पिछले महीने बड़ा झटका लगा, जब दिल्ली हाई कोर्ट ने EOW की दर्ज एफआईआर और ED की मनी लॉन्ड्रिंग जांच को रद्द कर दिया.

अब केवल अगस्त 2023 से शुरू हुई दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की UAPA के तहत न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ कार्रवाई बची है.

5 अगस्त 2023 को न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘A Global Web of Chinese Propaganda Leads to a U.S. Tech Mogul’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसमें जांच की गई थी कि क्या चीन का पैसा दुनिया भर के मीडिया और वकालत करने वाले संगठनों तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि बीजिंग की सत्तावादी नीतियों का बचाव किया जा सके. इसमें भारत का भी जिक्र था और न्यूज़क्लिक का संक्षिप्त उल्लेख किया गया था. रिपोर्ट में कहा गया कि मीडिया संस्थान ने अपनी कवरेज में “चीनी सरकार के विचारों को जगह दी”. बारह दिन बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एफआईआर दर्ज कर ली. इसके बाद कई टीवी चैनलों ने प्रबीर पुरकायस्थ और न्यूज़क्लिक के एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती के खिलाफ UAPA मामले की रिपोर्टिंग में न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट का हवाला दिया.

अक्टूबर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ऐसी पोस्टों की बाढ़ आ गई, जिनमें दावा किया गया कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने न्यूज़क्लिक से जुड़े कई पत्रकारों के घरों पर छापे मारे हैं. “मेरे घर पर छापा”, “मोबाइल और लैपटॉप जब्त”, और “मेरे फोन से आखिरी पोस्ट. मोबाइल दिल्ली पुलिस ने जब्त कर लिया” जैसी कई पोस्ट 3 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर दिखाई दीं. छापे 30 जगहों पर पड़े, जिनमें दक्षिण दिल्ली स्थित न्यूज़क्लिक का दफ्तर और दिल्ली-एनसीआर में कंपनी से जुड़े पत्रकारों और कर्मचारियों के घर शामिल थे.

EOW की 2020 में शुरुआत

न्यूज़क्लिक एक डिजिटल मीडिया संस्थान है, जिसे प्रबीर पुरकायस्थ ने 2009 में शुरू किया था. इसकी कानूनी लड़ाई 26 जून 2020 को शुरू हुई, जब दिल्ली पुलिस की EOW ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, किसी को संपत्ति देने या मूल्यवान सुरक्षा में बदलाव करने के लिए बेईमानी से प्रेरित करने और आपराधिक साजिश से जुड़ी कई धाराओं के तहत पहली एफआईआर दर्ज की.

यह सब सोभन सिंह नाम के एक व्यक्ति से शुरू हुआ. वह शिकायतकर्ता नहीं बल्कि सूचना देने वाला था. उसने 26 जून 2020 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा कि PPK न्यूज़क्लिक स्टूडियोज प्राइवेट लिमिटेड “फंड का दुरुपयोग कर रही है, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है” और उसने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति का उल्लंघन किया है. इसके बाद मंत्रालय के अवर सचिव विजय कौशिक ने इस पत्र को आगे बढ़ाया.

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वित्त वर्ष 2017-19 के दौरान कंपनी को 17.8 लाख रुपये से बढ़कर 6.61 करोड़ रुपये तक का भारी नुकसान हुआ. सिंह ने दावा किया कि यह नुकसान सलाहकारों, वेतन और किराये पर अत्यधिक खर्च की वजह से हुआ. उन्होंने कहा कि FDI का 45 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कंपनी के प्रमोटरों, पत्रकारों और कर्मचारियों के वेतन, सलाहकार शुल्क, किराये और अन्य खर्चों में खर्च या निकाल लिया गया.

शिकायत में कहा गया, “पहली नजर में ये तथ्य बताते हैं कि FDI का इस्तेमाल वास्तव में गुप्त और दूसरे उद्देश्यों के लिए भुगतान करने में किया गया.”

इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि पुरकायस्थ और उनके सहयोगी ‘न्यूज़क्लिक इंडिया ट्रस्ट’ के नाम से एक गैर-सरकारी संगठन चला रहे थे, जिसे बाद में PPK न्यूज़क्लिक स्टूडियो LLP में बदल दिया गया, ताकि “विदेशी फंड देश में लाया जा सके”.

मुख्य आरोप यह था कि कंपनी ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010 के कथित उल्लंघन में चार विदेशी संस्थाओं से 28.46 करोड़ रुपये की अस्पष्ट निर्यात राशि प्राप्त की. यह भी आरोप लगाया गया कि अमेरिका की वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग LLC ने PPK न्यूज़क्लिक में FDI के जरिए 9.59 करोड़ रुपये का निवेश किया, जो FCRA के प्रावधानों के खिलाफ था.

सोभन सिंह के पत्र के आधार पर दर्ज एफआईआर में कहा गया कि FCRA के उन प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है, जो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ऑडियो-विजुअल समाचार या समसामयिक कार्यक्रमों के निर्माण और प्रसारण से जुड़ी कंपनियों और उनके संवाददाताओं, स्तंभकारों, लेखकों या मालिकों को विदेशी चंदा लेने से रोकते हैं.

स्टेटस रिपोर्ट में गड़बड़ी

एक तरफ EOW अदालत को बता रही थी कि पुरकायस्थ की न्यूज़क्लिक ने गलत तरीके से FDI लेकर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) का उल्लंघन किया है, वहीं दूसरी तरफ EOW के सहायक पुलिस आयुक्त अनिल कुमार के साइन वाली 26 जुलाई 2021 की स्टेटस रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का जवाब भी शामिल था. इसमें कहा गया था कि “विदेश से आई राशि ऑटोमैटिक रूट के तहत आई थी” और FEMA का कोई उल्लंघन नहीं हुआ.

29 जुलाई 2021 को राज्य सरकार ने पहली स्टेटस रिपोर्ट से खुद को अलग कर लिया और उसे वापस लेकर नई रिपोर्ट दाखिल करने की मांग की, जबकि पहली रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं को पहले ही दे दी गई थी. दूसरी स्टेटस रिपोर्ट तीन महीने बाद, 4 अक्टूबर 2021 को दाखिल की गई, जिसमें RBI का जवाब पूरी तरह हटा दिया गया.

अब EOW ने आरोप लगाया कि न्यूज़क्लिक घाटे में चलने वाली कंपनी थी और उसने बढ़ी-चढ़ी कीमतों पर FDI हासिल किया. उसने यह भी आरोप लगाया कि प्रबीर पुरकायस्थ ने FDI की सीमा से बचने के लिए शेयरों की कीमत जरूरत से ज्यादा दिखाई और FDI का 45 प्रतिशत हिस्सा निकाल लिया गया.

ED भी जांच में शामिल हुई

EOW की कार्रवाई के तीन महीने बाद संगठन को दूसरा झटका तब लगा, जब प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत मामला दर्ज किया. दूसरी एफआईआर में PMLA की धारा 3 और 4 लगाई गईं, लेकिन आरोप वही थे जो EOW पहले ही लगा चुकी थी.

इसके बाद 12 फरवरी 2021 को दक्षिण दिल्ली के साकेत स्थित न्यूज़क्लिक दफ्तर पर ED ने 36 घंटे तक छापा मारा. वहीं, पुरकायस्थ के घर पर छापा 72 घंटे से ज्यादा चला. ED ने EOW की एफआईआर का संज्ञान लेते हुए एक प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) दर्ज की और आरोप लगाया कि पुरकायस्थ ने RBI के नियमों का उल्लंघन करते हुए विदेशी कंपनियों से मिले धन का दुरुपयोग किया और उसे इधर-उधर कर दिया.

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस नीना बंसल ने कहा कि 2020 में मामला दर्ज होने से लेकर 2025 तक “न तो जांच पूरी हुई और न ही कोई आरोपपत्र दाखिल किया गया.”

EOW और ED के मामले ढह गए

पुरकायस्थ के वकील ने अदालत को बताया कि न्यूज़क्लिक को 4 अप्रैल 2018 को FDI मिला था और उस समय डिजिटल मीडिया में 26 प्रतिशत की कोई सीमा नहीं थी. यह सीमा 18 सितंबर 2019 की एक प्रेस नोट के जरिए लागू की गई थी.

उन्होंने अदालत को बताया कि FEMA के दिशा-निर्देशों के अनुसार चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ने प्रति शेयर 9,188 रुपये की कीमत तय की थी, क्योंकि 10 रुपये पर शेयर बेचने से FEMA के नियमों का उल्लंघन होता. FEMA के मुताबिक भारतीय कंपनियां विदेशी निवेशकों को शेयर उनकी उचित कीमत से कम पर नहीं बेच सकतीं. यह उचित कीमत दुनिया भर में मान्य मूल्य निर्धारण तरीकों से तय की जाती है.

पुरकायस्थ के वकील ने अदालत से कहा, “रोजमर्रा के बाजार में, जब तक किसी सरकारी प्राधिकरण ने कोई कीमत तय नहीं की हो या किसी कानून के तहत शेयर प्रीमियम पर कोई सीमा न हो, तब तक शेयर की कीमत दोनों पक्षों की आपसी सहमति से तय होती है.”

राज्य ने आरोप लगाया कि न्यूज़क्लिक और वर्ल्ड मीडिया होल्डिंग्स LLC के बीच हुआ लेन-देन “धोखाधड़ी वाला लेन-देन” था, क्योंकि बाद वाली कंपनी अस्तित्व में ही नहीं थी. लेकिन पुरकायस्थ के वकील ने कहा कि ऐसा नहीं है, क्योंकि इसी नाम की पुरानी कंपनी 1 जून 2017 को समाप्त हो गई थी और उसके बाद 29 नवंबर 2017 को नई कंपनी अस्तित्व में आई थी. अमेरिका के डेलावेयर राज्य के कानून के अनुसार यदि कोई कंपनी समाप्त हो जाती है, तो कोई दूसरा व्यक्ति उसी नाम से नई कंपनी बना सकता है.

इस पर ध्यान देते हुए न्यायाधीश बंसल ने कहा कि FEMA के दिशा-निर्देशों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ और “राज्य की जांच में ऐसा कुछ सामने नहीं आया कि याचिकाकर्ता के साथ लेन-देन करने वाली M/s Worldwide Media Holdings LLC कोई अस्तित्वहीन कंपनी थी.”

उन्होंने कहा, “दरअसल, स्टेटस रिपोर्ट इस पहलू पर पूरी तरह खामोश है.”

“धोखाधड़ी” के आरोपों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि किसी पीड़ित व्यक्ति की शिकायत नहीं है और सोभन सिंह पीड़ित नहीं बल्कि केवल “सूचना देने वाले” हैं. इसलिए यह आरोप भी “साबित नहीं हुआ.”

इसके अलावा न्यायाधीश बंसल ने कहा कि “किसी भी तरह की व्याख्या से यह नहीं कहा जा सकता कि M/s Worldwide Media Holdings LLC ने कोई धन सौंपा था या याचिकाकर्ता ने उसका दुरुपयोग किया.” अदालत ने कहा कि IPC की धारा 406 या 420 के तहत कोई अपराध नहीं बनता. उन्होंने यह भी कहा कि ED का यह दावा कि “अनुसूचित अपराध स्पष्ट रूप से मौजूद है”, पूरी तरह गलत और निराधार है.

अदालत ने कहा, “2022 में विवादित ECIR दर्ज होने के बाद दो साल बीत चुके हैं. याचिकाकर्ता और उसके कई कर्मचारी 2021 में कई बार जांच में शामिल हुए, लेकिन सितंबर 2021 से जून 2022 के बीच उन्हें नहीं बुलाया गया. जिस तरीके से जांच की गई, उससे साफ है कि यह किसी अपराध के अस्तित्व के बिना याचिकाकर्ताओं के वित्तीय मामलों में केवल टोह लेने और इधर-उधर खोजने की कवायद थी.”

आरोपों और जांचकर्ताओं के निष्कर्षों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि ऐसी एफआईआर को जारी रखना “कानूनी प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है और इसे रद्द किया जाता है.” अदालत ने कहा, “यह तय किया जा चुका है कि यदि मूल अपराध से जुड़ी एफआईआर रद्द हो जाती है, तो ECIR भी अपने आप रद्द हो जाती है. इसलिए पूरी ECIR भी रद्द की जाती है.”

ED के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि वे एफआईआर रद्द करने के दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देंगे, लेकिन EOW के सूत्रों ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की.

आखिरी बची FIR

17 अगस्त 2023 को UAPA और IPC की धाराओं के तहत न्यूज़क्लिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद, उसी साल अक्टूबर में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल (नॉर्दर्न रेंज) ने दिल्ली-एनसीआर में 30 से ज्यादा जगहों पर छापे मारे. ये छापे न्यूज़क्लिक के साकेत दफ्तर, पुरकायस्थ के घर और संगठन से जुड़े पत्रकारों और स्तंभकारों की कई अन्य संपत्तियों पर पड़े.

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 3 अक्टूबर 2023 को शाम 5.45 बजे प्रबीर पुरकायस्थ और न्यूज़क्लिक के मानव संसाधन प्रमुख अमित चक्रवर्ती को गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी मेमो में यह समय दर्ज है. दोनों के खिलाफ कड़े आतंकवाद विरोधी कानून UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया.

पुलिस के पास रिमांड मांगने के लिए 24 घंटे का समय था, लेकिन वह सुबह 6 बजे पुरकायस्थ को रिमांड जज के घर ले गई. अदालत ने उन्हें 10 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया. दिप्रिंट द्वारा देखे गए अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, पुरकायस्थ के वकील को उनके रिमांड जज के सामने पेश किए जाने की जानकारी एक घंटे बाद, सुबह 7:07 बजे व्हाट्सऐप संदेश से दी गई.

वकील ने यह भी आरोप लगाया कि 3 अक्टूबर को गिरफ्तारी के बाद पुरकायस्थ को उनके वकील को बताए बिना रिमांड जज के सामने पेश किया गया. इसके अलावा 5 अक्टूबर की देर शाम तक एफआईआर की प्रति भी नहीं दी गई. यह संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन था, जिसमें कहा गया है कि गिरफ्तार व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि उसे “गिरफ्तारी के आधार” बताए जाएं.

इन आरोपों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने अनुच्छेद 22 का उल्लंघन किया, क्योंकि उसने “गिरफ्तारी के आधार” लिखित रूप में नहीं दिए. अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो में केवल “गिरफ्तारी के कारण” लिख देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इससे आधार स्पष्ट नहीं होते और गिरफ्तार व्यक्ति को अपना बचाव तैयार करने का मौका नहीं मिलता.

स्पेशल सेल की एफआईआर के अनुसार, विदेशी नागरिक नेविल रॉय सिंघम भारत का ऐसा नक्शा बनाने की चर्चा कर रहे थे जिसमें कश्मीर न हो और अरुणाचल प्रदेश को विवादित क्षेत्र दिखाया जाए. यह भी आरोप लगाया गया कि 2020-21 के किसान आंदोलन से जुड़े मामलों में धन का “दुरुपयोग” देश को अस्थिर करने के लिए किया गया.

एफआईआर में पुरकायस्थ, सिंघम और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा के नाम लेते हुए कहा गया कि न्यूज़क्लिक में धन डाला गया और फिर अभिसार शर्मा, परांजय गुहा ठाकुरता, तृणा शंकर, उर्मिलेश और आरात्रिका हलदार समेत अन्य लोगों को वितरित किया गया.

न्यूज़क्लिक के खिलाफ UAPA की धारा 13 (गैरकानूनी गतिविधियां), 16 (आतंकी कृत्य), 17 (आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाना), 18 (साजिश) और 22(C) (कंपनियों द्वारा अपराध), साथ ही IPC की धारा 153A (धर्म, जाति, जन्मस्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाना और सद्भाव बिगाड़ने वाले काम करना) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत मामला दर्ज किया गया.

राज्य और पुरकायस्थ के वकील की दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि हालांकि आरोपपत्र दाखिल किया गया था, लेकिन भारत का ऐसा कोई नक्शा, जिसमें कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश न हों, जब्त किए जाने का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया.

76 वर्षीय संपादक और न्यूज़क्लिक के संस्थापक को बाद में इस आधार पर रिहा कर दिया गया कि उन्हें “गिरफ्तारी के आधार की लिखित जानकारी” नहीं दी गई थी, जिससे गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड प्रक्रिया अवैध हो गई. पुरकायस्थ सात महीने हिरासत में रहने के बाद रिहा हुए.

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि EOW और ED के मामले दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द कर दिए हैं, लेकिन UAPA का मामला एक स्वतंत्र मामला है, जिसके निष्कर्ष पहले ही जमा किए जा चुके हैं. उन्होंने कहा, “कोई नया तथ्य या नया घटनाक्रम सामने नहीं आया है. हम अगली सुनवाई की तारीख का इंतजार कर रहे हैं.”

इसके बाद

तीन में से दो मामले रद्द होने के बाद पुरकायस्थ का कहना है कि दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला उनके उस पुराने रुख को सही साबित करता है कि यह मामला “प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला” था.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “यह फैसला उस बात की पुष्टि करता है जो हम शुरू से कहते रहे हैं कि हमने कानून और संबंधित एजेंसियों द्वारा तय प्रक्रियाओं के अनुसार ही सब कुछ किया था.”

UAPA से जुड़े छापों के कारण डिजिटल संगठन से जुड़े युवा पत्रकारों पर पड़े असर से स्पष्ट रूप से दुखी पुरकायस्थ ने कहा, “UAPA का मामला स्पष्ट रूप से ED के मामले से अलग है. न्यूज़क्लिक के अधिकांश लोग UAPA छापे से प्रभावित हुए.”

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “जो युवा रिपोर्टर एक समाचार संगठन से जुड़े थे, उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि पत्रकारिता के कारण उनके घरों पर छापे पड़ेंगे, उनके उपकरण जब्त होंगे और उनसे UAPA जैसे कठोर कानून के तहत पूछताछ होगी. हमें याद रखना चाहिए कि उनमें से कई युवा थे और अभी अपने करियर की शुरुआत ही कर रहे थे. मुझे उम्मीद है कि यह फैसला किसी न किसी तरह उनकी मदद करेगा, हालांकि जो समय चला गया, वह वापस नहीं आ सकता.”

दिप्रिंट ने मामले में राज्य पक्ष की कानूनी टीम के वकीलों से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. राज्य पक्ष के मुख्य वकील टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं थे और उनकी टीम के एक वकील ने भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

इस बीच, पुरकायस्थ और न्यूज़क्लिक के खिलाफ मामलों को “राजनीतिक मकसद से की गई जांच” बताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि ED और EOW के दावों में कभी कोई दम नहीं था.

सिब्बल ने दिप्रिंट से कहा, “इन मामलों में कभी कोई मजबूती नहीं थी. यह असहमति की आवाजों और उदार विचार रखने वालों को चुप कराने के लिए राजनीतिक प्रताड़ना थी. बीजेपी पत्रकारों, विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ ऐसा करती रही है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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