पिछले कुछ वर्षों में मेरी मुलाकात ब्रिटेन में पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा पर रह रहे कई भारतीय छात्रों से हुई है. विदेश में अपने देश के लोगों से मिलना हमेशा अच्छा लगता है, लेकिन इन बातचीतों के बाद अक्सर मेरे मन में मिले-जुले भाव पैदा होते हैं. इन छात्रों को यहां तक लाने वाले उत्साह और महत्वाकांक्षा के साथ-साथ मैं उनके भविष्य को लेकर चिंता भी देखता हूं.
बेशक, हर भारतीय छात्र विदेश में बसना नहीं चाहता, लेकिन ऐसे छात्रों की संख्या भी काफी है जो किसी भी कीमत पर विदेश में रहना चाहते हैं. उन्हें डर है कि उनके सपने पूरे नहीं हो पाएंगे.
मैंने देखा है कि संपन्न परिवारों से आने वाले छात्र भारत लौटने को लेकर कम चिंतित होते हैं. भारत में उनके लिए पहले से एक आरामदायक जीवन इंतजार कर रहा होता है—मजबूत संपर्क, पारिवारिक व्यवसाय, आर्थिक सुरक्षा और अच्छे करियर के अवसर. उनके लिए वापस लौटना असफलता जैसा नहीं लगता, क्योंकि उनके पास विकल्प होते हैं. कई बार उनके लिए दोबारा ब्रिटेन लौटने के रास्ते भी खुले रहते हैं.
लेकिन कई मध्यमवर्गीय छात्रों की स्थिति ऐसी नहीं होती. उनके लिए विदेश में पढ़ाई सिर्फ डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं होती. यह अक्सर एक बेहतर भविष्य बनाने की उम्मीद से जुड़ी होती है, जिसमें अच्छे करियर अवसर सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं.
कुछ छात्र अपने परिवार की जीवनभर की जमा पूंजी खर्च कर देते हैं. माता-पिता जमीन बेचते हैं, बचत खत्म कर देते हैं और कर्ज लेते हैं, इस उम्मीद में कि उनके बच्चों को वे अवसर मिलेंगे जो उन्हें कभी नहीं मिले. कई बार ब्रिटेन जाने का मकसद सिर्फ अपनी जिंदगी के फैसलों पर ज्यादा स्वतंत्रता और नियंत्रण पाना भी होता है.
हर मामले में छात्र सिर्फ नौकरी या वीजा के पीछे नहीं भाग रहे होते, बल्कि उससे कहीं ज्यादा बड़ी उम्मीदों का पीछा कर रहे होते हैं.
डर की वजह क्या है
एक महिला ने मुझे बताया कि उसका सबसे बड़ा डर बेरोज़गारी नहीं, बल्कि उस सामाजिक माहौल में वापस लौटना है जिसे वह पीछे छोड़ चुकी है.
ब्रिटेन में स्वतंत्र जीवन जीने के बाद उसे यह कल्पना करना मुश्किल लगता है कि वह अपने छोटे शहर की पुरानी सामाजिक अपेक्षाओं के बीच फिर से कैसे फिट हो पाएगी.
उसके माता-पिता उसे वापस आने के लिए नहीं कह रहे थे. बल्कि वे चाहते थे कि वह विदेश में ही रहे और उम्मीद करते थे कि एक दिन वह उन्हें भी विदेश बुलाने में मदद कर सकेगी. लेकिन मौजूदा नौकरी बाजार में प्रायोजित (स्पॉन्सर्ड) नौकरी मिलने की संभावना को लेकर वह चिंतित है.
एक अन्य महिला ने तब पीएचडी शुरू करने का फैसला किया जब उसका पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा खत्म होने वाला था, ताकि वह अपने पति के साथ कुछ और समय तक ब्रिटेन में रह सके.
भारत लौटने का डर हमेशा आर्थिक कारणों से नहीं होता. कई बार यह उस जीवन में लौटने का डर होता है, जिससे लोग खुद को अब जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते.
मुझे एक छात्रा की बात भी याद है, जिसने मजाक में कहा था कि उसने डेट पर जाना शुरू कर दिया है, इस उम्मीद में कि शायद उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जिसके पास ब्रिटिश नागरिकता या स्थायी निवास का दर्जा हो.
यह कहना गलत होगा कि ऐसे फैसले सिर्फ वीजा की वजह से लिए जाते हैं. लोग प्यार में भी पड़ते हैं, रिश्ते बनाते हैं और साथ जीवन बिताते हैं. लेकिन यह मान लेना भी अवास्तविक होगा कि इमिग्रेशन स्टेटस का इसमें कोई रोल नहीं होता.
मैंने ऐसे लोगों की कहानियां भी सुनी हैं जो इतने मजबूर हो जाते हैं कि अवैध वीजा स्पॉन्सरशिप के लिए 10 से 20 लाख रुपये तक दे देते हैं. इसके बाद वे सालों तक कोई भी काम करके खुद को संभाले रखने की कोशिश करते हैं.
इन कहानियों को लेकर मेरे मन में मिले-जुले विचार हैं. एक तरफ मुझे इन छात्रों के प्रति सहानुभूति है. वे सिर्फ दो देशों के बीच चुनाव नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी दो अलग-अलग पहचानों के बीच फंसे होते हैं.
दूसरी तरफ मुझे लगता है कि उम्मीदों और हकीकत के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है. छात्र यह सोचकर ब्रिटेन आते हैं कि विदेश में पढ़ाई करने से स्थायी रूप से बसने का रास्ता अपने आप खुल जाएगा, लेकिन बाद में उन्हें पता चलता है कि यह रास्ता कहीं ज्यादा अनिश्चित है.
कई छात्र पर्याप्त जानकारी के साथ फैसला नहीं लेते. उनका निर्णय सोच-समझकर बनाई गई योजना से ज्यादा मजबूरी पर आधारित होता है.
स्टूडेंट वीजा आपको पढ़ने, कौशल सीखने और एक अलग देश का अनुभव लेने का मौका देता है. हां, विदेश में पढ़ाई भविष्य में प्रवास (इमिग्रेशन) में मदद कर सकती है, लेकिन यही उसका एकमात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए.
अगर असली लक्ष्य विदेश में बसना है, तो क्या लोगों को शुरुआत से ही उसी हिसाब से योजना नहीं बनानी चाहिए?
एक शोषणकारी उद्योग
कुछ छात्रों को उस नौकरी बाजार की बहुत कम समझ होती है, जिसमें वे प्रवेश करने जा रहे हैं.
ऐसा लगता है कि कई छात्रों को एजेंटों, रिश्तेदारों या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने यह भरोसा दिला दिया है कि विदेश से डिग्री लेने के बाद अवसर अपने आप मिल जाएंगे.
फॉर्मूला बहुत आसान बताकर पेश किया जाता है—मास्टर्स कीजिए, पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा पाइए, नौकरी ढूंढ़िए और बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा.
लेकिन अगर विदेश में बसना ही लक्ष्य है, तो छात्रों को विमान में बैठने से पहले कुछ कठिन सवाल खुद से पूछने चाहिए.
कौन-से उद्योग वीजा स्पॉन्सर करते हैं?
किन कौशलों की मांग है?
क्या आपकी चुनी हुई डिग्री उन अवसरों से मेल खाती है?
स्थानीय स्नातकों की तुलना में आप कितने प्रतिस्पर्धी हैं?
अगर कभी स्पॉन्सरशिप न मिले तो क्या होगा?
अधिकतर मामलों में छात्रों के परिवारों को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का ज्यादा अनुभव नहीं होता.
और शिक्षा एजेंटों को ज्यादा छात्रों का दाखिला कराने के लिए इनाम मिलता है, न कि उनके लंबे समय के करियर की योजना बनाने के लिए.
विश्वविद्यालय भी जोखिमों को समझाने से ज्यादा अवसरों का प्रचार करने में माहिर होते हैं.
और हमेशा एक ऐसी सफलता की कहानी होती है, जिसे हर कोई जानता है—वह छात्र जिसकी जिंदगी विदेश में पढ़ाई के बाद पूरी तरह बदल गई.
यह लेख भारतीयों के ब्रिटेन में पढ़ने के खिलाफ नहीं है. न ही यह सभी लोगों से भारत लौट आने की अपील है.
मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूं कि छात्रों को इस बात की पूरी समझ के साथ विदेश जाना चाहिए कि वे किस रास्ते पर कदम रख रहे हैं.
अगर उनका लक्ष्य प्रवास करना है, तो उसके लिए शुरुआत से एक स्पष्ट योजना होनी चाहिए, न कि यह उम्मीद कि सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा.
भारत में विदेश में पढ़ाई को लेकर ज्यादा ईमानदार चर्चा की जरूरत है—ऐसी चर्चा जिसमें सिर्फ अवसरों की नहीं, बल्कि उन जोखिमों, खर्चों और वास्तविकताओं की भी बात हो जिनका छात्रों को विदेशी देशों में सामना करना पड़ेगा.
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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