नई दिल्ली: प्रगतिशील मुस्लिम कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों के एक समूह ने संयुक्त बयान जारी किया है. उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हालिया देशव्यापी “सेव इंडिया, सेव शरीयत” अभियान की आलोचना की है.
समूह ने कहा कि ध्यान शरीयत कानूनों का पालन करने के बजाय लैंगिक समानता, संवैधानिक अधिकारों और समुदाय से जुड़े सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर होना चाहिए.
इस सामूहिक पहल की शुरुआत इंडियन मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी (IMSD) के जावेद आनंद और फिरोज मिथीबोरवाला, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) की जकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज, Muslim सत्यशोधक मंडल के शम्सुद्दीन तांबोली और रोशनी के बदर सईद ने की है.
अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, अमोल पालेकर, रत्ना पाठक और मल्लिका साराभाई के साथ-साथ शिक्षाविद जीनत शौकत अली, कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़, लेखक सुल्तान शाहीन, सामाजिक टिप्पणीकार राम पुनियानी और तुषार गांधी समेत कई लोगों ने इस बयान पर हस्ताक्षर किए हैं.
AIMPLB ने इस अभियान की घोषणा 31 अगस्त को की थी और यह 17 सितंबर से तीन महीने तक चलना है. बोर्ड ने कहा था कि इस पहल का उद्देश्य समान नागरिक संहिता, धार्मिक स्वतंत्रता और उन मुद्दों को लेकर चिंता सामने रखना है, जिन्हें वह कानूनों के चुनिंदा तरीके से लागू किए जाने के तौर पर देखता है.
हालांकि, इस पर नई बहस शुरू होने से पहले ही पासमांदा मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों ने भी अभियान की आलोचना की थी. उन्होंने चेतावनी दी थी कि इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है.
ताजा बयान में प्रगतिशील मुस्लिम समूहों ने कहा कि यह अभियान लोगों का ध्यान समानता और नागरिकता के मुद्दों से हटाकर धार्मिक पहचान की ओर ले जा सकता है.
बयान में AIMPLB की ओर से 2016 में शायरा बानो मामले में दाखिल हलफनामे का भी जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि बोर्ड ने खुद माना था कि पर्सनल लॉ पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था का असर है.
बयान में कहा गया, “भारत में जिसे ‘ईश्वर द्वारा दिया गया शरीयत कानून’ कहा जाता है, वह कुछ और नहीं बल्कि इंसानों द्वारा बनाए गए पर्सनल लॉ हैं, जिनकी व्याख्या पुरुषों ने पितृसत्तात्मक तरीके से की है और AIMPLB उनका बचाव करता है.”
धार्मिक स्वतंत्रता
समूहों ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए. इसके साथ संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता और भेदभाव से सुरक्षा के अधिकारों का भी सम्मान होना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकारों की भी सुरक्षा होनी चाहिए.
बयान में कहा गया, “जहां मुख्यधारा की पार्टियां अक्सर मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों को नजरअंदाज करती हैं, वहीं हिंदू दक्षिणपंथी राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए UCC की बहस का इस्तेमाल करता है. परिवार से जुड़े कानूनों में सही सुधार के तहत मुस्लिम महिलाओं को शादी की न्यूनतम उम्र, बहुविवाह खत्म करने, आपसी तलाक, बराबर विरासत, बच्चे की कस्टडी, गोद लेने और महिला जननांग विकृति तथा हलाला पर रोक के मामलों में समान अधिकार मिलने चाहिए.”
बयान में मुस्लिम महिलाओं को झेलने वाले राजनीतिक इस्तेमाल का भी जिक्र किया गया और देश में मुस्लिम महिलाओं की प्रगति के लिए सुधारों की मांग की गई.
बयान में आगे कहा गया कि “शरीयत बचाने” पर ध्यान देकर AIMPLB ने भारतीय मुसलमानों के सामने मौजूद असली और रोजमर्रा की समस्याओं से ध्यान हटा दिया है या उन्हें नजरअंदाज किया है. इनमें सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार शामिल हैं.
बयान में कहा गया, “उलेमा को पीछे ले जाने वाले नियमों को आगे बढ़ाने के बजाय लोगों के सामने मौजूद बुनियादी जरूरतों और समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए.”
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