नई दिल्ली: जैसे ही दिल्ली के सबसे पुराने शहर महरौली में सूरज ढलने लगता है, हौज-ए-शम्सी और जहाज महल के बीच का मैदान एक ऐसे क्रिकेट ग्राउंड में बदल जाता है, जिसकी कोई मिसाल नहीं है. और यह महरौली को उसकी असल पहचान से भी ज्यादा खास बना देता है. हर गर्मी में 16 साल से कम उम्र के स्थानीय लड़कों की टीमें मेहरौली प्रीमियर लीग में हिस्सा लेने के लिए जुटती हैं. यह वही टूर्नामेंट है, जो कुछ समय के लिए तंग गलियों, जाम नालियों, सिर के ऊपर लटकते बिजली के तारों और तेज लाउडस्पीकरों वाले इस इलाके के क्रिकेट प्रेमियों की जिंदगी बदल देता है.
मेहरौली स्प्लेंडर्स और मेहरौली किंग्स के बीच मैच आखिरी ओवर तक पहुंचा, जबकि दूसरी टीम औलिया मस्जिद हंक्स के खिलाड़ी मैदान के किनारे खड़े होकर हौसला बढ़ा रहे थे. जैसे ही मेहरौली किंग्स के उप-कप्तान मोहम्मद तालिब ने आखिरी विकेट लेकर टीम को जीत दिलाई, सुनहरी और काली जर्सी पहने छोटे-छोटे लड़के मैदान में दौड़ पड़े और खुशी में नाचने लगे.
भारत की गलियों में खेले जाने वाला क्रिकेट अब महरौली में एक बड़े कम्युनिटी प्रीमियर क्रिकेट लीग का रूप ले चुका है. आईपीएल का असर यहां की तंग गलियों तक पहुंच चुका है.
खिलाड़ी ट्रॉफी जीतने के लिए मैदान में उतरते हैं, जबकि दर्शक पत्थरों पर, घास पर और संरक्षित स्मारक की दीवारों पर बैठकर मैच देखते हैं. उनका पसंदीदा खेल अब उनके लिए गर्व का मौका बन गया है. स्कूल के बाद दोस्तों के बीच खेला जाने वाला यह क्रिकेट अब टीमों की जबरदस्त प्रतिद्वंद्विता और जोशीले जश्न का रूप ले चुका है.

मेहरौली प्रीमियर लीग की शुरुआत 2008 में हुई थी. यह हर साल इलाके के लोगों और स्थानीय नेताओं महेंद्र चौधरी और रेखा चौधरी की ओर से आयोजित की जाती है. समय के साथ यह एक अनौपचारिक टूर्नामेंट से आगे बढ़कर पूरी कम्युनिटी लीग बन गई है, जिसमें टीम जर्सी, ट्रॉफी, अंपायर और कमेंटेटर तक होते हैं. इस साल 13 जून से शुरू हुआ टूर्नामेंट इसका 11वां सीजन है. कोविड लॉकडाउन वाले साल इसमें शामिल नहीं हैं.
एमपीएल की टीमों के नाम भी आईपीएल की तरह रखे गए हैं. किंग्स 11, मेहरौली जायंट्स, मेहरौली थंडर्स और ईगल चैलेंजर्स जैसे नाम सीधे आईपीएल टीमों की याद दिलाते हैं. वहीं कुछ टीमों के नाम उनके इलाकों पर रखे गए हैं, जैसे वार्ड 1 डायनामाइट्स, वार्ड 7 टाइगर्स और किशनगढ़ लायंस. मेहरौली किंग्स और वार्ड 7 टाइगर्स जैसी टीमें इलाके में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं. इनके खिलाड़ी स्थानीय स्तर पर मशहूर हैं और छोटे बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. वहीं मेहरौली वंडर्स जैसी कुछ टीमें नई हैं और पहली या दूसरी बार टूर्नामेंट खेल रही हैं.
महेंद्र कहते हैं, “एमपीएल महरौली का सबसे प्यारा त्योहार है. हर साल इसके लिए लोगों का उत्साह और बढ़ता जा रहा है.”
खिलाड़ी पूरे साल इस लीग का इंतिजार करते हैं और रजिस्ट्रेशन शुरू होने से कई महीने पहले से तैयारी में जुट जाते हैं.
13 साल के अयान कहते हैं, “पूरे साल हम हर रविवार क्रिकेट खेलते हैं और एमपीएल की तैयारी करते हैं.” जैसे ही टूर्नामेंट का शेड्यूल आता है, तैयारी और भी तेज हो जाती है और जीतने का जुनून बढ़ जाता है. महरौली के रहने वाले अयान मेहरौली वंडर्स के कप्तान हैं.
मेहरौली वंडर्स का एक युवा बल्लेबाज चमकीली नीली पॉलिएस्टर जर्सी पहनकर बल्लेबाजी के लिए तैयार होता है. उसकी जर्सी के पीछे “Mahender 4 Mehrauli” लिखा है. नॉन-स्ट्राइकर एंड पर खड़ा उसका साथी चिल्लाता है, “मार भाई, मार. सिक्स मार दे.” दूसरी टीम का गेंदबाज हरे रंग की जर्सी पहनकर दौड़ता है और उसके साथी कहते हैं, “आउट कर. आउट कर उसको. ये विकेट लेनी है.”
गेंद बल्ले का किनारा लेकर बाउंड्री की तरफ चली जाती है. कप्तान अयान साइडलाइन से जोर-जोर से ताली बजाते हुए चिल्लाते हैं, “चलो, चलो, डबल है.” रंग-बिरंगी और पसीने से भीगी जर्सी पहने 13 और 14 साल के लड़के कंक्रीट की पिच पर दौड़ते हैं. उनके सामने बस एक ही सपना है, बड़ी सुनहरी चैंपियनशिप ट्रॉफी जीतकर घर ले जाना.

एमपीएल की शुरुआत की कहानी
महेंद्र चौधरी 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में महरौली सीट से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार थे, लेकिन बीजेपी के गजेंद्र सिंह यादव से 1,782 वोटों से हार गए. उनकी पत्नी रेखा महेंद्र चौधरी इलाके की वार्ड प्रमुख हैं.
महेंद्र, जो पहले रणजी ट्रॉफी खिलाड़ी रह चुके हैं, बचपन से इलाके में होने वाले स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट देखते आए हैं. जब करीब 10 साल तक ये टूर्नामेंट बंद रहे, तो उन्होंने इन्हें दोबारा शुरू करने का फैसला किया.
महेंद्र कहते हैं, “हम चाहते हैं कि युवा खेलों से जुड़ें, खासकर ऐसे समय में जब हर कोई फोन में लगा रहता है. एमपीएल इसी सोच का हिस्सा है.”
हालांकि लीग शुरू करना आसान नहीं था, क्योंकि मैदानों की हालत खराब थी. चौधरी ने पहले सीनियर सेकेंडरी स्कूल का मैदान चुना, लेकिन वहां मलबा और पत्थर पड़े थे. जहाज महल का मैदान दलदल जैसा कूड़े का ढेर था, जो उन्हें “मरा हुआ” लगता था.
महेंद्र याद करते हैं, “हमने स्कूल का मैदान साफ कराया.” उस समय के शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह लवली ने 44 लाख रुपये मंजूर किए, जिससे वहां मिनी स्टेडियम जैसी व्यवस्था बनाई गई. बाद में टूर्नामेंट का मैदान स्कूल से आम बाग और फिर जहाज महल पहुंचा, जहां लगातार सुधार किए गए.

इनायत खान, जो पहले एमपीएल खेल चुके हैं, कहते हैं, “अब यहां कंक्रीट की पिच, नई घास और रात में खेलने के लिए लाइटें लगा दी गई हैं.”
जहाज महल और हौज-ए-शम्सी दोनों ऐतिहासिक स्थल हैं और पिछले दो साल से एमपीएल के मैच यहीं खेले जा रहे हैं.
महेंद्र कहते हैं, “इतिहास से जुड़े इन मैदानों पर बच्चों को खेलते देखना बहुत खुशी की बात है.” उनका कहना है कि सदियों पुराने स्मारकों के बीच खेलना इस टूर्नामेंट को और खास बना देता है.
मैच देखने आए लोग भी इन जगहों का इतिहास बताते हैं.
18 साल के साद कहते हैं, “जहाज महल पहले यात्रियों के ठहरने की सराय था. मुगल काल से यहां फूलों वाली सैर भी होती है. और अब यहां एमपीएल खेला जाता है.”
सीनियर एमपीएल
आज का अंडर-15 एमपीएल पहले ऐसा नहीं था. पहले इसमें बड़े खिलाड़ी भी खेलते थे.
लेकिन आमवाले बाग में क्रिकेट खेलते समय युवाओं के बीच हुई एक झड़प के बाद आरएसएस और बीजेपी के नेतृत्व में महरौली थाने के बाहर प्रदर्शन हुआ. इसके बाद चार पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया गया और जांच शुरू हुई. झगड़ा कैसे शुरू हुआ, इसे लेकर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग बातें हैं. लेकिन इसके बाद सीनियर एमपीएल बंद हो गया.
शरीफुद्दीन कहते हैं, “2017 तक सीनियर एमपीएल होता था. मैं भी उसमें खेलता था.”
अब शरीफुद्दीन गाड़ी चलाकर परिवार चलाते हैं, जबकि उनका बड़ा बेटा शफीन दरगाह के पास परिवार की दुकान संभालता है. परिवार के छह लोग अब दो मंजिला घर में रहते हैं. उनके पिता की मौत के बाद उनकी मां को बड़ा घर बेचना पड़ा था.
शरीफुद्दीन कहते हैं, “जूनियर एमपीएल अच्छा है, लेकिन सीनियर एमपीएल के सामने कुछ भी नहीं. वह शानदार था. बिल्कुल किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय लीग जैसा लगता था.”
सीनियर एमपीएल बड़े मैदानों में खेला जाता था, लेकिन अब वहां पेड़ लग गए हैं और क्रिकेट नहीं हो पाता.
अब महेंद्र कई मैचों की शुरुआत धार्मिक एकता का संदेश देकर करते हैं.
वह टॉस से पहले कहते हैं, “हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई. सब भाई-भाई.”

तालिब – मेहरौली किंग्स
13 साल के तालिब कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास एक तंग गली में रहते हैं. संकरी सीढ़ियां पहले मंजिल तक जाती हैं, जहां लाल और सुनहरे वॉलपेपर वाला कमरा, फर्श पर बिछे गद्दे और दरवाजे पर रखा बड़ा एयर कूलर है. दूसरी मंजिल पर रसोई है, जहां हमेशा खाने की खुशबू रहती है.
चार भाइयों में सबसे छोटे तालिब ने अपने पिता को दरगाह के शेर टीम के कप्तान के रूप में खेलते देखा है.
तालिब कहते हैं, “जब मैं मैदान में उतरता हूं तो लोग मुझे पहचानते हैं. कमेंटेटर कहते हैं कि आज मैं कितने छक्के मारूंगा. कई बार वे मुझे भी ‘शेर’ कहते हैं.”

तालिब दुबले-पतले हैं और हमेशा मुस्कुराते रहते हैं. उन्हें हर खेल पसंद है और साइकिल सजाने का भी शौक है. उनके पास साइकिल पर लगाने के लिए रंग-बिरंगी लाइटें और छोटी-छोटी चीजों से भरी एक दराज है. लेकिन क्रिकेट उनके दिल के सबसे करीब है.
वह कहते हैं, “मैं पिछले तीन साल से एमपीएल खेल रहा हूं.” और फिर अपनी तीनों जर्सीज़ दिखाते हैं.
पहली नीली जर्सी, जिसके पीछे नंबर 6 लिखा है, उन्हें अपने पहले एमपीएल मैच की याद दिलाती है. 2024 की जर्सी पर बी.आर. आंबेडकर और महेंद्र चौधरी की तस्वीर थी. बाद की जर्सियों में आंबेडकर की जगह रेखा चौधरी की तस्वीर लगा दी गई, जो बाद में वार्ड प्रमुख बनीं.
हर मैच से पहले तालिब अपनी टीम से कहते हैं कि शांति से खेलो और धैर्य बनाए रखो.
विराट कोहली के प्रशंसक तालिब ने उप-कप्तान बनना इसलिए स्वीकार किया ताकि कप्तानी चाहने वाले दूसरे लड़के को भी मौका मिल सके. उनकी टीम लीग चरण के चार में से तीन मैच जीत चुकी है और अब 28 जुलाई से शुरू होने वाले नॉकआउट में खेलेगी.
तालिब कहते हैं, “अगर हम नहीं जीते तो दूसरी दरगाह की टीम वार्ड 7 टाइगर्स जीतेगी.”
उनके माता-पिता क्रिकेट खेलने का पूरा समर्थन करते हैं, बस शर्त यह है कि पढ़ाई भी अच्छी चले. तालिब जल्द ही सरकारी स्कूल में दाखिला लेंगे. फिलहाल वह ट्यूशन जाते हैं. उनके पिता शरीफुद्दीन काम से जल्दी लौटें तो मैच देखने आते हैं, जबकि उनकी मां ने उन्हें सिर्फ वीडियो कॉल पर खेलते देखा है.
तालिब कहते हैं, “जब मेरे पापा मुझे खेलते देखने आते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. इससे मेरा हौसला बढ़ता है.”
उनका सपना है कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर बनें और इससे भी बड़ी ट्रॉफियां जीतकर घर लाएं.

MPL का विस्तार और ढांचा
एमपीएल अब काफी बड़ा हो चुका है. इस साल 264 टीमों ने आवेदन किया. स्क्रीनिंग टेस्ट के बाद 44 टीमें अगले दौर में पहुंचीं, जबकि पिछले साल यह संख्या करीब 30 थी. अगर किसी खिलाड़ी की उम्र 8 से 15 साल की तय सीमा से बाहर पाई जाती है, या खिलाड़ी गर्मियों की छुट्टियों में बाहर चले जाते हैं, तो टीम को बाहर कर दिया जाता है.
महेंद्र चौधरी के दफ्तर में अधिकारियों की टीम खिलाड़ियों के नाम, उम्र, फोटो, आधार कार्ड नंबर और संपर्क विवरण की जांच करती है. इसके बाद उन्हें जर्सी दी जाती है. आयोजकों का कहना है कि इस साल की जर्सी पहले से बेहतर पसीना सोखने वाले कपड़े से बनाई गई है, जिस पर उन्हें गर्व है.
जर्सी का बेस रंग काला है. हर टीम को अलग पहचान देने के लिए उसकी अपनी रंग की फ्लेम और चेक पैटर्न बनाए गए हैं. जैसे मेहरौली किंग्स की जर्सी पीले-सुनहरे रंग की, ईगल चैलेंजर्स की गुलाबी और मेहरौली टाइगर्स की नीली है.
हर टीम छह-छह ओवर के पांच लीग मैच खेलती है. हर ओवर में पांच गेंदें होती हैं. इसके बाद शीर्ष 16 टीमें नॉकआउट दौर में पहुंचती हैं.
पहले सीनियर एमपीएल के मैच शाम 6:30 से 7 बजे के बीच शुरू होते थे, जबकि जूनियर मैच सुबह या शाम को होते थे. पिछले साल की भीषण गर्मी के बाद आयोजकों ने ज्यादातर मैच देर शाम कराने का फैसला किया. अब फ्लडलाइट की वजह से रात में भी मैच हो रहे हैं.
रजिस्ट्रेशन पूरी तरह मुफ्त है. गेंद, खिलाड़ियों के लिए जलपान, उपहार और ट्रॉफी का खर्च आयोजक खुद उठाते हैं.
चौधरी बताते हैं, “मैन ऑफ द मैच को हम स्पोर्ट्स साइकिल देते हैं. इस साल लगातार तीन छक्के लगाने वाले बल्लेबाजों के लिए भी छोटे-छोटे इनाम रखे गए हैं.”
विजेता टीम को ट्रॉफी और हर खिलाड़ी को अलग-अलग उपहार दिए जाते हैं. इन उपहारों का चुनाव आयोजक करते हैं और पुरस्कार वितरण तक उन्हें गुप्त रखा जाता है. पिछले साल दोनों विजेता टीमों के खिलाड़ियों को डिनर सेट दिए गए थे. किसी खिलाड़ी को नकद इनाम नहीं दिया जाता.
चौधरी ने कहा, “हम पैसे का इनाम देकर सट्टेबाजी को बढ़ावा नहीं देना चाहते.”
पहले खिलाड़ियों को बैट भी दिए जाते थे, लेकिन बाद में यह बंद कर दिया गया क्योंकि बच्चे अपना बैट खुद चुनना पसंद करते हैं.

आयोजन में पूरे समुदाय की भागीदारी
एमपीएल की सबसे खास बात इसका पूरी तरह स्थानीय होना है. हर टीम मेहरौली के अलग-अलग इलाके से बनाई जाती है.
चौधरी ने कहा, “मैच देखने के लिए लोगों का इकट्ठा होना बहुत अच्छा लगता है. माता-पिता और दादा-दादी भी अपने बच्चों का हौसला बढ़ाने आते हैं.”
इस टूर्नामेंट को सफल बनाने के पीछे करीब 100 स्वयंसेवकों की मेहनत है. ये सभी स्थानीय लोग हैं, जिनकी अपनी-अपनी नौकरियां हैं. इनमें शिक्षक से लेकर दुकानदार तक शामिल हैं. वे शाम का समय निकालकर मेहरौली के इस त्योहार को सफल बनाते हैं. कमेंट्री, अंपायरिंग, जलपान और मैदान की व्यवस्था जैसी जिम्मेदारियां बांट दी जाती हैं और बारी-बारी से निभाई जाती हैं.
चौधरी ने कहा, “हर कोई इस टूर्नामेंट से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है. जितना समय मिल पाता है, हम निकाल लेते हैं. इस टूर्नामेंट की वजह से हम सबको साथ बैठने और मिलने का मौका भी मिल जाता है.”
हालांकि मैदान पर व्यवस्था की जिम्मेदारी मुख्य रूप से चौधरी की टीम और उनके राजनीतिक समर्थकों के पास होती है. स्वयंसेवक और पूर्व खिलाड़ी भी मदद करते हैं, लेकिन आयोजन का संचालन चौधरी की टीम करती है.
रेखा चौधरी के साथ काम करने वाले अरविंद पांडे पिछले दो साल से प्रबंधन टीम का हिस्सा हैं और अब कमेंटेटर की भूमिका निभा रहे हैं.
वह भी चौधरी की बात दोहराते हुए कहते हैं कि इस टूर्नामेंट की जरूरत क्यों है.
उन्होंने कहा, “आजकल बच्चे मोबाइल में ज्यादा व्यस्त रहते हैं और स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ गया है. यह टूर्नामेंट उन्हें मैदान में आकर खेलने का मौका देता है. खेल से बच्चों की मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की ताकत बढ़ती है.”

खिलाड़ी
13 साल का अयान, जो मेहरौली वंडर्स टीम का खिलाड़ी है, इस टूर्नामेंट की असली भावना को दिखाता है.
वह गर्व से कहता है, “मैं अपने इलाके की टीम में चुना गया हूं. हमारी टीम का नाम मेहरौली वंडर्स है.” विराट कोहली का प्रशंसक अयान इस साल पहली बार टूर्नामेंट खेल रहा है.
वह कहता है, “पिछली बार हमारी टीम सेमीफाइनल तक पहुंची थी, लेकिन जीत नहीं सकी. इस बार हम जरूर जीतेंगे.”
अयान और उसके साथी पूरे साल हर रविवार अभ्यास करते हैं. वह कहता है कि पढ़ाई पहले है, लेकिन सपना उससे भी बड़ा है.
“एक दिन हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलना चाहते हैं. हमारी टीम से कोई ऐसा खिलाड़ी निकले जो बड़ा नाम कमाए और उसके जरिए मेहरौली की पहचान बने.”
अयान का दावा है कि मेहरौली के 13-14 खिलाड़ी पहले ही अंडर-19 लीग तक पहुंच चुके हैं और कुछ ड्रीम लीग ऑफ इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म तक भी पहुंचे हैं.
महिलाओं की सीमित भागीदारी
मैदान लड़कों से भरा रहता है, लेकिन महिलाओं और लड़कियों की मौजूदगी बहुत कम दिखती है. जो कुछ महिलाएं आती भी हैं, वे सिर्फ दर्शक बनकर रहती हैं. तालिब की मां की तरह कई महिलाएं तो कभी मैदान तक आई ही नहीं हैं.
जब चौधरी से इसका कारण पूछा गया तो वह कुछ देर रुके.
उन्होंने कहा, “लड़कियां भी खेलना चाहती हैं. उन्होंने मुझसे यह बात कही है. मैं उन्हें भी टूर्नामेंट में शामिल करना चाहता हूं, लेकिन शुरुआत कहां से करूं, यही समझ नहीं आता.”
उन्होंने बताया कि 2011-12 से महिलाओं के लिए मेहंदी कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, लेकिन उनके अनुसार खेल की अपनी अलग अहमियत है.
उन्होंने कहा, “खेल आपको ऊर्जा देता है, जीने का तरीका देता है. महिलाएं मजबूत होती हैं. इसे शुरू करने के लिए मुझे एक टीम की जरूरत है.”
आगे की योजना
एमपीएल सिर्फ रोमांच नहीं देता, बल्कि इसमें खेलने वाले युवाओं की जिंदगी में भी बदलाव लाता है.
चौधरी कहते हैं, “एमपीएल खेलने के बाद बहुत से खिलाड़ी फिटनेस की अहमियत समझने लगते हैं. वे सुबह टहलने जाते हैं, दौड़ते हैं, क्रिकेट अकादमी और जिम जाने लगते हैं. अगर 500 खिलाड़ियों में से 50 भी क्रिकेट या किसी खेल को गंभीरता से अपनाते हैं, तो मैं इसे अपनी जीत मानता हूं.”
इस सीजन में सोशल मीडिया पर भी टूर्नामेंट की मौजूदगी बढ़ाई गई है. टूर्नामेंट के लिए इंस्टाग्राम और फेसबुक पर अलग अकाउंट बनाए गए हैं. इंस्टाग्राम अकाउंट @mehrauli_premier_league के 499 फॉलोअर्स हैं, जहां मैचों का शेड्यूल, नतीजे और हाइलाइट्स पोस्ट किए जाते हैं. बारिश के बाद एक पोस्ट में पानी से भरे मैदान की तस्वीर के साथ लिखा गया था, “कुछ दिन इंतिजार करना होगा भतीजों.”
तालिब अक्सर इस पेज की पोस्ट अपने अकाउंट पर शेयर करता है और उसने एमपीएल के लिए अलग स्टोरी हाइलाइट भी बनाई हुई है. आयोजकों का इरादा सिर्फ क्रिकेट तक सीमित रहने का नहीं है.
चौधरी कहते हैं, “हम फुटबॉल, वॉलीबॉल और बैडमिंटन की भी ऐसी ही लीग शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं.” फुटबॉल लीग का पोस्टर पहले ही एमपीएल के अकाउंट पर डाला जा चुका है.
अब नॉकआउट दौर करीब है और पूरे मेहरौली की नजरें मुकाबला कर रही टीमों पर टिकी हैं. युवा खिलाड़ियों पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है.
चौधरी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “फाइनल का माहौल और रोमांच बेमिसाल होता है. यह आईपीएल से बिल्कुल भी कम नहीं होगा.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: CJP प्रदर्शन: युवक की आंख और गर्दन में धंसे पैलेट, दो सर्जरी के बाद निकाले गए टुकड़े