इंदौर: 42 दूल्हों की पगड़ियां और शादी के कुर्ते पसीने से भीग चुके थे क्योंकि वे 42 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी में मंदिर के मंडप के पास अपनी दुल्हनों का इंतज़ार कर रहे थे.
कोई कार से आया था, कोई मोटरसाइकिल से और कुछ किराए की एसयूवी में पहुंचे थे. उन्हें वादा किया गया था कि उनकी ही बिरादरी की एक सुंदर और अच्छी लड़की से शादी होगी और उनकी ज़िंदगी की नई शुरुआत होगी, लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, सच्चाई सामने आने लगी. जिन महिलाओं से उनकी शादी होने वाली थी, वे वास्तव में थीं ही नहीं.
सीहोर से 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करके सामूहिक विवाह में शामिल होने आए फैक्ट्री कर्मचारी अभिषेक बैरागी ने कहा, “हमने अपने समाज के लोगों पर भरोसा किया था. अब हमारी और हमारे परिवारों की इज्ज़त बिखर गई है.”
भारत में सामूहिक विवाह केवल संस्कृति या परंपरा का हिस्सा नहीं हैं. इन्हें सामाजिक सेवा और परोपकार के रूप में देखा जाता है. आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों के लड़के-लड़कियों के लिए यह बिना भारी कर्ज लिए शादी करने का मौका होता है. शादी का खर्च कई बार माता-पिता को आर्थिक रूप से बर्बाद कर देता है.
कई राज्य सरकारों ने भव्य शादियों पर खर्च सीमित करने की कोशिश की, लेकिन इसमें खास सफलता नहीं मिली.
हालांकि, सामूहिक विवाहों के राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन हर साल सरकारी योजनाओं और सामाजिक संगठनों के माध्यम से हज़ारों शादियां कराई जाती हैं. 2017 से 2025 के बीच केवल उत्तर प्रदेश सरकार ने 4.8 लाख लोगों की शादी कराने में मदद की. वहीं मध्य प्रदेश सरकार भी 2006 से हज़ारों जोड़ों का विवाह करा चुकी है.
लेकिन हाल के वर्षों में सामूहिक विवाह धोखाधड़ी का एक नया मैदान बनकर उभरे हैं.
नकद सहायता, उपहार और अन्य लाभों के वादों ने लोगों का शोषण करने के लिए प्रोत्साहन पैदा किया है, भले ही आर्थिक फायदा बहुत बड़ा न हो. देवास में जो हुआ, वह इसी कमजोरी का नतीजा था.
दिल्ली हाई कोर्ट की वकील और वैवाहिक विवादों की विशेषज्ञ उर्वी मोहन ने कहा, “भारत में सामूहिक विवाहों का आर्थिक और सामाजिक दोनों पहलू है. देवास का मामला सिर्फ आर्थिक ठगी नहीं था. इसने उस सोच को भी उजागर किया है, जहां सही जीवनसाथी ढूंढने से ज्यादा महत्व सिर्फ शादीशुदा कहलाने को दिया जा रहा है.”
उन्होंने कहा, “लोग बिचौलियों को पैसे देकर शादी करवाने के लिए तैयार हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जीवन में स्थापित माने जाने के लिए शादी जरूरी है.”

देवास और शादी का धोखाधड़ी वाला मामला
भारत में शादी सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ भी होती है.
भारत दुनिया के सबसे बड़े शादी बाज़ारों में से एक है. कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के अनुमान के मुताबिक, 1 नवंबर से 14 दिसंबर 2025 के बीच शादियों पर 6.50 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए. वेडिंग प्लानर से लेकर मेहंदी कलाकार तक, दो लोगों की शादी कराने में सैकड़ों लोग शामिल होते हैं. जैसे-जैसे यह बाज़ार लगातार बड़ा होता जा रहा है, वैसे-वैसे धोखाधड़ी की संभावना भी बढ़ती जा रही है.
देवास में जो हुआ, वह उन परिवारों की बढ़ती मजबूरी की एक झलक थी, जो अपने बेटों के लिए दुल्हन ढूंढने में संघर्ष कर रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह समुदाय में महिलाओं की कमी भी है.
12वीं पास केशव, जो इंदौर की एक पॉश सोसाइटी में सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हैं, उन दूल्हों में शामिल थे जो देवास से खाली हाथ लौटे.
केशव के गांव काला पीपल में अब अफरा-तफरी तो कम हो गई है, लेकिन बेचैनी अभी भी बनी हुई है. 25 मई की घटना के दस दिन बाद उनका परिवार पैसे के नुकसान और दुल्हन न मिलने की हकीकत को स्वीकार कर चुका है. घटना के तुरंत बाद केशव वापस इंदौर काम पर लौट गया.
केशव के पिता भगवान दास बैरागी ने कहा, “हमारी गांव में बहुत बेइज्जती हुई.”
परिवार की महिलाएं भी, जिन्होंने केशव के साथ गए पुरुषों से धोखाधड़ी की पूरी कहानी सुनी, अब देवास से किसी “मदद” की उम्मीद नहीं कर रही हैं. बैरागी ने कहा, “जब कोई आपको फोटो दिखाकर कहता है कि वह शादी करा सकता है, तो आप उस पर विश्वास करना चाहते हैं. बहुत से परिवार अपने बेटों के लिए दुल्हन ढूंढने में परेशान हैं. लोग जोखिम उठाते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि शायद ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा.”
आरोप है कि चारों आरोपी, जो सभी बैरागी समाज से हैं, पीड़ितों को बताते थे कि जिन लड़कियों से उनकी शादी कराई जाएगी, वे इंदौर के मातृ छाया आश्रम की हैं. यह अनाथालय सेवा भारती द्वारा चलाया जाता है, जो आरएसएस से जुड़ा संगठन है. केशव के चाचा ओम प्रकाश बैरागी को यह दावा संदिग्ध लगा और उन्होंने खुद इसकी जांच शुरू की.
अनाथालय में काम करने वाली समाजसेवी सरिता कुन्हारे ने कहा, “पीड़ित परिवारों में से एक हमारे पास आया था क्योंकि वह ठगों को 25,000 रुपये देने वाला था और यह पुष्टि करना चाहता था कि क्या हमारी संस्था के माध्यम से ऐसी शादियां कराई जा रही हैं. हमने उसे साफ-साफ बता दिया कि यहां ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं चल रहा है.”

ओम प्रकाश ने परिवार को चेतावनी भी दी, लेकिन इसके बावजूद वे आगे बढ़ गए. 24 साल के केशव की बीमार दादी अपने पोते की शादी अपने ही समाज की लड़की से होते देखना चाहती थीं.
सामूहिक विवाह से जुड़े घोटाले अभी ज्यादातर ऑफलाइन होते हैं, लेकिन शादी से जुड़ी ठगी तेज़ी से ऑनलाइन दुनिया में भी फैल रही है. ठग अब मैट्रिमोनियल वेबसाइटों, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं. दिसंबर 2025 में डॉ. आंबेडकर गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, चेन्नई की प्रोफेसर वी. चित्रा के एक शोध पत्र में कहा गया कि ठग अरेंज मैरिज और मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म से जुड़े भरोसे का फायदा उठाते हैं. वे फर्ज़ी आईडी बनाते हैं और भावनात्मक रूप से लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं.
शोध में बताया गया कि ऐसे मामलों की रिपोर्ट में चार साल के दौरान 9000 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. 2024 में इससे होने वाला आर्थिक नुकसान 22,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था.
मोहन ने कहा, “इस सबकी जड़ भारतीय समाज में शादी को दी जाने वाली बेहद ज्यादा अहमियत है. हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि शादी के बिना ज़िंदगी अधूरी है. ‘सेटल होना’ का मतलब शायद ही कभी अच्छी नौकरी या घर खरीदना होता है, इसका मतलब लगभग हमेशा शादी करना और बच्चे पैदा करना माना जाता है. यही सामाजिक दबाव एक ऐसा बाज़ार तैयार करता है, जिसका फायदा ठग उठा सकते हैं.”
एक बैरागी दुल्हन
शादी से जुड़ी धोखाधड़ी अब काफी संगठित हो चुकी है और ठग एक तय तरीके से काम करते हैं. देवास में जो हुआ, वह कोई अकेली घटना नहीं थी. “गायब दुल्हनों” वाले सामूहिक विवाह के मामले देश के कई हिस्सों में बार-बार सामने आए हैं.
सामूहिक विवाह ज्यादातर ग्रामीण या अर्ध-शहरी इलाकों में होते हैं, जहां संभावित जीवनसाथी के बारे में जानकारी की जांच-पड़ताल करने के साधन कम होते हैं. कई मामलों में दूल्हा-दुल्हन की उम्र में बड़ा अंतर होता है और ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने वाले पुरुष अक्सर वे होते हैं जिन्हें सामान्य विवाह व्यवस्था के जरिए जीवनसाथी नहीं मिल पाता.
इन मामलों में एक एजेंट भी शामिल होता है—यही वह बिचौलिया होता है जो पैसा कमाता है. रिपोर्ट के मुताबिक, देवास में पीड़ित परिवारों ने एक बिचौलिए को 15,000 से 25,000 रुपये तक दिए थे. यह दिखाता है कि कैसे लोगों की मजबूरी को एक फायदे वाले कारोबार में बदला जा सकता है.
केशव के परिवार की मुलाकात अप्रैल में एक रिश्तेदार की शादी में सुनीता दास बैरागी से हुई थी. वह काफी बातूनी महिला थी और मेहमानों के बीच आसानी से घूम रही थी और अपने फोन में एक सुंदर लड़की की फोटो दिखा रही थी. भारत में यह कोई असामान्य बात नहीं है. शादियां अक्सर अच्छे दूल्हे और दुल्हन की तलाश का भी एक मंच बन जाती हैं.
हालांकि, केशव उस समय इंदौर में थे, लेकिन उनके पिता और चाचा फोटो में दिखाई गई लड़की की सुंदरता से प्रभावित हो गए और उन्होंने रिश्ता आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया.
इंदौर में कैब ड्राइवर के रूप में काम करने वाले ओम प्रकाश ने कहा, “हमें बताया गया कि शादी अगले महीने है और तैयारी के लिए परिवार को 15,000 रुपये देने होंगे. यह बैरागी समाज का सामूहिक विवाह होगा.”
मध्य प्रदेश में बैरागी समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से हिंदू पुजारी, मंदिरों के देखभालकर्ता और धार्मिक मार्गदर्शक रहे हैं. वे वैष्णव परंपरा से जुड़े होते हैं.

शिकायत करने में हिचकिचाहट
मध्य प्रदेश में निवेश घोटाले, गिफ्ट और कस्टम क्लियरेंस फ्रॉड, फर्जी एनआरआई दूल्हा-दुल्हन योजनाएं, सेक्सटॉर्शन और लूटेरी दुल्हन जैसे मामले काफी बदनाम हैं.
“लूटेरी दुल्हन” वह महिला होती है, जो शादी को किसी परिवार में घुलने-मिलने का जरिया बनाती है और भरोसा जीतने के बाद उनके पैसे और कीमती सामान लेकर गायब हो जाती है. ऐसी ज्यादातर दुल्हनें दूसरे राज्यों से लाई जाती हैं.
देवास के पुलिस अधीक्षक (सीएसपी) सुमित अग्रवाल ने कहा, “आरोपी लूटेरी दुल्हन के मामलों से प्रेरित थे.” सभी आरोपियों—मुकेश, उसकी पत्नी सुनीता, उसके पिता नरसिंह और उसके भाई दिनेश को गिरफ्तार कर लिया गया है.
ये सभी लोग दिहाड़ी मजदूरी जैसे छोटे-मोटे काम करते थे और बेहतर ज़िंदगी की तलाश में थे. शादी के नाम पर ठगी का विचार उन्हें आसान लगा.
लेकिन 42 ठगे गए लोगों में से पुलिस को केवल 13 शिकायतें मिली हैं और दर्ज की गई हैं, जिनमें केशव की शिकायत भी शामिल है.
ओम प्रकाश ने कहा, “हमारे समाज में ऐसी बातें बहुत जल्दी फैल जाती हैं और यह हमारी इज्ज़त का सवाल था, इसलिए बहुत से लोगों ने शिकायत दर्ज नहीं कराई.”
अग्रवाल ने कहा, “पीड़ितों से करीब 1.25 लाख रुपये ठगे गए हैं.”
शिकायत दर्ज कराने में ऐसी हिचकिचाहट अहमदाबाद में हुए एक इसी तरह के सामूहिक विवाह घोटाले में भी देखने को मिली थी.
2024 में हिंदू जन विकास सेवा संघ ट्रस्ट के नाम पर एक सामूहिक विवाह समारोह का पर्चा बांटा गया था. इसमें भाग लेने वाले परिवारों से शादी के खर्च के लिए 22,000 रुपये मांगे गए थे. 113 जोड़ों ने इसमें नाम दर्ज कराया.
लेकिन जब वे कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे, तो वहां शादी की कोई तैयारी नहीं थी. आयोजक फरार हो चुके थे.
समाचार रिपोर्टों के अनुसार, परिवारों से करीब 24 लाख रुपये लिए गए थे. एक समाजसेवी ने 113 जोड़ों में से एक परिवार को शिकायत दर्ज कराने के लिए तैयार किया, जिसके बाद मामला दर्ज हुआ.
अहमदाबाद की घटना के विपरीत, देवास के इस सामूहिक विवाह की जानकारी दूल्हों तक सामुदायिक नेटवर्क के जरिए पहुंची थी.
ओम प्रकाश ने कहा, “हमने इस पर भरोसा किया क्योंकि जानकारी रिश्तेदारों के जरिए आई थी. एक व्यक्ति ने दूसरे पर भरोसा किया और फिर बाकी लोग भी जुड़ते गए. जब रिश्तेदार कहते हैं कि शादी तय हो गई है, तो तुरंत यह नहीं लगता कि यह धोखाधड़ी हो सकती है.”
परिवार ने इस शादी से बहुत उम्मीदें लगा रखी थीं.
केशव की मां, जिन्होंने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर बात की, बताती हैं, “हर माता-पिता की तरह हम भी बहू के घर आने का इंतज़ार कर रहे थे.”
उन्होंने कहा, “जब आपका बेटा शादी की उम्र में पहुंच जाता है, तो हर परिवार यही सपना देखता है.”

बहु-विवाह योजनाएं, एनजीओ और सरकारी पहल
भारत के अलग-अलग राज्यों में सामूहिक विवाह से जुड़े धोखाधड़ी के कई अलग-अलग मामले सामने आए हैं.
उत्तर प्रदेश के बलिया में एक सामूहिक विवाह समारोह के बाद गिरफ्तारियां हुई थीं. अधिकारियों को पता चला कि कुछ दूल्हों को कथित तौर पर विवाह दलालों ने पैसे देकर पति बनकर खड़े होने के लिए तैयार किया था, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ गलत तरीके से लिया जा सके.
भारत में सामूहिक विवाह सरकारी योजनाओं, सामुदायिक मंदिरों और एनजीओ के माध्यम से कराए जाते हैं.
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कन्या विवाह/निकाह योजना, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना, राजस्थान में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना और बिहार में मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना चलती हैं.
इन सभी सरकारी योजनाओं के तहत शादी का खर्च उठाने के लिए दुल्हन और उसके परिवार को आर्थिक सहायता दी जाती है. उत्तर प्रदेश में दुल्हन के परिवार को करीब 1 लाख रुपये दिए जाते हैं, जिसमें 60,000 रुपये दुल्हन के खाते में, 25,000 रुपये शादी का सामान खरीदने के लिए और 15,000 रुपये शादी की व्यवस्था के लिए दिए जाते हैं.
मोहन ने कहा, “यह तथ्य कि ऐसे घोटाले बार-बार सामने आ रहे हैं, हमें बताता है कि इनके लिए मांग मौजूद है. ठग हवा में कोई बाज़ार नहीं बना रहे हैं—वे पहले से मौजूद सामाजिक दबाव का फायदा उठा रहे हैं. अगर मांग नहीं होती, तो ये शादी कराने वाले बिचौलिए और एजेंट इतनी आसानी से कामयाब नहीं हो पाते.”
सांस्कृतिक समानता
केशव अपने गांव के अकेले व्यक्ति नहीं थे जो सज-धजकर सामुदायिक विवाह में शामिल होने के लिए देवास गए थे. सुनीता दास की योजना आसपास के गांवों में, खासकर बैरागी समुदाय के बीच, तेजी से फैल गई थी.
शादी के स्थल पर पहुंचने वालों में 40-वर्षीय किसान भीम सिंह भी थे, जो अपने 100 साल के पिता के साथ अकेले रहते हैं. हालांकि, उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि वह दूल्हे के रूप में वहां नहीं गए थे, लेकिन उनके पड़ोसियों का कहना था कि वह दुल्हन की तलाश कर रहे थे.
वे सभी अपने घरों से मुस्कुराते हुए निकले थे. उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें पत्नी मिलेगी, जो उनके परिवार की देखभाल करेगी.
सामूहिक विवाह अक्सर उन पुरुषों के लिए आखिरी विकल्प बन जाता है जिन्हें पत्नी ढूंढने में परेशानी होती है. वे समाज द्वारा तय विवाह योग्य उम्र से आगे निकल चुके हो सकते हैं, जैसे सिंह, या तलाकशुदा हो सकते हैं, या फिर नशे की लत से जूझ रहे हो सकते हैं.
इसी मजबूरी का फायदा एजेंट और मैरिज ब्यूरो उठाते हैं.
दिल्ली स्थित कमज़ोर महिलाओं के उत्थान के लिए काम करने वाले संगठन लाडली फाउंडेशन के संस्थापक देवेंद्र कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “एजेंट, जिन्हें बिचौलिया कहा जाता है, इन परिवारों से शादी कराने का वादा करते हैं और उनसे पैसे मांगते हैं.”

कुमार ने कहा कि हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में इस तरह की धोखाधड़ी ज्यादा देखने को मिलती है, जहां 20 साल पहले लिंगानुपात असंतुलित था.
इंदौर में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की महिला सशक्तिकरण अधिकारी वंचना सिंह परिहार ने दिप्रिंट से कहा, “लोग सामूहिक विवाह इसलिए चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे ऑनलाइन ठगी से बच सकते हैं.”
उन्होंने कहा कि लोग सामूहिक विवाह इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि ये अपने ही समुदाय के भीतर होते हैं.
उन्होंने कहा, “इससे सांस्कृतिक समानता बनी रहती है.”

इसी वजह से बैरागी परिवारों जैसे परिवारों के लिए सामुदायिक विवाह का विकल्प अभी भी खत्म नहीं हुआ है.
केशव की मां ने कहा, “केशव की शादी तो करनी ही है, लेकिन अब हम ज्यादा सावधानी बरतेंगे.”
परिवार अब भी एक “उपयुक्त दुल्हन” की तलाश में है—ऐसी लड़की जो सुंदर हो और उनके समुदाय की हो.
केशव की बुआ ने कहा, “और क्या कर सकते हैं? हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा बस जाए.”
सभी मामले धोखाधड़ी नहीं होते
लाडली फाउंडेशन 2012 से सामूहिक विवाह करवा रहा है. कुमार ने दिप्रिंट को बताया कि संस्था उम्र की जांच, ज़रूरी दस्तावेज़ और कई स्तर की जांच पर जोर देती है. इससे न सिर्फ धोखाधड़ी रुकती है, बल्कि कम उम्र की शादियों पर भी नजर रखी जाती है.
नई दिल्ली के तुगलकाबाद की 19-वर्षीय रुक्मिणी कुमारी ने मार्च में दिल्ली सरकार के समर्थन और लाडली फाउंडेशन की मदद से आयोजित एक सामूहिक विवाह में अपने 21-वर्षीय प्रेमी से शादी की.
वह शादी पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना चाहती थीं. इसलिए जब उनकी मां ने उन्हें दिल्ली में होने वाले सामूहिक विवाह के बारे में बताया, तो उन्होंने तुरंत इसमें हिस्सा लेने का फैसला किया. उन्होंने अपने पति के साथ 3,100 रुपये देकर विवाह के लिए रजिस्ट्रेशन कराया.
उन्हें सिर्फ वहां पहुंचना था, बाकी सारी व्यवस्था पहले से की गई थी, यहां तक कि मेकअप भी.

उन्होंने कहा, “मैं उसी से शादी करना चाहती थी. मुझे पता था कि मेरे पिता भव्य शादी का खर्च नहीं उठा पाएंगे, इसलिए मैंने सामूहिक विवाह चुना.”
“सामूहिक विवाह करें या निजी विवाह… शादी तो शादी होती है.”
शादी के बाद दंपति को साड़ियों और बर्तनों से भरा एक सूटकेस मिला. दंपति का दावा है कि उन्हें लाडली की ओर से शादी के तीन साल बाद 1 लाख रुपये देने का भी वादा किया गया है.
रुक्मिणी नई दिल्ली के रामानुजन कॉलेज से बीए की पढ़ाई कर रही हैं. उनके पति एक टेक्सटाइल कंपनी में ऑपरेटर हैं और घर का खर्च संभालते हैं.
रुक्मिणी ने कहा, “मेरे पति हमारी शादी का जश्न मनाना चाहते थे. वह सामूहिक विवाह नहीं चाहते थे, लेकिन आखिर में हमने सोचा कि यही बेहतर है.”
हालांकि, उनकी शादी मुफ्त में हुई, फिर भी उन्होंने हल्दी, मेहंदी, कपड़ों और यात्रा पर लगभग 2 लाख रुपये खर्च किए.
अखिल भारतीय अग्रवाल समाज के अध्यक्ष राज कुमार गोयल ने दिप्रिंट को बताया कि सामूहिक विवाह आयोजित करने में कई महीने लग जाते हैं.
उन्होंने कहा, “ज्यादातर जोड़े पहले से एक-दूसरे को जानते हैं और सामूहिक विवाह उनके लिए शादी करने का आसान तरीका होता है.”
जबलपुर के गायत्री मंदिर में मुख्य पुजारी अभी-अभी शादियों से जुड़ा कुछ कागज़ी काम पूरा कर चुके थे. हालांकि, मंदिर सामूहिक विवाह आयोजित नहीं करता, लेकिन बिना तड़क-भड़क के हिंदू विवाह कराने के लिए इलाके में काफी प्रसिद्ध है.
मुख्य पुजारी सादगीपूर्ण विवाह के समर्थक हैं. उनका इकलौता बेटा, जो एयरबस में काम करता है, उनकी ओर से आयोजित एक सामूहिक विवाह में पांच अन्य जोड़ों के साथ शादी के बंधन में बंधा था.
पुजारी ने कहा, “मेरा बेटा अच्छी कमाई करता है. वह सामूहिक विवाह नहीं करना चाहता था, लेकिन ऐसी शादियां बहुत सरल होती हैं और बेवजह के खर्च को बचाती हैं.”
पकड़ा गया एक धोखाधड़ी का मामला
लाडली फाउंडेशन ने पिछले दस साल में 2,200 सामूहिक विवाह आयोजित किए हैं. कुमार ने कहा कि धोखाधड़ी के मामले बहुत आम हैं. कई मामलों में लोग किसी और की पहचान बनकर फर्जी दस्तावेज़ का इस्तेमाल करते हैं.
रजिस्ट्रेशन के बाद संस्था तीन चरणों में जांच करती है. टीम दूल्हे के बैकग्राउंड की जांच करती है, आंतरिक सत्यापन करती है और व्यक्तिगत इंटरव्यू भी लेती है.
कुमार ने कहा, “हर जोड़े का हमारे कार्यालय में इंटरव्यू लिया जाता है.” उनका कार्यालय कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में स्थित है.
उन्होंने कहा, “हम 90 प्रतिशत फर्जी जोड़ों को छांटने में सफल हो जाते हैं, लेकिन कभी-कभी दो या तीन मामले फिर भी बच जाते हैं.”
ऐसे जोड़े शादी के बाद लाडली फाउंडेशन और सरकार की ओर से मिलने वाले लाभ पाने के लिए ऐसा करते हैं.
इन सभी जांचों के बावजूद, कुमार ने कहा कि मार्च में हुए सामूहिक विवाह में भी तीन धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे.
कुमार ने यह भी कहा कि ऐसी धोखाधड़ी सरकारी सत्यापन में कमी की वजह से भी हो सकती है.
राज्य सरकारें भी अब सामूहिक विवाह योजनाओं के नियम और सख्त कर रही हैं.
इस साल उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के तहत आयोजित सामूहिक विवाह में सरकार ने सख्त बायोमेट्रिक सिस्टम लागू किया था. यह उस प्रक्रिया का अंतिम चरण था, जो शादी से लगभग एक साल पहले शुरू हो जाती है.
करीब एक साल पहले राज्य सरकार ने ऑनलाइन पंजीकरण शुरू किया था.
पोर्टल पूरे 365 दिन खुला रहता है और शादी की तारीख से एक हफ्ते पहले तक आवेदन स्वीकार किए जाते हैं.
ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के बाद ब्लॉक विभाग जोड़े की पृष्ठभूमि की जांच करता है—दूल्हा-दुल्हन का आधार सत्यापन, आय प्रमाणपत्र की अनिवार्य ऑनलाइन जांच और लाभार्थियों के डेटा का दो बार सत्यापन किया जाता है. इस चरण में फर्जी पहचान का उपयोग करने वाले लोगों को बाहर कर दिया जाता है. इसके बाद अंतिम सूची समाज कल्याण विभाग को भेजी जाती है.
इतनी सख्त जांच इसलिए की जाती है क्योंकि शादी के बाद जोड़े को 1 लाख रुपये की सहायता मिलती है.
वित्त वर्ष 2025-26 में समाज कल्याण विभाग को 42,000 से ज्यादा फर्जी आवेदन मिले. इसी अवधि में राज्य सरकार ने 76,522 जोड़ों की शादी कराई.
इस साल एक मामले में रजिस्टर्ड दूल्हा बायोमेट्रिक सत्यापन की जानकारी मिलने के बाद शादी में नहीं पहुंचा. बताया गया कि वह पहले से शादीशुदा था और दो बच्चों का पिता था.
विभाग ने जब उससे संपर्क किया तो उसने कहा कि उसने कभी पंजीकरण नहीं कराया और संभव है कि किसी ने उसका आधार कार्ड इस्तेमाल कर लिया हो.
कन्नौज के समाज कल्याण जिला अधिकारी वेद प्रकाश मिश्रा ने कहा, “हमने एक संभावित धोखाधड़ी को रोक दिया.”
दुल्हन मंडप में ही रह गई.
मिश्रा ने कहा कि चूंकि दूल्हा वहां नहीं पहुंचा, इसलिए उसके खाते में पैसे ट्रांसफर नहीं किए गए.
उन्होंने कहा, “इस बात की पूरी संभावना थी कि वह महिला भी इस धोखाधड़ी में शामिल थी, बस पुरुष वहां से भाग गया.”
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