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Friday, 17 April, 2026
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ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट हासिल करने की लंबी लड़ाई—सरकारी अनदेखी, भ्रम, लालफीताशाही और भेदभाव

भारत के ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए जो भ्रम की स्थिति पहले से थी, वह 2026 के संशोधन के बाद और बढ़ गई है, जिसे लेकर कई लोग कह रहे हैं कि अब कागजी कार्रवाई की सरकारी मुश्किलें एक कभी खत्म न होने वाली और बेहद थकाऊ प्रक्रिया बन सकती हैं.

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नई दिल्ली: 29 वर्षीय मनवीर चार साल पहले दिल्ली के एक सरकारी दफ्तर की अपनी पहली यात्रा को आज भी भूल नहीं पाए हैं. एक अधिकारी उनके उस आवेदन को देख रहा था जिसमें उन्होंने आधिकारिक दस्तावेजों में अपना लिंग महिला से ट्रांसजेंडर में बदलने की मांग की थी. फिर उसने उन्हें देखा और कहा: “आपको ट्रांसजेंडर कार्ड की क्या जरूरत है? आप तो मुझे ठीक-ठाक लग रहे हैं.”

यह कई ट्रांसजेंडर लोगों के लिए एक जाना-पहचाना अनुभव है जो जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तरों में जाते हैं. सामान्य आवेदन ऐसे अधिकारियों की मेज पर पहुंचते हैं जिन्हें कानून की जानकारी नहीं होती, वे असंवेदनशील टिप्पणियां करते हैं, और अक्सर आवेदकों से ही नियम समझाने को कहते हैं. वे अक्सर ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 6 और धारा 7 को मिला देते हैं, या स्व-घोषणा और पोस्ट-ट्रांजिशन प्रमाणन के बीच अंतर को लेकर असमंजस में रहते हैं.

अब यह भ्रम और अज्ञानता हाल ही में संशोधित कानून से और बढ़ गई है, जिसे लेकर कई लोग कहते हैं कि यह नौकरशाही कागजी प्रक्रिया को और भी मुश्किल बना सकता है.

ट्रांसजेंडर समुदाय के कई लोगों के लिए यह कागजी प्रक्रिया अक्सर खुले प्रशासनिक उपेक्षा और अज्ञानता से भरे अनुभव में बदल जाती है, जिससे उनकी नाजुक मानसिक स्थिति और अधिक आहत होती है. ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र के बिना आधार, पैन और वोटर आईडी कार्ड में नाम और लिंग बदलने की सुविधा सीमित हो जाती है, जिससे रोजगार, आवास और ट्रांस-विशिष्ट कल्याण योजनाओं जैसे SMILE और आयुष्मान भारत के TG-प्लस स्वास्थ्य बीमा कार्ड तक पहुंच भी प्रभावित होती है.

मनवीर ने कहा, “ये बातचीत हमें जैसे जिरह जैसी लगती है. जब हम समझाते हैं, तो अधिकारी बस सिर हिला देते हैं.”

उन्होंने अपने रोजमर्रा के जीवन में अपने ‘मर्दाना रूप’ को अपनाना सीख लिया है, चाहे दवाइयां खरीदनी हों या काम ढूंढना हो. केवल सरकारी स्तर पर ही वे उस स्थिति में फंसे रहते हैं जिसे वे अपनी “मृत” पहचान कहते हैं.

The most consequential change by the 2026 amendment bill (now an act) is a major revision in the definition of ‘transgender person’ | Suraj Singh Bisht | ThePrint File
2026 के संशोधन विधेयक (जो अब एक अधिनियम बन चुका है) द्वारा किया गया सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा में किया गया एक बड़ा संशोधन है | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट फ़ाइल

यह संघर्ष तब भी मौजूद था जब पुराना कानून लागू था, जो समुदाय को स्वयं की पहचान का अधिकार देता था. 2019 अधिनियम की धारा 6 के तहत, आवेदक ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता पाने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकते थे; धारा 7 के तहत, वे अपने दस्तावेजों में द्विआधारी लिंग—पुरुष या महिला—दर्ज करवा सकते थे. अब संशोधित अधिनियम ने इस अधिकार को समाप्त कर दिया है और इसकी जगह “मेडिकल बोर्ड” द्वारा अनिवार्य सत्यापन कर दिया गया है, जिससे पूरी दस्तावेज प्रक्रिया और अधिक भ्रमित हो गई है.

जहां कई लोग आगे और अधिक प्रतिबंधात्मक व्यवस्था की आशंका जता रहे हैं, वहीं भारत के ट्रांसजेंडर समुदाय ने लंबे समय से पाया है कि मौजूदा प्रक्रिया भी उनके खिलाफ झुकी हुई है. ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र के आवेदन में देरी होती है, प्रक्रियाएं जिलों के हिसाब से अलग-अलग होती हैं, और सरकारी दफ्तर एक ऐसा सार्वजनिक स्थान बन जाते हैं जहां ‘दिखावट’ का मूल्यांकन किया जाता है या जिज्ञासु नजरों का सामना करना पड़ता है.

इस व्यवस्था के केंद्र में जिला मजिस्ट्रेट का दफ्तर है, जो ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र जारी करने के लिए जिम्मेदार है. कागजों पर प्रक्रिया सरल है: राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से आवेदन जमा करें और 30 दिनों के भीतर प्रमाण पत्र प्राप्त करें. व्यवहार में ऐसा शायद ही कभी होता है.

2023 के अंत तक, राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति पोर्टल पर 24,000 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे, लेकिन केवल लगभग 15,800 प्रमाण पत्र ही जारी किए गए थे. हजारों आवेदन तय समय सीमा से काफी देर तक लंबित रहे, और देरी के कारणों को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी. कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि भारत की लगभग 4.87 लाख ट्रांसजेंडर आबादी में से 5 प्रतिशत से भी कम लोग ही अब तक यह पहचान पत्र प्राप्त कर पाए हैं.

Inside the office of Tweet Foundation | Photo: Sakshi Mehra | ThePrint
ट्वीट फाउंडेशन के दफ़्तर के भीतर | फ़ोटो: साक्षी मेहरा | दिप्रिंट

समझाना, सुधारना, और अस्वीकार का एक चक्र

ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र हासिल करना सिर्फ कानूनी मान्यता की कभी न खत्म होने वाली लड़ाई का पहला कदम है. मनवीर के लिए यह प्रक्रिया सालों से चल रही है.

उन्होंने 2014 में नजफगढ़ में अपना घर छोड़ दिया और जल्दी काम करना शुरू किया, उस पहचान की ओर बढ़ने की कोशिश करते हुए जो उन्हें अपनी लगती थी. समय के साथ उन्होंने अपना नाम बदलने और आधार कार्ड में अपना लिंग अपडेट करने में सफलता पाई. ये आंशिक, कठिन जीतें थीं.

ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र प्राप्त करना खुद भी एक लंबी प्रक्रिया थी. उन्होंने कई बार अलग-अलग जिला मजिस्ट्रेट दफ्तरों में आवेदन किया—पहले दिल्ली में, फिर राजस्थान के धौलपुर में, जब उन्हें बताया गया कि वहां प्रक्रिया तेज होगी. लेकिन वहां भी काम नहीं बना, क्योंकि अधिकारियों ने उनसे कहा कि वे अपना पता स्थायी रूप से राजस्थान में बदलें. आखिरकार, उन्हें 2023 में नोएडा के डीएम कार्यालय से धारा 6 के तहत अपना TG कार्ड मिला.

2021 में, एक एनजीओ द्वारा आयोजित आधार कार्ड कैंप के दौरान, वह बाइनरी जेंडर चुन पाने में सक्षम हुए.

लेकिन उनके अतीत के दो निशान अभी भी बने हुए हैं और व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा करते रहते हैं. दस्तावेज में अब भी पुरानी तस्वीर लगी है. पीछे की तरफ अब भी “D/O”—डॉटर ऑफ लिखा हुआ है.

उन्होंने कहा, “जब भी मैं किराए पर अपार्टमेंट लेने जाता हूं, लोग इसे देखकर पूछते हैं कि यहां ‘डॉटर ऑफ’ क्यों लिखा है. मैं बस कह देता हूं कि यह गलती है.”

यह हमेशा आसान नहीं होता. कभी-कभी वह असहज परिस्थितियों में फंस जाते हैं, जैसे खुद को पुरुष पहचानते हुए भी महिला हॉस्टल में रहना. सोनीपत में, जहां उन्होंने कभी काम किया था, मकान मालिक उन्हें रहने से मना कर देते थे.

आधार के कुछ हिस्से अपडेट करने के बाद भी, अन्य दस्तावेज—जैसे उनका पैन कार्ड और शैक्षिक प्रमाण पत्र—अब भी बदले नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “ये मेल न खाने वाली चीजें मेरी नौकरी, बैंक और यहां तक कि पीएफ लेने में भी समस्या पैदा करती हैं. मैंने अपना पैन कार्ड ठीक कराने में पैसे भी खर्च किए, लेकिन वह भी काम नहीं आया.”

मनवीर ने वर्षों में कई तरह की नौकरियां की हैं—कॉल सेंटर से लेकर कंसल्टेंसी, अस्पताल सुरक्षा और यहां तक कि अमेज़न में भी. उन्होंने स्टेनोग्राफी भी सीखी और एक बार सरकारी परीक्षा भी पास की, लेकिन उन्होंने उसे आगे नहीं बढ़ाया क्योंकि उन्हें डर था कि वह उस माहौल में ईमानदारी से नहीं रह पाएंगे.

मेडिकल ट्रांजिशन ने भी अपनी चुनौतियां दीं. उन्होंने 2018 में हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) शुरू की, लेकिन आर्थिक कारणों से इसे रोकना पड़ा और दो साल बाद फिर शुरू किया. इस प्रक्रिया के लिए मनोचिकित्सक से जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर (GID) लेटर और एंडोक्रिनोलॉजिस्ट के प्रिस्क्रिप्शन की जरूरत होती थी, जो उन्हें महंगा लगा.

उन्होंने कहा, “शुरुआत में मुझे हर 15 दिन में इंजेक्शन मिलते थे. लेकिन बाद में मैं डॉक्टर के पास जाना बंद कर दिया और पास की मेडिकल दुकान से दवाइयां लेने लगा.” उन्होंने कहा, “मैं पहले से ही मर्दाना दिखता था, इसलिए यह आसान था, लेकिन मुझे अक्सर कहना पड़ता था कि यह जिम के लिए है.”

जून 2025 में हिस्टेरेक्टॉमी कराने के बाद, उन्होंने धारा 7 के तहत ट्रांसजेंडर आईडी कार्ड के लिए आवेदन किया ताकि उनका लिंग बदला जा सके और सभी आधिकारिक दस्तावेजों में अपडेट हो सके. लगभग छह महीने बाद भी उनका आवेदन लंबित है. कोई कारण नहीं बताया गया है.

Inside the office of Tweet Foundation | Photo: Sakshi Mehra | ThePrint
ट्वीट फाउंडेशन के दफ़्तर के भीतर | फ़ोटो: साक्षी मेहरा | दिप्रिंट

अब, इंतिजार से थककर, वह फिर से जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय जाने पर विचार कर रहे हैं—इस बार यह पूछने के लिए कि क्यों.

कुछ अधिकारी, हालांकि, कहते हैं कि अगर प्रक्रिया सही तरीके से लागू की जाए तो यह काम कर सकती है.

दिल्ली के एक सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने अपने जिले को ऐसा बताया जहां देरी और भ्रम को काफी हद तक दूर कर दिया गया है.

उन्होंने कहा, “मुझे यहां आए एक महीना हुआ है. अब हमारे पास ट्रांसजेंडर आवेदनों का कोई लंबित मामला नहीं है.”

उनके अनुसार, प्रक्रिया को सरल बनाया गया है. आवेदकों को अनावश्यक रूप से नहीं बुलाया जाता, और स्पष्टीकरण बिना किसी असहज स्थिति के संभाले जाते हैं. साथ ही, उन्होंने अलग-अलग दफ्तरों में असंगतियों को स्वीकार किया, खासकर धारा 6 और धारा 7 के बीच के भ्रम को.

उन्होंने आगे कहा कि अधिकारियों से उम्मीद की जाती है कि वे कानूनों और संशोधनों के बारे में खुद को अपडेट रखें, लेकिन जिला कार्यालयों में कोई औपचारिक प्रशिक्षण कार्यशालाएं नहीं होतीं ताकि एक समान तरीके से लागू करना सुनिश्चित किया जा सके.

रुकी मान्यता हुई

अनिका, 22, पिछले लगभग एक साल से ट्वीट फाउंडेशन में काम कर रही हैं. उनका ट्रांजिशन काफी पहले शुरू हुआ था, और वह ज्यादातर अकेलेपन में हुआ.

करीब चार साल पहले, उन्होंने बिना किसी मेडिकल निगरानी के हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) शुरू की, और दवाइयां सीधे मेडिकल दुकानों से लेनी शुरू कर दीं, अक्सर बिना प्रिस्क्रिप्शन के.

उन्होंने कहा, “मैंने किसी से सलाह नहीं ली. मैंने बस खुद ही शुरू कर दिया. मैं उनकी फोटो दिखाकर कहती थी कि मेरा प्रिस्क्रिप्शन खो गया है, और वे मुझे दवाइयां दे देते थे. मैंने ऐसा तीन साल तक किया,” उन्होंने कहा, और यह भी बताया कि बहुत से लोगों के साथ ऐसा ही होता है.

उस समय वह दिल्ली में अपने परिवार के साथ रह रही थीं और अपना ट्रांजिशन छिपा रही थीं. जैसे-जैसे शारीरिक बदलाव दिखने लगे, उनके सामान की जांच की गई, दवाइयां मिल गईं, और अपने भाई के साथ एक हिंसक घटना के बाद वह घर छोड़कर चली गईं.

औपचारिक स्वास्थ्य सुविधा उन्हें बहुत बाद में मिली. उन्होंने दिसंबर 2024 में जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्हें मई 2027 की तारीख दी गई.

एक ऐसा सिस्टम जो खुद को नहीं जानता

विनशी, 29, ने सरकारी दफ्तरों में ट्रांसजेंडर दस्तावेजों को लेकर जागरूकता की कमी को बताया. जब उन्होंने पहली बार अधिकारियों से संपर्क किया, तो कई लोग यह भी नहीं जानते थे कि ट्रांसजेंडर प्रमाण पत्र होता क्या है.

उन्होंने कहा, “मैंने पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया कदम-दर-कदम समझाई. फाइल पहले तहसील में जाती है, फिर पटवारी के पास, उसके बाद तहसीलदार के पास, और अंत में मंजूरी और हस्ताक्षर के लिए एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के पास पहुंचती है.”

उन्होंने यह भी बताया कि ट्रांजिशन के बाद पहचान दस्तावेजों को अपडेट करना कितना जटिल और महंगा हो जाता है.

उन्होंने कहा, “पहचान अपडेट करने के लिए कई दस्तावेजों की जरूरत होती है, जिनमें गजट नोटिफिकेशन, आधार अपडेट और TG प्रमाणन शामिल हैं. इसमें कम से कम 3,000 रुपये खर्च होते हैं, और अगर इसे किसी तीसरे पक्ष से करवाया जाए तो यह 5,000 से 10,000 रुपये तक हो सकता है.”

Trans community is against the 2026 bill passed by Parliament that redefines who’s trans and who isn’t | Suraj Singh Bisht | ThePrint File Photo
ट्रांस समुदाय संसद द्वारा पारित 2026 के उस बिल के खिलाफ है, जो यह फिर से परिभाषित करता है कि कौन ट्रांस है और कौन नहीं | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट फ़ाइल फ़ोटो

उनकी धारा 7 TG कार्ड पाने की कोशिशें बार-बार खारिज कर दी गईं. उन्होंने चार बार आवेदन किया, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि उनके मेडिकल सर्टिफिकेट, भले ही AIIMS द्वारा जारी किए गए हों, मान्य नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “डीएम कार्यालय ने मुझसे कहा, ‘इसे सीएमओ या मेडिकल सुपरिंटेंडेंट से साइन करवाओ.’” उन्होंने बताया कि उनके दस्तावेजों पर पहले से ही AIIMS डॉक्टर की मुहर थी, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया.

एक अधिकारी ने उनसे कहा, “हमारे पास समय नहीं है. हम पूरे दिन यहां बैठकर आप जैसे लोगों से नहीं निपट सकते.”

निराश होकर, उन्होंने अपना आवेदन खुद ही दोबारा तैयार किया, अपनी मेडिकल हिस्ट्री को सरल बनाया और दस्तावेज फिर से जमा किए. एक महीने के भीतर उनका आवेदन मंजूर हो गया.

इसके बाद भी प्रक्रिया खत्म नहीं हुई. उनका आधार और पैन कार्ड अपडेट हो चुके हैं, लेकिन उनके शैक्षणिक प्रमाण पत्र अब भी नहीं बदले हैं. जब उन्होंने CBSE से संपर्क किया, तो उनसे गजट नोटिफिकेशन मांगा गया और कहा गया कि पहले आधार अपडेट करें, जबकि वह पहले ही कर चुकी थीं.

दस्तावेजी नियमों को लेकर भी व्यापक भ्रम है. कई लोग मानते हैं कि सभी पहचान अपडेट के लिए गजट नोटिफिकेशन अनिवार्य है.

ट्रांसजेंडर पोर्टल के साथ करीब से काम कर चुके एक सरकारी कर्मचारी ने, नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आवेदन अक्सर इसलिए खारिज हो जाते हैं क्योंकि वे गलत जिले में दायर किए जाते हैं या आवश्यक दस्तावेज नहीं होते. छोटे-छोटे प्रक्रियात्मक गलतियां भी देरी या अस्वीकृति का कारण बन सकती हैं.

जहां 2020 के नियमों ने सर्जरी से आगे बढ़कर पहचान को मान्यता दी थी और हार्मोन थेरेपी तथा मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन को वैध आधार माना था, वहीं कार्यान्वयन असंगत रहा, और कई अधिकारी पुराने कानून की व्याख्याओं के अनुसार ही काम करते रहे. अब संशोधित अधिनियम ने स्व-पहचान को हटाकर मेडिकल सत्यापन जोड़ दिया है, जिससे ढांचा फिर से बदल गया है और जमीन पर यह भ्रम बढ़ गया है कि कौन-सा प्रमाण मान्य है और कौन प्रमाण पत्र के लिए योग्य है.

कानून, मेडिकल और जीवन की सच्चाई 

समुदाय के कई लोगों के लिए, लिंग तय श्रेणियों से परे होता है.

ट्वीट फाउंडेशन की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिना आहेर ने कहा कि बड़ी संख्या में लोग लिंग अभिव्यक्ति के एक स्पेक्ट्रम के भीतर खुद को पहचानते हैं, जिसमें नॉन-बाइनरी पहचान भी शामिल है.

उन्होंने कहा, “सरकार अक्सर इन भेदों को गलत समझती है और सभी ट्रांसजेंडर पहचान को एक सीमित बाइनरी ढांचे में देखती है. इससे नीति निर्माण में भ्रम पैदा होता है और समुदाय के बड़े हिस्से बाहर रह जाते हैं.”

NALSA फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि स्व-पहचान का सिद्धांत स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया था. लेकिन व्यवहार में, यह प्रक्रिया अक्सर दखल देने वाली और असंगत रही है.

उन्होंने कहा, “शुरुआती दौर में लोगों से यहां तक कि कपड़े उतारने के लिए कहा जाता था, जिसे हमने रुकवाया. लेकिन अब भी उनसे उनके शरीर और यहां तक कि उनके यौन जीवन के बारे में दखल देने वाले सवाल पूछे जाते हैं,” उन्होंने कहा, और यह भी जोड़ा कि 2026 के संशोधन में मेडिकल सत्यापन की शर्त इन नियंत्रणों को और सख्त बना सकती है.

उन्होंने कहा, “मुझे दुनिया को यह बताने की क्या जरूरत है कि मैंने सर्जरी करवाई है? आप कौन हैं? यह गोपनीयता का उल्लंघन है.”

For 22-year-old Sahil, who started their hormone replacement therapy 10 days ago, the Bill raises doubts about whether their transgender identity card will remain valid | Photo: Vitasta Kaul, ThePrint
22 वर्षीय साहिल, जिन्होंने 10 दिन पहले ही अपनी हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी शुरू की है, के लिए यह बिल इस बात पर संदेह पैदा करता है कि क्या उनका ट्रांसजेंडर पहचान पत्र वैध बना रहेगा | फोटो: वितस्ता कौल, दिप्रिंट

डॉक्टरों का कहना है कि बदला हुआ ढांचा चिकित्सा पेशेवरों के लिए भी अनिश्चितता पैदा करेगा, जो पहले से स्थापित अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का पालन कर रहे हैं.

इंडियन एसोसिएशन ऑफ एस्थेटिक प्लास्टिक सर्जन्स की अध्यक्ष मेधा आनंद भावे ने कहा, “दस्तावेजों में कमी अब मेडिकल पेशेवरों को जोखिम में डाल सकती है, जिसमें जरूरी कागजी प्रक्रिया पूरी न होने पर दंड की संभावना भी शामिल है.”

अनिका और उन अन्य लोगों के लिए जिन्होंने सर्जरी नहीं करवाई है, चाहे अपनी पसंद से या खर्च के कारण, अब जोखिम यह है कि उन्हें मान्यता से ही बाहर कर दिया जाए.

उन्होंने कहा, “अब लोग सबूत मांगेंगे. हमें कितनी बार यह साबित करना पड़ेगा कि हम कौन हैं?”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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