नई दिल्ली: जब कृष्ण पाल पंवार के पिता पिछले साल गंभीर रूप से बीमार पड़े, तो एंबुलेंस दक्षिण दिल्ली के शाहपुर जाट की घुमावदार गलियों में प्रवेश नहीं कर सकी. पंवार ने उन्हें अपने कंधों पर उठाकर गांव की तंग गलियों से होकर अपनी कार तक पहुंचाया. कुछ महीनों बाद उनके पिता का निधन हो गया.
दक्षिण दिल्ली के लाल डोरा गांवों में रहने वाले लोग लंबे समय से तंग गलियों, उलझी हुई बिजली की तारों और दीवार से दीवार सटे, माचिस की डिब्बियों जैसे एक-दूसरे पर खड़े बहुमंजिला मकानों के बीच ज़िंदगी बसर करने के आदी हो चुके हैं, लेकिन हाल के वर्षों में लगी आग की घटनाओं और एक घातक इमारत ढहने की घटना ने उस छिपी हुई कीमत को उजागर कर दिया है, जिसे निवासी एक सदी से अधिक समय से चली आ रही प्लानिंग की कमी का नतीजा बताते हैं.
50-वर्षीय पंवार, जो एक एनजीओ चलाते हैं, ने कहा, “हां, पहले मुश्किल होती थी, लेकिन हम हमेशा से इसी तरह के जीवन के आदी रहे हैं. हमें यह अजीब नहीं लगता.”
साकेत के चमकदार सेलेक्ट सिटीवॉक मॉल और वसंत कुंज के डीएलएफ प्रोमेनेड जैसे सजे-धजे और आलीशान इलाकों के बीच, दक्षिण दिल्ली के लाल डोरा गांवों की गलियों में एक समानांतर शहर बसता है. इस अनिश्चित स्थिति वाले इलाके में नगर निगम के भवन नियम लगभग लागू नहीं होते. गलियां अक्सर चार से पांच फीट तक सिमट जाती हैं और कई जगहों पर दो लोग साथ-साथ मुश्किल से चल पाते हैं. दमकल की गाड़ियां इनमें प्रवेश नहीं कर सकतीं. एंबुलेंस नजदीकी चौक तक ही पहुंचती है, जिसके बाद मरीजों को स्ट्रेचर, व्हीलचेयर या गोद में उठाकर गलियों के जाल से गुज़रना पड़ता है.
दक्षिण दिल्ली के सबसे महंगे इलाकों के ठीक बगल में शहर की सबसे उपेक्षित बस्तियां मौजूद हैं—जो शहर की आवास व्यवस्था के लिए अनिवार्य भी हैं.
समय के साथ ये इलाके आग के जाल में बदल गए हैं, जिन्हें तेज़ी से फैलती अनियंत्रित शहरीकरण ने घेर लिया है. हौज रानी के एक होटल में लगी आग में 22 लोगों की मौत हो गई. साकेत के सैदुलाजाब में एक इमारत गिर गई. हुमायूं पुर के एक होटल के बेसमेंट में भी आग लगी, जिससे पिछले पांच वर्षों में आग से होने वाली मौतों में तेज़ वृद्धि हुई है.
नगर निगम अधिकारियों ने 3 जून को हौज रानी स्थित फ्लोरिश बी एंड बी में लगी आग के लिए बिना मंजूरी के बनाए गए नक्शों को जिम्मेदार ठहराया. अधिकारियों के अनुसार, इस संपत्ति का उपयोग रिहायशी इलाके में व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था.
यह संपत्ति मुख्य रूप से विदेशी पर्यटकों को सस्ती आवास सुविधा प्रदान करती थी, खासकर उन लोगों को जो मैक्स अस्पताल के पास ठहरना चाहते थे.
इस साल मार्च तक, दिल्ली फायर सर्विस को 36,000 से अधिक कॉल मिल चुकी थीं. एक एमसीडी अधिकारी ने बताया कि इनमें से अधिकांश कॉल लाल डोरा गांवों और अनधिकृत कॉलोनियों से थीं.

औपनिवेशिक काल में मूल रूप से लाल डोरा क्षेत्रों को गांव की आबादी और कृषि भूमि के बीच अंतर करने के लिए चिन्हित किया गया था. नक्शे पर लाल पेन से रेखा खींचकर आबादी और खेती की जमीन को अलग किया गया था. समय के साथ कटवारिया सराय, जिया सराय, किशनगढ़, शाहपुर जाट और छतरपुर जैसे गांवों ने छात्रों, प्रवासी मजदूरों, घरेलू कामगारों, अस्पताल सहायकों और किफायती आवास की तलाश में आए युवा पेशेवरों को अपने भीतर समेट लिया. इमारतें ऊंचाई में बढ़ती गईं, घर पीजी और किराये के कमरों में बदल गए और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ीं, लेकिन बुनियादी ढांचा, निवासियों के अनुसार, कभी उसके साथ कदम नहीं मिला सका.
इन इलाकों में कैफे, बुटीक और डिजाइनर स्टोर तो आ गए, लेकिन सड़कों, सफाई और पानी जैसी बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं. लाल डोरा गांव दिल्ली का वह खुला, गंदा सच हैं जिसे कोई ठीक करने की हिम्मत नहीं करता.
आज, सामाजिक कार्यकर्ता, पूर्व नौकरशाह और निवासी यह तर्क देते हैं कि वही कानूनी और प्रशासनिक अस्पष्टता, जिसने कभी गांवों की स्वायत्तता की रक्षा की थी, अब इन बस्तियों को ग्रामीण दर्जे और शहरी वास्तविकता के बीच फंसा कर छोड़ चुकी है.
इतिहासकार सुहैल हाशमी ने कहा, “लाल डोरा का निर्धारण मूल रूप से गांव की आबादी की रक्षा के लिए किया गया था—इसने इन क्षेत्रों को नगर निगम के नियमों से बाहर रखा, जिससे निवासियों को अपनी ज़मीन पर स्वायत्तता मिली, लेकिन इसकी एक कीमत भी चुकानी पड़ी. कोई नगर निगम कानून लागू नहीं होता था. निर्माण संबंधी कानून लागू नहीं होते थे. उन्हें यह अधिकार तो दिया गया, लेकिन नागरिक सुविधाओं से वंचित कर दिया गया.”.

दक्षिण दिल्ली की छाया में ज़िंदगी
हर सुबह सुमित्रा किशनगढ़ स्थित अपने एक कमरे के घर से निकलती हैं और पास के वसंत कुंज की कॉलोनियों में जाती हैं, जहां वह उन घरों में खाना बनाती और सफाई करती हैं, जिनमें रहना उनके लिए कभी संभव नहीं.
4,000 रुपये प्रति माह में वह एक छोटा कमरा किराए पर लेती हैं, जिसमें एक छोटी रसोई है और एक साझा बाथरूम, जिसे चार परिवार इस्तेमाल करते हैं. यह व्यवस्था बुनियादी है, लेकिन इससे उन्हें और उनके पति को काम के करीब रहने में सुविधा मिलती है. उनके पति वसंत कुंज में माली का काम करते हैं.
उन्होंने कहा, “यह वसंत कुंज के पास है, इसलिए मैं बिना ज्यादा खर्च किए आसानी से काम पर जा सकती हूं.”
इस दंपति ने कभी किराए का कोई समझौता नहीं किया और न ही आधार सत्यापन हुआ.
सुमित्रा जैसे हज़ारों कामगारों के लिए, लाल डोरा गांव कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूरी हैं. कुछ ही किलोमीटर दूर हौज खास, पंचशील एन्क्लेव और वसंत कुंज जैसी कॉलोनियों में किराया सालाना लाखों रुपये तक पहुँच जाता है. वहीं लाल डोरा गाँवों में, निवासियों के अनुसार, रहने की व्यवस्था अब भी उन लोगों की पहुँच में है, जो दक्षिण दिल्ली को चलाते तो हैं, लेकिन वहाँ रहने का खर्च नहीं उठा सकते.
मणिपुर के 34-वर्षीय राणा अपने एक दोस्त के साथ शाहपुर जाट में दो कमरों के फ्लैट में रहते हैं. वह गुरुग्राम में एक बीपीओ में काम करते हैं और अपना खुद का कपड़ों का व्यवसाय शुरू करने की योजना बना रहे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने यह इलाका सोच-समझकर चुना.
उन्होंने कहा, “शाहपुर जाट अपने कस्टम टेलरिंग के लिए जाना जाता है, इसलिए यह मेरे स्टार्टअप की योजना बनाने में मदद करता है. किराया भी अपेक्षाकृत किफायती है—20,000 रुपये—इसलिए यह मेरे और मेरे दोस्त के लिए ठीक है.”
वह एक संकरी गली में रहते हैं, जहां उनके अनुसार मुश्किल से एक रिक्शा ही निकल सकता है.
यही किफायतीपन समझाता है कि क्यों जर्जर बुनियादी ढांचे और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बावजूद लाल डोरा गांव लोगों को आकर्षित करते रहते हैं. ये दक्षिण दिल्ली में अपेक्षाकृत सस्ते आवास के आखिरी विकल्पों में से एक बन चुके हैं.

सुहैल हाशमी कहते हैं कि दिल्ली का अधिकांश कामगार वर्ग लाल डोरा क्षेत्रों में ही रहता है.
उन्होंने कहा, “वसंत कुंज में रहने वाले लोग—आप क्या सोचते हैं उनके घरेलू कामगार कहां से आते हैं? वे लाल डोरा क्षेत्रों से आते हैं. सड़क के उस पार एक डुप्लेक्स की कीमत 6 करोड़ रुपये है. कौन खरीद सकता है? मध्यम वर्ग कहां जाएगा? कामगार वर्ग कहां जाएगा?”
इसका जवाब पिछले तीन दशकों में दिल्ली के गांवों के बदलते स्वरूप में छिपा है, जहां कभी कम ऊंचाई वाली कृषि बस्तियां थीं, वे अब घनी किराये की अर्थव्यवस्थाओं में बदल चुकी हैं, जो आज शहर के बड़े हिस्से के कामगारों को आश्रय देती हैं.

मवेशियों के बाड़ों से किराये की अर्थव्यवस्था तक
“टू-लेट” के बोर्ड, पीजी आवास और कोचिंग सेंटर आने से बहुत पहले, लाल डोरा के कई घरों में ‘घेर’ हुआ करते थे—खुले बाड़े जहां मवेशियों को बांधा जाता था और चारा रखा जाता था. आज ये जगहें लगभग गायब हो चुकी हैं और उनकी जगह चार-पांच मंजिला इमारतों की कतारों ने ले ली है, जो दिल्ली में सस्ते आवास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बनाई गई हैं.
यह बदलाव 1990 के दशक में शुरू हुआ, जब रियल एस्टेट का उछाल राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंचा और धीरे-धीरे इसके गांवों में भी फैल गया.
जिया सराय (आईआईटी दिल्ली के पास स्थित एक और लाल डोरा गांव) में रहने वाले सेवानिवृत्त वायु सेना अधिकारी रणबीर सिंह खोखर को याद है कि कैसे ब्रोकर आसान कमाई के सपने लेकर आए थे.
उन्होंने कहा, “रियल एस्टेट ब्रोकर हर समय मौजूद रहने लगे थे. वे उन लोगों को किराये से आय का सपना बेच रहे थे, जो कृषि के अलावा ज्यादा कुछ नहीं जानते थे.”
उन्होंने बताया कि किसी ठोस नियम या निगरानी के अभाव में ब्रोकरों के लिए दखल देना आसान हो गया था.

उन्होंने कहा, “ब्रोकर गांव वालों से कहते थे—इन घेरों का क्या करोगे? मुझे 20 कमरे बनाने दो. तुम किराया कमाओगे. तुम्हारा भविष्य सुरक्षित हो जाएगा.”
यह प्रस्ताव ठुकराना मुश्किल था. धीरे-धीरे, खुले और विरल गांवों के घर घनी किराये की बस्तियों में बदल गए और तब से हर साल यह घनत्व और बढ़ता ही गया है.
आज लाल डोरा गांवों के अधिकांश घर पीजी में बदल चुके हैं और मूल निवासी बेहतर जगहों पर बसने लगे हैं. दरवाजे और दीवारें विज्ञापन के बोर्ड बन गए हैं, जिन पर पीजी के साइन और फोन नंबर चिपके होते हैं. दो कमरों के सेट का औसत किराया लगभग 18,000 से 20,000 रुपये के बीच है.
एक रियल एस्टेट एजेंट ने कहा, “अब लोग लाल डोरा गांवों में रहने के लिए संपत्ति नहीं खरीदते. ज्यादातर लोग इसे व्यावसायिक उपयोग के लिए देखते हैं—छोटे होटल, कोचिंग सेंटर या पीजी बनाने के लिए.”

सौ साल पुराना अपवाद
जर्जर बुनियादी ढांचा लाल डोरा की समस्या का सिर्फ एक पहलू है. इसके नीचे एक सदी पुरानी कानूनी अस्पष्टता छिपी है, जिसे सुलझाने के लिए निवासी, योजनाकार और लगातार आती सरकारें जूझती रही हैं.
1960 के दशक में, जब दिल्ली ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के नेतृत्व में योजनाबद्ध विस्तार की राह पकड़ी, तब लाल डोरा गांव हाशिए पर ही बने रहे. इनके आसपास की कृषि भूमि पर विकास होता रहा—चौड़ी सड़कों और आधुनिक बुनियादी ढांचे वाली पॉश कॉलोनियां बनीं, जो इन गांवों के किनारों तक तो पहुंचीं, लेकिन उनके भीतर कभी नहीं आईं.
जो निवासी कभी यहां से नहीं गए, उनके पास शिकायतों की लंबी सूची है.
शाहपुर जाट में अपने दफ्तर में बैठे संदीप पवार ने गुस्से भरी आवाज़ में कहा, “हम दिल्ली के मूल निवासी हैं, फिर भी हमें दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार मिलता है. सरकार ने हमारी कृषि भूमि पर शहर खड़ा कर दिया, लेकिन हमें आज भी बुनियादी सुविधाएं और ढांचा नहीं मिला.”
कागज़ों पर शाहपुर जाट एक शहरी गांव है, लेकिन ज़मीन पर, इसके सजे-धजे कैफे और डिजाइनर शोरूम से आगे बढ़ते ही एक अलग ही हकीकत सामने आती है. इस शहरी गांव के प्रवेश द्वार पर एक जर्जर मकबरा खड़ा है. रंग-बिरंगी दुकानों की चमक धीरे-धीरे टूटती दीवारों में बदल जाती है.
सीवर व्यवस्था अधूरी है, पानी की सप्लाई अनियमित है और बुनियादी ढांचा गांव की बढ़ती आबादी के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा. यह इतिहास, उपेक्षा और अनियोजित विकास की टकराहट है.
दिल्ली पंचायत संघ (दिल्ली के 360 गांवों) के उपाध्यक्ष और अधिवक्ता यमन यादव ने कहा, “लाल डोरा दरअसल एक औपनिवेशिक जाल है, जिसमें दिल्ली के मूल निवासी आज़ादी के बाद भी फंसे हुए हैं. यह गंभीर समस्याएं पैदा करता है, जैसे संपत्ति के अस्पष्ट अधिकार और बुनियादी ढांचे की कमी. निवासी कानूनी रूप से अपने घरों का पुनर्विकास भी नहीं कर सकते क्योंकि उनके नक्शे पास नहीं होते.”
2018 में, आम आदमी पार्टी सरकार ने एमसीडी को निर्देश दिया था कि बढ़ती आबादी के कारण ढांचे पर पड़े दबाव को देखते हुए लाल डोरा सीमाओं के विस्तार की प्रक्रिया शुरू की जाए.

हालांकि, यह कदम ज़मीनी स्तर पर कभी लागू नहीं हो पाया.
पंवार ने कहा, “सरकार लाल डोरा की सीमाएं कैसे बढ़ाएगी? हम एक तरफ हौज खास और दूसरी तरफ पंचशील पार्क के बीच घिरे हुए हैं. विस्तार के लिए जगह कहां है?”
1990 के दशक से अब तक, अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों ने लाल डोरा सुधार, सीमा विस्तार और स्वामित्व से जुड़ी कई योजनाएं प्रस्तावित की हैं, लेकिन निवासियों का कहना है कि जमीन पर बहुत कम बदलाव आया है.
सेवानिवृत्त डीडीए आयुक्त (योजना) ए.के. जैन ने बताया, “2004 में एमसीडी ने एक आदेश जारी किया था कि सभी लाल डोरा गांवों को मास्टर प्लान के नियमों का पालन करना होगा. इसके बाद, जो भी व्यक्ति इन गांवों में निर्माण करना चाहता था, उसे नगर निगम के नियमों का पालन करना ज़रूरी हो गया था.”
जैन ने दिप्रिंट से कहा, “लेकिन इस फैसले के खिलाफ काफी विरोध हुआ और राजनीतिक दबाव बढ़ गया. दो महीने के भीतर ही यह आदेश वापस ले लिया गया और गांव बढ़ते रहे.”
1992 से 1997 के बीच, तत्कालीन डीडीए आयुक्त के.जे. अल्फोंस ने द्वारका को विकसित करने के लिए 14,310 अवैध निर्माणों को गिराने का अभियान चलाया, जिसके कारण उन्हें ‘डेमोलिशन मैन’ कहा गया. अल्फोंस का कहना है कि उन्होंने द्वारका क्षेत्र के लाल डोरा गांवों को अपने अधीन लेकर निवासियों को वैकल्पिक भूमि प्रदान की थी.
अल्फोंस ने कहा, “मैंने 3,750 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित की. मैंने सरकारी नीति के खिलाफ जाकर भी काम किया. मैंने लाल डोरा क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लिया—विरोध हुआ, लेकिन यह सही योजना के लिए ज़रूरी था. समस्या यह है कि अगर आप गांवों और उनके आसपास के लाल डोरा क्षेत्रों को अलग छोड़ देते हैं, तो आप उन्हें शहरी सुविधाएं नहीं दे सकते, क्योंकि इसके लिए आवश्यक भौतिक ढांचा ही मौजूद नहीं होता.”
अल्फोंस का मानना है कि लाल डोरा गांवों को एक बड़े शहरी ढांचे में शामिल किया जाना चाहिए और निवासियों को वैकल्पिक भूमि पर बसाया जाना चाहिए.
उन्होंने सवाल उठाया, “जब इलाके इतने घने हो जाएं और ज़मीन ही उपलब्ध न हो, तो आप सीवर सिस्टम जैसी बुनियादी सुविधाएं कैसे बनाएंगे? यह संभव ही नहीं है. लाल डोरा को ऐसे ही छोड़ देना मूल रूप से एक गलत नीति है.”

लाल डोरा को छूने से क्यों बचते हैं सब
अगर लाल डोरा गांवों की समस्याएं सभी को मालूम हैं, तो सवाल यह उठता है कि दशकों से उनका समाधान क्यों नहीं हो पाया.
अधिकारियों और पूर्व नीति-निर्माताओं के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण वही अस्पष्टता है, जिसने औपनिवेशिक दौर से इन बस्तियों को परिभाषित किया है.
एमसीडी के डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार कहते हैं कि लाल डोरा क्षेत्रों को लेकर यह अस्पष्टता आज भी नियमों के पालन को मुश्किल बनाती है.
“लाल डोरा मूल रूप से आबादी क्षेत्र था. चूंकि वहां से कोई राजस्व नहीं लिया जाता था, इसलिए यह काफी हद तक अनिर्धारित ही रहा. ब्रिटिश काल में इसका स्पष्ट वर्गीकरण नहीं हुआ और वही अस्पष्टता आज तक जारी है.”
उनके अनुसार, इस ऐतिहासिक ढील ने लोगों की मानसिकता को भी प्रभावित किया है.
कुमार ने कहा, “लोगों के मन में लाल डोरा का मतलब था—कोई पाबंदी नहीं, कोई कानून नहीं—आप जैसा चाहें वैसा निर्माण कर सकते हैं. लेकिन जब भवन नियम लागू हुए, तो उन्हें स्वीकार करने में विरोध हुआ.”
यह चुनौती खासतौर पर तब सामने आती है, जब अधिकारी अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने की कोशिश करते हैं.
कुमार ने कहा, 2006 में, केंद्र सरकार ने एक विशेष कानून लागू किया, जिसके तहत दिल्ली में हजारों अवैध निर्माणों को संरक्षण दिया गया. इसके बाद से नियमों का पालन करवाना और भी जटिल हो गया है.
उन्होंने कहा, “2014 से पहले बने ढांचों को कुछ हद तक संरक्षण मिला हुआ है, लेकिन उसके बाद बने निर्माण इसके दायरे में नहीं आते. अब भवन नक्शों को मंजूरी ज़रूरी है, लेकिन कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उल्लंघन अक्सर छिपाए जाते हैं. अगर कोई व्यावसायिक इमारत बनाता है और उस पर कार्रवाई होती है, तो वे कहते हैं कि यह निजी मकान है. आवास के नाम पर व्यावसायिक ढांचा खड़ा हो जाता है.”
कुमार के अनुसार, कार्रवाई के दौरान समुदाय का विरोध भी सामने आता है.
“उन्हें अपने समुदाय का भी संरक्षण मिलता है. तर्क दिया जाता है—‘यह हमारा गांव है, हम अपना घर बना रहे हैं, आप क्यों दखल दे रहे हैं?’ लेकिन सच्चाई यह है कि दिल्ली में अब ‘गांव’ की अवधारणा नहीं रही, फिर भी उसी नाम पर छूट मांगी जाती है.”
हौज रानी की आग की घटना ने इन विरोधाभासों को उजागर किया. कुमार के अनुसार, जिस इमारत में आग लगी थी, वह 2007 में बनी थी और बाद में उसका विस्तार किया गया.
“इसलिए एमसीडी के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है. यह एक परतदार और जटिल समस्या है.”
पूर्व मालवीय नगर विधायक सोमनाथ भारती का मानना है कि असली समस्या जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि जवाबदेही की कमी है.

उन्होंने कहा, “लाल डोरा गांव कई प्राधिकरणों के अधीन आते हैं—डीडीए, एमसीडी, राजस्व विभाग, दिल्ली सरकार और कई मामलों में केंद्र सरकार. हर संस्था कुछ न कुछ नियंत्रण रखती है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता.”
उनके अनुसार, यही बिखराव सरकारों को स्वामित्व, पुनर्विकास और नियमों के पालन जैसे कठिन फैसलों से बचने का मौका देता रहा है.
भारती ने कहा, “समाधान किसी अस्थायी राहत में नहीं, बल्कि एक व्यापक और अंतिम निपटारे में है.”
निवासियों के लिए, यह संस्थागत गतिरोध दशकों की अनिश्चितता में बदल गया है. कार्यकर्ताओं जैसे परास त्यागी के लिए, यह एक निजी लड़ाई बन चुकी है.

अकेला लाल डोरा योद्धा
पारस त्यागी लाल डोरा गांवों और उनके निवासियों के भविष्य को सुरक्षित करने के मिशन पर हैं. पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी स्थित बुढेला गांव में उनका बचपन बीता, जहां अक्सर सरकारी अधिकारी आते थे और दावा करते थे कि उनका घर सरकारी जमीन पर बना है.
1999 में, दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके घर को तोड़ने का आदेश भी दे दिया था. इसके बाद एक लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जो लगभग दो दशकों तक चली और आखिरकार 2021 में उनका परिवार यह मामला जीत गया.
38-वर्षीय त्यागी ने कहा, “ये 20 साल ऐसे थे, जब एक परिवार को बेवजह मुकदमेबाजी और यह साबित करने के दर्द से गुजरना पड़ा कि जमीन उनकी ही थी.”
इस विवाद के केंद्र में वही समस्या थी, जो आज भी लाल डोरा गांवों को परेशान करती है—स्वामित्व अधिकारों की कमी. इस अनुभव ने त्यागी के जीवन की दिशा तय कर दी. उन्होंने बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल से पब्लिक पॉलिसी की पढ़ाई की, जहां उन्होंने दिल्ली के लाल डोरा गांवों पर विशेष ध्यान दिया. इसके बाद वे दिल्ली लौटे और 2016 में ‘सेंटर फॉर यूथ, कल्चर, लॉ एंड एनवायरमेंट’ (CYCLE) की स्थापना की.
अब तक त्यागी दर्जनभर से अधिक याचिकाएं अदालतों और नागरिक निकायों में दाखिल कर चुके हैं—गांव के तालाब पर सांस्कृतिक केंद्र बनाने की कोशिशों को रोकने से लेकर, गांवों के लेआउट प्लान और लाल डोरा क्षेत्रों में स्वामित्व योजना (SVAMITVA) लागू करवाने तक.

SVAMITVA (स्वामित्व योजना) केंद्र सरकार की एक पहल है, जिसे 2021 में पंचायत राज मंत्रालय ने शुरू किया था. इसका उद्देश्य ड्रोन तकनीक के जरिए ग्रामीण आबादी की जमीन का नक्शा तैयार करना और निवासियों को औपचारिक प्रॉपर्टी कार्ड देना था, ताकि उन्हें स्वामित्व का अधिकार मिले और वे बैंक से ऋण ले सकें, लेकिन दिल्ली में यह योजना ठीक से लागू नहीं हो पाई है.
त्यागी ने कहा, “मैं चाहता हूं कि दिल्ली के गांवों के लिए लेआउट प्लान लागू किए जाएं, ताकि एमसीडी, दिल्ली सरकार और डीडीए लाल डोरा को जटिल बताकर बहाने न बना सकें. इन गांवों की मैपिंग क्यों नहीं की जाती? आखिर अधिकारियों को क्या रोक रहा है?”
अप्रैल में, दक्षिण दिल्ली से भाजपा सांसद रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कहा था कि 31 लाल डोरा गांवों के निवासियों को स्वामित्व अधिकार दिए जाएंगे और प्रॉपर्टी कार्ड जारी किए जाएंगे, जिससे वे बैंक से लोन ले सकें. उन्होंने केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर को इस संबंध में पत्र भी लिखा, लेकिन चूंकि दिल्ली में ग्राम पंचायतें नहीं हैं, इसलिए इस योजना को लागू करने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता है.
इतिहासकार सुहैल हाशमी ने कहा, “दिल्ली सरकार के पास जमीन, पुलिस और वास्तविक प्रशासनिक अधिकारों पर सीधा नियंत्रण नहीं है. दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है और एमसीडी भी. यहां तक कि कोई आदेश पास करने के लिए भी राज्य सरकार को केंद्र से अनुमति लेनी पड़ती है.”
उनका कहना है कि दिल्ली की चमकदार कॉलोनियों और उपेक्षित गांवों के बीच का अंतर बुनियादी ढांचे का है.
उन्होंने कहा, “लाल डोरा की गलियां साफ क्यों नहीं हो सकतीं? बिजली की तारों को जमीन के नीचे क्यों नहीं डाला जा सकता? आलीशान कॉलोनियों में तो तारें भूमिगत हो चुकी हैं, लेकिन गांवों में कुछ नहीं बदला.”
2001 से 2004 तक दिल्ली की पहली महिला मुख्य सचिव रहीं शैलजा चंद्रा का मानना है कि एक ऐसा कानून होना चाहिए, जो सभी लाल डोरा गांवों को एक ही ढांचे के तहत लाए.
उन्होंने कहा, “समस्या यह है कि बड़ी आबादी अब घनी बस्तियों में रह रही है, जहां फायर सेफ्टी, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन, जल निकासी और भवन नियमों के पालन की जिम्मेदारी कोई एक एजेंसी नहीं लेती. हौज रानी जैसी घटनाओं के बाद सरकार को एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें एक ही प्राधिकरण इन सभी जिम्मेदारियों को संभाले—चाहे वह कानून, नियम या कार्यकारी आदेश के जरिए हो.”

ज़मीन का मालिक कौन?
हजारों निवासियों के लिए समस्या एक बेहद सरल दिखने वाले सवाल से शुरू होती है: उनके घर के नीचे की जमीन का कानूनी मालिक कौन है?
स्वामित्व संकट की जड़ें 1908 के भूमि समेकन (लैंड कंसोलिडेशन) में हैं, जब लाल डोरा गांवों की पूरी आबादी क्षेत्र (आबादी) को एक ही खसरा के रूप में दर्ज कर लिया गया था, बिना इसे अलग-अलग हिस्सों में बांटे. समय के साथ, जमीन पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही और परिवारों के भीतर अनौपचारिक रूप से बांटी जाती रही, लेकिन इन बदलावों को कभी राजस्व रिकॉर्ड में औपचारिक रूप से दर्ज नहीं किया गया.
त्यागी ने कहा, “और दिल्ली के अधिकारियों ने कभी परवाह नहीं की—1940 के दशक से लेकर 2020 तक भी, कि लाल डोरा क्षेत्रों में व्यक्तिगत जमीन के रिकॉर्ड अपडेट किए जाएं. यही स्वामित्व अधिकारों को लेकर भ्रम की मुख्य वजह है.”
उन्होंने कहा, जैसे-जैसे दिल्ली अपने गांवों के चारों ओर फैलती गई, लाल डोरा बस्तियों का स्वरूप बदलता गया. कृषि आधारित जीवनशैली की जगह शहरी जीवन ने ले ली. लोगों ने पक्के घर बनाए, पुराने ढांचों का विस्तार किया और धीरे-धीरे अपने घरों को किराये की संपत्तियों में बदल दिया. निर्माण को आसान बनाने के लिए राजस्व विभाग ने प्रमाणपत्र तो जारी किए, लेकिन स्वामित्व के रिकॉर्ड खुद कभी स्पष्ट नहीं किए गए.
इस अस्पष्टता के परिणाम आज भी लाल डोरा गाँवों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं.
त्यागी, जो इन गांवों पर लंबे समय से शोध कर रहे हैं और इनके ऐतिहासिक विकास का अध्ययन कर रहे हैं, बताते हैं कि 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एमसीडी को निर्देश दिया था कि छह महीने के भीतर इन गांवों के लेआउट प्लान तैयार किए जाएं, लेकिन ये लेआउट प्लान कभी बने ही नहीं.

त्यागी सवाल उठाते हैं, “अब इसके लिए जिम्मेदार कौन है?”.
शैलजा चंद्रा का कहना है कि यह तय करना सरकार का काम है कि वह कौन सा रास्ता अपनाना चाहती है.
“मैं कोई विशेष कानूनी रास्ता नहीं सुझा रही हूं. इसके लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन, विशेष नियम या अध्यादेश—क्या जरूरी है, यह सरकार को तय करना होगा, लेकिन यह स्थिति जारी नहीं रह सकती, जहाँ ये इलाके कई अधिकार क्षेत्रों के बीच फंसे रहें और निवासियों को बुनियादी नागरिक सुरक्षा तक न मिले.”
लंबा इंतज़ार
लाल डोरा क्षेत्रों में इमारतों के मालिक अब सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले रेग्युलराइजेशन (वैधीकरण) की सूची का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. तब तक वे अपनी संपत्ति को बाज़ार मूल्य पर बेच भी नहीं सकते.
शाहपुर जाट में अपने दफ्तर में बैठे संदीप पंवार कहते हैं कि उनके पास स्वामित्व साबित करने के लिए सिर्फ एक ही दस्तावेज़ है—वह हाउस टैक्स जो वे भरते हैं.
उन्होंने कहा, “लेकिन समस्या यह है कि मैं बैंक से लोन के लिए आवेदन नहीं कर सकता, क्योंकि बैंक हाउस टैक्स के दस्तावेज़ को स्वामित्व का प्रमाण नहीं मानते.”

औपनिवेशिक दौर में नक्शों पर खींची गई उस लाल रेखा के एक सदी से अधिक समय बाद भी, निवासी कहते हैं कि वे आज तक उसके परिणामों के साथ जी रहे हैं—गांव और शहर के बीच, वैधता और अस्पष्टता के बीच, उपेक्षा और निर्भरता के बीच फंसे हुए.
पंवार का कहना है कि इन गांवों के आसपास विकसित हुआ शहर उन्हें पीछे छोड़कर आगे बढ़ चुका है.
उन्होंने कहा, “अब अलग-अलग शहरों से आए लोग, जो पॉश कॉलोनियों में रहते हैं, खुद को दिल्लीवाला कहते हैं और हम, जो अपने ही शहर के किनारों पर रहते हैं, हमें बाहरी जैसा माना जाता है.”
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