नई दिल्ली: एक दशक पहले तक भारत के ट्रैक एंड फील्ड खिलाड़ियों की मैदान के बाहर की कहानी लगभग एक जैसी होती थी. अगर वे अच्छा परफॉर्म करते, तेज़ दौड़ते या लंबी छलांग लगाते, तो उन्हें रेलवे या पुलिस में सरकारी नौकरी मिल जाती. यही नौकरी भारतीय एथलेटिक्स को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा सहारा थी.
लेकिन 2020 टोक्यो ओलंपिक में नीरज चोपड़ा के एथलेटिक्स में भारत का पहला गोल्ड मेडल जीतने के बाद यह सोच बदलने लगी.
नीरज चोपड़ा ने खिलाड़ियों को यह दिखाया कि पक्की सरकारी नौकरी ही एकमात्र सपना नहीं है. उन्होंने ट्रैक एंड फील्ड को नई पहचान दी और इसे आकर्षक बनाया. खुद नीरज ने भी सरकारी नौकरी के पीछे भागने की बजाय अलग रास्ता चुना.
अब लॉन्ग जंपर मुरली श्रीशंकर और निहारिका वशिष्ठ, स्टीपलचेज धावक अविनाश साबले, स्प्रिंटर ज्योति याराजी, साक्षी चव्हाण, रूपल चौधरी और हर्डलर तेजस्विन शंकर जैसे खिलाड़ी वह करियर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी पहले की पीढ़ी सिर्फ कल्पना ही कर सकती थी.
कई सालों तक पी.टी. उषा, मिल्खा सिंह और अंजू बॉबी जॉर्ज जैसे खिलाड़ियों को अलग पहचान मिली, लेकिन वे अपवाद थे. उनकी उपलब्धियां इसलिए ज्यादा बड़ी मानी जाती थीं क्योंकि पूरे सिस्टम से उन्हें बहुत कम सहयोग मिलता था.
कुल मिलाकर, क्रिकेट के दीवाने देश में ट्रैक एंड फील्ड हमेशा एक छोटा खेल माना जाता रहा, लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है. मुरली श्रीशंकर ने दिप्रिंट से कहा, “नीरज चोपड़ा की ओलंपिक जीत ने हमारी सोच बदल दी. पहले हम सिर्फ गेम में हिस्सा लेने के बारे में सोचते थे, अब लगता है कि हम दुनिया के बड़े खिलाड़ियों को भी हरा सकते हैं.”
श्रीशंकर ने 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों और 2023 हांगझोउ एशियाई खेलों में लॉन्ग जंप में रजत पदक जीता था, लेकिन उनका भी सरकारी नौकरी करने का कोई इरादा नहीं है. अब खिलाड़ियों के लिए स्पॉन्सरशिप, ब्रांड एंडोर्समेंट, इंस्टाग्राम रील्स और ब्रांड के साथ साझेदारी के जरिए करियर बनाने का नया रास्ता खुल गया है.
जिस खेल में दशकों तक सिर्फ ‘अनुशासन’ और ‘संघर्ष’ था, वहां अब पैसा भी आने लगा है.
2020 में नीरज चोपड़ा के ओलंपिक गोल्ड के बाद उभरते खेलों में खिलाड़ियों के ब्रांड एंडोर्समेंट में 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. साल 2024 तक भारत में खिलाड़ियों के ब्रांड एंडोर्समेंट पहली बार 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गए. पेरिस ओलंपिक 2024 में मनु भाकर के कांस्य पदक ने भी इस माहौल को और मजबूत किया. वहीं डिजिटल क्रांति ने खेलों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया.
मुरली श्रीशंकर ने कहा, “अब खिलाड़ियों की सोच भी बदल गई है. हमारे मन में यह भरोसा रहता है कि हमारे पास एक सुरक्षा कवच है. हम चाहे किसी भी पृष्ठभूमि से आते हों, अब हममें से ज्यादातर लोगों को पैसों की चिंता पहले जैसी नहीं रहती.”
जीतने से ज्यादा क्या पोस्ट करते हैं, उससे पहचान बनती है
स्प्रिंटर साक्षी चव्हाण का इंस्टाग्राम अकाउंट 2022 तक प्राइवेट था, लेकिन लगातार लगी चोटों की वजह से उनका करियर रुक गया. ट्रेनिंग और रिकवरी के अलावा उनके पास ज्यादा कुछ करने को नहीं था. ऐसे में उन्होंने अपनी ट्रेनिंग के वीडियो ऐसे ही पोस्ट करने शुरू कर दिए. उनके कुछ वीडियो लाखों लोगों ने देखे. इसके बाद ब्रांड्स की नज़र उन पर पड़ी. पहले उन्हें सिर्फ प्रोडक्ट के बदले पोस्ट करने के ऑफर मिले. एक साल बाद उन्हें पैसे लेकर ब्रांड्स के साथ काम मिलने लगा.
साक्षी चव्हाण ने कहा, “मैंने सोशल मीडिया से कमाए पैसों से अपने माता-पिता की शादी की सालगिरह पर उन्हें सोने की अंगूठी गिफ्ट की. अब मैं घर में भी पैसे देने लगी हूं.” उनके एक बड़े और एक छोटे भाई हैं.
ओलंपिक मेडल नहीं होने के बावजूद सोशल मीडिया उनके लिए कमाई का अच्छा जरिया बन गया. साक्षी अब बोट (boAt) की एथलीट हैं. वह गिवा (Giva), नायका (Nykaa) और लैक्मे (Lakme) जैसे ब्रांड्स के साथ भी काम कर चुकी हैं. उनका कहना है कि यह सब सोशल मीडिया पर उनकी पहचान की वजह से संभव हुआ.
साक्षी ने कहा, “आजकल लोग अखबारों से ज्यादा सोशल मीडिया देखते हैं. अगर आप सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करेंगे तो लोग आपको नहीं जानेंगे. अगर आप बार-बार उनकी फीड में नहीं आएंगे तो लोग आपको भूल जाएंगे.”
इंस्टाग्राम पर उनके 2 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं. उनका कहना है कि अब लोग उन्हें उनके खेल के नतीजों से पहले पहचानने लगे हैं. हाल ही में एक चैंपियनशिप में लोग उनके साथ फोटो खिंचवाने आए.
यानी अब खिलाड़ियों की पहचान सिर्फ मेडल से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी से भी बन रही है. खिलाड़ियों के लिए मजबूत सोशल मीडिया प्रोफाइल एक तरह की सुरक्षा बन गई है.
साक्षी खास तौर पर सनस्क्रीन ब्रांड्स के बीच काफी लोकप्रिय हैं. उनके वीडियो की शुरुआत अक्सर ट्रैक पर दौड़ते हुए होती है. वह बताती हैं कि उन्हें दिन का ज्यादातर समय धूप में बिताना पड़ता है. एक वीडियो में वह कहती हैं, “जैसे मैं अपनी ट्रेनिंग कभी नहीं छोड़ती, वैसे ही सनस्क्रीन लगाना भी नहीं छोड़ती.” यह वीडियो नायका के साथ किया गया था, जिसमें उन्होंने पांच अलग-अलग सनस्क्रीन ब्रांड्स का प्रचार किया.
अपना ब्रांड बना रहे खिलाड़ी
साक्षी जैसे खिलाड़ी-इन्फ्लुएंसर दूसरे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से अलग हैं. वे अलग से कहानी नहीं बनाते, बल्कि अपने रोज़ाना की लाइफ में ही प्रोडक्ट को शामिल करते हैं. इससे उनका प्रचार ज्यादा भरोसेमंद लगता है.
इस तरह खिलाड़ी अपनी अलग पहचान बना रहे हैं, स्पॉन्सर जोड़ रहे हैं और ऐसा करियर बना रहे हैं जो सिर्फ खेल के नतीजों पर निर्भर नहीं है. इससे चोट, ऑफ-सीजन या खराब परफॉर्मेंस के दौरान भी उनकी कमाई जारी रहती है.
नीरज चोपड़ा, स्प्रिंटर हिमा दास, ज्योति याराजी और निहारिका वशिष्ठ की सोशल मीडिया सफलता ने युवा खिलाड़ियों को नया रास्ता दिखाया है.
हालांकि, नीरज चोपड़ा को स्टार उनके टोक्यो ओलंपिक 2020 के गोल्ड मेडल ने बनाया था, लेकिन सोशल मीडिया ने उस सफलता को लंबे समय तक चलने वाले बड़े ब्रांड में बदल दिया. इंस्टाग्राम पर उनके 91 लाख (9.1 मिलियन) फॉलोअर्स हैं. उनकी ब्रांड वैल्यू करीब 4 करोड़ डॉलर (लगभग 330 करोड़ रुपये) बताई जाती है. वह अंडर आर्मर (Under Armour), ओमेगा (Omega), जिलेट (Gillette), CRED, सैमसंग (Samsung) और वीजा (Visa) समेत करीब दो दर्जन ब्रांड्स के साथ जुड़े हैं.
हिमा दास ट्रैक एंड फील्ड की शुरुआती खिलाड़ियों में थीं, जिन्हें बड़े ब्रांड्स का साथ मिला. 2018 IAAF वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने के बाद इंस्टाग्राम पर उनके 4 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हो गए. उसी साल वह एडिडास (Adidas) का चेहरा बनीं. खबरों के मुताबिक, मेडल बढ़ने के साथ उनकी एंडोर्समेंट फीस बढ़कर सालाना करीब 65 लाख रुपये हो गई.
ज्योति याराजी ने भी ऐसा ही सफर तय किया. करीब 5 लाख फॉलोअर्स और अर्जुन पुरस्कार मिलने के बाद उनकी सफलता से उन्हें लगातार ब्रांड्स और स्पॉन्सर्स मिलने लगे.
100 मीटर दौड़ में 10.10 सेकेंड से कम समय लेने वाले पहले भारतीय गुरिंदरवीर सिंह के इंस्टाग्राम पर 4.5 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं. हाल ही में उन्होंने अभिनेत्री आलिया भट्ट के साथ उनकी फिल्म ‘अल्फा’ के प्रचार के लिए काम किया.
वीडियो में आलिया भट्ट ट्रैक पर दौड़ने की तैयारी करती हैं और पीछे से आवाज़ आती है, “सबसे आगे और सबसे तेज बनने के लिए फोकस, मेहनत और लगन चाहिए.” यह आवाज गुरिंदरवीर सिंह की थी. वीडियो के कैप्शन में लिखा गया, “मंडे मोटिवेशन…आज भारत के सबसे तेज़ ‘अल्फा’ गुरिंदरवीर सिंह के साथ ट्रैक पर वक्त बिताया.” वीडियो में आलिया उनसे उनके करियर और खेल चुनने की वजह के बारे में सवाल भी पूछती हैं.
एक और उदाहरण निहारिका वशिष्ठ हैं. वह नेशनल ट्रिपल जंप चैंपियन हैं और उन्होंने अपने इंस्टाग्राम फॉलोअर्स के दम पर अपना खेल करियर आगे बढ़ाया है. कोरोना महामारी के बाद उनके 2.5 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हो गए. अब वह अपनी ट्रेनिंग, सप्लीमेंट और यात्रा का खर्च लगभग पूरी तरह ब्रांड्स के साथ काम करके निकालती हैं. उन्हें सरकारी मदद या किसी कॉरपोरेट स्पॉन्सर पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
ऐसे खिलाड़ियों के लिए सोशल मीडिया अब सिर्फ प्रचार का जरिया नहीं है, बल्कि आर्थिक सहारा भी बन गया है. इससे वे ऐसे खेल में अपना करियर बना पा रहे हैं, जहां पहले सरकारी नौकरी और थोड़े समय की पहचान के अलावा ज्यादा कुछ नहीं मिलता था.
एक बदला हुआ खेल तंत्र
श्रीशंकर एक खिलाड़ी परिवार से आते हैं. उनके माता-पिता दोनों राज्य स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं. इसलिए उन्होंने अपनी आंखों से देखा है कि वर्षों में खेल व्यवस्था कितनी बदल गई है. जहां उनके माता-पिता को राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में जाने के लिए भी यात्रा का खर्च जुटाने में मुश्किल होती थी, वहीं श्रीशंकर इस समय 2026 राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्स) और एशियाई खेलों की तैयारी के लिए 30 अन्य खिलाड़ियों के साथ पोलैंड में ट्रेनिंग कर रहे हैं.
केरल के छोटे शहर पालक्काड के रहने वाले श्रीशंकर ने कहा, “अगर पिछली पीढ़ी से तुलना करें तो बहुत बड़ा बदलाव आया है. मेरे माता-पिता को आज हमें जितना सहयोग मिलता है, उसका 5 प्रतिशत भी नहीं मिलता था.”
उन्होंने कहा, “जब मेरे माता-पिता खेलते थे, तब सिंथेटिक ट्रैक भी नहीं थे. एक और उदाहरण देखिए- यात्रा के दौरान हमें 50 हज़ार रुपये का भत्ता मिलता है. पहले मेरे माता-पिता को सिर्फ 200-300 रुपये मिलते थे. यानी हम बहुत आगे आ चुके हैं.”
श्रीशंकर मानते हैं कि उनके माता-पिता को खेल से बहुत प्यार था, लेकिन आखिर में उनका लक्ष्य सरकारी नौकरी पाना था. वहीं श्रीशंकर सिर्फ अपने खेल के जुनून से आगे बढ़ रहे हैं.
उन्होंने कहा, “अब मुझे पैसों की चिंता नहीं रहती. सरकार की अलग-अलग योजनाएं हमारी ज़रूरतों का ध्यान रखती हैं.”
श्रीशंकर प्यूमा (Puma), लिम्का (Limca), यार्डली (Yardley) और टोयोटा ग्लोबल (Toyota Global) जैसे ब्रांड्स के साथ काम कर चुके हैं.
श्रीशंकर जिस मदद की बात कर रहे हैं, वह संशोधित खेलो इंडिया योजना है. इसके तहत करीब 3,000 खिलाड़ियों को हर साल 6.28 लाख रुपये की छात्रवृत्ति दी जा रही है. इस राशि से कोचिंग, डाइट, खेल किट, मेडिकल इंश्योरेंस और खिलाड़ियों के निजी खर्च पूरे किए जाते हैं.

इस योजना के तहत खेल सुविधाओं पर भी बड़ा निवेश किया गया है. देशभर में 23 राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र और सैकड़ों मान्यता प्राप्त खेल अकादमियां बनाई गई हैं. इसके अलावा टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) भी है. इसे 2014 में युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय ने शुरू किया था. इसका मकसद ओलंपिक की तैयारी कर रहे खिलाड़ियों को आर्थिक सहायता देना है.
उदाहरण के तौर पर, श्रीशंकर का पोलैंड में चल रहा ट्रेनिंग कैंप एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) मिलकर चला रहे हैं. उनके माता-पिता के समय खेल महासंघ और सरकार के बीच इस तरह का सहयोग नहीं होता था.
निजी संस्थाएं भी खिलाड़ियों को दे रही हैं सहारा
खेलों में अब निजी कंपनियों का पैसा भी उन कमियों को पूरा कर रहा है, जो पहले रह जाती थीं.
रिलायंस फाउंडेशन का यूथ स्पोर्ट्स प्रोग्राम पूरे भारत से युवा खिलाड़ियों को खोजता है और उन्हें आगे बढ़ने का मौका देता है. वहीं भुवनेश्वर में उसका एथलेटिक्स हाई परफॉर्मेंस सेंटर खिलाड़ियों को सालभर रहने और ट्रेनिंग की सुविधा देता है. यहां उन्हें कोच, फिजियोलॉजिस्ट, साइकोलॉजिस्ट और न्यूट्रिशनिस्ट की मदद भी मिलती है. साक्षी चव्हाण भी इसी सेंटर से जुड़ी हैं.
रिलायंस फाउंडेशन ने 2021 में यूथ नेशनल प्रतियोगिता के दौरान साक्षी को चुना था और 2022 में उन्हें अपने स्पोर्ट्स प्रोग्राम में शामिल किया. तब से फाउंडेशन उनकी फिजियोथेरेपी से लेकर रिकवरी तक का पूरा खर्च उठा रहा है, जबकि चोटों की वजह से कई बार उनका करियर खतरे में पड़ गया था.
रूपल चौधरी भी ऐसी ही खिलाड़ी हैं. उनका कहना है कि अगर रिलायंस फाउंडेशन, खेलो इंडिया और TOPS जैसी योजनाओं का सहारा नहीं मिलता, तो वह अपने करियर में यहां तक नहीं पहुंच पातीं. रूपल उत्तर प्रदेश के मेरठ के एक साधारण परिवार से हैं. उनके पिता गेहूं और गन्ने की खेती करते हैं और वही पूरे परिवार की कमाई का एकमात्र सहारा हैं.
रूपल ने कहा, “एक खिलाड़ी की जिंदगी बहुत महंगी होती है. हमें अच्छे उपकरण, सही डाइट, जूते, ट्रेनिंग किट और बहुत सी दूसरी चीजें चाहिए होती हैं. हमारे परिवारों के लिए यह सब खरीदना आसान नहीं होता. ऐसे में जब संस्थाएं मदद करती हैं तो हमारे परिवार का बोझ काफी कम हो जाता है.”

रूपल खेल के प्रति इतनी समर्पित थीं कि 2017 में, जब वह 9वीं कक्षा में थीं, तब उन्होंने पूरी तरह ट्रेनिंग करने के लिए स्कूल छोड़ दिया. वह रोज करीब 6 घंटे ट्रैक पर अभ्यास करती थीं.
हालांकि, शुरुआत में घर में उनके इस फैसले को गंभीरता से नहीं लिया गया.
उन्होंने याद करते हुए कहा, “शुरुआत में मेरे पापा मेरी ट्रेनिंग को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन 2019 की नेशनल जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में अंडर-16 की 400 मीटर दौड़ में गोल्ड मेडल जीतने के बाद मैं उनकी पहली प्राथमिकता बन गई. वह मेरी ट्रेनिंग के लिए अपने दूसरे काम भी छोड़ देते थे.”
अपने कई साथियों से अलग, रूपल अभी तक इंस्टाग्राम पर अपने 50 हजार फॉलोअर्स से कमाई नहीं कर पाई हैं. वह मानती हैं कि कंटेंट बनाना उनकी ताकत नहीं है.
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे बस भागना अच्छा लगता है.”
हालांकि, उनकी अपनी सोशल मीडिया से कमाई नहीं है, लेकिन संस्थाओं से मिलने वाली मदद की वजह से अब उनके परिवार को उनके खेल का पूरा खर्च नहीं उठाना पड़ता.
श्रीशंकर ने कहा, “एक बार आपकी पहचान बन जाए और आपको कोई संस्था चुन ले, तो फिर आपको सिर्फ अपने प्रदर्शन पर ध्यान देना होता है. पैसे, सुविधाएं और बाकी जरूरत की चीजें आपको मिल जाती हैं.”
मदद सिर्फ उन्हीं को, जो पहले से बहुत अच्छे या बहुत मशहूर हैं
“अच्छा प्रदर्शन करो, कोई संस्था तुम्हें चुन लेगी और फिर पैसों की चिंता खत्म हो जाएगी” — यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन साक्षी चव्हाण कहती हैं कि असलियत इससे कहीं ज्यादा मुश्किल है. वह इस सच्चाई को खुलकर बताती हैं.
भले ही उनका अपना सफर किसी सपने जैसा लगता हो, लेकिन वह उन खिलाड़ियों की भी बात करती हैं, जिनका रास्ता इतना आसान नहीं रहा.
साक्षी ने कहा, “अगर आप बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं, तो आपको कोई संस्था चुन लेगी. लेकिन हर खिलाड़ी शुरुआत से ही बहुत अच्छा नहीं होता. कई खिलाड़ियों को अच्छा बनने के लिए पहले मदद की जरूरत होती है.” उन्होंने इसे खेल व्यवस्था की सबसे बड़ी कमियों में से एक बताया.
उन्होंने कहा, “हम उन लोगों की मदद नहीं करते जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है. हम सिर्फ उन्हीं खिलाड़ियों का साथ देते हैं जो पहले से बहुत अच्छे हैं या बहुत मशहूर हैं.”
साक्षी का कहना है कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन मौके उन खिलाड़ियों तक नहीं पहुंचते जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है. इसलिए वह हमेशा युवा खिलाड़ियों को सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाने की सलाह देती हैं.
उन्होंने कहा, “बहुत अच्छे स्प्रिंटर हैं, लेकिन कोई उन्हें जानता ही नहीं, क्योंकि वे सोशल मीडिया पर अकाउंट नहीं बनाते और अपनी ट्रेनिंग के वीडियो पोस्ट नहीं करते.”
वहीं, श्रीशंकर एक दूसरी और बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनका सवाल है कि हर ओलंपिक के बाद भारत सबसे बड़े खेल मंच पर लगातार ज्यादा मेडल क्यों नहीं जीत पाता.
टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत ने कुल 7 मेडल जीते थे. इनमें नीरज चोपड़ा का गोल्ड भी शामिल था. इसके साथ भारत मेडल तालिका में 48वें स्थान पर रहा.
लेकिन यह प्रदर्शन पेरिस ओलंपिक 2024 में जारी नहीं रह सका. भारत ने वहां 6 मेडल जीते—1 सिल्वर और 5 ब्रॉन्ज. इसके बाद भारत 71वें स्थान पर पहुंच गया. एथलेटिक्स में भी सिर्फ नीरज चोपड़ा का सिल्वर मेडल ही मिला.
श्रीशंकर ने कहा, “हमारे खेल तंत्र की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि घरेलू प्रतियोगिताओं में मिलने वाली सफलता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दोहराया जाए.” उनका मानना है कि खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव और ज्यादा मौके नहीं मिलना इसकी सबसे बड़ी वजह है.
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