नई दिल्ली: शनिवार, 18 जुलाई की शाम के 6 बजे हैं. सूरज की तपिश थोड़ी कम होने लगी है, लेकिन गर्मी से ज़्यादा राहत नहीं मिली है. जंतर मंतर में हवा में नमी बहुत ज़्यादा है और वहां बने एक अस्थायी मंच के नीचे जुटे सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के चेहरों से पसीना टपक रहा है. यहीं सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने शनिवार सुबह तक 20 दिनों का अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की.
करीब तीन हफ्तों तक यह प्रदर्शन एक तय दिनचर्या के साथ चलता रहा. हर दिन अलग-अलग जगहों से लोग समर्थन देने यहां आते रहे. वहीं वांगचुक टेंट के नीचे एक पतले गद्दे पर लेटे रहते और हल्की मुस्कान के साथ मिलने वालों का स्वागत करते.
शाम के समय सबसे ज़्यादा भीड़ होती थी. “हल्ला बोल” के नारे पूरे जंतर मंतर में गूंजते थे. “छात्रों की संस्थागत हत्या बंद करो”, “NTA खत्म करो” और “हमारा भविष्य कोई राजनीतिक प्रयोग नहीं है” जैसे पोस्टर उस गुस्से को दिखा रहे थे जिसने लोगों को यहां आने के लिए मजबूर किया.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के स्वयंसेवक भीड़ के बीच घूमकर उन लोगों को संभाल रहे थे जो वांगचुक की एक झलक देखना चाहते थे. पास ही कुछ कलाकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिटलर के रूप में दिखाते हुए पोस्टर बना रहे थे. कुछ लोग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मोदी की गोद में बैठे हुए कार्टून के रूप में बना रहे थे. वहीं कुछ लोग गर्मी में इंतज़ार कर रहे लोगों को पीने का पानी बांट रहे थे.

शनिवार सुबह यह पूरी दिनचर्या अचानक बदल गई.
सुबह करीब 7 बजे पुलिस मौके पर पहुंची. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया और वांगचुक को वहां से ले गई. पुलिस का कहना था कि उनकी तबीयत लगातार खराब हो रही थी. लेकिन प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें जबरन उठाकर ले जाया गया. हालांकि इससे आंदोलन खत्म होने के बजाय और तेज हो गया. कई लोग वहां से जाने को तैयार नहीं हुए और समर्थन में सैकड़ों लोग और जंतर-मंतर पहुंच गए. देखते ही देखते भीड़ करीब 1,000 लोगों तक पहुंच गई.
अब वांगचुक वहां नहीं थे, लेकिन प्रदर्शनकारी पहले से भी ज़्यादा दृढ़ नजर आए. उन्होंने सरकार पर सख्ती से कार्रवाई करने का आरोप लगाया और कहा कि सोमवार को संसद तक होने वाला मार्च पहले से कहीं बड़ा होगा.

वहां मौजूद कई स्कूल के छात्रों के लिए सोनम वांगचुक पहले एक अनजान नाम थे. उनका ज़्यादातर काम लद्दाख से जुड़ा रहा है, जो NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों की चिंताओं से काफी दूर था. लेकिन जैसे-जैसे उनके भूख हड़ताल की खबर फैली, कई छात्रों ने उनके बारे में पढ़ना शुरू किया और कुछ ही दिनों में वह कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गए.
गाजियाबाद की कक्षा 10 की छात्रा फिजा ने बताया कि उन्होंने वांगचुक का नाम पहली बार भूख हड़ताल शुरू होने के बाद सुना. उन्हें जिज्ञासा हुई तो उन्होंने उनके काम के बारे में पढ़ा और फिर अपने माता-पिता से ज़िद करके जंतर मंतर आने को कहा.
गाजियाबाद के ही कृष्णा ने भी ऐसी ही बात कही. उन्होंने कहा, “मुझे पहले उनके बारे में कुछ भी पता नहीं था. लेकिन वह असली जिंदगी के हीरो हैं. मैं सिर्फ उनकी एक झलक देखने यहां आया हूं. उन्होंने हमेशा अपने लोगों के लिए आवाज उठाई है और अब वह हमारे लिए खड़े हुए हैं. हम कम से कम यहां आकर उनका समर्थन तो कर ही सकते हैं.”
‘वकीलों से लेकर छात्रों और पूर्व सैनिकों तक—सभी जवाब चाहते हैं’
यह प्रदर्शन सिर्फ नाराज़ छात्रों तक सीमित नहीं है. यहां रिटायर्ड और नौकरी कर रहे सरकारी कर्मचारी, कोर्ट से लौटते हुए वकील, छोटे बच्चों के साथ आए माता-पिता, कक्षा 10 के छात्र, पूर्व सैनिक और ऑटो-रिक्शा चालक भी मौजूद हैं.
सभी की पृष्ठभूमि अलग है, लेकिन उनकी मांगें एक जैसी हैं.
वे सिर्फ NEET पेपर लीक के लिए जवाबदेही नहीं चाहते, बल्कि सरकार से यह भी चाहते हैं कि वह अपनी व्यवस्था की कमियों को स्वीकार करे, देश की परीक्षा प्रणाली पर लोगों का भरोसा फिर से बहाल करे और “माफी” मांगे.
झारखंड के हृतिक, जिन्होंने 3 मई को परीक्षा दी थी और बाद में वह रद्द कर दी गई, कहते हैं, “किसी को नहीं पता कि पेपर क्यों लीक हुआ. हमें जवाब कौन देगा. दोषी कौन है. मुझे यह जानने का अधिकार है. और उन छात्रों का जवाब कौन देगा जिन्होंने अपनी जान दे दी.”
वह आगे कहते हैं, “हम धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं क्योंकि इन परीक्षाओं को सही तरीके से कराना उनकी जिम्मेदारी थी और वह इसमें असफल रहे. उनके इस्तीफे से शायद समस्या पूरी तरह खत्म न हो, लेकिन इससे एक संदेश जरूर जाएगा. सबसे खराब बात यह है कि सरकार इस लीक को अपनी नाकामी मानने तक को तैयार नहीं है.”
प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए वह कहते हैं, “इतने बड़े संकट पर प्रधानमंत्री ने अब तक एक भी बयान क्यों नहीं दिया. क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है कि लोगों को भरोसा दिलाएं कि ऐसा दोबारा नहीं होगा और मामले की निष्पक्ष जांच होगी. सरकार ने न कुछ कहा है और न ही कोई कार्रवाई की है.”

एक और छात्र प्रतीक बड़े सुधारों की जरूरत पर ज़ोर देते हैं.
वह कहते हैं, “छात्र कोचिंग सेंटरों में लाखों रुपये खर्च करते हैं. कई परिवार सिर्फ एक परीक्षा दिलाने के लिए कर्ज लेते हैं. माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी की कमाई बच्चों की पढ़ाई पर लगा देते हैं और फिर पेपर लीक हो जाता है. इससे छात्रों का मन पूरी तरह टूट जाता है.”
वह आगे कहते हैं, “बड़े सुधारों की जरूरत है. कोचिंग इंडस्ट्री को भी नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए. अभी ऐसा लगता है कि छात्र हर तरफ से फंसे हुए हैं.”
हर दिन प्रदर्शन में आने वाले ऑटो-रिक्शा चालक मुम्मा सनवर कहते हैं कि वह इस आंदोलन को देश के भविष्य की लड़ाई मानते हैं.
वह दिप्रिंट से कहते हैं, “हमारे छात्रों का भविष्य अंधेरे में नहीं जाना चाहिए और न ही पेपर लीक के भरोसे छोड़ा जाना चाहिए. यही बच्चे देश का भविष्य हैं. बहुत समय बाद इस प्रदर्शन ने मुझे महसूस कराया कि हमारा संविधान अभी भी जिंदा है क्योंकि लोग आखिरकार सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछ रहे हैं.”
वह इस आंदोलन को पूरी तरह लोगों का आंदोलन बताते हुए कहते हैं, “यह किसी राजनीतिक पार्टी का आंदोलन नहीं है. सरकार को समझना चाहिए कि जिन लोगों ने उन्हें चुना था, वही आज यहां प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार की जिम्मेदारी है कि वह लोगों से बात करे.”
वह बताते हैं कि वह रोज़ क्यों आते हैं. “मैं हर दिन यहां आता हूं ताकि हमारे बच्चे जानें कि उनके दादा-दादी की पीढ़ी भी उनके साथ खड़ी थी. मेरे अपने बच्चे नहीं हैं, लेकिन मैं छात्रों के लिए यहां हूं. मैं बच्चों के लिए यहां हूं.”
पूर्व सैनिक सूबेदार मेजर लाल चंद यादव भी इसी भावना से सहमत हैं.
वह कहते हैं, “मैं यहां छात्रों के लिए आया हूं. उन्हें ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कहकर बदनाम किया जा रहा है. मैं यहां दो-तीन बार आ चुका हूं. जो लोग सच्चे देशभक्त हैं, उन्हें यहां आकर इस आंदोलन का समर्थन करना चाहिए. यह क्रांतिकारियों का देश है. सरकार हमें कॉकरोच समझती है और खुद को राजा. उन्हें यहां आकर वांगचुक से उनकी भूख हड़ताल खत्म करने की अपील करनी चाहिए.”

‘ऑनलाइन सितारे’
प्रदर्शन में सबसे अलग जो चीज़ नजर आती है, वह है बड़ी संख्या में मोबाइल फोन पकड़े लोग. कोई लाइवस्ट्रीम कर रहा है, कोई वीडियो बना रहा है, कोई प्रदर्शनकारियों का इंटरव्यू ले रहा है और कोई कैमरे के सामने रिपोर्टिंग कर रहा है.
एक यूट्यूबर, जो प्रदर्शन को कवर कर रहा है, कहता है, “यह हमारी जिम्मेदारी है. जब मुख्यधारा का मीडिया ज़मीनी सच्चाई नहीं दिखाता, तब हम आगे आते हैं. हम वही काम कर रहे हैं जो मीडिया को करना चाहिए.”
इस प्रदर्शन की ज़्यादातर कवरेज छोटे क्षेत्रीय मीडिया संस्थान, स्वतंत्र यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर कर रहे हैं. वे लगातार लाइवस्ट्रीम कर रहे हैं और हर नई जानकारी सीधे अपने दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं.
एक कंटेंट क्रिएटर, जो कहता है कि वह पहले दिन से इस प्रदर्शन को रिकॉर्ड कर रहा है, बताता है, “हम पहले दिन से यहां हैं. हम हर दिन की गतिविधियां रिकॉर्ड करते हैं और रोज़ लोगों से बात करके समझते हैं कि कौन आ रहा है और क्यों आ रहा है.”
अपने लाइवस्ट्रीम देखने वालों से यह कहते हुए कि वह उन्हें थोड़ी देर में अभिजीत दीपके की झलक दिखाएगा, वह कहता है, “जब से मैंने इस प्रदर्शन की लाइवस्ट्रीम शुरू की है, मेरे फॉलोअर्स बढ़ गए हैं. इससे पता चलता है कि लोगों की इसमें दिलचस्पी है. जो लोग यहां नहीं आ सकते, वे भी इसे देख रहे हैं और हर अपडेट पर नजर रख रहे हैं.”

‘डर’
ड्रॉप लेकर JEE की तैयारी कर रहे प्रतीक कहते हैं कि उन्हें डर है कि 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान अगर बाहर के लोग आकर गड़बड़ी करें तो असली प्रदर्शनकारियों की छवि खराब हो सकती है. वह कहते हैं, “कई आंदोलनों में हमने देखा है कि अचानक कुछ लोग देश विरोधी नारे लगाने लगते हैं. बाद में पुलिस उसी बहाने असली प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करती है. इससे पूरे आंदोलन को बदनाम करने का मौका मिल जाता है.”
वह यह भी कहते हैं कि उन्हें डर है कि आंदोलन में घुसपैठ हो सकती है. “20 जुलाई को सरकार के लोग स्वयंसेवक बनकर आ सकते हैं और जानबूझकर पुलिस से टकराव करा सकते हैं. फिर उसी बहाने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की जा सकती है,” वह आरोप लगाते हैं.
जैसे-जैसे रात होती है, भीड़ धीरे-धीरे कम होने लगती है. नारों की आवाज़ धीमी पड़ जाती है और जंतर मंतर में फिर से शांति लौट आती है. वहां तैनात रैपिड एक्शन फोर्स के जवान भी अब आराम से नजर आते हैं.
प्रदर्शन का एक और दिन खत्म हो जाता है. लेकिन जाते समय सभी लोग अगले दिन फिर लौटने का वादा करते हैं. सब जानते हैं कि कल फिर यहां भीड़ जुटेगी. प्रदर्शन जारी है और जवाब मिलने की उम्मीद भी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: क्या वांगचुक को हटाया जाना ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ? जंतर-मंतर पर सैकड़ों लोग समर्थन में जुटे