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Thursday, 16 July, 2026
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2,000 स्थल, 60 कब्रिस्तान और रिसर्च की कमी: हड़प्पा काल में कैसे होता था अंतिम संस्कार

हड़प्पा सभ्यता के 2,000 से अधिक ज्ञात स्थलों में करीब 60 कब्रिस्तान ही दर्ज किए गए हैं. विद्वानों का मानना है कि भारत के प्राचीन दफन परंपराओं पर रिसर्च की काफी कमी है. जबकि मिस्र में यह विषय लंबे समय से अध्ययन का केंद्र रहा है.

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नई दिल्ली: हर बार जब भी हड़प्पा काल का कोई कंकाल जमीन से निकाला जाता है, तो पुरातत्वविद् (आर्कियोलॉजिस्ट) हैरान रह जाते हैं और एक नया रहस्य सामने आने लगता है. वे इस एहसास से अच्छी तरह वाकिफ हैं. यह तो सभी जानते हैं कि हड़प्पा काल की लिपि हमेशा से उलझन का विषय रही है. लेकिन हड़प्पा काल के दौरान हुए अंतिम संस्कार की परंपराओं पर बहुत कम रिसर्च हुआ है और यह कई इतिहासकारों के लिए आज भी पहेली बनी हुई है.

मिट्टी को सावधानी से हटाना, खोपड़ी दिखना, और शव के पास रखे मिट्टी के बर्तनों का धीरे-धीरे सामने आना — हड़प्पा सभ्यता के दफनाए गए लोगों से जुड़े नए राज़ लगातार सामने आ रहे हैं.

1921 में इस सभ्यता की खोज के बाद से, हड़प्पा, राखीगढ़ी, कालीबंगन, लोथल, धौलावीरा और फरमाना जैसी जगहों से मानव कंकाल मिले हैं. लेकिन आर्कियोलॉजिस्ट, इतिहासकार और मानवविज्ञानी अभी भी हज़ारों साल पुराने इस समाज की पूरी तस्वीर बनाने से बहुत दूर हैं — जैसे कि उनके पूर्वज कौन थे, उनकी मान्यताएं, खान-पान और एक जगह से दूसरी जगह जाने के तरीके क्या थे. इसके बजाय, हर खुदाई इस रहस्य में एक और परत जोड़ देती है.

2,000 से ज़्यादा ज्ञात हड़प्पा स्थलों में लगभग 60 कब्रिस्तान अभी तक पता चल पाए हैं. विद्वानों का कहना है कि भारत में प्राचीन काल में दफनाए गए लोगों पर काफी स्टडी नहीं की गई है, जो मिस्र के अध्ययन के बिल्कुल उलट है. शवों के साथ क्या दफनाया गया था, कब्रिस्तान कहां स्थित थे, वे हड़प्पा समाज के पदानुक्रम के बारे में क्या संकेत देते हैं, और वे मरने के बाद के जीवन के बारे में क्या सोचते थे — ये सब अभी भी एक रहस्य बना हुआ है.

राखीगढ़ी में खुदाई का नेतृत्व करने वाले अनुभवी आर्कियोलॉजिस्ट वसंत शिंदे ने कहा, “पिछले सौ वर्षों में, आर्कियोलॉजिस्ट्स ने हड़प्पा बस्तियों का पता लगाने पर ज़्यादा ध्यान दिया. कब्रिस्तानों पर बहुत कम ध्यान दिया गया. लेकिन इन कब्रों से हमने जो कुछ भी सीखा है, उसने उनके जीवन के बारे में अद्भुत जानकारी दी है. हमें और भी कई कब्रिस्तानों का अध्ययन करने की ज़रूरत है.”

हरियाणा के विशाल हड़प्पा शहर, राखीगढ़ी में एक बार फिर ऐसा ही हुआ. हाल की खुदाई के दौरान आर्कियोलॉजिस्ट्स को शवों के साथ रखी गई तकरीबन 40 रस्मी चीज़ें (जैसे मिट्टी के बर्तन, गहने और मनके) मिलीं, जो इस जगह पर पहले मिली 22 चीज़ों की संख्या से कहीं ज़्यादा हैं.

Harappan skeleton unearthed during the recent excavation at Rakhigarhi, Haryana. The skeleton is surrounded by ceremonial offerings placed inside the grave | Photo by special arrangement
हरियाणा के राखीगढ़ी में हाल की खुदाई के दौरान मिला हड़प्पाकालीन कंकाल. कंकाल के चारों ओर कब्र के अंदर रखी रस्मी चीज़ें हैं | फोटो: विशेष व्यवस्था

महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा में आर्कियोलॉजिस्ट और प्राचीन इतिहास के प्रोफेसर रह चुके पी. अजितप्रसाद ने कहा, “मिट्टी के बर्तनों का होना या न होना और उनकी मात्रा को सामाजिक स्थिति के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है. शव के साथ दफनाई जाने वाली चीज़ों में मिट्टी के बर्तन सबसे आम थे.”

अब, डीएनए टेस्टिंग की वजह से हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी रिसर्च में नई तेज़ी आई है.

अजितप्रसाद के लिए, मिट्टी के बर्तन इस बात का भी सबूत हैं कि हड़प्पा सभ्यता में अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपराएं गहरी मान्यताओं पर आधारित थीं.

अजितप्रसाद ने कहा, “अगर ऐसी मान्यताएं न होतीं, तो कब्रों और उनमें रखी जाने वाली चीज़ों की एक जैसी विशेषताएं इतने बड़े हड़प्पा सांस्कृतिक इलाके में नहीं फैल पातीं. कुछ मुहरों पर दिखने वाली कहानी या दृश्य भी शायद इन्हीं मान्यताओं से जुड़े हो सकते हैं.”

मौत के बाद भी सहारा

पिछली सदी के ज़्यादातर समय में, आर्कियोलॉजिस्ट्स की दिलचस्पी हड़प्पा के शहरों को खोजने में ज़्यादा थी, न कि उनके कब्रिस्तान की जांच-पड़ताल करने में. नतीजतन, आज जो सबूत मौजूद हैं, वे इतने कम हैं कि यह पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता कि यह सभ्यता अपने मृतकों के साथ कैसा व्यवहार करती थी.

हड़प्पा की अंतिम संस्कार की परंपराओं के बारे में हमें जो कुछ भी पता है, वह आर्कियोलॉजिस्ट्स के एक छोटे से समूह के काम से पता चला है, जिसमें वसंत शिंदे, वीएन प्रभाकर, एमएस वत्स, एसआर राव, एसवी राजेश, वीणा मुशरीफ त्रिपाठी, पी अजितप्रसाद और सतरूपा बाल शामिल हैं. पाकिस्तान में, आर्कियोलॉजिस्ट मोहम्मद रफीक मुगल ने हड़प्पा के कब्रिस्तान के अध्ययन में अहम योगदान दिया, जबकि जोनाथन मार्क केनोयर और ग्वेन रॉबिंस शुग जैसे विद्वानों ने हड़प्पा की दफनाने की परंपराओं पर रिसर्च को और आगे बढ़ाया है.

इसके बावजूद, जिन कब्रिस्तानों की खुदाई की गई है, वे एक खास नतीजे की ओर इशारा करते हैं. दस लाख वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा इलाके में फैली इस सभ्यता में, हड़प्पा के लोग अपने मृतकों को एक जैसी परंपरा के साथ दफनाते थे, भले ही अलग-अलग इलाकों और समय के साथ स्थानीय रीति-रिवाजों में बदलाव आया हो.

Archaeologist Vasant Shinde's team excavates burials at Rakhigarhi, Haryana, during the 2013-16 excavation. Team members wore PPE to minimise DNA contamination | Photo by special arrangement
पुरातत्वविद वसंत शिंदे की टीम 2013-16 की खुदाई के दौरान हरियाणा के राखीगढ़ी में कब्रों की खुदाई कर रही है. डीएनए संदूषण को कम करने के लिए टीम के सदस्यों ने पीपीई पहना था | विशेष व्यवस्था

चाहे आज का हरियाणा हो, गुजरात हो या पंजाब, मृतकों को आमतौर पर लंबे आयताकार या अंडाकार गड्ढों में लिटाया जाता था, उनके शरीर को पीठ के बल और सिर को उत्तर की ओर रखा जाता था.

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) के पूर्व जॉइंट डायरेक्टर जनरल और गुजरात के धोलावीरा में खुदाई टीम के सदस्य डीएन डिमरी ने कहा, “यह परंपरा हड़प्पा सभ्यता के तीनों चरणों (शुरुआती, परिपक्व और बाद के) में बनी रही, जिससे पता चलता है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर रहने वाले समुदायों की मृतकों के सम्मान के तरीके के बारे में एक जैसी समझ थी.”

हड़प्पा के कब्रिस्तान में मोटे तौर पर तीन तरह की दफनाने की परंपराएं थीं—प्राथमिक, माध्यमिक और प्रतीकात्मक— हालांकि अंतिम संस्कार के तरीके अलग-अलग इलाकों और समय के साथ बदलते रहते थे. कालीबंगन में, अनुभवी आर्कियोलॉजिस्ट बीबी लाल ने दफनाने वाले बर्तनों के अंदर राख देखी, जिससे पता चलता है कि शवदाह (अंतिम संस्कार में शव को जलाना) की परंपरा भी रही होगी, हालांकि ऐसा लगता है कि यह बहुत कम होता था.

आर्कियोलॉजिस्ट वी.एन. प्रभाकर ने अपने पेपर ‘A Survey of Burial Practices in the Late/Post-Urban Harappan Phase during the Second and First Millennium BCE’ में लिखा है, “हड़प्पा काल में शवों को दफनाने के कई तरीके देखने को मिलते हैं. इनमें सबसे आम तरीका शव को पीठ के बल सीधा लिटाकर दफनाना था. कुछ शवों को मिट्टी की ईंटों या लकड़ी से बने अच्छी तरह से तैयार किए गए मकबरों में दफनाया गया था.”

Grave goods recovered from a burial at Rakhigarhi, Haryana. Archaeologist Vasant Shinde says the quantity and quality of grave goods may reflect the social status of the deceased | Photo by special arrangement
हरियाणा के राखीगढ़ी में एक कब्र से मिली चीज़ें। पुरातत्वविद् वसंत शिंदे का कहना है कि कब्र में मिली चीज़ों की मात्रा और गुणवत्ता से मरने वाले व्यक्ति के सामाजिक दर्जे का पता चल सकता है | विशेष व्यवस्था से ली गई तस्वीर
A pot burial with capstones exposed during excavations at Dhaneti, Gujarat. Remains of a stone circle surrounding the burial pit are visible in the background | Photo by special arrangement
गुजरात के धनेटी में खुदाई के दौरान मिला एक पॉट-बुरियल (मटके में दफन शव), जिसके ऊपर पत्थर की शिलाएं (कैपस्टोन) लगी थीं. बैकग्राउंड में दफन गड्ढे के चारों ओर पत्थर के घेरे के अवशेष दिखाई दे रहे हैं | फोटो: विशेष व्यवस्था

कब्रों के ज़रिए समाज को समझना

हड़प्पा काल की कब्रों में मौजूद अंतर भी उतनी ही अहम जानकारी देते हैं जितनी कि उनकी समानताएं.

कुछ कब्रों में मिट्टी के बर्तन बहुत कम संख्या में मिले. वहीं, राखीगढ़ी में हाल ही में खोजी गई कब्रों में दर्जनों बर्तन मिले. कई कब्रों में खाने-पीने की चीज़ें, गहने और सावधानी से रखे गए बर्तन और मटके मिले, जो आमतौर पर मृतक के सिर के पास रखे जाते थे. कुछ कब्रों में ईंटों या पत्थरों की लाइनिंग की गई थी, जिससे पता चलता है कि अंतिम विश्राम स्थल तैयार करने में काफी मेहनत की गई थी.

आर्कियोलॉजिस्ट्स के लिए, ये कोई आम चीज़ें नहीं थीं. ये भेंट या चढ़ावा थीं, जो शायद दूसरे जीवन के लिए रखी गई थीं.

लेकिन हड़प्पा काल के जीवन से जुड़ा एक बड़ा रहस्य सामाजिक पदानुक्रम और सत्ता का ढांचा था. ऐसा नहीं लगता कि हड़प्पा समाज में शाही परिवार या शासक हुआ करते थे. लेकिन कब्रिस्तान सामाजिक वर्ग की ओर इशारा करते हैं.

शिंदे ने कहा, “कब्र में रखी जाने वाली चीज़ों की मात्रा और गुणवत्ता हर कब्र में अलग-अलग होती है, और इससे मृतक की आर्थिक स्थिति का पता चल सकता है.”

लेकिन ‘अमीर’ कब्रों के भी सबूत मिलते हैं — जैसे बड़े गड्ढे जिनमें मिट्टी की ईंटों की अच्छी लाइनिंग हो, रोज़वुड (शीशम) से बने लकड़ी के ताबूत हों, या फिर मनके, जैस्पर, सोने के गहने और तांबे के आईने जैसी बहुत सारी चीज़ें रखी हों.

हालांकि, यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि ये कब्रें ज़्यादा ताकतवर लोगों की थीं या नहीं.

अशोका यूनिवर्सिटी में ‘सेंटर फॉर इंटरडिसिप्लिनरी आर्कियोलॉजिकल रिसर्च’ में असिस्टेंट प्रोफेसर कल्याण शेखर चक्रवर्ती ने कहा, “हालांकि ऐसी कब्रों में दफनाए गए लोगों को दफनाने की प्रक्रिया के दौरान निश्चित रूप से खास सम्मान मिला, लेकिन यह पता लगाना मुश्किल है कि क्या उन्हें अपने जीवनकाल में भी वैसा ही सामाजिक दर्जा हासिल था.”

हरियाणा के राखीगढ़ी में पेट के बल दफनाया गया एक हड़प्पाकालीन व्यक्ति, जिसके सिर और पैरों के पास मिट्टी के बर्तन रखे हुए हैं | फोटो: विशेष व्यवस्था

हड़प्पा के लोग शवों को कहां दफ़नाते थे?

कब्रें जितनी अहम हैं, उतनी ही जरूरी यह बात भी है कि हड़प्पा के लोगों ने उन्हें कहां बनाने का फैसला किया.

मध्य भारत और दक्कन की कई ताम्रपाषाण (chalcolithic) संस्कृतियों के विपरीत, जहां मृतकों को घरों के फर्श के नीचे दफनाया जाता था, हड़प्पा के लोग लगभग हमेशा अपने मृतकों को अपनी बस्तियों के बाहर दफनाते थे.

कब्रिस्तान आमतौर पर कुछ सौ मीटर दूर होते थे, हालांकि हरियाणा में पुथी सेमन जैसी जगहों पर, वे रिहायशी इलाकों से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित थे. धोलावीरा में, कब्रिस्तान प्राचीन शहर के पश्चिम में लगभग 200 मीटर दूर है, जबकि राखीगढ़ी में यह बस्ती से लगभग 500 मीटर दूर है.

चक्रवर्ती ने कहा, “इससे जीवित और मृतकों के बीच एक प्रतीकात्मक अलगाव या शायद समुदाय से मृतक के भौतिक और आध्यात्मिक अलगाव का संकेत मिल सकता है.”

इतिहासकार नयनजोत लाहिड़ी एक और संभावना बताती हैं. अपनी किताब ‘टाइम पीसेज़: ए व्हिसल-स्टॉप टूर थ्रू एंशिएंट इंडिया’ में, वह तर्क देती हैं कि हड़प्पा के लोग शायद शवों को अपवित्र और अस्वच्छ मानते थे, इसलिए वे उन्हें सम्मानपूर्वक लेकिन जल्दी से रहने की जगहों से हटा देते थे.

वह बताती हैं कि उनकी कब्रें अक्सर सावधानी से बनाई जाती थीं और कभी-कभी उनके साथ विस्तृत चढ़ावा भी रखा जाता था. हड़प्पा में, आर्कियोलॉजिस्ट्स को देवदार के ढक्कन वाला रोज़वुड (शीशम) का बना एक दुर्लभ लकड़ी का ताबूत भी मिला.

लाहिड़ी ने कहा, “जीवित रहने वाले इलाकों से शवों को अलग रखने पर काफी ज़ोर दिया जाता था.”

शिंदे के लिए, यह प्रथा आश्चर्यजनक रूप से जानी-पहचानी लगती है.

उन्होंने कहा, “आज भी, कब्रिस्तान रिहायशी इलाकों के बाहर स्थित होते हैं. कई मायनों में, कुछ हड़प्पा परंपराएं हमारे समाज में जारी हैं.” उन्होंने आगे कहा कि हड़प्पा के कंकालों के अध्ययन से पता चलता है कि उन्होंने साफ-सुथरे और स्वच्छ शहर बनाए थे.

हड़प्पा, पाकिस्तान में कब्रिस्तान H और वहां मौजूद मटकों में दफनाए गए शवों (पॉट बरियल्स) का सामान्य दृश्य | विशेष व्यवस्था
पाकिस्तान के हड़प्पा में कब्रिस्तान H में बच्चों के अवशेष वाले मटके में दफ़नाए गए शव | विशेष व्यवस्था

मोहनजोदड़ो, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘मृतकों का टीला’, एक अपवाद है. वहां अभी तक किसी कब्रिस्तान की पहचान नहीं हो पाई है, हालांकि शहर की सड़कों पर बिखरी हुई इंसानी हड्डियां मिली हैं.

क्षेत्रीय भू-दृश्य (लैंडस्केप) ने भी दफनाने की प्रथाओं पर अपनी छाप छोड़ी.

कालीबंगन और लोथल (गुजराती में ‘लोथल’ का अर्थ है ‘मृतकों का टीला’) में, कब्रों को मिट्टी की ईंटों से बनाया गया था. धोलावीरा में, जहां चूना-पत्थर आसानी से मिल जाता था, वहां कब्रों को पत्थर की सिल्लियों से घेरा गया था.

धोलावीरा में कई कब्रों में कोई कंकाल नहीं मिला, सिर्फ कब्र में रखी जाने वाली चीज़ें मिलीं.

डिमरी ने कहा, “ये कब्रें प्रतीकात्मक और यादगार थीं.”

डिमरी, आर.एस. बिष्ट की उस खुदाई टीम का हिस्सा थे, जिसने 1990 और 2005 के बीच कई चरणों में धोलावीरा में बड़े पैमाने पर खुदाई की थी.

डिमरी के लिए, एकरूपता और क्षेत्रीय अनुकूलन का यह मेल खुद उस सभ्यता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बताता है.

उन्होंने कहा, “हड़प्पा के लोग एक-दूसरे से अच्छी तरह जुड़े हुए थे. दफनाने की परंपरा में कोई अंतर नहीं है. जो चीज़ बदलती है, वह है स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री.”

Dishes, dish-on-stands, medium- and large-sized pots, cylindrical vases and beakers unearthed at Dhaneti, an Early Harappan burial site in Gujarat | Photo by special arrangement
गुजरात में शुरुआती हड़प्पा काल की दफनाने की जगह, धनेटी में मिलीं डिश, स्टैंड वाली डिश, मध्यम और बड़े आकार के बर्तन, बेलनाकार फूलदान और बीकर | विशेष व्यवस्था

हालांकि धोलावीरा में हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े कब्रिस्तान परिसरों में से एक है, फिर भी इसकी बहुत कम कब्रों की खुदाई की गई है.

कुछ खोजों ने आर्कियोलॉजिस्ट्स की धारणाओं को भी चुनौती दी है.

गुजरात में लोथल और संथाली, और हरियाणा में फरमाना और राखीगढ़ी जैसी जगहों पर दुर्लभ एक ही कब्र में दो लोगों को दफ़नाने के प्रमाण मिले हैं.

जब एस.आर. राव ने पहली बार लोथल में डबल बरियल की खुदाई की, तो कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि यह सती जैसी प्रथा हो सकती है.

अजितप्रसाद ने कहा, “कंकाल के अध्ययन से यह गलत साबित हुआ, जिसमें पुष्टि हुई कि दोनों पुरुष थे. डबल बरियल परिवार के सदस्यों की एक साथ मौत या महामारी के दौरान मौत के कारण हो सकते हैं.”

बाद में शिंदे की टीम ने फरमाना और राखीगढ़ी दोनों जगहों पर डबल बरियल के प्रमाण खोजे.

शिंदे ने कहा, “हम बस यह मान सकते हैं कि उनकी मौत एक ही समय पर हुई थी और यह एक पुरुष और महिला के बीच के रिश्ते की ओर इशारा कर सकता है.”

‘एक खास खोज’

हर हड़प्पाकालीन कंकाल इतिहास नहीं बदलता. लेकिन राखीगढ़ी से मिले एक कंकाल ने ऐसा किया.

इस साल मई में, जब ताहिर हुसैन की टीम और सिनौली के कुछ युवाओं ने राखीगढ़ी के टीले नंबर 7 — जो प्राचीन दृषद्वती नदी की पुरानी धारा के किनारे बना एक कब्रिस्तान था — से नाज़ुक कंकालों को सावधानी से निकाला, तो उन अवशेषों को पैक करके कोलकाता में ‘एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ भेजा गया. वहां, वैज्ञानिकों ने हड्डियों में छिपी कहानी को पढ़ने का मुश्किल काम शुरू किया.

केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने 22 जून को एक बयान में कहा, “राखीगढ़ी से मिले अवशेषों से दुनिया की सबसे शुरुआती शहरी सभ्यताओं में से एक की उत्पत्ति, स्वास्थ्य, लोगों की आवाजाही और जैविक इतिहास को समझने में काफी मदद मिलने की उम्मीद है.”

हरियाणा के राखीगढ़ी में टीला नंबर 7, यह कब्रिस्तान प्राचीन बस्ती से लगभग 500 मीटर दूर स्थित है | फोटो: विशेष व्यवस्था

इस मुकाम तक पहुंचने में कई दशक लग गए.

जब आर्कियोलॉजिस्ट अमरेंद्र नाथ ने पहली बार 1997 में राखीगढ़ी में खुदाई की, तो उन्हें कब्रिस्तान और रिहायशी इलाके, दोनों जगहों पर कंकाल मिले. लेकिन खुदाई सीमित थी, इसलिए कब्रिस्तान का ज़्यादातर हिस्सा बिना छुए ही रह गया.

यह स्थिति 2013 तक बनी रही, जब आर्कियोलॉजिस्ट वसंत शिंदे हड़प्पा दौर के पुरातत्व की सबसे बड़ी कमियों में से एक को दूर करने की उम्मीद के साथ उस जगह पर वापस लौटे. अगले तीन सालों में, उनकी टीम ने दर्जनों कब्रों का रिकॉर्ड बनाया और धीरे-धीरे यह समझा कि हड़प्पावासी अपने कब्रिस्तान कैसे बनाते थे और मृतकों के साथ कैसा व्यवहार करते थे.

इस बार, शिंदे ने एक ऐसी गलती न दोहराने का पक्का इरादा किया था जो उन्हें सालों से परेशान कर रही थी.

2006 में, हरियाणा के फरमाना में हड़प्पाकालीन कब्रिस्तान की खुदाई के दौरान — जो बस्ती वाले इलाके से 900 मीटर दूर था — उनकी टीम को लगभग 70 कब्रें मिलीं. सैंपल लेने से पहले कंकाल लगभग दो महीने तक खुले में पड़े रहे. तब तक, आधुनिक डीएनए के संपर्क में आने से अवशेष खराब हो चुके थे.

शिंदे ने याद करते हुए कहा, “यह एक बहुत बड़ी विफलता थी.”

राखीगढ़ी का मामला अलग होने वाला था.

खुदाई करने वाली टीम के सदस्यों ने दस्ताने, मास्क, गाउन और कैप पहनकर काम किया, जबकि ऊपर से जगह का नक्शा बनाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया.

Members of archaeologist Vasant Shinde's team wear protective clothing to minimise contamination during the Rakhigarhi excavation | Photo by special arrangement
वसंत शिंदे की टीम के सदस्य राखीगढ़ी में खुदाई के दौरान गंदगी या संक्रमण को कम करने के लिए सुरक्षात्मक कपड़े पहने हुए हैं | फोटो: विशेष व्यवस्था

शिंदे ने कहा, “इससे पता चलता है कि डीएनए कितना संवेदनशील होता है और अतीत का पता लगाने का काम कितना नाजुक है.”

सावधानी बरतने का फायदा हुआ.

शिंदे ने 62 कब्रों की खुदाई की. 61 कब्रों से कोई काम का डीएनए नहीं मिला. सिर्फ एक से मिला.

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह मेरी किस्मत थी.”

वह कंकाल — एक महिला का, जिसे मिट्टी के बर्तनों के साथ दफनाया गया था — आगे चलकर भारतीय पुरातत्व में वैज्ञानिक रूप से सबसे अहम खोजों में से एक बन गया.

उसके डीएनए का विश्लेषण हैदराबाद में सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, एक कोरियाई प्रयोगशाला और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की प्राचीन डीएनए सुविधा केंद्र द्वारा किया गया था. इसके नतीजे 2019 में ‘सेल‘ (Cell) पत्रिका में प्रकाशित हुए थे.

शिंदे ने दिप्रिंट को बताया, “हमें पता चला कि हड़प्पा के लोग आज के दक्षिण एशियाई लोगों के पूर्वज थे और उनकी जड़ें लगभग 12,000 साल पुरानी हैं. हमें यह सब एक कंकाल से पता चला.”

इस अध्ययन ने लंबे समय से चली आ रही ‘आर्य आक्रमण’ की परिकल्पना को भी चुनौती दी, क्योंकि उस हड़प्पा-युग के जीनोम में स्टेपी (Steppe) क्षेत्र के लोगों के वंश का कोई निशान नहीं मिला.

शिंदे ने कहा, “हड़प्पा सभ्यता का विकास स्थानीय लोगों ने किया था. ज़्यादातर दक्षिण एशियाई लोग हड़प्पा के लोगों के वंशज हैं. पुरातत्व और आनुवंशिक (जेनेटिक) सबूत आज तक निरंतरता दिखाते हैं और न तो स्टेपी के चरवाहों और न ही ईरानी किसानों ने दक्षिण एशियाई वंश के विकास में कोई योगदान दिया.”

फिर भी आज भी, भारत में ऐसी खोजों को सुरक्षित रखने के लिए कोई खास सुविधा नहीं है.

देश भर में बड़ी संख्या में कंकाल मिलने के बावजूद, ASI के पास प्राचीन मानव अवशेषों को रखने के लिए कोई विशेष भंडार नहीं है. कुछ कंकाल एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया या बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज को भेज दिए जाते हैं, जबकि बाकी एएसआई के क्षेत्रीय कार्यालयों में पड़े रहते हैं.

ASI के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक रामनाथ फोनिया ने कहा, “सभी कंकाल इन संस्थानों को नहीं भेजे जाते हैं. ASI के पास डीएनए कंटैमिनेशन (गंदगी या बाहरी चीज़ों के असर) के बिना इन्हें रखने के लिए कोई विशेष बजट या सुविधा नहीं है.”

हड़प्पा के लोगों की मान्यताएं

राखीगढ़ी में मिली एक अनोखी चीज़ ने आर्कियोलॉजिस्ट्स को हड़प्पा समाज के बारे में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है.

भारत के राखीगढ़ी में हड़प्पा कब्रिस्तान पर पुरातात्विक और मानव-विज्ञान संबंधी अध्ययन‘ नाम के एक पेपर में वसंत शिंदे ने बताया कि ईंटों से बनी कब्रें, जिन्हें पारंपरिक रूप से महत्वपूर्ण पुरुषों की कब्रें माना जाता था, असल में 21 से 35 साल की युवा महिलाओं की थीं.

शिंदे ने लिखा, “अगर हम इस परिकल्पना को स्वीकार करते हैं कि ईंटों से बनी कब्रों में दफनाए गए लोग वास्तव में राखीगढ़ी समाज के प्रभावशाली समूह से थे, तो हमें उस समय की कुछ हड़प्पा महिलाओं की सामाजिक भूमिका पर फिर से विचार करना होगा.”

हालांकि, रिसर्चर्स का कहना है कि यह साबित नहीं किया जा सकता है कि उस दौर में महिलाओं का सामाजिक दर्जा ऊंचा था.

पुणे के डेक्कन कॉलेज में हड़प्पा की अंतिम संस्कार प्रथाओं पर डॉक्टरेट शोध करने वालीं असिस्टेंट सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट सतरूपा बल ने कहा, “हमारे पास हड़प्पा के लोगों का कोई लिखित प्रमाण नहीं है. हम केवल परिकल्पना के आधार पर महिलाओं के बारे में कुछ कह सकते हैं. किसी भी तरह का अनुमान लगाना गलत है. डेटा से हमें जो मिलता है वह महत्वपूर्ण है, और हमारे पास बहुत कम डेटा है.”

Skeletal remains from Rakhigarhi undergo CT scanning as part of scientific analysis | Photo by special arrangement
वैज्ञानिक विश्लेषण के हिस्से के तौर पर राखीगढ़ी से मिले कंकालों की सीटी स्कैनिंग की जा रही है | फोटो: विशेष व्यवस्था

राखीगढ़ी से एक और अप्रत्याशित खोज भी सामने आई.

अब तक, भारतीय उपमहाद्वीप में पेट के बल (prone-position) दफनाने के लगभग 600 मामलों का दस्तावेजीकरण किया गया है. इनमें से ज़्यादातर मामले पुरुषों के हैं और कब्रों में बहुत कम सामान मिला है.

दुनिया भर में, पेट के बल दफनाने की प्रथा — जिसमें व्यक्ति को मुंह नीचे करके दफनाया जाता है — अक्सर ऐसे लोगों से जुड़ी रही है जिन्हें समाज से बहिष्कृत माना जाता था.

पब्लिक हिस्टोरियन एरिक चोपड़ा के अनुसार, ऐसी दफन प्रथाएं खतरनाक माने जाने वाले लोगों से जुड़ी रही हैं, जिनमें चुड़ैलें, वैम्पायर या ऐसे अन्य लोग शामिल हैं जिनके बारे में माना जाता था कि वे मरने के बाद वापस आ सकते हैं.

शिंदे की टीम को मुंह नीचे करके दफनाए गए ऐसे शव मिले जिनके साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी के बर्तन थे. इनमें से कई महिलाएं थीं.

शिंदे ने लिखा, “राखीगढ़ी कब्रिस्तान में, पेट के बल दफनाई गई कब्रों में जो बात खास है, वह यह है कि ऐसा नहीं लगता कि ये लोग समाज के नियमों को तोड़ने वाले रहे होंगे.”

उन्होंने सुझाव दिया कि वे असल में समाज के उच्च वर्गों से संबंधित हो सकते हैं. हड़प्पा के लोगों और उस समय की दूसरी कांस्य-युगीन सभ्यताओं के बीच सबसे बड़ा फर्क यह नहीं था कि वे मौत के बारे में सोचते थे या नहीं, बल्कि यह था कि वे उस चिंता को कैसे ज़ाहिर करते थे.

चोपड़ा ने कहा, “मेसोपोटामिया या मिस्र में, रईस लोगों की कब्रें दौलत, राजनीतिक ताकत और धार्मिक विश्वास का ज़बरदस्त प्रदर्शन होती थीं. ऊर (Ur) के शाही मकबरों में भारी मात्रा में सोना, कीमती पत्थर, शानदार गहने, संगीत के वाद्ययंत्र और यहां तक कि बलि के लिए रखे गए लोग भी मिलते थे.”

इसके उलट, हड़प्पा की कब्रों में कीमती चीज़ें बहुत कम मिलती हैं, जबकि इस सभ्यता के पास कीमती सामान की कोई कमी नहीं थी.

शिंदे का कहना है कि इससे एक अलग तरह के समाज का पता चलता है.

उन्होंने कहा, “हड़प्पा का समाज ज़्यादा लोकतांत्रिक था. वहां उस समय के मेसोपोटामिया और मिस्र जैसा राजशाही सिस्टम नहीं था, जहां समाज पर राजा का शासन होता था. हड़प्पा के कब्रिस्तान में हमें समाज के हर तबके के लोगों के सबूत मिले हैं.”

यह फर्क अप्रैल की एक शाम को साफ हो गया, जब नेशनल म्यूज़ियम ने पहली बार रात में अपने दरवाज़े खोले.

विज़िटर्स को हड़प्पा गैलरी में ले जाते हुए, चोपड़ा मोहनजोदड़ो की मशहूर डांसिंग गर्ल के सामने रुके और उसे सभ्यता की ‘दीवा’ (खास कलाकार) बताया. वह कुछ कदम और आगे बढ़े और एक कहीं ज़्यादा शांत प्रदर्शनी — राखीगढ़ी से मिली एक महिला के कंकाल के सामने रुके.

कांस्य की मूर्ति के उलट, इस प्रदर्शनी में कोई चकाचौंध नहीं थी. बस सवाल थे.

Public historian Eric Chopra (left) speaks about a woman's burial from Rakhigarhi during a museum walk | Photo: Krishan Murari/ThePrint
म्यूज़ियम वॉक के दौरान पब्लिक हिस्टोरियन एरिक चोपड़ा (बाएं) राखीगढ़ी से मिली एक महिला की कब्र के बारे में बात कर रहे हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

1997 में राखीगढ़ी की पहली खुदाई के दौरान मिले कंकाल को बाद में नेशनल म्यूज़ियम में भेज दिया गया था. यह एएसआई की उस पॉलिसी के तहत किया गया था जिसके तहत उनकी सबसे अहम खोजों को नेशनल कलेक्शन में शामिल किया जाता है.

कंकाल के सामने खड़े होकर, चोपड़ा ने विज़िटर्स की ओर देखा.

उन्होंने पूछा कि हड़प्पा के लोग किसी महिला को मिट्टी के बर्तनों और गहनों के साथ क्यों दफनाते थे?

ग्रुप में से किसी ने जवाब दिया, “मान्यता.” चोपड़ा ने सिर हिलाया.

चोपड़ा ने दिप्रिंट को बताया, “जैसे आज के समाज में मौत के बाद क्या होता है, इसे लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं, वैसे ही हड़प्पा के लोगों के बारे में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है. हो सकता है कि कुछ लोग मरने के बाद की ज़िंदगी में यकीन रखते हों, जबकि कुछ न रखते हों. कब्र में सामान का मिलना पक्का इस बात की ओर इशारा करता है कि कम से कम कुछ लोग यह मानते थे कि मरने वालों को मौत के बाद भी चीज़ों की ज़रूरत होती है – चाहे वह प्रैक्टिकल इस्तेमाल के लिए हो, रस्मों के लिए हो या ज़िंदगी के जारी रहने के एहसास के लिए.”

यह पुरातत्व विज्ञान के सबसे पुराने सवालों में से एक है: पुराने समाज मरे हुए लोगों को उन चीज़ों के साथ क्यों दफनाते थे जिनका वे अब इस्तेमाल नहीं कर सकते?

इतिहासकार नयनजोत लाहिड़ी के मुताबिक, यह मानने की इच्छा कि मरने वाले किसी न किसी रूप में बने रहते हैं, लगभग सभी पुरानी सभ्यताओं में आम रही है – चाहे वह मिस्र और सुमेरियन सभ्यता हो या स्कैंडिनेवियाई और एशियाई सभ्यता.

चोपड़ा मेसोपोटामिया का ज़िक्र करते हैं, जहां मरने वालों के साथ शांति बनाए रखने के लिए भेंट चढ़ाई जाती थी क्योंकि लोगों का मानना था कि आत्माएं जीवित लोगों को परेशान कर सकती हैं.

शिंदे का तर्क था कि भूतों में यह विश्वास शायद उन वजहों में से एक हो सकता है जिनकी वजह से हड़प्पा के लोगों ने रिहायशी इलाकों के बाहर कब्रिस्तान बनाए थे.

म्यूज़ियम गैलरी में वापस आकर, चोपड़ा ने एक और चीज़ की ओर ध्यान दिलाया — चार हज़ार साल से ज़्यादा समय बीतने के बाद भी कंकाल की बाहों में दो चूड़ियां मौजूद थीं.

इस महिला को अक्सर “मृत दुल्हन” कहा जाता है. चोपड़ा को यह नाम पसंद नहीं है.

उन्होंने कहा, “गहनों को शादी से जोड़ना हमारे समय की सोच को उन पर थोपने जैसा है. किसी महिला की पहचान को सिर्फ एक शादीशुदा दुल्हन तक सीमित कर देना और उसे उसी रूप में याद करना असल में उसकी पहचान को बहुत कम करके आंकना है.”

हालांकि, आर्कियोलॉजिस्ट्स के लिए इससे मिलने वाला सबसे बड़ा सबक विनम्रता का है.

सतरूपा बाल ने कहा, “खुदाई में मिली कब्रों से इस सभ्यता के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल पाई. अगर हम कब्रों, रहने की जगहों और उस लिपि से मिले सबूतों को एक साथ देखें – जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है – तो हम हड़प्पा के लोगों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं.”

तब तक, हड़प्पा काल का हर कंकाल नए सवाल खड़े कर रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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