मुझे उम्मीद है कि जब तक आप यह कॉलम पढ़ेंगे, तब तक सोनम वांगचुक अपना अनशन खत्म कर चुके होंगे. वे इतने अच्छे इंसान हैं कि हम उन्हें खोना नहीं चाहेंगे.
लेकिन अगर आप सोनम वांगचुक और जिस आंदोलन का वे हिस्सा हैं, उससे जुड़ी सोशल मीडिया टिप्पणियां देखें, तो आपको दो बातें नजर आएंगी.
पहली, लोग वांगचुक के मुद्दों पर बात करने से ज्यादा इस बात को लेकर चिंतित दिख रहे हैं कि अनशन की वजह से उनकी सेहत और खराब न हो. लोगों का वांगचुक के प्रति सम्मान देखते हुए उनकी चिंता समझी जा सकती है. लेकिन मुझे लगता है कि अगर उनके स्वास्थ्य के बजाय उनके मुद्दे सुर्खियों में होते, तो शायद उन्हें ज्यादा खुशी होती.
दूसरी, प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों की एक बड़ी मांग यह है कि राहुल गांधी उनके समर्थन में बोलें और शायद वांगचुक से मिलने भी जाएं. हो सकता है राहुल गांधी कोई बयान दें या प्रदर्शनकारियों से मिलने जाएं. या फिर सरकार भी कोई कदम उठाए ताकि वांगचुक अपना अनशन खत्म कर दें.
फिर भी, घटनाओं का यह मोड़ मुझे थोड़ा अजीब लगता है. जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) पहली बार सोशल मीडिया पर सामने आई, तो उसे मिली प्रतिक्रिया दुनिया भर में खबर बन गई. उस समय आम धारणा यह थी कि भारत में कुछ बड़ा हो रहा है. मुख्य विपक्ष सरकार का प्रभावी तरीके से विरोध करने में नाकाम रहा था, इसलिए युवाओं ने खुद ही एक आंदोलन खड़ा हो गया. माना गया कि यह आंदोलन लगातार मजबूत होगा.
शायद. लेकिन हकीकत यह है कि इस आंदोलन के समर्थक उसी मुख्य विपक्ष से समर्थन पाने पर ज्यादा ध्यान देते दिख रहे हैं, जिसका विकल्प बनने की बात वे कर रहे थे.
अगर भारत को CJP की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जवाबदेह ठहराने में नाकाम रहे, तो फिर CJP को खुद राहुल गांधी की जरूरत क्यों है?
जहां तक मुझे याद है, प्रदर्शनकारियों की एक प्रमुख मांग यह भी थी कि भारतीय परीक्षा प्रणाली में फैली अव्यवस्था के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें. लेकिन अब प्रदर्शनकारी धर्मेंद्र प्रधान के बजाय राहुल गांधी की गैरमौजूदगी की ज्यादा चर्चा कर रहे हैं. जबकि धर्मेंद्र प्रधान अब भी अपने पद पर बने हुए हैं. परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग का क्या हुआ?
शायद इस शुरुआती दौर में CJP और उसके नेताओं का आकलन करना जल्दबाजी होगी. हो सकता है उनके पास इतने बड़े आंदोलन को चलाने के लिए जरूरी अनुभव अभी न हो. यह भी संभव है कि समय के साथ वे इसमें बेहतर हो जाएं. लेकिन यह मानने से कौन इनकार कर सकता है कि कुछ तो गड़बड़ है, जब भारत के युवाओं की निराशा को आवाज देने वाला आंदोलन अपना सबसे बड़ा उद्देश्य विपक्ष के नेता को बुलाकर वांगचुक का अनशन खत्म करवाना मानने लगे? सरकार का विरोध करने की बात का क्या हुआ?
अन्ना आंदोलन क्यों सफल हुआ
हममें से कई लोग इसलिए हैरान हैं क्योंकि हमें लगा था कि यह आंदोलन भी इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान जैसा असर डालेगा. उस आंदोलन का चेहरा भले ही अन्ना हजारे थे, लेकिन असल रणनीति अरविंद केजरीवाल बना रहे थे. वे अन्ना हजारे की आवाज बनकर सामने आए और उसी आंदोलन को आगे चलकर अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने की सीढ़ी बना लिया.
BJP शायद कभी खुलकर यह बात न माने, लेकिन तथाकथित अन्ना आंदोलन और अरविंद केजरीवाल की रणनीति के बिना नरेंद्र मोदी उसके बाद हुए आम चुनावों में इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाते. केजरीवाल और उनके साथियों ने ही UPA-2 सरकार की छवि को खत्म किया और लोगों के बीच पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ऐसी तस्वीर बनाई कि वे घोटालों से घिरी सरकार के कमजोर नेता माने जाने लगे.
लेकिन अब समय बदल चुका है. अन्ना आंदोलन कई कारणों से सफल हुआ था. घोटालों के आरोप इसलिए असरदार लगे क्योंकि वे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के आधार पर सामने आए थे. लोगों को लगता था कि CAG के पास सरकार की जांच के लिए जरूरी सभी आंकड़े होते हैं. इसी भरोसे की वजह से ‘अनुमानित नुकसान’ जैसी कई बातों को भी सच मान लिया गया.
बाद में जिन कथित घोटालों की चर्चा हुई, जैसे 2G घोटाला और कोयला घोटाला, उनमें से कई या तो साबित नहीं हुए या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए थे. यहां तक कि BJP सरकार के वकील भी अदालत में इन आरोपों को साबित नहीं कर पाए. इसके बावजूद इन्हीं कथित घोटालों ने UPA सरकार की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया.
अन्ना आंदोलन को उस समय यह फायदा भी मिला कि वह टीवी न्यूज़ चैनलों और तेज-तर्रार बहसों का दौर था. जैसे-जैसे हर नया ‘घोटाला’ सामने आता, टीवी चैनलों पर भारी हंगामा मच जाता. अन्ना आंदोलन से जुड़े कई ऐसे लोग, जिन्हें पहले कोई नहीं जानता था और जो बाद में BJP में शामिल हो गए या उसका समर्थन करने लगे, टीवी पर आकर UPA सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते थे. प्रशांत भूषण को उस समय कानूनी और संवैधानिक मामलों का सबसे बड़ा जानकार माना जाने लगा.
मोदी मनमोहन सिंह की गलतियां नहीं दोहराएंगे
जब विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे, तब UPA सरकार पहले से ही मुश्किलों में थी. सोनिया गांधी बीमार थीं और इलाज के लिए लंबे समय तक विदेश में रहती थीं. मनमोहन सिंह राजनीतिक प्रबंधन में ज्यादा कुशल नहीं थे और जल्द ही अपने मंत्रिमंडल पर उनका नियंत्रण कमजोर पड़ गया. उनकी सरकार में कोई भी सोशल मीडिया को ठीक से नहीं समझता था. जब वे संगठित तरीके से होने वाले हमलों का निशाना बने, तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन बढ़ते गए, उन पर लगे आरोपों से वे इतने परेशान हो गए कि उन्होंने लगभग चुप्पी साध ली और नेतृत्व भी खुलकर नहीं दिखाया.
इन परिस्थितियों को देखते हुए यह पूरी तरह हैरानी की बात नहीं थी कि अन्ना आंदोलन ने UPA सरकार को कमजोर कर दिया और देश में मजबूत और साफ दिखने वाले नेतृत्व की मांग बढ़ी. यह भूमिका नरेंद्र मोदी ने निभाई.
इन हालात को याद रखना इसलिए जरूरी है ताकि समझा जा सके कि मौजूदा दौर के विरोध प्रदर्शन अन्ना आंदोलन जैसा असर क्यों नहीं डाल पा रहे हैं?
पहली बात, इस आंदोलन के आयोजकों में किसी के पास भी अरविंद केजरीवाल जैसी रणनीतिक समझ और राजनीतिक चतुराई नहीं दिखती. केजरीवाल ने पूरे आंदोलन को सिर्फ एक मुद्दे, भ्रष्टाचार, पर केंद्रित रखा. वे हर दिन उसी मुद्दे को लगातार उठाते रहे. जब उनके पास अपने दावों के समर्थन में तथ्य होते थे, तब भी वे उन्हें तोड़-मरोड़कर और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते थे. और जब तथ्य नहीं होते थे, तब भी वे उन्हें गढ़ लेते थे.
दूसरी बात, आज यह सोचना भी मुश्किल लगता है कि CAG जैसा कोई संवैधानिक अधिकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस सरकार में ऐसा CAG शायद पांच मिनट भी अपने पद पर न टिक पाए. (उपराष्ट्रपति को जिस तेजी से हटाया गया, उसे ही देख लीजिए.)
तीसरी बात, टीवी चैनलों के जो आक्रामक एंकर पहले सरकारों पर जमकर हमला बोलते थे, वे मौजूदा सरकार के प्रदर्शन पर चर्चा करते समय अब बेहद नरम नजर आते हैं. वैसे भी अब पहले की तुलना में कम लोग टीवी न्यूज़ देखते हैं.
चौथी बात, सोशल मीडिया पर CJP को शुरुआत में भले ही सफलता मिली हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि BJP ने सोशल मीडिया पर जिस तरह पकड़ बनाई है, वैसी दुनिया की बहुत कम राजनीतिक पार्टियां बना पाई हैं.
और आखिर में सबसे बड़ा फर्क. केजरीवाल और उनके साथियों ने मनमोहन सिंह को उस समय निशाना बनाया, जब वे पहले से कमजोर पड़ चुके थे. इसके उलट नरेंद्र मोदी आज भी इतने मजबूत हैं कि वे अब भी भारत के सबसे लोकप्रिय नेता हैं. यहां तक कि जो लोग उन्हें पसंद नहीं करते, वे भी उनसे डरते हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी आंखों से देखा है कि अन्ना आंदोलन पर UPA-2 पर क्या असर पड़ा था. आखिर उस आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा उन्हें ही मिला था. इसलिए वे मनमोहन सिंह जैसी गलतियां दोहराने वाले नहीं हैं. उनका मानना है कि प्रदर्शनकारियों या मीडिया के दबाव में झुकना उन्हें कमजोर दिखाता है. वे आमतौर पर उन लोगों की मांगें नहीं मानते, जिन्हें वे अपने विरोधी मानते हैं. (कृषि कानूनों को वापस लेना इसका एक दुर्लभ अपवाद था.)
इन सभी कारणों से मोदी के दौर में किसी भी विरोध आंदोलन के लिए उतना आसान नहीं होगा, जितना UPA-2 के समय अन्ना आंदोलन के लिए था. उसके लिए अपना संदेश लोगों तक पहुंचाना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि मीडिया उसके विरोध और मांगों को ज्यादा महत्व नहीं देगा. साथ ही, कई प्रमुख लोग भी खुलकर उसका समर्थन करने से बचेंगे.
इसका मतलब यह नहीं है कि CJP का भविष्य खत्म हो गया है. ज्यादातर जन आंदोलन लोगों का भरोसा और समर्थन हासिल करने में समय लेते हैं. यह आंदोलन भी अभी शुरुआत में है. समय के साथ यह अपनी शुरुआती गलतियों से सीख सकता है और जैसे-जैसे सत्ता विरोधी माहौल बढ़ेगा, वैसे-वैसे बदलते जनमत को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना भी सीख सकता है.
लेकिन हमें यह गलती नहीं करनी चाहिए कि इसे दूसरा इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन मान लें. वह एक अलग दौर था. और यह एक बिल्कुल अलग प्रधानमंत्री का दौर है.
वीर सांघवी प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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