नई दिल्ली: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर में बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर (B.Arch) की पढ़ाई कर रहे एक स्टूडेंट ने मेडिकल बेसिस पर ट्रांसफर के लिए करीब एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इस मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने आईआईटी रुड़की से कहा कि जब तक इस याचिका पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक एक सीट खाली रखी जाए.
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने एम्स दिल्ली को भी स्टूडेंट की मेडिकल जांच करने का निर्देश दिया. दरअसल, स्टूडेंट बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से पीड़ित हैं और उनका इलाज चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) में चल रहा है.
स्टूडेंट ने पहले एम्स दिल्ली में इलाज जारी रखने के लिए आईआईटी दिल्ली में ट्रांसफर की मांग की थी, लेकिन जब उन्हें बताया गया कि आईआईटी दिल्ली में यह कोर्स 4 साल का है, जबकि आईआईटीखड़गपुर में 5 साल का है, तो उन्होंने कोर्ट से आईआईटी रुड़की में ट्रांसफर की मांग की. उन्होंने कहा कि आईआईटी रुड़की, एम्स ऋषिकेश के पास है, जहां वह थेरेपी ले सकते हैं.
जब कोर्ट को बताया गया कि आईआईटी खड़गपुर को स्टूडेंट के ट्रांसफर पर कोई आपत्ति नहीं है, तब कोर्ट ने एम्स को मेडिकल जांच करने का निर्देश दिया. ट्रांसफर पॉलिसी के तहत असेसमेंट ज़रूरी है.
याचिका
सुप्रीम कोर्ट में स्टूडेंट की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया कि मौजूदा ट्रांसफर पॉलिसी स्टूडेंट की मांग का समर्थन करती है, लेकिन मेडिकल जांच कराए बिना ही आईआईटी खड़गपुर ने 6 अगस्त 2025 को उनका ट्रांसफर आवेदन खारिज कर दिया था. इसके बाद स्टूडेंट ने कोर्ट में गुहार लगाई.
याचिका में स्टूडेंट ने कहा कि 2019 में PGIMER चंडीगढ़ में उन्हें डिप्रेशन और एंग्जायटी की बीमारी का पता चला था. इसके बाद उन्होंने एम्स दिल्ली में स्पेशल थेरेपी ली और उनकी हालत में काफी सुधार हुआ.
लेकिन 2023 में आईआईटी खड़गपुर में दाखिला मिलने के बाद उनकी परेशानी फिर बढ़ गई. परिवार से दूर रहना और नई जगह का माहौल उनके डिप्रेशन को और गंभीर बना गया.
आईआईटी के ट्रांसफर रूल मेडिकल बेसिस पर एक आईआईटी से दूसरी आईआईटी में अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट्स के ट्रांसफर की अनुमति देते हैं. इसी वजह से स्टूडेंट के पैरेंट्स ने आईआईटी दिल्ली से संपर्क किया. वहां के निदेशक ने कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दी, जिसके बाद परिवार ने आईआईटी खड़गपुर से बात की.
लेकिन शुरुआती भरोसा देने के बावजूद आईआईटी खड़गपुर ने कई कारण बताते हुए ट्रांसफर की मांग ठुकरा दी. इनमें जेईई में कम रैंक, कोर्स में अंतर, B.Arch और B.Tech के दाखिला प्रक्रिया में समानता न होना और आर्किटेक्चर के स्टूडेंट्स पर ट्रांसफर रूल लागू न होना शामिल था.
आईआईटी दिल्ली में ट्रांसफर की मांग करते हुए स्टूडेंट ने कहा था कि वहां से एम्स दिल्ली पास है, जहां उनका इलाज हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि आईआईटी खड़गपुर में उनके लिए समस्या यह थी कि उनकी बीमारी की थेरेपी के लिए सबसे नज़दीकी अस्पताल कोलकाता में था, जो कि एक प्राइवेट हॉस्पिटल था और उसका खर्च उठाना उनके परिवार के लिए संभव नहीं था.
पिछले साल अक्टूबर में जब सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी, तब आईआईटी खड़गपुर के निदेशक ने स्टूडेंट के परिवार से ट्रांसफर की संभावना पर बात की, लेकिन कोर्स के ढांचे में अंतर होने की वजह से आईआईटी दिल्ली का विकल्प छोड़ दिया गया. इसके बाद आईआईटी रुड़की का नाम तय हुआ और वहां से जवाब मांगा गया.
शोभा गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया कि आईआईटी रुड़की ने ट्रांसफर को लेकर कुछ आपत्तियां उठाई थीं. सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि स्टूडेंट आईआईटी खड़गपुर में दो साल की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं.
उन्होंने कहा, “लेकिन यह गलतफहमी थी. उन्होंने अभी तक सिर्फ एक साल की पढ़ाई पूरी की है. कोर्ट में मामला चलने की वजह से वह दूसरे साल की पढ़ाई नहीं कर पाए. ज़रूरत पड़ी तो वह पहले साल से दोबारा पढ़ाई शुरू करने के लिए भी तैयार हैं.”
कोर्ट ने क्या कहा
बुधवार की सुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने आईआईटी खड़गपुर के वकील की सुनवाई टालने की रिक्वेस्ट को सीरियसली लिया. उन्होंने देखा कि इंस्टीट्यूशन के वकील ने अपनी पेशी के लिए ऑफिशियल डॉक्यूमेंट फाइल नहीं किया था.
जज ने कहा, “आपको अपना वकालतनामा फाइल करने में कितना समय लगता है? यह क्या है? आप एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन हैं. आप पहली बार पेश हो रहे हैं और आप सुनवाई टालने की मांग कर रहे हैं.”
हालांकि, वकील ने ट्रांसफर पर एतराज़ जताया और आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी रुड़की के बीच करिकुलम और कोर्स पैरिटी में अंतर की ओर इशारा किया, लेकिन बाद में उन्होंने बेंच को बताया कि प्रिंसिपल तौर पर, इंस्टीट्यूशन को कोई एतराज़ नहीं है.
इस समय, कोर्ट को यह भी बताया गया कि आईआईटी रुड़की में एडमिशन की आखिरी तारीख 17 जुलाई थी, जिस पर बेंच ने तुरंत इंस्टीट्यूशन को एक सीट खाली रखने का ऑर्डर दिया.
कोर्ट ने स्टूडेंट को 20 जुलाई को एम्स बोर्ड के सामने पेश होने को कहा और मामले की दोबारा सुनवाई के लिए 29 जुलाई की तारीख तय की. कोर्ट ने यह भी देखा कि स्टूडेंट ने आईआईटी दिल्ली के बजाय आईआईटी रुड़की में ट्रांसफर के लिए रिक्वेस्ट की थी, जहां कोर्स का करिकुलम आईआईटी खड़गपुर के करिकुलम से अलग है.
जब आईआईटी खड़गपुर के वकील ने कहा कि स्टूडेंट के एंट्रेंस मार्क्स आईआईटी रुड़की के लिए तय लिमिट से कम थे, तो बेंच ने पलटकर कहा कि ट्रांसफर के लिए मार्क्स ज़रूरी नहीं हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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