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Thursday, 16 July, 2026
होममत-विमतराम मंदिर घोटाले में संघ परिवार आरोपी होने के बावजूद पुलिस, वकील और जज की भूमिका निभा रहा है

राम मंदिर घोटाले में संघ परिवार आरोपी होने के बावजूद पुलिस, वकील और जज की भूमिका निभा रहा है

यह घटना भ्रष्टाचार से ज़्यादा RSS-BJP की अक्षमता को दिखाती है: यह एक बेहद अहम संस्थान को संभालने में नाकाम साबित हुई.

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आखिरकार, अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े सबसे वरिष्ठ लोगों में से एक नृपेंद्र मिश्रा ने इस चोरी पर बयान दिया और इसे कलंक बताया. लेकिन मंदिर प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल रहे लोग अब भी इस मामले को स्वीकार करने के बजाय इनकार की मुद्रा में हैं. राम मंदिर ट्रस्ट पर पूरा नियंत्रण रखने वाले संघ परिवार के नेताओं का रवैया यही दिखाता है. करीब एक महीने तक चुप रहने के बाद उन्होंने इस तरह बयान दिया, जैसे उनकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं हो. RSS के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने घटना की निंदा तो की, लेकिन साथ ही कहा कि “हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी ताकतें इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का इस्तेमाल हिंदू धर्म और समाज को बदनाम करने के लिए कर रही हैं.”

मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा की बात संघ नेतृत्व के रुख से अलग है. लेकिन मिश्रा की राय से आम लोग काफी हद तक सहमत हैं.

संघ नेतृत्व अपने लोगों को दोष से बचाने के लिए ज्यादा चिंतित दिख रहा है. नाकामी के बाद भी जिदपूर्वक इस से इनकार करना उनके लिए बड़ी गलती साबित हो सकता है.

वे एक सीधी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. देशभर से हर दिन हजारों हिंदू अयोध्या आते हैं. राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े RSS पदाधिकारियों के कामकाज और उनकी अक्षमता की खबर भारत और विदेशों में हर हिंदू परिवार तक पहुंचेगी.

उनकी अक्षमता कई स्तरों पर दिखती है. पहली बात, उनके रहते इतनी बड़ी चोरी होती रही. इससे पता चलता है कि वे सिर्फ मंदिर चलाने में ही नहीं, बल्कि उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण शासन चलाने में भी अयोग्य हैं. संघ चपंत राय की व्यक्तिगत ईमानदारी की बात करता है, लेकिन सिर्फ ईमानदारी अक्षमता की भरपाई नहीं कर सकती. शासन में समाज की सुरक्षा, न्याय और व्यवस्था बनाए रखना व्यक्तिगत ईमानदारी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.

सुप्रीम कोर्ट के 2019 के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाया था. इसलिए यह घोटाला सीधे तौर पर केंद्र सरकार की छवि पर भी असर डालता है.

निजी बातचीत में संघ से जुड़े लोगों का मानना है कि राम मंदिर चोरी का मामला भी समय के साथ लोगों की याद से धुंधला पड़ जाएगा. लेकिन यह दाग उन पर लंबे समय तक रह सकता है. यह पहले से कई नाकामियों, उलटे परिणाम वाले फैसलों, अजीब बयानों, बदलती नीतियों, और दुनिया में भारत की लगातार गिरती प्रतिष्ठा की लंबी कड़ी में ताजा जुड़ा है.

संघ परिवार लंबे समय से “चरित्र निर्माण” को अपना मूल उद्देश्य बताता रहा है. लेकिन सत्ता में आने के बाद उसका व्यवहार काफी अलग नजर आया है.

2019 में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मतदाताओं को यह जानने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक दलों को पैसा कहां से मिलता है.

राम मंदिर ट्रस्ट भी इसी तरह की दलील दे सकता था. “लोगों को यह जानने की जरूरत ही क्यों है कि दान में मिला पैसा कहां जा रहा है?” यह पहले वाली दलील के बिल्कुल अनुरूप होता.

आखिर दोनों जगहों का संचालन RSS में प्रशिक्षित शीर्ष लोग ही कर रहे हैं. इसलिए उनकी सोच, उनका नजरिया और उनका फैसला लेने का तरीका एक जैसा है. खासकर जिम्मेदारी और पारदर्शिता के मामले में.

ऐसी लापरवाह सोच के साथ राम मंदिर की यह घटना कोई असाधारण बात नहीं लगनी चाहिए.

प्रचार भी अब काम नहीं आ रहा

राम मंदिर के मामलों में RSS और BJP दोनों की भूमिका है. ऐसे में सिर्फ दूसरों पर दोष डालकर राम मंदिर घोटाले के असर से बचना मुश्किल है.

यह घटना भ्रष्टाचार से ज्यादा RSS-BJP की अक्षमता दिखाती है. यह साबित हुआ कि वे इतने महत्वपूर्ण एक संस्थान को भी ठीक से संभाल नहीं सके. फिर भी उन्हें इस मामले की गंभीरता का एहसास नहीं है.

उन के इस रवैये से बहुत से हिंदू दुखी हैं. उनकी आवाज उठाने वाला कोई नहीं है. लेकिन वे संवेदनशील हैं. वे साफ देख सकते हैं कि जो नेता हमेशा दूसरों के काम का श्रेय लेने में भी आगे रहते हैं, वही अब अपनी साफ दिखाई देने वाली नाकामियों से जिदपूर्वक इनकार कर रहे हैं.

अयोध्या का श्रेय झपट लेने के लिए आगे आ जाने वाले, दशकों तक काम करने वाले लोगों को किनारे कर, उद्घाटन समारोह में अकेले बैठ जाने वाले, उसका टीवी पर प्रचार करने, और बाद में चुनावी फायदा लेने के लिए घर-घर मंदिर की तस्वीरें बांटने वाले नेताओं में से किसी ने अब तक इस मामले पर कोई बयान नहीं दिया है.

जो नेता अक्सर एकदम मामूली बातों पर लंबे उपदेश देते रहते हैं, वही उस समय चुप हो जाते हैं जब उनसे जवाब की उम्मीद होती है. चाहे वे RSS के हों या BJP के, चाहे मामला देश का हो या विदेश का, वे चुप रहते हैं और इंतिजार करते हैं कि मामला अपने आप ठंडा पड़ जाए. यह भी कई मुद्दों पर उनकी समझ की कमी और जिम्मेदारी से बचने का ही एक और उदाहरण है.

जब लोग बार-बार ऐसा रवैया देखते हैं, तो बिलकुल आम आदमी भी इसे समझने लगता है. अब प्रचार यह सच नहीं छिपा सकता कि “सम्राट ने कपड़े नहीं पहने हैं.” उनकी चतुराई, ईमानदारी और क्षमता वैसी नहीं निकली, जैसी बताई गई थी. कोई भी सरकार हमेशा के लिए जनता की राय को अपने पक्ष में नहीं रख सकती.

क्या अयोग्यता भी एक नीति है?

अयोध्या का संबंध संघ परिवार की राजनीति और उसके सत्ता के सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंचने से भी गहराई से जुड़ा है. यह कोई साधारण जगह नहीं है, जहां ऐसी गलतियों और लापरवाही को आसानी से भुला दिया जाए. अगर कोई ऐसा मानता है, तो यह एक खास मानसिकता को दर्शाता है. यानी हर चीज़ को हल्के में लेने का रवैया. संघ शायद यह मानकर चल रहा है कि उसका कोई विकल्प नहीं है और लोग उसके साथ हर हाल में बने रहेंगे, चाहे वह कुछ भी करे.

लेकिन कोई नहीं बता सकता कि जनता की राय कब और किस घटना की वजह से बदलनी शुरू हो जाए. कई बार एक छोटी-सी घटना भी पहले हुई कई घटनाओं को अचानक नया अर्थ दे देती है, जो अब तक अस्पष्ट था. इसके बाद सत्ता में बैठे लोगों की छवि अपने आप बदलने लगती है और उसे नियंत्रित करने की कोशिशें बेकार साबित होती है.

फिलहाल संघ परिवार का रवैया, उसके कमजोर बयान और लगातार इनकार इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं. अगर उसने अपनी गलतियों, कमजोरियों और अपने लोगों की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए बात की होती और उसी हिसाब से कदम उठाए होते, तो उसकी बात ज्यादा भरोसेमंद लगती, लेकिन उसने ऐसा व्यवहार किया, जैसे वही पुलिस भी है, वकील भी और जज भी. जबकि दरअसल इस मामले में वही अभियुक्त है.

अयोध्या से लेकर नई दिल्ली तक, इस मामले की जिम्मेदारी और गलतियां संघ की हैं, न कि विपक्ष, मीडिया, वामपंथियों, इस्लामी संगठनों या ईसाई मिशनरियों की.

इसलिए जब वह इस मामले में दूसरों पर हिंदू धर्म के खिलाफ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाता है, तो उसके बयान खोखले लगते हैं. चाहे यह अपने लोगों को बचाने की कोशिश हो या सिर्फ अयोग्यता का उदाहरण, लोगों के मन में यह धारणा बन सकती है कि अयोध्या का राम मंदिर गलत लोगों के हाथों में है.

इस घटना को पहले लगे आरोपों के संदर्भ में भी देखा जाएगा. 1991 में भी संघ के नेताओं पर राम मंदिर के लिए मिले चंदे में गड़बड़ी करने के आरोप लगे थे. ये आरोप राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी बाबा लाल दास ने लगाए थे.

ऐसे में सबसे एक बड़ा सवाल यह है कि क्या बड़ी सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों पर अयोग्य लोगों को बैठाना कोई नीति है या सिर्फ मूढ़ता? आखिर RSS में समझदार, युवा और ईमानदार लोग भी हैं. फिर ऐसे लोग हमेशा किनारे क्यों रह जाते हैं? चाहे पार्टी हो, संगठन हो या सरकार, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े जिम्मेदार पद हों, हर जगह बार-बार यही झलक दिखाई देती है.

राजनीति का अनिश्चित खेल

अगर RSS असली सवालों को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ दूसरों पर आरोप लगाता रहेगा, तो वह अपने ही कई समर्थकों को भी दूर कर देगा. जब जरूरत अपने घर की सफाई करने की हो, तब दूसरों को दोष देना जिम्मेदारी से भागने जैसा है.

संघ परिवार को यह नहीं मान लेना चाहिए कि हिंदू हमेशा उसके साथ ही रहेंगे. BJP काफी हद तक इसलिए सत्ता में आई क्योंकि लोगों में पहले के नेताओं के प्रति असंतोष बढ़ गया था. अगर वही असंतोष मौजूदा नेताओं के खिलाफ भी बढ़ता है, तो उसके साथ भी वही हो सकता है.

संघ परिवार शायद यह मानकर चल रहा है कि उसने अब ऐसी स्थिति से बचने के लिए पूरी तैयारी कर ली है. पहली नज़र में यह बात सही भी लगती है.

लेकिन राजनीति में हमेशा एक ऐसा अनजान पहलू होता है, जिसका पहले से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. यह कब और कैसे सारी तैयारियों को बिगाड़ दे, कोई नहीं कह सकता.

लोकतंत्र में जनता की सोच को इस तरह प्रभावित करना पड़ता है कि उन्हें यह एहसास न हो कि उन्हें भुलावा देकर किसी दिशा में ले जाया जा रहा है.

यही वह बिन्दु है जहां संघ परिवार ज़रूरत से ज्यादा आत्मविश्वासी दिखाई देता है. उसे अपने संगठन, प्रचार, राजनीतिक गणित, और प्रबंधन पर बहुत ज्यादा भरोसा है. इसलिए वह अब भी वही पुराने आरोप दोहराकर सफलता मिलने की उम्मीद करता है.

उसे अपनी चतुराई पर बहुत भरोसा है. लेकिन भारत जैसे विविधता वाले देश में किसी भी चीज को पहले से तय मान लेना जोखिम भरा हो सकता है. एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए. जिस नाले को घर का गंदा पानी बाहर निकालने के लिए बनाया जाता है, वही नाला कभी-कभी तूफान के समय बाहर का गंदा पानी वापस घर के अंदर ले आता है.

शंकर शरण एक कॉलिमिस्ट और पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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