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Saturday, 8 August, 2026
होमविदेश'असमानता डिजिटल हो सकती है' —ज़ाम्बिया SC की भारतीय मूल की पहली महिला जज की चेतावनी

‘असमानता डिजिटल हो सकती है’ —ज़ाम्बिया SC की भारतीय मूल की पहली महिला जज की चेतावनी

जस्टिस आभा नायर पटेल ने यह भी कहा कि भाषा, साक्षरता, विकलांगता, दूरी और खर्च के आधार पर यह तय नहीं होना चाहिए कि किसे न्याय मिलेगा और किसे नहीं.

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नई दिल्ली: ज़ाम्बिया सुप्रीम कोर्ट में भारतीय मूल की पहली महिला जज, जस्टिस आभा नायर पटेल ने गुरुवार को न्याय के क्षेत्र में बिना सोचे-समझे किए जा रहे इनोवेशन (नई खोजों) के बारे में चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि इससे मौजूदा असमानताएं “सिर्फ़ डिजिटल” हो सकती हैं.

जज सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) द्वारा आयोजित वकीलों के एक कार्यक्रम में मुख्य भाषण दे रही थीं. उन्होंने “न्याय देने का भविष्य: इनोवेशन, समावेशिता और ईमानदारी” विषय पर बात की.

इस कार्यक्रम में भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना शामिल हुए.

जस्टिस पटेल ने कहा कि अदालतों में तकनीकी साधनों का इस्तेमाल तब तक नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि वे नतीजों की निष्पक्षता और न्याय तक पहुंच, दोनों में सुधार न करें. कोई भी साधन जो इनमें से किसी एक में भी खरा नहीं उतरता, उसे न्यायिक इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त माना जाता है, चाहे उसकी इंजीनियरिंग कितनी भी शानदार क्यों न हो.

जस्टिस पटेल ने कहा, “ईमानदारी के बिना इनोवेशन खतरनाक है. समावेशिता के बिना ईमानदारी अधूरी है, और इनोवेशन के बिना समावेशिता अक्सर इतनी धीमी होती है कि उसका कोई खास असर नहीं होता.”

दुनिया भर की न्यायपालिकाएं कानूनी रिसर्च, केस मैनेजमेंट, ई-फाइलिंग और प्रेडिक्टिव एनालिसिस में AI का इस्तेमाल कर रही हैं. इस पर जज ने कहा कि तकनीकी साधन न्यायिक सोच की जगह नहीं ले रहे हैं, बल्कि ज़्यादा संख्या वाले और कम जटिल मामलों में उसमें मदद कर रहे हैं.

उन्होंने ज़ाम्बिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोर्ट रिकॉर्ड के डिजिटाइज़ेशन और वर्चुअल गवाही की दिशा में उठाए गए “धीमे लेकिन सार्थक कदमों” पर विस्तार से बात की. कोविड के दौरान ज़रूरत के कारण अपनाए गए ये तरीके अब न्याय तक पहुंच बेहतर बनाने वाले साधनों के तौर पर पहचाने जाते हैं. वर्चुअल सुनवाई से उस मुक़दमेबाज़ की पहुंच बेहतर हो सकती है जिसके पास स्मार्टफोन और स्थिर इंटरनेट कनेक्शन है, लेकिन यह उस मुक़दमेबाज़ को बाहर कर सकती है जिसके पास इनमें से कुछ भी नहीं है. इसलिए, उन्होंने “अदालतों में तकनीक के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले स्पष्ट न्यायिक और पेशेवर मानकों” की मांग की.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि न्याय देने की प्रक्रिया में समावेशिता को सिर्फ़ एक नारा नहीं बनाया जाना चाहिए.

जस्टिस पटेल ने कहा, “न्याय में समावेशिता का मतलब है कि ग्रामीण ज़िले की वह महिला जिसने कभी कोर्ट का अंदरूनी हिस्सा नहीं देखा, वह भी यह समझ सके कि उसके अधिकार क्या हैं और उन्हें कैसे हासिल किया जाए. इसका मतलब है कि भाषा, साक्षरता, विकलांगता, दूरी और लागत चुपचाप यह तय न करें कि किसे न्याय मिलेगा और किसे नहीं.”

उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए बेंच (जजों), बार (वकीलों) और नीति बनाने वाले संस्थानों में प्रतिनिधित्व की ज़रूरत है. “सबको साथ लेकर चलने की सोच (इनक्लूसिविटी) कोई नई बात नहीं है. यह एक अधूरा काम है जो पीढ़ियों से चल रहा है, और इसे सही अंजाम तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी हमारी है.” उन्होंने मध्यस्थता के बारे में भी बात की, जो विवाद सुलझाने का एक उभरता हुआ विकल्प है; यह तरीका कम डरावना है और इसमें शामिल पक्षों की असल ज़िंदगी की हकीकत को ज़्यादा ध्यान में रखा जाता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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