नई दिल्ली: गोबर से बने इलेक्ट्रोड से लेकर गोमूत्र की रासायनिक प्रोफाइलिंग तक, कई आईआईटी के रिसर्चर्स ने कई सालों तक “काउपैथी” और “देसी गायों” के गुणों पर स्टडी की है. उनके इस काम को केंद्र सरकार के SUTRA-PIC कार्यक्रम के तहत फंड मिला है. SUTRA-PIC का पूरा नाम है—साइंटिफिक यूटिलाइजेशन थ्रू रिसर्च ऑगमेंटेशन-प्राइम प्रोडक्ट्स फ्रॉम इंडिजिनस काउज.
अब, छह साल बाद, इन परियोजनाओं के नतीजे सामने आने लगे हैं. दिप्रिंट की ओर से अब तक प्रकाशित शोध पत्रों के विश्लेषण से ऐसे निष्कर्ष सामने आए हैं, जिनमें प्रदूषित पानी को साफ करने वाले गोबर से लेकर गोमूत्र की रासायनिक संरचना और उसके औद्योगिक उपयोग तक शामिल हैं.
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने अप्रैल 2020 में SUTRA-PIC शुरू किया था. यह भारतीय गायों पर शोध के लिए खास तौर पर दी गई अपनी तरह की पहली ग्रांट थी. इसके लिए 98 करोड़ रुपये का स्वीकृत बजट रखा गया था. इसका उद्देश्य देसी गायों और उनसे मिलने वाले उत्पादों पर स्वास्थ्य, कृषि और पोषण के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देना था.
इस कार्यक्रम के तहत कुल 10 परियोजनाओं को मंजूरी मिली, जिनमें से चार का नेतृत्व आईआईटी के रिसर्चर्स ने किया. इनमें दो परियोजनाएं IIT-BHU, एक IIT (ISM) धनबाद और एक IIT कानपुर में चलाई गईं. बाकी परियोजनाएं नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी और ICAR-सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन कैटल जैसे संस्थानों में हुईं.
दिप्रिंट ने परियोजनाओं और फंड के उपयोग की जानकारी के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय से ईमेल और फोन के जरिए संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
SUTRA-PIC शुरू होने के समय कुछ वैज्ञानिकों ने मंत्रालय की आलोचना की थी. उनका कहना था कि मंत्रालय ने एक बहुत व्यापक प्रस्ताव साझा किया है, जिससे “खराब तरीके से तैयार किए गए” शोध पत्र सामने आ सकते हैं.
इसका मूल विचार DST के शुरुआती दस्तावेज में बताया गया था. उसमें कहा गया था, “ऐसा माना जाता है कि भारतीय गायों में कुछ खास गुण और विशेषताएं होती हैं. आम धारणा है कि देसी गाय स्थानीय वातावरण में स्वस्थ रह सकती है और आसानी से जीवित रह सकती है. देसी गायों के कई गुणों की विस्तार से वैज्ञानिक जांच की जरूरत है.”
रिसर्चर्स का कहना है कि उन्होंने इस चुनौती को किसी भी अन्य वैज्ञानिक परियोजना की तरह पूरी गंभीरता और वैज्ञानिक तरीके से लिया.
DST की ग्रांट पाने वाले एक आईआईटी वैज्ञानिक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “गाय से मिलने वाले उत्पादों के फायदे पहले से ही वेदों में बताए और दर्ज किए गए हैं. हम सिर्फ उस पर आधुनिक वैज्ञानिक तरीका लागू कर रहे हैं और विज्ञान के जरिए उसकी पुष्टि कर रहे हैं.”
यहां कुछ प्रमुख निष्कर्षों पर नजर डालते हैं.
उद्योग के लिए गोमूत्र
IIT-BHU में स्कूल ऑफ बायोकेमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अभिषेक एस धोबले ने SUTRA-PIC की 31 लाख रुपये की ग्रांट से कई रिसर्च पेपर प्रकाशित किए हैं. DST के प्रस्ताव के अनुरूप उनका शोध गाय से मिलने वाले उत्पादों और उप-उत्पादों, यानी दूध, गोबर और गोमूत्र की बेहतर गुणवत्ता पर केंद्रित है.
जर्नल ट्रॉपिकल एनिमल हेल्थ एंड प्रोडक्शन में प्रकाशित उनके एक रिसर्च पेपर में लिखा गया है, “गाय का गोबर और गोमूत्र बहुत महत्व रखते हैं और गायों को संतुलित पोषण देना इन उत्पादों और उप-उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने की कुंजी हो सकता है.”
लेकिन इस ग्रांट के तहत धोबले के नेतृत्व में किया गया सबसे उल्लेखनीय रिसर्च जुलाई 2025 में जर्नल एप्लाइड बायोकेमिस्ट्री एंड बायोटेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ.
“मेटाबोलोमिक प्रोफाइलिंग ऑफ काउ यूरिन ऑफ वैरियस ब्रीड्स रिवील्स बायोएक्टिव मेटाबोलाइट्स ऑफ डाइवर्स इंडस्ट्रियल एप्लिकेशंस” शीर्षक वाले इस अध्ययन में कहा गया कि पहली बार विभिन्न नस्लों की गायों के गोमूत्र की मेटाबोलाइट प्रोफाइल की तुलना की गई. रिसर्चर्स ने आठ नस्लों, जिनमें सात देसी और एक विदेशी नस्ल थी, के गोमूत्र पर मास स्पेक्ट्रोमेट्री की और ऐसे जैव सक्रिय यौगिकों की पहचान की, जिनके संभावित औद्योगिक उपयोग हो सकते हैं.
अध्ययन में गोमूत्र में फिनोल, क्रेसोल और एस्टर जैसे यौगिकों के साथ-साथ जाइलीन और फॉर्मामाइड जैसे विषैले पदार्थ भी पाए गए.
अध्ययन में कहा गया, “पहचाने गए यौगिकों के कई तरह के औद्योगिक और औषधीय उपयोग हैं. इनमें कीटाणुनाशक, फ्लेवरिंग, कॉस्मेटिक्स, कृषि रसायन और मेटाबोलिक इंजीनियरिंग में इस्तेमाल शामिल है.”
SUTRA-PIC का एक घोषित उद्देश्य चिकित्सा और स्वास्थ्य के लिए गाय से उत्पाद विकसित करना है, लेकिन इस अध्ययन में यह नहीं बताया गया कि अगर इन विषैले पदार्थों वाला गोमूत्र पिया जाए तो वह नुकसानदायक हो सकता है या नहीं.
DST के प्रस्ताव में कहा गया था, “देशभर में आयुर्वेदिक चिकित्सक गोमूत्र और उसके आसव का उपयोग कर रहे हैं. प्राचीन आयुर्वेदिक साहित्य में कैंसर, पेचिश, दस्त, रक्तचाप और अस्थमा जैसी बीमारियों के इलाज में गाय से मिलने वाले उत्पादों के औषधीय उपयोग का उल्लेख है.”
गौरतलब है कि भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान की एक पुरानी स्टडी में पाया गया था कि स्वस्थ गायों के गोमूत्र के नमूनों में कम से कम 14 प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया मौजूद थे.
साफ पानी और इलेक्ट्रोड के लिए गोबर
IIT (ISM) धनबाद में प्रोफेसर बृजेश कुमार मिश्रा और उनकी टीम ने जहरीली भारी धातुओं को पानी से निकालने के लिए गोबर से बनी सामग्री पर शोध किया. इस परियोजना के लिए मिश्रा को SUTRA-PIC के तहत 36 लाख रुपये मिले. यह परियोजना पर्यावरण इंजीनियरिंग और रसायन एवं रासायनिक जीवविज्ञान विभागों ने मिलकर चलाई.
इस परियोजना से जुड़ा एक शोध पत्र, जो अगस्त में बायोकेमिकल इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित होने वाला है, यह बताता है कि आसानी से उपलब्ध और कार्बन से भरपूर गोबर को सक्रिय कर प्रदूषित पानी से जहरीले क्रोमियम को हटाने के लिए अवशोषक सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
जब इस सामग्री ने क्रोमियम को सोख लिया, तो रिसर्चर्स ने पाया कि इसे ऊर्जा भंडारण उपकरणों के लिए इलेक्ट्रोड के रूप में दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.
शोध पत्र के सार में कहा गया है, “गोबर और औद्योगिक क्रोमियम (VI) जैसे दो तरह के कचरे को पर्यावरण और ऊर्जा से जुड़ी आधुनिक सामग्रियों में बदलकर यह तरीका न सिर्फ कचरा और प्रदूषण कम करता है, बल्कि संसाधनों की पुनर्प्राप्ति का उदाहरण भी पेश करता है, जो सर्कुलर इकोनॉमी और ग्रीन केमिस्ट्री के सिद्धांतों के अनुरूप है.”
इस शोध पत्र में खास तौर पर “देसी गायों” पर ध्यान नहीं दिया गया है. इसमें गोबर को ही अध्ययन की सामग्री माना गया है.
ज़ंग लगने से रोकने के लिए गोबर की खाद
IIT कानपुर में प्रोफेसर कल्लोल मंडल को गोबर की खाद से पर्यावरण के अनुकूल ज़ंग लगने से रोकने वाले पदार्थ विकसित करने और कंक्रीट में इस्तेमाल होने वाले स्टील की सुरक्षा की जांच करने के लिए SUTRA-PIC के तहत 58 लाख रुपये की ग्रांट मिली.
जून 2024 में बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी रिपोर्ट्स में प्रकाशित मंडल और अन्य रिसर्चर्स की स्टडी में पाया गया कि गोबर की खाद का अर्क हल्के स्टील के लिए कम लागत वाला और पर्यावरण के अनुकूल जंगरोधी पदार्थ बन सकता है. अध्ययन में कहा गया कि खाद में मौजूद यौगिक धातु पर एक सुरक्षात्मक परत बना देते हैं, जिससे जंग लगने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है.
IIT मद्रास की विज्ञान और प्रौद्योगिकी पत्रिका शास्त्र के अनुसार, शोध टीम प्रयोगशाला में मिले परिणामों को औद्योगिक स्तर पर परखने की योजना बना रही है.
#NewsFeature
A research team led by Prof. Kallol Mondal, Department of Materials Science & Engineering, study the possibilities of Cow dung being a green option to battle the bane of metal corrosion.https://t.co/KUBXsQ6OEU#sustainability #NetZero #circulareconomy #IITKanpur… pic.twitter.com/2WdbGOX2dj— IIT Kanpur (@IITKanpur) July 18, 2024
पंचगव्य की वैज्ञानिक जांच
SUTRA-PIC के तहत मंजूर कुछ परियोजनाएं अभी अंतिम लेखन चरण में हैं और अभी प्रकाशित नहीं हुई हैं.
IIT-BHU की एक परियोजना पंचगव्य, यानी दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर के मिश्रण, की “संक्रमणरोधी” क्षमता का अध्ययन कर रही है. इस परियोजना के लिए प्रोफेसर श्रेयांस कुमार जैन को 65 लाख रुपये की ग्रांट मिली.
ICAR-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के रिसर्चर्स ने पहले ही पंचगव्य के “प्रतिरक्षा बढ़ाने वाले गुणों” पर अध्ययन किया है, लेकिन जैन इसका अध्ययन मेटाबोलोमिक्स के जरिए कर रहे हैं. इसमें मास स्पेक्ट्रोमेट्री की मदद से जैविक रासायनिक अणुओं का विश्लेषण किया जाता है.
जैन ने कहा, “हमने परिसर के पास की गायों के नमूने इस्तेमाल किए हैं और पशु चिकित्सकों की मदद से गायों की नस्ल की पहचान की है.”
उनका रिसर्च पेपर और उससे जुड़ा पेटेंट अभी तैयार नहीं है. उन्होंने काम पूरा करने के लिए छह महीने का अतिरिक्त समय मांगा है. उनका कहना है कि आंकड़ों की विश्वसनीयता को देखते हुए कई जर्नल इस अध्ययन को प्रकाशित करने के लिए तैयार होंगे.
SUTRA-PIC ने आईआईटी के बाहर पंचगव्य पर एक और परियोजना को भी फंड दिया. गांधीनगर की नेशनल फॉरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी के रिसर्चर जयराजसिंह सरवैया को “असली” पंचगव्य उत्पादों की पहचान के लिए एक प्रोटोकॉल विकसित करने हेतु 42 लाख रुपये की ग्रांट मिली.
अप्रैल में उत्तराखंड के गंगोत्री मंदिर ने घोषणा की थी कि मंदिर में प्रवेश से पहले पंचगव्य का सेवन अनिवार्य होगा और इसे हिंदू परंपरा में “शुद्धिकरण का सर्वोच्च रूप” बताया था.
भारत में गायों पर रिसर्च तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र बन रहा है और यह सिर्फ SUTRA-PIC तक सीमित नहीं है. 2024 में IIT मद्रास के एक रिसर्चर ने गोबर आधारित हर्बल मच्छर भगाने वाले उत्पाद के लिए एक “नया तरीका” विकसित किया था, जबकि IIT गुवाहाटी ने 2023 में “आधुनिक जीवन और चिकित्सा विज्ञान में गौ विज्ञान” पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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