पुणे: चार अक्षरों के एक नाम ने पुणे के आपस में जुड़े मारवाड़ी समाज को हिला दिया है—सिया. देखते ही देखते यह नाम उस डर की पहचान बन गया है, जिसके बारे में इस परंपरावादी समाज को हमेशा लगता था कि यह कभी उनके घर तक नहीं पहुंचेगा.
18 जून को, जब 26 साल के रियल एस्टेट कारोबारी परिवार के वारिस केतन अग्रवाल की पुणे से 60 किलोमीटर से ज्यादा दूर स्थित लोहागढ़ किले से गिरने के बाद मौत हो गई और उसके पांच दिन बाद पुलिस ने उनकी मंगेतर सिया गोयल और उसके दोस्त चेतन चौधरी को उनकी हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया, तब से यह मामला कोर्ट की चारदीवारी से बहुत आगे निकल चुका है. अब यह व्हाट्सऐप ग्रुपों तक पहुंच चुका है, जहां हर घंटे सैकड़ों मैसेज, सीसीटीवी क्लिप, पुलिस अपडेट और तरह-तरह के अनुमान वाले संदेश आ रहे हैं.
“क्या तुमने सिया और चेतन का स्नैपचैट वीडियो देखा?”
“आज पुलिस सिया को वापस घर लेकर आई थी, मैंने खुद देखा.”
“मुझे लगता है कि सिया बच जाएगी, जेल तो लड़के को ही होगी.”
लगता है हर किसी के पास कोई नई थ्योरी या फिर कोई नया फॉरवर्ड किया हुआ वीडियो है.
यह मामला कोरेगांव पार्क और कोथरुड के डिनर टेबल से लेकर कारोबारी परिवारों के ड्रॉइंग रूम तक पहुंच गया है, जहां लोग उस घटना को समझने की कोशिश कर रहे हैं जिसे कई लोग “कल्पना से परे” बता रहे हैं.
यह मामला पुणे के अग्रवाल समाज में बांटे जाने वाले साप्ताहिक सामुदायिक परिशिष्ट ‘अग्र भूषण’ के पन्नों तक भी पहुंच गया है. पिछले हफ्ते के अंक की हेडलाइन थी—“सिया, ये तूने क्या किया?”

पुणे में करीब 50,000 से 55,000 मारवाड़ी रहते हैं. ज्यादातर लोगों के अनुसार यह समाज शहर में पूरी तरह घुल-मिल गया है. वे मराठी भाषा बोलते हैं, रियल एस्टेट और कारोबार से जुड़े हैं और जिस शहर में रहते हैं, उसका सम्मान करते हैं, लेकिन समाज के कई लोगों का कहना है कि यह मेल-जोल कभी उनकी मूल परंपराओं तक नहीं पहुंचा. शादी किससे होगी, कब होगी और किन शर्तों पर होगी—इन फैसलों को लेकर उनकी सोच नहीं बदली. समाज के बुजुर्गों का कहना है कि मारवाड़ी समाज में अरेंज मैरिज की व्यवस्था केवल आपसी मेल पर नहीं, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा पर भी टिकी होती है और यही एक ऐसी विरासत थी जिस पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं था.
सिया गोयल के घर के पास स्थित गंगाधाम मार्केट में शाम बिताइए, जहां हर शाम जैन और मारवाड़ी परिवार खाने, खरीदारी और आराम से टहलने के लिए इकट्ठा होते हैं. वहां होने वाली बातचीत बार-बार इसी मामले पर आकर रुक जाती है.
एक डोसा स्टॉल पर खड़े करीब 50 साल के एक व्यक्ति ने कहा, “19 साल की लड़की की सोच इतनी अपराधी कैसे हो सकती है? वह शादी के लिए सिर्फ मना भी तो कर सकती थी.” घटना के अगले दिन यानी 19 जून को सिया 20 साल की हो गई थी.
सामाजिक टिप्पणीकारों का कहना है कि पुणे में धन-दौलत और सामाजिक हैसियत होने के बावजूद कई बनिया परिवार अब भी ऐसे अनलिखे नियमों से बंधे हैं, जहां माता-पिता को ‘ना’ कहना सामाजिक रूप से भारी पड़ सकता है. आर्थिक आराम ने उन्हें एक तरह की सहमति वाली ज़िंदगी में ढाल दिया है—बिलकुल फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ जैसी सोच, लेकिन इस मामले के बाद यह सोच और भी सख्त हो गई है. माता-पिता ने अपनी पकड़ ढीली करने के बजाय और मजबूत कर दी है.
अब समाज के बुजुर्ग कह रहे हैं कि अरेंज मैरिज की व्यवस्था को और “मजबूत” करने की ज़रूरत है. इसके लिए लड़का-लड़की की जांच को और सख्त बनाया जाए, बैकग्राउंड चेक को औपचारिक किया जाए और शादी से पहले एचआईवी व दूसरी बीमारियों की जांच के लिए ब्लड टेस्ट भी कराया जाए. जो परिवार पहले शादी-ब्याह में भरोसेमंद रिश्तेदारों और परिचितों के जरिए रिश्ता तय कर लेते थे, अब वे निजी जासूस रखने की बात कर रहे हैं. मैरिज ब्यूरो का कहना है कि अब चिंतित माता-पिता ऐसे सवाल पूछ रहे हैं, जो उन्होंने पहले कभी नहीं पूछे थे.

युवा पीढ़ी की सोच अलग है. कोथरुड के एक बार में बैठे 20-25 साल के एक अग्रवाल युवक ने कहा कि इस मामले ने अरेंज मैरिज को लेकर उसका नजरिया बदल दिया है.
उसने अपने दोस्तों से ड्रिंक का घूंट लेते हुए कहा, “इस केस के बाद मैं अरेंज मैरिज नहीं करूंगा. इससे अच्छा तो मैं अकेला रहना पसंद करूंगा, बजाय इसके कि मेरी किस्मत खराब निकल जाए.”
लेखक और कॉलमिस्ट चेतन भगत ने हाल ही में लिखे एक लेख में कहा कि असली कहानी सिया गोयल पर लगे आरोप नहीं हैं, बल्कि उसके पीछे दिखने वाला पैटर्न है. छोटे और मझोले कारोबारी परिवार अपने घरों को भी उसी तरह चलाते हैं जैसे अपना कारोबार—ऊपर से नीचे तक आदेश देने वाला तरीका, असहमति के लिए कम जगह और ऐसे बच्चे की चाह जो हर बात मान ले, साथ ही भव्य शादी को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानना.
30 जून को टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे अपने लेख में भगत ने कहा, “दूसरी पीढ़ी के कई कारोबारी वारिस अपने परिवार का विरोध इसलिए भी नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें आर्थिक आराम पहले मिल जाता है और आत्मनिर्भरता बाद में. आर्थिक निर्भरता, भावनात्मक आज़ादी को हासिल करना और भी मुश्किल बना देती है.”

भरोसे की व्यवस्था पर उठे सवाल
कृष्ण कुमार गोयल पिछले 40 साल से भी ज्यादा समय से पुणे के मारवाड़ी और अग्रवाल समाज को करीब से देखते आ रहे हैं. वह रियल एस्टेट कंपनी कोहिनूर ग्रुप के चेयरमैन हैं और शहर की लगभग हर अग्रवाल सामाजिक संस्था में किसी न किसी पद पर रह चुके हैं. 73 साल के गोयल, अग्रवाल समाज फेडरेशन की पुणे इकाई के अध्यक्ष हैं. उनके अपने शब्दों में, जब समाज में कुछ गलत होता है तो लोग सबसे पहले उन्हें ही फोन करते हैं.

गोयल ने बताया कि वह अग्रवाल परिवार को कई सालों से जानते हैं. उनके अनुसार, यह परिवार करीब दो दशक पहले तुलजापुर से पुणे आया था और यहां सफल कारोबार खड़ा किया. परिवार के तीनों भाई एक ही छत के नीचे मिलकर काम करते थे. विदेश में पढ़ाई कर चुके केतन एक आदर्श मारवाड़ी बेटे की तरह थे—शांत स्वभाव के, अनुशासित और अपने माता-पिता का सम्मान करने वाले.
गोयल ने इस रिश्ते को बनते हुए भी देखा था. उन्होंने बताया कि दोनों परिवारों की मुलाकात सिया के चाचा के जरिए हुई थी. उन्होंने अपने परिवार के बारे में भरोसा दिलाया था कि वे सम्मानित और आर्थिक रूप से मजबूत लोग हैं. उन्होंने कहा था, “यहां शादी करने में कोई बुराई नहीं है.”
गोयल के मुताबिक, केतन अनुशासित थे और “ऐसे लड़के नहीं थे जो अपनी मनमर्जी करते हों.” जब परिवार ने यह रिश्ता सुझाया, तो केतन ने बिना किसी विरोध के हामी भर दी.
केतन के बारे में गोयल ने कहा, “अगर उनके माता-पिता को लगता था कि यह सही रिश्ता है, तो वह उनके फैसले पर भरोसा करते थे.”
गोयल के मुताबिक, सगाई के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे किसी को कोई शक हो.
गोयल ने बताया कि केतन की मां और बहन से हुई बातचीत के आधार पर उन्हें पता चला कि सिया अक्सर अग्रवाल परिवार के घर आती थी और पूरे परिवार के साथ प्यार से पेश आती थी. वह अपने होम बेकरी के कारोबार से उनके लिए केक बनाकर लाती थी, परिवार के कार्यक्रमों में शामिल होती थी और बाहर से देखने पर ऐसा लगता था कि उसने इस रिश्ते को पूरी तरह अपना लिया है.
गोयल ने कहा, “उसने कभी केतन को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उसे पसंद नहीं करती. कभी ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि वह खुश नहीं थी.”
अब गोयल को सबसे ज्यादा वही बातें परेशान करती हैं, जिन्हें उस समय परिवार ने आम समझा था. शादी से पहले सिया और चेतन चौधरी के बीच लगातार होने वाली फोन पर बातचीत, जिसके बारे में परिवार को मीडिया रिपोर्टों से पता चला. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, दोनों के बीच 2,000 से ज्यादा फोन कॉल हुई थीं.
उन्होंने कहा, “अगर कोई लड़की अपने ही घर में इतनी देर तक फोन पर बात करती है, तो क्या उसके माता-पिता की नज़र नहीं पड़ती? यहीं दोनों परिवारों से लापरवाही हुई. वे अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे रहे थे.”
गोयल ने यह भी बताया कि शुरुआत में इस मामले को एक हादसा माना गया था, लेकिन अंतिम संस्कार के कुछ दिन बाद जब केतन की बहन सिया से मिलने गई और उससे कुछ सवाल पूछे, तो उसके जवाब मेल नहीं खा रहे थे. गोयल के मुताबिक, परिवार को लगा कि “सिया उतनी दुखी नहीं दिख रही थी जितनी उसे होना चाहिए था.”
गोयल ने याद करते हुए कहा, “सिया ज्यादा रो नहीं रही थी. वह बिल्कुल सामान्य लग रही थी. तभी केतन की बहन को शक हुआ.”
इसी शक के बाद परिवार पुलिस के पास पहुंचा. बाद में सीसीटीवी फुटेज सामने आई, जिसमें पुलिस के अनुसार हुडी पहने एक व्यक्ति, यानी चेतन, भीषण गर्मी में किले पर दिखाई दिया. इसी बात ने हादसे वाली थ्योरी को कमजोर कर दिया.
गोयल सिया के लिए कोई सहानुभूति नहीं रखते.

गोयल ने कहा, “अगर वह किसी और से शादी करना चाहती थी, तो साफ कह सकती थी. बहस होती, परिवार शायद विरोध भी करता. लेकिन बहस खत्म हो जाती है. अब उसके इस कदम ने अरेंज मैरिज की पूरी व्यवस्था पर लोगों का भरोसा तोड़ दिया है.”
गोयल के लिए यह मामला सिर्फ एक अलग घटना नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक समस्या का संकेत है. उनका मानना है कि इसकी जड़ संयुक्त परिवारों के टूटने में है. उन्होंने कहा कि उनके बचपन में एक घर में आठ-नौ लोग रहते थे, लेकिन अब परिवार सिर्फ दो-तीन लोगों तक सिमट गए हैं. इसके साथ ही वह रोज़मर्रा की सामाजिक निगरानी भी खत्म हो गई है, जो पहले चाचा-चाची, दादा-दादी या दूसरे बड़े-बुजुर्ग करते थे. वे पूछते थे कि कहां गए थे, किसके साथ थे और देर क्यों हुई.
उन्होंने कहा, “अब दादा-दादी कहां हैं? आजकल दादा, पिता और बेटी सभी एक ही टीवी स्क्रीन देख रहे हैं, तो पीढ़ियों के बीच शर्म और संकोच कहां बचा?”
इस समस्या का समाधान बताते हुए गोयल चाहते हैं कि समाज इसे गंभीरता से ले. उनका कहना है कि जल्दबाजी में सगाई नहीं होनी चाहिए. रिश्ता तय करने से पहले दोनों परिवारों की ज्यादा मुलाकातें होनी चाहिए—”एक-दो नहीं, कम से कम दस मुलाकातें.” इसके अलावा शादी तय करने से पहले ब्लड ग्रुप की जांच, आपसी अनुकूलता और निजी जासूसों के जरिए बैकग्राउंड चेक भी कराया जाना चाहिए. उनका कहना है कि यह कदम युवाओं को सजा देने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए है.
उन्होंने बताया कि दूल्हा-दुल्हन चुनने में सावधानी बरतने को लेकर समाज की बैठकें भी हो चुकी हैं.
उन्होंने कहा, “आगे से बच्चों को अपनी पसंद का मौका दीजिए. बेटे या बेटी को किसी एक फैसले के लिए मजबूर करने की जरूरत नहीं है. उन्हें कुछ खुली जगह दीजिए.”
गोयल का कहना है कि अब प्रेम विवाह भी समाज के लिए कोई बड़ी समस्या नहीं है. उनके अनुसार, समाज भी अब “आधुनिक” हो गया है, लेकिन इसके साथ एक शर्त भी है.
उन्होंने कहा, “बस शादी शाकाहारी समाज के भीतर होनी चाहिए. जैन या गुजराती परिवार से भी हमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन मुस्लिम, ईसाई, पिछड़ी जातियों और मांसाहारी परिवारों से शादी नहीं होनी चाहिए.”

‘हमारे माता-पिता हमसे बेहतर जानते हैं’
सात महीने पहले, केतन अग्रवाल केस सामने आने से काफी पहले, 29 साल के जय और 25 साल की कृति की शादी बिल्कुल एक पारंपरिक मारवाड़ी अरेंज मैरिज की तरह हुई.
एक रिश्तेदार ने किसी पारिवारिक समारोह में कृति को देखा और फिर दोनों परिवारों की मुलाकात करवाई. दोनों परिवारों की पृष्ठभूमि एक जैसी थी. दोनों कारोबारी परिवार थे. जय का परिवार रियल एस्टेट के कारोबार में है, जबकि कृति का परिवार मसाले और किराना व्यापार से जुड़ा है. जाति भी एक थी और सामाजिक हैसियत भी. सिर्फ तीन महीने के भीतर शादी तय हो गई.
जय ने हंसते हुए कहा, “हमारी जल्दी सगाई हुई और उससे भी जल्दी शादी हो गई.”
शादी से पहले दोनों की मुलाकात सिर्फ कुछ ही बार हुई. ज्यादातर मुलाकातों में माता-पिता या रिश्तेदार साथ होते थे, हालांकि, दोनों फोन पर अक्सर बात करते थे. लेकिन दोनों में से किसी ने भी इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाया.
जय ने कहा, “मैंने कभी किसी रिश्ते की तलाश नहीं की, क्योंकि मुझे हमेशा पता था कि मैं उसी लड़की से शादी करूंगा जिसे मेरे माता-पिता चुनेंगे. जब मैं कृति से मिला तो सब कुछ मेल खा गया—एक ही समाज, एक जैसी पारिवारिक पृष्ठभूमि और जाना-पहचाना परिवार. वह संयुक्त परिवार में रहने के लिए भी सहज थी. अगर वह चाहे तो हमारे पारिवारिक कारोबार में भी शामिल हो सकती है.”
कृति की कहानी भी इससे अलग नहीं थी.
कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह सोच रही थीं कि नौकरी करें या परिवार के कारोबार से जुड़ें. तभी शादी का रिश्ता आ गया.
उन्होंने सरल शब्दों में कहा, “मुझे यह अच्छा रिश्ता और अच्छी जिंदगी लगी. मेरी कोई खास चेकलिस्ट नहीं थी. बस परिवार अच्छा हो और लड़का अच्छा हो.”

सिया गोयल केस ने इन दोनों की अरेंज मैरिज को लेकर सोच में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है. उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि शादी के बाद कोई इंसान बदल सकता है या अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं करेगा.
जय ने कहा, “यह ज़िंदगी का हिस्सा है. शादी निभाने का नाम है. हमारे माता-पिता ने भी शादी से पहले एक-दूसरे के साथ ज्यादा समय नहीं बिताया था. पिता पूरे दिन काम करते थे. मां घर संभालती थीं. फिर भी उन्होंने अपना रिश्ता निभाया. शादी में समझौता और एक-दूसरे के साथ तालमेल जरूरी होता है. हमारे माता-पिता हमसे बेहतर जानते हैं और उन्होंने हमें रास्ता दिखाया है.”
कृति के लिए आने वाला भविष्य पहले से तय है. 30 साल की उम्र से पहले एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे. अगर नौकरी करनी हुई तो वह बाद में भी की जा सकती है.
उन्होंने कहा, “जब बच्चे हो जाएंगे तो समय कहां मिलेगा? हमारी जिंदगी आरामदायक है. अगर बाद में काम करने का मन हुआ तो मैं अपने पिता या ससुर के कारोबार से जुड़ सकती हूं.”
शादी का यह तरीका अब भी वही है, लेकिन इसे लेकर पूछे जाने वाले सवाल अब बदल रहे हैं.
मैचमेकर की भूमिका
पुणे के शिवाजीनगर में स्थित हार्मनी मैरिज ब्यूरो 1992 से लगभग पूरी तरह लोगों की सिफारिशों के भरोसे चल रहा है. इसकी 82-वर्षीय संचालिका नंदिनी सुरेश डांगे अब तक 17,000 शादियां तय करा चुकी हैं.
उन्होंने कहा, “प्रक्रिया में ज्यादा बदलाव नहीं आया है. आज भी परिवार प्रोफाइल देखते हैं, बायोडाटा बदलते हैं, कई महीनों तक फोन पर बात करते हैं और फिर मुलाकात होती है. अगर दोनों पक्ष तैयार हों तो शादी की ओर बढ़ते हैं.”
लेकिन उनके मुताबिक, अब सबसे बड़ा बदलाव उन सवालों में आया है जो लोग ‘हां’ कहने से पहले पूछते हैं.
डांगे ने कहा, “अब लोग डिटेक्टिव एजेंसी के बारे में पूछने लगे हैं. मैं इसके लिए कोई फीस नहीं लेती. मैं सिर्फ उन्हें ऐसे व्यक्ति का संपर्क दे देती हूं, जो उनकी जरूरत के हिसाब से जांच कर सके.”

अब लोग ऐसे सवाल भी पूछते हैं—”क्या होने वाले दूल्हे या दुल्हन का पहले किसी के साथ रिश्ता रहा है? क्या उसकी किसी आदत के बारे में परिवार को जानकारी नहीं है?”
डांगे ने कहा, “अगर मुझे किसी लड़के या लड़की के परिवार के बारे में कुछ गलत पता चलता है तो मैं उन्हें आगे नहीं बढ़ने की सलाह देती हूं. अगर मुझे उनका व्यवहार या उनकी उम्मीदें पसंद नहीं आतीं, तो मैं उनका रजिस्ट्रेशन ही नहीं करती.”
उन्होंने एक बार एक परिवार को एक लड़के के व्यवहार को लेकर पहले ही आगाह कर दिया था.
उन्होंने कहा, “लड़का खुद बहुत सांवला था, लेकिन उसे गोरी और सुंदर दुल्हन चाहिए थी. वह 1989 में पैदा हुआ था, लेकिन 2000 में जन्मी लड़की चाहता था. एक लड़की उसमें रुचि रखती थी, लेकिन मैंने अपनी जिम्मेदारी निभाई और उसके परिवार को अपनी चिंता बता दी.”
डांगे को एक ऐसी मां भी याद हैं, जिनकी शर्त थी कि उनकी बेटी का होने वाला पति पोर्शे या मर्सिडीज़ मेबैक कार का मालिक होना चाहिए, क्योंकि उनकी बेटी ब्रिटेन में ऐसी जीवनशैली की आदी है.
डांगे हंसते हुए याद करती हैं, “मैंने उससे पूछा, ‘क्या आपकी बेटी कार के अंदर सोती है?’ शिक्षा, अच्छे संस्कार और आपसी सम्मान कहीं ज्यादा जरूरी हैं. इसलिए मैंने उसका रजिस्ट्रेशन ही नहीं किया.”

फिर भी उनका मानना है कि पुणे के इस मामले ने यह दिखा दिया है कि कुछ कारोबारी समुदायों में आज भी शादी को लेकर दबाव मौजूद है.
उन्होंने कहा, “हां, मारवाड़ी और गुजराती जैसे कुछ समाजों में कम उम्र में शादी करने का दबाव होता है, लेकिन अगर कोई शादी नहीं करना चाहता तो उसे साफ-साफ कह देना चाहिए.”
उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास आने वाले ग्राहकों में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा पढ़ी-लिखी होती हैं. महिलाओं की उम्मीदें भी बदल गई हैं. उनके अनुसार, यही अंतर अब शादियों में देरी की एक वजह बन रहा है.
उन्होंने कहा, “आज लड़कियां लड़कों जितना, और कई बार उनसे भी ज्यादा कमा रही हैं.”
डांगे के पास अब भी सबसे ज्यादा ग्राहक कारोबारी परिवारों से आते हैं. खासकर उनके अलग ‘वीआईपी’ रजिस्टर में उद्योगपति, राजनेता और अमीर परिवार शामिल होते हैं. ये परिवार अब भी ज्यादातर अपने जैसे कारोबारी परिवारों में ही रिश्ता तलाशते हैं.

परंपरावादी सोच भी अब भी बनी हुई है.
डांगे ने कहा, “अंतर-धार्मिक शादियां आमतौर पर तभी होती हैं जब वह प्रेम विवाह हो. वरना परिवार आज भी अपने ही समाज के भीतर शादी करना चाहते हैं.”
लेकिन अब परंपरा और आधुनिक सोच के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश हो रही है.
उन्होंने बताया कि अब लड़कियां साफ कह रही हैं कि वे संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहतीं. उनके मैरिज ब्यूरो ने हाल ही में एक ऐसा सवाल भी फॉर्म में जोड़ा है, जिसकी जरूरत शायद दस साल पहले नहीं पड़ती.
“क्या आप अपना खुद का बच्चा चाहते हैं?”
डांगे ने कहा, “नई पीढ़ी अब अलग तरह के सवाल पूछ रही है.”
उनके मुताबिक, केतन अग्रवाल केस के बाद जांच-पड़ताल जरूर बढ़ गई है, लेकिन इससे अरेंज मैरिज की व्यवस्था खत्म नहीं हुई है.
डांगे ने कहा, “मुझे लगता है कि उस लड़की (सिया) की सोच अपराधी थी. उसका मानसिक नजरिया अलग था. वह इतनी छोटी उम्र में ऐसा क्यों करेगी? वह चाहती तो सिर्फ शादी से मना कर सकती थी.”

अपवाद, नियम नहीं
हर कोई यह नहीं मानता कि केतन अग्रवाल केस से यह सीख मिलती है कि मारवाड़ी परिवारों को अब ज्यादा डिटेक्टिव रखने चाहिए, ज्यादा बैकग्राउंड चेक कराने चाहिए या शादी तय होने से पहले लड़का-लड़की को ज्यादा समय तक मिलने देना चाहिए.
एक मारवाड़ी आईएएस अधिकारी ने, नाम न छापने की शर्त पर, कहा कि इस मामले के बाद समाज में जो घबराहट फैल गई है, उससे कहीं ज्यादा पुरानी और बड़ी समस्या नजरों से ओझल हो सकती है.
उन्होंने कहा, “अगर मारवाड़ी समाज खुद को ही पीड़ित मानने लगे, तो फिर हम बाकी लोगों की क्या उम्मीद करेंगे? यह भारत के सबसे सफल समाजों में से एक है. यह वैसा ही है जैसे एलन मस्क कहें कि उनके पास पैसे नहीं हैं.”
उनके मुताबिक, पिछले 100 साल में मारवाड़ी समाज ने खुद को राजस्थान और हरियाणा से आए प्रवासी कारोबारी परिवारों से बदलकर भारत के सबसे समृद्ध कारोबारी समुदायों में शामिल कर लिया. उन्होंने शिक्षा में निवेश किया, उद्योग खड़े किए और पुणे जैसे शहरों में अपनी मजबूत सामाजिक व्यवस्था बनाए रखते हुए खुद को वहां के समाज में भी शामिल कर लिया.
उन्होंने कहा, “हां, मारवाड़ी समाज थोड़ा परंपरावादी है, लेकिन इसकी वजह वे इलाके भी हैं, जहां से यह समाज आया है. यह सिर्फ समाज की नहीं, बल्कि भौगोलिक पृष्ठभूमि की भी समस्या है. और यह सिर्फ मारवाड़ी परिवारों की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय परिवारों की समस्या ज्यादा है.”
उन्होंने कहा कि लगभग हर समाज में आज भी बच्चे अपने माता-पिता के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी महसूस करते हैं, जबकि पश्चिमी देशों में ऐसा कम देखने को मिलता है.
उन्होंने कहा, “शादी करने का बहुत ज्यादा भावनात्मक दबाव होता है. यह कुछ-कुछ स्टॉकहोम सिंड्रोम जैसा है. माता-पिता की तरफ से धमकी, भावनात्मक दबाव और ब्लैकमेल तक होता है. ‘मैं शादी नहीं करना चाहता’ कहना बहुत कम मामलों में एक सही विकल्प माना जाता है.”
उनके अनुसार, इस दबाव का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है, हालांकि पुरुष भी इससे पूरी तरह अछूते नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि वह यह बात अपने अनुभव से जानते हैं.
मारवाड़ी समाज के हिसाब से शादी की सामान्य उम्र निकल जाने के बावजूद उन्होंने कई बार अपने माता-पिता के शादी करने के दबाव का विरोध किया है.
उन्होंने कहा, “अब उन्होंने जोर देना बंद कर दिया है, लेकिन याद दिलाना अभी भी बंद नहीं किया है.”
उन्होंने बताया कि शादी को लेकर उनकी झिझक की एक वजह उनका पेशा भी है.
उन्होंने कहा, “अगर आप IAS अधिकारी हैं और आपकी शादी सफल नहीं होती, तो वह सार्वजनिक मामला बन जाता है. जीवनसाथी की कोई शिकायत भी खबर बन जाती है. लोग समय के साथ बदल जाते हैं. किसी चीज की गारंटी नहीं होती. फिर मैं ऐसा जोखिम क्यों लूं?”
समाज के बुजुर्गों की तरह वह यह नहीं मानते कि इसका समाधान अरेंज मैरिज की प्रक्रिया को और सख्त बनाना है.
उन्होंने कहा कि 50 साल पहले लोगों के पास बहुत कम विकल्प होते थे.
“आज लोगों के पास विकल्प हैं. महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं. पुरुष भी पढ़े-लिखे हैं. और अब बहुत से लोग शादी न करने का फैसला भी कर रहे हैं.”
वह इस बात को भी नहीं मानते कि मारवाड़ी परिवारों की महिलाएं सिर्फ चुपचाप फैसले मानने वाली होती हैं.
उन्होंने अपनी एक करीबी दोस्त का उदाहरण दिया, जो चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और परीक्षा में टॉप भी कर चुकी हैं. शादी के बाद उन्होंने अपनी इच्छा से करियर छोड़ दिया और एक संपन्न कारोबारी परिवार की जिंदगी अपनाई.
उन्होंने कहा, “उनके पास काम करने का पूरा मौका था. लेकिन उन्होंने खुद वह जिंदगी चुनी. हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि महिलाओं का हर फैसला दबाव में लिया गया होता है.”

जहां उन्हें सबसे बड़ी समस्या दिखती है, वह है बड़ों की हर बात बिना सवाल किए मान लेना.
उन्होंने कहा, “हम अपने घर तो साफ रखते हैं, लेकिन सड़कें गंदी छोड़ देते हैं. हम बाहर बराबरी की बातें करते हैं, लेकिन घर के अंदर पितृसत्ता को निभाते हैं.”
उनके लिए सिया गोयल का मामला अरेंज मैरिज पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि ऐसी सोच पर सवाल खड़ा करता है, जहां किसी असहमति को अक्सर बदतमीजी या अवज्ञा समझ लिया जाता है.
लेकिन साथ ही वह इस बात से भी सावधान रहने की सलाह देते हैं कि एक अपराध के आधार पर पूरे समाज के बारे में निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए.
उन्होंने कहा, “हमें कैसे पता कि सिया मानसिक रूप से बीमार नहीं थी? हो सकता है यह सिर्फ एक अपवाद वाला मामला हो.”
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: ब्यूटी पार्लर, जिम और क्लिनिक की शिकायतों से परेशान NCR की RWAs