नई दिल्ली: कई पीढ़ियों से सेंट स्टीफंस कॉलेज भारत में एलीट शिक्षा की एक खास पहचान रहा है — जिसकी नींव लिबरल आर्ट्स की पढ़ाई, डिबेटिंग सोसाइटी, अकादमिक एक्सीलेंस और ऐसे लंबे इतिहास पर रही है, जिसने कई पब्लिक इंटेलेक्चुअल्स, सिविल सर्वेंट्स और राजनीतिक नेताओं को तैयार किया, लेकिन अब उसकी अगली प्रिंसिपल एक बिल्कुल अलग दुनिया से आती हैं.
प्रोफेसर सुसान एलियास, जो 1 जून को सेंट स्टीफंस की पहली महिला प्रिंसिपल बनेंगी, एक कंप्यूटर साइंटिस्ट हैं जिनका काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरडिसिप्लिनरी इंजीनियरिंग रिसर्च पर बेस्ड रहा है. उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब भारतीय विश्वविद्यालय टेक्नोलॉजी, रोजगार और खुद लिबरल एजुकेशन के भविष्य जैसे सवालों से जूझ रहे हैं.
सुसान एलियास ने दिप्रिंट से कहा, “आज़ादी से पहले जब सेंट स्टीफंस शुरू हुआ था, तब भारत को नेताओं की ज़रूरत थी. इसलिए आज तक यह भारत को बेहतरीन नेतृत्व देता आया है, लेकिन आज भारत को एंटरप्रेन्योर्स की ज़रूरत है. भारत को ऐसे युवाओं की ज़रूरत है जो ज्यादा नौकरियां पैदा करें और भारत को रिसर्च साइंटिस्ट्स की भी ज़रूरत है. हमें अपने देश को समय से आगे रखना होगा.”
12 मई की एक घोषणा में दिल्ली के बिशप और कॉलेज के चेयरमैन राइट रेव्ड डॉ. पॉल स्वरूप ने एलियास की नियुक्ति का ऐलान किया.
बयान में कहा गया, “कॉलेज की सुप्रीम काउंसिल यह घोषणा करते हुए खुश है कि प्रोफेसर सुसान एलियास 1 जून 2026 से कॉलेज की 14वीं प्रिंसिपल और पहली महिला प्रिंसिपल के रूप में कार्यभार संभालेंगी.”
अगर आप मेरी प्रोफाइल देखें, तो मैं आज के सेंट स्टीफंस के हिसाब से फिट नहीं बैठती, लेकिन अगर आप देखें कि आगे सेंट स्टीफंस को किस दिशा में ले जाना है, तो मैं उसके लिए सही हूं
–सुसान एलियास
क्रिश्चियन स्टूडेंट्स के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण वाले इस अल्पसंख्यक संस्थान सेंट स्टीफंस को भारत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित लिबरल आर्ट्स और साइंस कॉलेजों में गिना जाता है. 2024 की NIRF रैंकिंग में देश के कॉलेजों में तीसरे स्थान पर रहे इस संस्थान को लंबे समय से अकादमिक एक्सीलेंस के लिए जाना जाता है.
हालांकि, एलियास की नियुक्ति एक नए बदलाव का संकेत देती है—रिसर्च, एंटरप्रेन्योरशिप और उभरती टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ते फोकस का.
कंप्यूटर साइंटिस्ट और अकादमिक एडमिनिस्ट्रेटर एलियास का करियर ज्यादातर इंजीनियरिंग संस्थानों और रिसर्च लीडरशिप भूमिकाओं में रहा है. ऐसे में वह सेंट स्टीफंस में एक ऐसी प्रोफाइल लेकर आ रही हैं, जो कॉलेज की पारंपरिक ह्यूमैनिटीज़-प्रधान नेतृत्व शैली से काफी अलग है.
इंजीनियरिंग क्लास से सेंट स्टीफंस तक
कुछ महीने पहले तक एलियास एक दूसरे विश्वविद्यालय का भविष्य तय करने में लगी हुई थीं. सेंट स्टीफंस उनकी योजना का हिस्सा नहीं था.
हाल ही में वे चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के लखनऊ कैंपस में प्रो वाइस-चांसलर (रिसर्च) के पद पर थीं. उन्होंने जनवरी में वहां जॉइन किया था और विश्वविद्यालय के लिए पांच साल का रोडमैप तैयार कर रही थीं, तभी अचानक सेंट स्टीफंस की बात सामने आई.
कॉलेज से उनका जुड़ाव इस साल मार्च में शुरू हुआ, जब उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस फैकल्टी की भर्ती के लिए विषय विशेषज्ञ के तौर पर बुलाया गया.
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने देखा कि कई उम्मीदवार इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से थे और उनकी अपनी योग्यता भी तकनीकी रूप से उन्हें सेंट स्टीफंस में पदों के लिए योग्य बनाती थी.
उन्होंने कहा, “मैंने कभी खुद को सेंट स्टीफंस से नहीं जोड़ा क्योंकि मेरा बैकग्राउंड इंजीनियरिंग का है, लेकिन जब मैं यहां आई, तब मुझे लगा कि शायद मैं कई साल पहले भी यहां काम कर सकती थी.”
इसी दौरान उन्हें पता चला कि प्रिंसिपल पद के लिए भर्ती के दूसरे दौर में आवेदन अभी भी खुले हुए हैं. उन्होंने आवेदन किया, दिल्ली में इंटरव्यू दिए और आखिरकार उनका सिलेक्शन हो गया. उन्होंने कहा कि यह नियुक्ति “पूरी तरह अप्रत्याशित” थी.
उन्होंने कहा, “मैं विश्वविद्यालय में प्रो वाइस-चांसलर के तौर पर एक अलग रास्ते पर थी और शायद एक साल में वाइस-चांसलर बनने की तैयारी में थी. और अचानक यह बिल्कुल अलग तरह का मौका सामने आ गया.”
एलियास ने माना कि शुरुआत में उनका प्रोफाइल सेंट स्टीफंस के लिए थोड़ा अलग लग सकता है.
“अगर आप मेरा प्रोफाइल देखें, तो मैं आज के सेंट स्टीफंस के हिसाब से फिट नहीं बैठती. लेकिन अगर आप देखें कि भविष्य में सेंट स्टीफंस को किस दिशा में जाना है, तो मैं उसके लिए फिट हूं.”
अपने पुराने प्रिंसिपलों से अलग एक प्रिंसिपल
एलियास की नियुक्ति इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि उनका प्रोफाइल सेंट स्टीफंस की पारंपरिक नेतृत्व शैली से अलग है. 1881 में बने इस कॉलेज को लंबे समय तक ऐसे प्रिंसिपलों ने चलाया, जिनकी पृष्ठभूमि थियोलॉजी, लिबरल आर्ट्स और मानविकी विषयों में रही. शुरुआती कई प्रिंसिपल इतिहास, दर्शनशास्त्र, साहित्य और चर्च प्रशासन से जुड़े रहे थे.
बाद के वर्षों में भी ज्यादातर प्रिंसिपल मानविकी विषयों से ही आए. एलियास से पहले जॉन वर्गीज़ के पास अंग्रेज़ी साहित्य में डॉक्टरेट थी. उनसे पहले वाल्सन थंपू (2008-2016) ने थियोलॉजी में डॉक्टरेट की थी और उनसे पहले अनिल विल्सन (1991-2007) भी अंग्रेज़ी साहित्य की पृष्ठभूमि से थे.
इसके उलट, एलियास का पूरा करियर लगभग इंजीनियरिंग संस्थानों और रिसर्च प्रशासन में बीता है.
उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, उन्होंने 1991 में चेन्नई के भारथ इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की. इसके बाद उन्होंने मल्टीमीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग और अन्ना यूनिवर्सिटी से मल्टीमीडिया कम्युनिकेशंस में पीएचडी की. बाद में उन्होंने आईआईटी मद्रास में मेम्ब्रेन कंप्यूटिंग में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च भी की.
मेरे अनुभव में, जब आप किसी संस्थान को चलाना चाहते हैं, तब यह मायने नहीं रखता कि आप किस विषय या पृष्ठभूमि से आते हैं. ज़रूरी यह है कि आपकी सोच अच्छी हो, आपका नज़रिया उदार हो और अकादमिक मामलों को लेकर आपका संतुलित दृष्टिकोण हो
– दिनेश सिंह, पूर्व DU वाइस-चांसलर
पिछले 30 सालों में उन्होंने कई इंजीनियरिंग और रिसर्च संस्थानों में बड़े शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर काम किया. वह वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (VIT), चेन्नई में स्कूल ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग (SENSE) की डीन रहीं. वहां उन्होंने सेंटर ऑफ एडवांस्ड डेटा साइंसेज की डिप्टी डायरेक्टर के तौर पर भी काम किया. बाद में वह हिंदुस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस में रिसर्च डायरेक्टर और डिजिटल हेल्थ एंड बायो-इनोवेशंस सेंटर की प्रमुख बनीं.
उनकी रिसर्च आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, मेडिकल इमेजिंग, रोबोटिक्स और डिजिटल हेल्थ जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित रही है. साथ ही उनका काम एंटरप्रेन्योरशिप और स्टार्टअप मेंटरशिप से भी जुड़ा रहा है. वह DRDO द्वारा फंड किए गए पांच प्रोजेक्ट्स की प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर रह चुकी हैं और उनका कहना है कि उन्होंने अपने पूरे करियर में जानबूझकर रिसर्च और इनोवेशन से जुड़े पद चुने.
एलियास का कहना है कि यही पृष्ठभूमि उनके चयन की वजह बनी.
“वे ऐसे प्रोफाइल की तलाश में थे जिसमें मजबूत रिसर्च स्किल्स हों और जो कैंपस में वह चीज ला सके जो अभी वहां नहीं है.”
एलियास ने कहा कि समय के साथ उन्हें लगातार ऐसी नेतृत्व भूमिकाएं मिलती गईं जिनमें “रिसर्च मुख्य हिस्सा” था. इससे उन्हें फंडिंग लाने, रिसर्चर्स को गाइड करने और संस्थानों में इनोवेशन का माहौल बनाने का मौका मिला. उन्होंने कहा, “जब मैं वीआईटी में डीन थी, तब मैं काफी फंडिंग लेकर आई थी.”
एलियास का मानना है कि सेंट स्टीफंस में नेतृत्व और लिबरल शिक्षा की मजबूत विरासत पहले से है, लेकिन रिसर्च और एंटरप्रेन्योरशिप अभी भी कैंपस में अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्र हैं.
उन्होंने कहा, “ये दोनों चीज़ें कैंपस में नहीं हैं और यही मेरी ताकत हैं. उनकी विरासत को बिना बदले मैं इसे एक वैल्यू एडिशन के तौर पर ला पाऊंगी.”
उन्हें यह भी भरोसा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकें भविष्य में पारंपरिक लिबरल आर्ट्स विषयों को भी बदल देंगी.
उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मानविकी और सामाजिक विज्ञान अभी एआई से पूरी तरह मजबूत हुए हैं. किसी भी पेशे में एआई इस्तेमाल करने वाले लोग उन लोगों की जगह ले लेंगे जो एआई का इस्तेमाल नहीं करेंगे. अब मैं कॉलेज को एआई के लिए तैयार करना चाहती हूं और आने वाली अगली बड़ी लहर यानी क्वांटम कंप्यूटिंग के दौर के बारे में जागरूक बनाना चाहती हूं.”
निरंतरता और बदलाव
सेंट स्टीफंस के पूर्व छात्रों के बीच एलियास की नियुक्ति ने खुशी के साथ-साथ भारत के सबसे चर्चित कॉलेजों में से एक के भविष्य को लेकर गहरी चर्चा भी शुरू कर दी है.
कांग्रेस सांसद और कॉलेज के पूर्व छात्र शशि थरूर ने एक्स पर इस नियुक्ति का स्वागत करते हुए लिखा, “1975 में महिलाओं को छात्राओं के रूप में प्रवेश दिया गया था, अब समय आ गया था कि किसी महिला को कॉलेज का नेतृत्व करने की भी अनुमति मिले.”
राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने इसे “गर्व और ऐतिहासिक क्षण” बताया. उन्होंने एक्स पर लिखा कि पुराने और वर्तमान सभी स्टीफेनियन कॉलेज की पहली महिला प्रिंसिपल का स्वागत करके खुश हैं.
उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य और सेंट स्टीफंस के पूर्व छात्र साकेत मिश्रा के लिए यह नियुक्ति संस्थान के इतिहास में देर से आया, लेकिन महत्वपूर्ण कदम है. हालांकि, उनका कहना था कि सबसे अहम सवाल आखिरकार केवल जेंडर नहीं, बल्कि शैक्षणिक नेतृत्व का है. उन्होंने इस बदलाव को “ताज़ी हवा का झोंका” बताया.
उन्होंने कहा, “अगर वह यह सुनिश्चित कर पाती हैं कि कॉलेज अपने शैक्षणिक स्तर को बनाए रखे, तो मुझे बेहद खुशी होगी.” उन्होंने यह भी कहा कि कैंपस जीवन में महिलाओं की अधिक भागीदारी और मौजूदगी इस नियुक्ति का सकारात्मक परिणाम हो सकती है.
साथ ही मिश्रा ने यह भी कहा कि आज उच्च शिक्षा में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को जिस तरह पेश किया जा रहा है, उसे लेकर कुछ सावधानी बरतने की ज़रूरत है. उनके अनुसार, एआई को पढ़ाई और रिसर्च को मजबूत करने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल होना चाहिए, न कि किसी लिबरल आर्ट्स संस्थान की पहचान बन जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “सेंट स्टीफंस कॉलेज को इंजीनियरिंग कॉलेज बनाने की कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है.” उनका मानना है कि संस्थान की असली ताकत अब भी मानविकी और शुद्ध विज्ञान विषयों में है, खासकर अर्थशास्त्र, भौतिकी और रसायन विज्ञान जैसे विषयों में.
फिर भी उन्होंने माना कि सेंट स्टीफंस जैसे संस्थान शिक्षा और रोजगार की दुनिया में हो रहे बड़े बदलावों से खुद को अलग नहीं रख सकते.
उन्होंने कहा, “दुनिया आगे बढ़ रही है और अगर हम तकनीक के साथ नहीं बढ़ेंगे, तो हम ज्यादा आगे की बात नहीं कर पाएंगे.” उन्होंने तकनीकी समझ को रोजगार और रिसर्च दोनों के लिए ज़रूरी बताया.
सेंट स्टीफंस कभी उन छात्रों के लिए जाना जाता था जो सिर्फ पढ़ाई में ही नहीं बल्कि डिबेट, खेल और सार्वजनिक जीवन में भी आगे रहते थे. मिश्रा ने कहा, “इसकी ताकत ऐसे लोगों को तैयार करने में थी जो आम लोगों से जुड़े रहते थे और समाज की सेवा करने की कोशिश करते थे.”
उन्होंने यह भी कहा कि दशकों में कैंपस का सामाजिक स्वरूप काफी बदल चुका है. पहले सेंट स्टीफंस में ज्यादातर छात्र विशेष और सुविधासंपन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आते थे, लेकिन आज के छात्र अधिक महत्वाकांक्षी और सामाजिक रूप से विविध हैं. उनके अनुसार, आज के छात्र आर्थिक दबावों और करियर बनाने की मजबूत सोच से प्रभावित हैं.
उन्होंने कहा, “आज छात्र अपने लिए मौके बनाने पर कहीं ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.”
एक अच्छे प्रिंसिपल की पहचान
दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर दिनेश सिंह ने भी एलियास की नियुक्ति का स्वागत किया. उन्होंने इस सोच से असहमति जताई कि सेंट स्टीफंस हमेशा सिर्फ मानविकी और सार्वजनिक जीवन से ही जुड़ा रहा है. लिबरल आर्ट्स की उसकी विरासत को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि कॉलेज में लंबे समय से मजबूत विज्ञान विभाग भी रहे हैं.
उन्होंने कहा, “सेंट स्टीफंस में कम से कम 60 सालों से गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं.”
सिंह के अनुसार, असली सवाल यह नहीं है कि कोई प्रिंसिपल किस विषय से आता है, बल्कि यह है कि क्या उसमें किसी शैक्षणिक संस्थान का नेतृत्व करने के लिए जरूरी बौद्धिक सोच और दृष्टिकोण है.
उन्होंने कहा, “मेरे अनुभव में, जब आप किसी संस्थान को चलाना चाहते हैं, तब यह मायने नहीं रखता कि आप किस विषय या पृष्ठभूमि से आते हैं. ज़रूरी यह है कि आपकी सोच अच्छी हो, आपका नज़रिया उदार हो और अकादमिक मामलों को लेकर आपका संतुलित दृष्टिकोण हो.”
सिंह ने एलियास की नियुक्ति को उच्च शिक्षा में महिलाओं के नेतृत्व के लंबे इतिहास से भी जोड़ा. उन्होंने हंसा मेहता का उदाहरण दिया, जो स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा की सदस्य और महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा की पहली वाइस-चांसलर थीं. उनके अनुसार, हंसा मेहता ने यह दिखाया कि प्रभावशाली संस्थागत नेतृत्व केवल किसी एक विषय की पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं होता.
उन्होंने कहा, “वह भारत की सबसे बेहतरीन वाइस-चांसलरों में से एक थीं. इसलिए हमें इस बात को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए.”
सिंह ने इस नियुक्ति को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के बाद भारतीय उच्च शिक्षा में आ रहे व्यापक बदलावों से भी जोड़ा. उनके अनुसार, नई शिक्षा नीति में अलग-अलग विषयों के मेल, ग्रेजुएट लेवल पर रिसर्च और इनोवेशन आधारित शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया गया है.
उन्होंने कहा, “एनईपी एक स्वस्थ मिश्रण की बात करती है, जिसमें ट्रांस-डिसिप्लिनरी अप्रोच हो और ऐसी पढ़ाई हो जो वास्तविक दुनिया से जुड़ी हो. पहली बार केंद्र स्तर पर सामूहिक रूप से हमसे कहा जा रहा है कि भारत में ग्रेजुएशन लेवल पर इनोवेशन और रिसर्च को बढ़ावा दिया जाए.”
इस मायने में, सिंह का कहना था कि एलियास की रिसर्च और तकनीक केंद्रित पृष्ठभूमि भारतीय विश्वविद्यालयों में पहले से चल रहे बड़े बदलावों के अनुरूप है, न कि उनसे बिल्कुल अलग कोई नई दिशा.
भविष्य के लिए अतीत को समझना
हालांकि, एलियास एंटरप्रेन्योरशिप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रिसर्च की बात करती हैं, लेकिन उनका कहना है कि सेंट स्टीफंस के लिए उनका विजन कॉलेज को एकदम से पूरी तरह बदलने का नहीं है. बल्कि उनकी पहली प्राथमिकता यह समझना है कि 145 साल पुराने इस कॉलेज ने अपनी पहचान और प्रतिष्ठा कैसे बनाई और उसे इतने सालों तक कैसे बनाए रखा.
एलियास ने कहा, “मैं उनके मॉडल को समझना चाहती हूं क्योंकि उन्होंने पहले भी और आज भी भारत के बेहतरीन लोग तैयार किए हैं.”
उनके लिए चुनौती सिर्फ कॉलेज में तकनीक से जुड़े नए रास्ते जोड़ने की नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि कोई भी नई दिशा “सेंट स्टीफंस ब्रांड” को बनाए रखे.
उन्होंने कहा, “चाहे हम एंटरप्रेन्योर तैयार करें या वैज्ञानिक, उनमें वह ब्रांड वाली पहचान होनी चाहिए. देश के बाकी हिस्से भी एंटरप्रेन्योर तैयार करते हैं, लेकिन जब हम उन्हें तैयार करें तो उनमें कुछ अलग और खास होना चाहिए.”
उन्होंने इशारा किया कि उनका तरीका अचानक बड़े बदलाव करने के बजाय धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला होगा. उनकी नियुक्ति को लेकर बातचीत में एआई, इंटरडिसिप्लिनरी शिक्षा और रोजगार पर काफी जोर रहा है, लेकिन एलियास का कहना है कि पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव तुरंत नहीं किए जा सकते.
इसके बजाय वह मौजूदा लिबरल आर्ट्स ढांचे के साथ-साथ वैल्यू-ऐडेड कोर्स, सर्टिफिकेट प्रोग्राम और तकनीक से जुड़े नए प्रयास शुरू करने की सोच रही हैं. बड़े स्तर पर पाठ्यक्रम में बदलाव बाद में हो सकता है.
एलियास ने कॉलेज के इतिहास में पहली महिला प्रिंसिपल बनने को लेकर हो रही चर्चा पर भी बात की. उन्होंने कहा कि “ग्लास सीलिंग” तोड़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि चयन समिति खास तौर पर किसी महिला उम्मीदवार की तलाश कर रही थी.
उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि वे खास तौर पर किसी महिला को ढूंढ रहे थे. वे ऐसे प्रोफाइल की तलाश में थे जिसमें मजबूत रिसर्च स्किल्स हों और जो कैंपस में वह चीज ला सके जो अभी वहां नहीं है.”
उनका कहना था कि उनकी उम्मीदवारी को अलग बनाने वाली चीज तीन दशकों में हासिल किया गया शिक्षण, रिसर्च, एंटरप्रेन्योरशिप और प्रशासनिक अनुभव का मेल था.
उन्होंने कहा, “यह संयोजन हासिल करना आसान नहीं होता. यही चीज मुझे अलग बनाती है.”
हालांकि, एलियास के विजन के केंद्र में आखिरकार छात्र ही हैं. इंजीनियरिंग संस्थानों में अपना ज्यादातर करियर बिताने के बावजूद उन्होंने कहा कि वह खास तौर पर लिबरल आर्ट्स और मानविकी के छात्रों के साथ काम करने को लेकर उत्साहित हैं.
उन्होंने कहा, “35 सालों में मेरे करियर का सबसे अच्छा हिस्सा छात्र रहे हैं. मैं बहुत छात्र-केंद्रित व्यक्ति हूं. मैं उनके साथ बैठना चाहती हूं, उन्हें देखना चाहती हूं और समझना चाहती हूं कि वे कैसे सीखते हैं.”
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